गीता में योग की व्याख्या

डॉ. श्यामदेवमिश्र

(continued from previous article)

योग की गीता में व्याख्या से मन में शंका उठती है कि प्रभु ने योग की कई परिभाषाएं दे डालीं जिससे योग के स्वरुप को समझना सामान्य जिज्ञासु के लिए कठिन हो गया है। पहले सिद्धि और असिद्धि की समता को योग कहा; फिर कर्म की कुशलता को योग कहा और आगे दु:ख के संयोग के वियोग को भी योग कहा। किन्तु विचार करने पर यह शंका निर्मूल सिद्ध होती है। प्रभु ने योग के अनेक लक्षण नहीं बताए हैं अपितु एक ही लक्षण को अनेक प्रकार से समझाया है। वास्तव में फल की आशा छोड़कर कर्त्तव्य बुद्धि से कर्म करते रहना ही कर्मयोग है। उस फल की आशा को छोड़ने के अलग-अलग विवरण हैं। फल की आशा छोड़ देने पर सिद्धि और असिद्धि में समानता हो जायेगी। फल की आशा से ही कर्म-सिद्ध होने पर सुख और असिद्ध होने पर दुःख हुआ करता है; फलाशा न रहने पर न सुख होगा न दुःख। तब सिद्धि और असिद्धि में समता हो गयी। यही योग है। इसी प्रकार समानता रखकर कर्म करते जाने से आत्मा पर कर्म का कोई प्रभाव नहीं आता इसलिए यह अर्थात् योग एक बड़ा कौशल या चतुरता भी हुई। यहाँ फलाशा के त्याग को ही ‘कौशल’ शब्द से प्रकट किया है क्योंकि फलाशा-त्याग न करने के स्थिति में फलाशा पूर्ण न होने पर दु:ख हुआ करता है। फलाशा छोड़ देने पर दु:ख का भी प्रसंग नहीं रहेगा। अत: दु:ख संयोग-वियोगरूप लक्षण में भी वही बात प्रकारांतर से कही जाएगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही विषय को भिन्न-भिन्न शब्दों से भिन्न-भिन्न अर्थों में समझाया गया है। ‘योग’ शब्द का अर्थ कर्म-योग मान लेने पर सभी लक्षणों की सङ्गति उक्त प्रकार से हो जाती है।

यहाँ एक और प्रश्न उठता है जिसका समाधान अत्यावश्यक है कि फलाशा-त्याग अर्थात् फल की आशा को छोड़ देने से क्या अभिप्राय है?

फल की आशा छोड़ने से तात्पर्य है कि फल के प्रति चिंता ही न करे। इसके दो कारण हैं –  पहला कि फल के बारे में सोचने पर कर्म दुष्प्रभावित या विकृत होगा। दूसरा केवल कर्म के प्रति मनुष्य का अधिकार है यानी केवल कर्म करना ही उसके वश में है; फल के प्रति मनुष्य का अधिकार अर्थात् वश ही नहीं है। यानी फल क्या मिलेगा? कितना मिलेगा? कब मिलेगा? इत्यादि मनुष्य के अधिकार-क्षेत्र के बाहर की बात है। अत: अधिकार-क्षेत्र से बाहर के विषय में चिन्तना करना ही व्यर्थ है। इसीलिये प्रभु ने कहा है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि अनधिकार होने के कारण यदि मनुष्य फल की इच्छा का त्याग कर देवे यानी उसके बारे में सोचे ही नहीं तब फिर कर्म करने का प्रयोजन क्या रहा? और बिना प्रयोजन के मनुष्य कर्म ही क्यूँ करे?

इसका समाधान यह है कि प्रयोजन दो प्रकार का समझा जा सकता है – १. क्षणिक या ऐहिक और २. आत्यन्तिक या पारलौकिक । क्षणिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख की अवधि निश्चित हो; यानी जिसमें फल के उपभोग की समाप्ति अर्थात् वियोग-रूपी दु:ख भी मिलना तय है। क्षणिक प्रयोजन के ही तीन अवान्तर रूप हैं – धर्म, अर्थ और काम ये तीन पुरुषार्थ। किन्तु उत्कृष्टतम कर्म से प्राप्त ब्रह्मलोकरूपी फल के भी भोग के पश्चात् पुन: मनुष्य जीवन-मृत्यु-चक्र में फँसता है। भगवान् ने स्वयं ही कहा है – आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन (गीता )

किन्तु आत्यन्तिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख का अन्त ही नहीं है अर्थात् जिसमें लेश-मात्र भी दु:ख नहीं है। यही कारण है कि इसे परमप्रयोजन या परमपुरुषार्थ मोक्ष कहा है।

अब यह मनुष्य पर है कि वह किस प्रयोजन का चयन करता है। मनुष्य, जो कि लेश-मात्र भी दुखाकाङ्क्षी नहीं है, वह ‘दुःख हो ही न’ ऐसा प्रबंध क्यों न करे? वही आत्यन्तिक-प्रयोजन अर्थात् मोक्ष है जो केवल पूर्वोक्त योग यानि कर्मयोग  से ही संभव है।

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(Source of image : http://www.navhindu.com/bhagwad-gita-chapter-3/)

इस प्रकार जो कर्म, मनुष्य को स्वभाव से ही बांधने वाले हैं, वे ही मुक्ति देने वाले हो जाएं – यही वस्तुत: कर्मों में कुशलता है। कर्म करने की ऐसी ही चतुरता को योग कहते हैं कि मनुष्य कर्म करता भी जाए और उसके बंधन में भी न फंसे। काजल की कोठारी में जाकर बिना कालिख लगाए निकल आना ही बड़ी भारी चतुरता है। ऐसी ही कुशलता योग से प्राप्त होती है कि कर्म करता भी जाए और उसका फल भी अपने पर आने न दे।

इस प्रकार देखा जाए तो योग: कर्मसु कौशलम् योग की परिभाषा से बढ़कर उसकी महिमा का उद्घोष है।

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

 

योग: कर्मसु कौशलम्

[It was broadcasted by International Broadcast service, All India Radio, New Delhi in 2016 on the occasion of International Yog Day]

डॉ. श्यामदेवमिश्र

‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृतेतस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है। योग के इस हेतु को स्पष्टतया जानने के लिये, सबसे पहले यह समझना परमावश्यक है कि ‘योग क्या है’? या ‘योग किसे कहते हैं’?

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(Source of Image: http://www.boisetemple.org/bhakti-yoga/)

गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – समत्वं योग उच्यते(२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – पश्य मे योगमैश्वर्यम्(९/५); और ३ समाधि; जैसे – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया(६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“समत्वं योग उच्यते”(गीता २/४८)

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

‘योग: कर्मसु कौशलम्’  के दो अर्थ लिये जा सकते हैं –

1. कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।

२. कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।

यदि हम पहला अर्थ लें यानि कर्मों में कुशलता ही योग है तो, जो बड़ी ही कुशलता से सावधानी से ठगी, चोरी या फिर हत्या आदि कर्म करता है उसका कर्म भी ‘योग’ हो जाएगा! किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और फिर श्लोक में निषिद्ध कर्मों का प्रसंग भी नहीं है। अगर हम यहाँ ‘कर्म’ शब्द से केवल शुभ कर्मों का ही ग्रहण करें तब फिर ‘कर्मसु कौशलम् योग:’ इस पद के दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में भावार्थ निकलेंगे जो प्रसंग-विशेष में तो ठीक प्रतीत होते हैं किन्तु गीता में प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग के सिद्धांतों से इतर सिद्ध होते हैं। आइए उन दोनों पर ही गौर करते हैं –

शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

अब यहाँ प्रश्न यह है कि उक्त दोनों ही भावार्थ, गीता में प्रतिपादित योग की संकल्पना से किस प्रकार भिन्न हैं? इसको समझने के लिए योग की परिभाषा को समझना होगा, जिसमें कहा है  –

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है। इस श्लोक की व्याख्या में कई विद्वानों ने योग का अर्थ परमात्मा से सम्बन्ध माना है यानी परमात्मा से सम्बन्ध रखते हुए कर्म करो अर्थात जो कुछ करो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से करो और कर्मों को परमात्मा को ही अर्पण कर दिया करो।

योग या कर्मयोग के पूर्वोक्त स्वरूप के आलोक में अब हम पुन: योग: कर्मसु कौशलम् के उन पूर्वोक्त भावार्थों पर विचार करते हैं। अगर यहाँ शुभ-कर्मों को ही कुशलतापूर्वक करने का नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये हुए शुभ-कर्मों के फल से बंध जाएगा। कहा भी है– फले सक्तो निबध्यते; अत: उसकी स्थिति समता में नहीं रहेगी और उसके दुखों का नाश नहीं होगा। फलत: प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग की संगति इस अर्थ में नहीं बैठेगी।

यहाँ एक जिज्ञासा है कि शुभ कर्मों को करने के बाद भी मनुष्य दु:ख क्यूँ पाएगा? इसका समाधान यह है कि कितना भी शुभ कर्म-करने वाला क्यूँ न हो किन्तु मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं अथवा सब कुछ सर्वदा ही उसके मनोनुकूल नहीं होता; जो कि अंतत: उसे दुःख ही पहुঁचाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर सत्यवादी हरिश्चंद्र, जो कि स्वप्न में भी अशुभ कर्मों से दूर रहे, उन्हें अत्यंत कष्ट क्यों झेलना पड़ता!

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति कैसे हो? इसका उत्तर है – जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति अर्थात् मोक्ष होने पर। ये कब होगा? उत्तर है – कर्मफलों के संपूर्ण भुक्त हो जाने पर। फिर शंका हुई कि जब तक जीवन है तब तक न तो कर्म करना कभी समाप्त होगा और न ही उसके फल का भोग और बिना फल भोगे तो कृत-कर्म की समाप्ति भी नहीं होगी; कहा है –नाभुक्तं क्षीयते कर्म। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म से फल की उत्पत्ति एवं फल-भोगार्थ पुन: कर्म; इस प्रकार से तो यह अनवरत चलने वाला क्रम बन गया। दूसरे शब्दों में, जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति ही नहीं होगी। यह सुनकर तो और दुःख बढ़ ही गया। अरे भाई! जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक दु:ख भी समाप्त नहीं होगा। यह तो बड़ी ही भारी विपदा है! क्योंकि जो व्यक्ति धरती पर आया है उसका कर्मासक्त होना और फिर इस आसक्ति के कारण दु:खी होना निश्चित है। शास्त्रों में आया है –कर्मणा बध्यते जन्तु: अर्थात् कर्मों से मनुष्य बंध जाता है। कर्म कितने ही बढियां हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फल का संयोग और वियोग भी होता है। जिसका आरम्भ और अन्त संयोग और वियोग से होता है, उसके द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? साथ ही यह प्रश्न भी अनुत्तरित रह गया कि दु:ख के संयोग का वियोग कैसे हो? अर्थात् दु:ख का निवारण कैसे हो?

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु प्रभु ने योग या कर्मयोग का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए उपदेश किया कि बिना आसक्ति रखे कर्म करना ही योग है, जिससे कारण कर्म के फल अर्थात् भोग से सम्बन्ध छूट जाता है और अन्तत: मुक्त होने के कारण दुःख भी समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण प्रभु ने ‘योग’ को दु:ख के संयोग का वियोग भी ही माना है –

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

यदि उपर्युक्त अर्थ (यानि कर्मों में कुशलता ही योग है) का ही ग्रहण करना अभीष्ट हो तो फिर कुशलता का अर्थ समत्व या निष्कामभाव यानि कि ‘योग’ लेना होगा। किन्तु जब उपर्युक्त पद में ‘योग’ शब्द आया ही है तो फिर पुन: कुशलता का अर्थ योग करने की क्या आवश्यकता है? यानि “कर्मों में कुशलता ही योग है” इस अर्थ से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में “योग: कर्मसु कौशलम्” का ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाए? पूर्व के श्लोक में योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि यहाँ योग ही विधेय है कर्मों की कुशलता नहीं फिर कर्म तो नाशवान हैं; नाशवान् के द्वारा अविनाशी की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अत: महत्त्व योग का है, कर्मों का नहीं। अत: “योग: कर्मसु कौशलम्” का यही अर्थ – ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ उचित प्रतीत होता है।

(to be continued…)

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

श्री परशुराम आधारित अवतारवाद-विश्लेषण

-डॉ. श्यामदेवमिश्र

आज के सामाजिक अस्त-व्यस्तता के युग में क्रांतिकारी विचारों की आवश्यकता है। परशुराम के जीवन अवतार की वर्तमान में प्रासंगिगकता और अनुकरणीयता को प्रस्तुत आलेख में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

(Editor’s note)

अवतारवाद का औचित्य

परब्रह्म-तत्व को मन और बुद्धि से नहीं जाना जा सकता है अत:, उसके विषय में चिन्तन करने के लिए जितने भी उपाय शास्त्रों में वर्णित हैं उसमें ‘अवतारवाद’ सबसे उत्तम कहा जा सकता है क्योंकि जब निर्विशेष (अर्थात् गुण, आकृति आदि से रहित) ब्रह्म बुद्धि में आ ही नहीं सकता है तब उसकी उपासना कैसे सम्भव होगी? ऐसे में मनुष्य, प्रत्यक्ष दिखाई पड़ने वाले पदार्थों में परमेश्वर के लक्षण देखकर उन्हें (उन पदार्थों को) आलंबन (सहारा) मानकर ब्रह्मभाव से उसकी उपासना करता है। उसमें भी, चेतना में – विशेषकर मनुष्यरूप में,  ब्रह्मत्व का भाव रखना तथा उसकी उपासना करना अत्युपयोगी व सरल है क्योंकि उपासक मनुष्य का मन अपने सजातीय में स्वाभाविक रूप से लगने के कारण उससे ही प्रेम करने लगता है जिससे, चित्त स्थिर हो जाता है । यही ‘अवतारोपासना’ है ।

अवतार की अवधारणा

सर्वत्र स्थित, सदा प्रकाशित, शाश्वत, एकरूप शक्ति के अतिरिक्त कोई भी शक्ति नहीं है जो हमारी ज्ञानेन्द्रियों में प्रवेश कर सके। वही चैतन्य शक्ति जब इन्द्रियग्राह्य होने के लिए स्थूल बनता है अर्थात् अपने उच्च स्वरूप से नीचे अवतरण कर स्थूल रूप धारण करता है, तब उसे ईश्वरीयशक्ति का अवतार होना कहते हैं। गीता के चतुर्थ अध्याय के छठे श्लोक “अजोऽपि सन्नव्ययात्मा ……सम्भवाम्यात्ममायया” में भगवान् स्वयम् अवतरण को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि मैं जन्मरहित, अविनाशी तथा सभी भूतों में रहते हुए भी अपने अनन्त-रूप-धारण-सामर्थ्य-सम्पन्नरूपी स्वभाव-धर्म-शक्ति का उपयोग करके अपनी माया से स्थूल जगत् में अवतार धारण करता हूँ।

दश अवतार

वराहपुराण के अनुसार दश अवतार क्रमशः इस प्रकार हैं –

  1. मत्स्य: कूर्मो 3. वराहश्च 4. नृसिंहो 5. वामनस्तथा
  2. रामो 7. रामश्च 8. कृष्णश्च 9. बौद्ध: 10. कल्की तथैव च ।।

इसमें छठे अवतार राम अर्थात् परशुराम थे। इसके अतिरिक्त पुरुषावतार, गुणावतार, मन्वन्तरावतार इत्यादि प्रसिद्ध हैं ।

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(Source of image: http://vishnudashavatars.blogspot.in/2010/04/vishnu-dashavatar.html)

अवतारों के प्रकार

यद्यपि सभी अवतार परिपूर्ण हैं, किसी में तत्त्वत: न्यूनाधिक्य नहीं है; तथापि शक्ति के प्रकटन की न्यूनता-अधिकता के आधार पर अवतारों के चार प्रकार माने गए हैं –

1. आवेश, २. प्राभव, ३. वैभव और ४. परावस्थ

परशुराम, कल्की आदि आवेशावतार हैं। कूर्म, मत्स्य, वराह आदि वैभवावतार तथा श्रीनृसिंह, श्रीराम एवं श्रीकृष्ण परावस्थवतार या पूर्णावतार हैं ।

अवतार का प्रयोजन?

अवतरण हेतु आवश्यक परिस्थिति या उचित काल को भगवान ने स्वयं ही गीता में बताया है –

“यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्याहम् ।।”

(गीता 4.7)

अर्थात् जब धर्म की हानि होती है और अधर्म का उत्थान होता है तब मैं अवतार लेता हूँ।

अवतार का प्रयोजन आगे स्पष्ट करते हैं –

“परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् । धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ।।”

(गीता 4.8)

अर्थात् सज्जनों की रक्षा करने के लिए, दुष्टों का संहार करने के लिए तथा धर्म की पुन: प्रतिष्ठा करने के लिए मैं हर युग में अवतार लेता हूँ।

विचार किया जाए तो किसी व्यक्ति, वस्तु या घटना की प्रासङ्गिकता अथवा समसामयिकता का निर्धारण एवं मूल्याङ्कन, काल तथा प्रयोजन के अधीन (सापेक्ष्य) है। ऊपर के भगवदुक्त श्लोकों से स्पष्ट है कि अपने अवतरण हेतु उचित काल तथा प्रयोजन-विशेष का निर्धारण जगत-नियंता (ईश्वर) के ही हाथ में है। अत:, सामान्य रूप से विचार करने पर सर्वाधिक-सर्वथा-उचित काल में समसामयिक व प्रासङ्गिक उद्देश्य से युक्त भगवत-अवतरणों की तत्तत्कालीन प्रासङ्गिकता स्वत: स्पष्ट हो जाती है । चूंकि, काल-क्रम से अधर्म की वृद्धि व धर्म की हानि युग-धर्म है अत: प्रत्येक युग में अवतारों की प्रासंगिकता भी उतनी ही रहेगी । किसी एक अवतार-विशेष को, चाहे वह परशुराम हों या अन्य कोई, इससे अलग  रखकर विचार नहीं किया जा सकता है। भगवदवतरणों के सम्बन्ध में (प्रासंगिकता, समसामयिकता और महत्त्व पर) इससे अधिक कहना पिष्टपेषण (चबाये हुए को चबाना) ही होगा क्यूंकि, उस विषय में भगवान स्वयं ही वचनबद्ध हैं-

“यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्याहम्।।

(और उनसे अधिक काल और कालानुरूप प्रासङ्गिकता को कौन जान सकता है!!)

वैसे विचार किया जाए तो, प्रत्येक अवतार एक नायक ही तो है । इन अलौकिक नायकों (अवतारों) से इतर, समाज को नई दिशा दिखाने वाले स्वामी विवेकानन्द सदृश विशिष्ट-शक्ति-सम्पन्न लौकिक नायकों की प्रासंगिकता तो हर युग में रहेगी ही और फिर वर्तमान में तो, युग-धर्म के कारण, नितान्त अशक्त और नाना प्रकार के जञ्जालों में फंसे हुए मानवों के लिए, ऐसे नायकों का सम्पूर्ण जीवन-चरित्र ही प्रेरणादायक और अनुकरणीय होने के कारण और भी प्रासंगिक है। ऐसे में न केवल प्रभु के सभी रूप (अवतार) प्रासङ्गिक नज़र आते हैं अपितु इन अवतारों का स्मरण, अनुकीर्तन आदि ही समस्त दुखों का नाश करने वाला बन जाता है । कहा ही है –

“यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात्। विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे।।”

जहां तक प्रश्न अवतारों के वर्ग (जाति) का है (विशेषकर, परशुराम अवतार में), मेरी समझ से अवतारों को जातिगत-दृष्टि से देखना किसी भी व्यक्ति के लिए (चाहे वह इतर अवतारों की अपेक्षा, अवतार-विशेष में विशिष्ट प्रीति रखने वाला हो या उसके विरुद्ध विचार या आचरण वाला हो) कतई न्यायपूर्ण या तर्कपूर्ण नहीं है। यह तो न सिर्फ उल्टे भगवान् को ही बांटने जैसा हो गया बल्कि उसकी अवतार-व्यवस्था के मूल पर ही आघात करने जैसा है क्यूंकि, जिसका अवतरण ही समाज को धर्मयुक्त व संगठित करना तथा समाज का कल्याण करना है उसको (विरोधी विचार रखने वालों के द्वारा) धर्म-विशेष, जाति-विशेष का प्रतिनिधिभूत मानकर अवतारविशेष के प्रति अरुचि या अश्रद्धा का भाव रखना अथवा कुछ दिग्भ्रमित लोगों के द्वारा, उस अवतार-विशेष को केवल अपने ही वर्ग का गौरव बताना नितान्त भ्रमोत्पादक व कलहोत्पादक है ।

परशुराम जी के विषय में एक अन्य बड़ा प्रश्न यह उपस्थित होता है कि जब वह अवताररूप हैं तब अन्य अवतारों की भांति उनका पुनर्गमन क्यूँ नहीं हुआ और वे चिरजीवी कैसे रह गये? वस्तुत: वैष्णव-परम्परा में परिगणित दश अवतारों में परशुराम आवेशावतार माने गए हैं अर्थात्, भगवदंश का आवेश उनमें है इसीलिये वे अंशावतार कहे गए हैं। आवश्यकता पड़ने पर, भगवदंश से आविष्ट परशुराम जी ने अपने अवतरण का प्रयोजन सार्थक किया और भविष्य में भी तादृश परिस्थिति उत्पन्न होने पर परब्रह्म (वैष्णवागम में प्रभु विष्णु) की प्रेरणा से वह पुन: अपने अवतरण को सार्थक कर सकें एतदर्थ ही वे चिरजीवी भी हैं। कहने का आशय यह है कि सामान्यत: वे मनुष्य-रूप होने के कारण चिरजीवी हैं किन्तु, परिस्थिति-विशेष में उनका, अन्तस्थ भगवदंशरूप आवेशावतार लोक-कल्याणार्थ प्रकटित होता है ।

 उपसंहार

सुनीति एवं सद्धर्म ही उन्नति का सर्वोत्तम मार्ग है। अतः, जो अधर्म एवं कुरीतियों का हटाकर इनकी प्रतिष्ठा करते हैं, वो महापुरुष कहलाते हैं। भगवान् परशुराम ने तत्कालीन समाज में व्याप्त अनैतिकता एवं राक्षसी प्रवृत्तियों का समूलोच्छेद करके सनातन धर्म की स्थापना की। निश्चय ही भगवदंशावतार श्री परशुराम का इतिवृत्त एवं जीवन-चरित्र का सतत अनुशीलन न केवल हमें अपने देश के गौरवशाली इतिहास का दिग्दर्शन कराता है अपितु अपनी संस्कृति व सभ्यता के रक्षार्थ सतत प्रेरणा का भी संचार करता है।

-डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर,भोपाल, म.प्र.

Concept of New Year (or Calendar) in Vedic System (Part- I)

-Dr. Shyam Deo Mishra, Assistant Professor, Rashtriya Sanskrit Sansthan, New Delhi

mishraDr. Mishra is National Coordinator of Jyotish at Mukta-Swadhyaya-Peetham (Institute of Distance Education),  Rashtriya Sanskrit Sansthan, New Delhi

“Time never marks its beginning with a thunderstorm”, this quotation of Thomas Mann does indicate the lack of concepts of the beginning of time in western world which often termed as Epoch, Era in historical parlance. While in Bharatvarsha, numerous eras have been in practice since Vedic period. The most ancient eras like; Brahma-Samvat, Srishti-Samvat, Kartikeya Samvat etc are purely the concept of prodigious Indian mind and no such era is being mentioned in any other civilization. Such concepts not only emphatically establish the antiquity of Aryan or Indian civilization but also indicate its height of advancement in academic, social and political perspective. As mentioned before, several Samvatsaras or eras described in Vedic and Pauranic scriptures were being practiced in India and being followed by other cultures with subtle changes according to their suitability. Before defining several Samvatsaras its concept must be understood first.

Samvatsar:

In Vedas, the word Samvatsara (short form is Samvat) is used for year. The definition of Samvatsara is ‘Samvasanti ritavah yasmin’ means ‘in which Ritu or season does reside’. Hence Samvatsara is the collection or cycle of seasons. Now the question is that why the word ‘ritavah’ used to define the meaning of Samvatsara or how Ritu does related to Samvatsar? Actually the answer is in the word itself which is derived from the root verb ‘tsara(Bhwaadi-gana, 554) that means ‘to move in hiding (Chhadma or Vakra) or curve’. We know that the Earth’s curved motion in its elliptical orbit constantly changes its direction that causes seasons or Ritus. One must understand that the primary cause of life on earth lies on her constantly changing seasons. Therefore ‘Samvatsar’, the originator of seasons, also called as ‘Prajapati’.  In the space of solar system there are 6 zones of varying energy which are called as ‘Vashatkara’. Parallel to 6 Vashatkara in space, there are 6 seasons on earth, each extending to motion of sun in 2 signs (60 degrees). The word Varsha or Sharad clearly manifests its relation with Ritu (such as ‘Varsha’ & ‘Sharad’) or season. Aitreya Brahmana (7/17)  defines the Samvatsar- It means, there are 360 Ahaani (24 hours) or 720 Ahoraatraas (days & nights) in a year (Samvatsar).

Happy Chaitra Vikram Samvat 2071 and Happy Navratri 2014 by Vikrmn CA Verma 10 Alone

Synonyms of Samvatsar are Samvat, Vatsara, Varsha, Haayan, Shaka, Sharad, San etc. Each synonym ensconces different meaning, form and usage of Samvatsara in it. Another meaning of Samvatsara is Sam+vat+sarati (Sameekrirooopena saranti yasmaat kaalaat sa Samvatsara) that means the period from which everything start from the balanced state. In other words, it is a particular point of time from which all move accordingly and simultaneously. In fact, when a king wanted to start a particular Samvatsara or Samvat he tended to release his subject from all kinds of debts. Thus new financial year, and later on, the academic sessions etc did start from the commencement of Samvatsara. Hence, all our activities, financial year, academic sessions, festivals etc tends to move along with Samvatsara. It also means ‘a series of sequential years’ that started from a phenomenon like Yudhishthir Samvat, Kali Samvat, Vikram Samvat etc.

The Cause of the beginning of Samvatsara:

There must be a social, sacral, gracious or political cause behind the commencement of any Samvatsara. Several sacrifices (Shraut & Smaart Yaag) like ‘Aagraayaneshti’, ‘Navaanneshti’ ‘Chaaturmaasya’ etc tended to start at the beginning of Samvatsar.  Whenever a king wanted to introduce a new Samvat or era he had to amortize all the debts of his subject. This uniqueness of introducing a new Samvat makes Indian civilization more sublime than rest of the world.

The time of the start of Samvatsara (or Era):

In Vedic tradition, the start of any era (Samvat or Shaka) generally coincides with particular celestial phenomena. Why? It is because our ancestors had a strong belief that there is a direct relation among time, planetary motion and mundane world. Some of those copiously mentioned phenomena which used as the commencement points of any Samvatsar are:

  1. Vernal equinox (Vasanta Sampaat) – When sun comes at equator on 23rd March (Visuva-din).
  2. Summer solstice (Dakshinayana) – When sun reaches at the farthest point in his northward motion and starts southward journey on 23rd June.
  3. Autumnal equinox (Sharat Sampaat) – When sun crosses equator on 23rd September.
  4. Winter solstice (Uttarayana) – When sun reaches at the farthest point in south and starts northward journey on 22nd December.

Based on these phenomena, there are several systems (or ways) used to manifest a year or Samvatsar. For an instance, one of the calendars starts from the Uttarayana or winter solstice. It is the beginning of divyadin (day of devas). Bhishma Pitamaha waited for 58 days after falling on the bed of arrows on 10th day of Mahabharat war in 3139 BC. As it is start of ‘divya-dina’, it is commonly called as ‘Bada-dina’. As solar year starts with this month so Krishna in Gita (10/35) said that he is Margashirsha among months. It is called ‘Agrahayana’ because it is starting month (agra) of ‘Hayana’ or year. Year or hayana has two halves or ayans: Uttarayan and dakshinayan. Since equinoctial point is moving backward in about 26,000 years (300 in about 2000 years) therefore in Bhaarateeya chronological history, almost at intervals of 2 or 3 thousand years one can find the commencement of new system of calendar.

to be continued….

Ethics of the Gita – lessons for individuals to work according to their nature

– Dr. Shakuntala, Associate Professor, Department of Philosophy,  University of Gauhati, Guwahati, Assam

Dr. Shakuntala did M.A. and Ph.D. from North-Easter-Hill-University, Shillong, Meghalaya. She has authored the following books – Enquiry into Nature of Self (2009), Essays on Philosophy of JidduKrishnamurti (2010), ‘What Ought I to Do?’ The Gita’s Perspective (2014), Rethinking Philosophy of JidduKrishnamurti (2015), and Revisiting the Upanisads (2016).

In the ethics of the Gita svabhava or one’s own nature plays a very important role. It holds that everyone, including the man of knowledge acts according to his own nature. It further says that one is compelled to act as prescribed by his nature and it is simply futile to try otherwise. Krishna tells Arjuna that it is pointless on the part of Arjuna’s to say that he would not fight for nature will certainly induce him to fight. ‘That which, through delusion, thou wishest not to do, O Son of Kunti (Arjuna), that thou shalt do even against thy will, fettered by thy own acts born of thy nature.’ (XVIII.60). Arjuna is born Kshatriya and thus there is no escape but to fight: ‘Even the man of knowledge acts in accordance with his own nature. Beings follow their mature. What can repression accomplish?’ (III.33) Gita says that the karma or action prescribed by one’s nature or svabhava is one’s duty or dharma. What one ought to do is prescribed by what one’s nature is. ‘Heroism, vigour, steadiness, resourcefulness, not fleeing even in a battle, generosity and leadership, these are the duties of a Kshatriya born of his nature.’ (XVIII.43). In fact, there is no good other than performing one’s duty as prescribed by one’s nature: ‘Having regard for thine own duty, thou shouldst not falter, there exists no greater good for a Kshatriya than a battle enjoined by duty.’ (II.31).

Now, if one indeed realizes the truth of such a situation, that one cannot escape doing what one’s nature forces one to do, one automatically becomes happy. When one acts according to one’s nature there is no conflict between what one is and what one thinks one ought to be. The ‘is’ is the ‘ought’. In other words, there is nothing one is putting up as ideal in such a situation to achieve. There is no gap between what one is and what one is trying to be- action becomes niskama, that is, action is performed without desire for becoming.

bhagavat-gita

We further see that svadharma of the Gita as prescribed by one’s svabhava also dissolves the gap between individual and social duty. Arjuna by svabhava is a Kshatriya and thus is asked by Krishna to give up the thought of not-fighting and enter into the battle. But while performing his individual duty he also performs the social duty of a Kshatriya that demands from him generosity and lordly nature; demands that Arjuna does not get affected by personal preference while deciding an action that can change the fate of thousands of people. The Gita does not say that one is to perform two kinds of duties- individual and social. In the Gita in performing one’s individual duty one helps in smooth running of the society.

The Gita does not tire of saying that one cannot change the way nature behaves. Actually this has an important bearing on the whole issue of the ethics of Gita. On one hand we have seen that it helps one in performing action without desire, and on the other hand such a realization, the Gita shows, helps one in working out moral dilemmas.  According to Gita the realization that one cannot change the way nature behaves automatically brings in detachment. When one truly understands the futility of trying to change course of nature, one in a way resigns to it. This attitude, the Gita shows, helps one in solving moral dilemmas of life. In the Gita, Arjuna is shown not questioning the rightness or wrongness of the action of going to battle. But Arjuna is shown as not wanting to enter into battle having seen his friends and family as his opponent: ‘When I see my own people arrayed and eager to fight O Krishna, my limbs quail, my mouth goes dry, my body shakes and my hair stands on end.’ (I.29). The question for Arjuna is not rightness or wrongness of action of doing battle but whether he would incur evil by killing the people who are his relatives: ‘And I see evil omens, O Kesava (Krishna), nor do I foresee any good by slaying my own people in the fight.’ (I.32). Krishna is reprimanding Arjuna for his behaviour that is borne out of attachment for his loved ones: ‘Thou grievest for those whom thou should not grieve for, and yet thou speakest words about wisdom.’ (II.11). If Arjuna were detached, he would not have been affected by who is standing against him but would have performed his duty: ‘As the unlearned act from attachment to their work, so should the learned also act, O Bharata (Arjuna), but without any attachment, with the desire to maintain the world-order.’ (III.25). Again, if Arjuna were detached he would have seen the fact that the battle would not stop with him not-fighting and in fact his not-fighting would affect the fate of all those people who agreed to enter into the battle and are fighting for the Pandavas in a negative way.

*The translation of the verses are taken from The Bhagavadgita by S. Radhakrishnan, HarperCollins India, Impression 2008.