स्वतंत्रता की भारतीय शैली

-प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

Independence का वास्तविक अर्थ आत्मनिर्भरता है। In का अर्थ है inside अर्थात् आत्मा के स्तर तक पहुँचना और फिर उसी पर निर्भर होना अथवा dependent हो जाना। जब व्यक्ति आत्मश: कार्यरत होता है तो उसका आत्मबल सदैव पुष्टित होता रहता है। उसके लिए सारा जग आत्मीय बन जाता है। वह ‘अयम निज: परोवेति’ की गणना लघुचेतीय समझता है। उसके अंत:करण में चिरक़ालीन उदारता झकोरे लेने लगती है, तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सम्मत भाव जागृत हो जाते हैं। यहाँ तक कि उनके यहाँ ‘संताने तनय व तनया’ तक न सीमित रहकर आत्मज और आत्मजा के रूप उत्पन्न होने लगती हैं अर्थात् आत्मबीज ही अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित. व फलित होता है। ‘अहम् ब्रह्म अस्मि’ की अनुभूति सार्थक हो जाती है। ये है independence की वास्तविक महिमा! ये एक दिन में सीमित नहीं हो सकता, ये तो कल्पों का माजरा है जनाब!!

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Independence का दूसरा अर्थ है है स्वाधीनता, अर्थात् अपने को पूरी तरह से पहचान कर उसके आधीन हो जाना अथवा उसी की सत्ता के आधीन कार्यरत हो जाना। अपने को पहचानने का अभिप्राय है अपने धर्म को पहचानना, और उसी आधार पर गुण और कर्म निर्धारित करना। स्वधर्म की पहचान का तात्पर्य है अपनी प्रकृति को गहराई से समझना, बूझना, और परखना। जब व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है तब अपनी प्रकृति को ही आधार बनाकर उसी में श्रद्धा एवं भक्ति से संलग्न होकर कर्म करता है। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं करता। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसका उद्धरण इस प्रकार किया है- ‘स्वधर्मे निधनम श्रेय: परधर्मों भयावह’, अर्थात् अपने धर्म के अनुसार आचरण में सबकुछ मिट जाना भी श्रेयस्कर है। यही नहीं किसी अन्य के धर्म अर्थात् प्रकृति का आचरण भयावह होता है इसलिए स्वाधीनता अत्यंत आवश्यक मानवीय दशा है जो मानव ही नहीं बल्कि पूरी समष्टि के लिए कल्याणकारी है।

Independence का तीसरा अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात् अपना ही तंत्र होना चाहिए चाहे वो पारिवारिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, शैक्षिक हो, अथवा राजनीतिक हो। दूसरों की व्यवस्था यद्यपि उनके लिए कितनी भी उच्च एवं सराहनीय क्यों न हो किसी और के लिए तनावपूर्ण, बलाघाती, भयंकर कलह का कारण बन सकती है। अतः किसी भी देश को एक ऐसी व्यवस्था का सृजन करना चाहिए जिसके अंतर्गत हर एक व्यक्ति को सम्पूर्ण मुक्ति रहे कि वह व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक स्तरों पर अपने ही तंत्र के अनुकूल जीवन यापन कर सके। यह व्यवस्था बाह्य रूप से प्रारम्भ में अनेकता के सिद्धांत पर ही आधारित हो सकती है, अर्थात् कोई uniform civil code नहीं, कोई संविधान नहीं, कोई अधिवक्ता या न्यूनतवक़्ता नहीं, कोई AC में विराजित न्यायाधीश नहीं। मात्र धरातलीय प्रबुद्धजनो की आवश्यकता होती है जिनमे आचार विचार से आत्मबोध झलकता हो। वही सर्वभूतानाम की स्वतंत्रता सुनियोजित व  सुनिश्चित कर सकते है इसीलिए भारत ऋषियों का देश रहा है, स्वतंत्रता के लिए। आधुनिक स्वतंत्रता दिवस  को प्रेरणा का आधार मानकर स्वतंत्रता को शाश्वत बनाने के लिए संकल्पित हों, और इसी का पर्व मनायें आज and forever!! शुभम्

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

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Indian Family Traditions, Laws, and Government

Prof. Bal Ram Singh

Traditions can also take ugly forms, such as dowry system, female feticide, outraging modesty of women, etc. which can make family lives of the women (and men) anguished and intolerable. Despite (and may be due to) the laws against dowry, the menace of discord continues to grow in Indian society. Government response to enact further laws to protect women has also taken an ugly turn, and is being used settle scores between families.

Clearly, enacting laws, particularly with selfish culture in mind, is not very effective approach to solve social and family problems. However, government of India has gone on with several intriguing laws to solve family problems. Interestingly, these laws are enacted only for Hindus, the majority community in India, leaving Muslims and Christians untouched presumably to exhibit government’s secular practice. An exception is a bill that was recently introduced againt triple talaq practice of Muslims.

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In addition to giving an impression of Hindu practices in need of reforms (thereby wrong), the secular principles borrowed from West where culture and practices are very different are being applied to Indian culture, many times confusing the population, and also at times at the behest of international organizations and groups.

Some of the recent laws or government positions are listed below:

  1. Government of India enacted a law that children are liable to take care of parents, and can be sued by parents if they default.
  2. Parents cannot sell inherited properties without children’s consent.
  3. Live in relationship is fine, citing Radha and Krishna as example of live in relationship.
  4. Girls and boys of less than 16 years of age can have sexual relationship even though marriage age is 18 years for girls and 21 years for boys.

Many may not know that in several states of USA there is no lower age limit on marriage, and many states have provision for marriage as young as 14 years of age!

These laws and assertions are obviously anti-family and anti-Indian culture, and unfortunately applied selectively to Hindu population. Even Supreme court judges took the government to task on the selective application of amendments to Hindus.

The Supreme court of India said  that government’s attempts to reform personal laws don’t go beyond Hindus who have been more tolerant of such initiatives (Times of India, February 11, 2011; http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/7456761.cms?prtpage=1)

“The Hindu community has been tolerant to these statutory interventions. But there appears a lack of secular commitment as it has not happened for other religions.” 

Justices Dalveer Bhandari and A K Ganguly made the observation while hearing petitions filed by the National Commission for Women and its Delhi chapter. The petitioners had sought formulation of a uniform marriageable age and complained that different stipulations in as many statutes had created confusion. 

In fact, the Hindu Marriage Act of 1955 itself is fairly arbitrarily done, and has almost nothing to do with Hindu philosophy or general practices. At least no references are made to any Hindu scriptures, consultation, or consensus. Government continues to make laws for Hindus without even a shred of consideration to either the community or its religious authorities. Many a times Hindu related laws are singled out to be enacted at the behest of a few elite class experiences, international pressure, domestic politics, or to create equivalence to other communities, viz., Christians and Muslims, both communities having extensive references to the social and legal aspects in their religious books, unlike Hindu texts.

It is certainly true that Hindu texts are more of guidance at spiritual, intellectual, and social levels, and allow flexibility for time and place. Nevertheless, a secular government, with a society less inclined to be intellectually engaged at mass level, and much less being sought to provide philosophical input to the provisions, is committing a grave long term mistake in imposing Western practices on its people. This acquires more significance and importance when one considers the diversity that the Hindu community exhibits traditionally, which has continued with the many of the practices of the only living ancient living civilization.

Obviously, there is a major disconnect between the society and the rulers. India is a very large society with many of the cultural intermixes to be ruled by a single set of laws and provisions. India and Hindu represent a diversity of thoughts and practices that is integral to its existence. There is no reference in ancient India to have a constitution, judges, advocates, as wide ranging as it is currently enforced. It has been a self policing society, governed by Kuldharma, Jatidharma, Varnadharma, Rashtradharma, and paramdharama. Currently, uch things are not even seriously considered while making policies and laws for the society.

There are many ills that are creeping in the Indian society, as a result of not considering the traditions, practices, and ancient wisdom in making policies and laws by the politicians and bureaucrats, and in the enforcement by the police and judiciary. It is, therefore, essential to bring the issue of the Indian family system to at least a certain level of intellectual and scholarly debate. It is hoped that such an exercise will spill over into the policy debates and eventually in the society for charting its course for future.

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

योग का तत्कालीन क्रियात्मक बोध

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

योग: सत्तस्य पर्याय: तस्य सार्थकेव मानव जीवनस्य लक्ष्य:।

योग सत्य का पर्याय है, उसी को सार्थक बनाना जीवन का उद्देश्य है।

वैसे तो सत्य एक सरल सी धारणा है पर अधिकतर व्यक्तियों को इसका बोध नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण है कि व्यक्ति कुछ विशेष वस्तुओं, स्थानों, लोगों, अथवा बातों से ही जुड़ता है और उसी को मानक बनाकर अपना दृष्टिकोण निर्धारित कर लेता है।

जैसे कि वस्तुतः व्यक्ति परिवार से या माँ से जुड़ता है और उसे प्रेम करता है। यदि उस माँ के प्रेम को सीमित न करके उसे प्रेम के अभ्यास की प्रक्रिया मान ले तो उसी प्रेम भाव को औरों के साथ जोड़ सकता है। तभी माँ के प्रेम की सार्थकता हो सकती है ठीक उसी तरह जैसे कि स्कूल में गणित सीख कर हम उसका जीवन के अन्य पहलुओं में उपयोग करते हैं।

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इस अवधारणा को प्रथम स्तर पर हम योग अभ्यास से समझ सकते हैं। स्थूल रूप से आसन एवं मुद्राएँ हमारे मन को शरीर के उन भागों पर केंद्रित करते हैं जहाँ आसन के कारण ज़ोर पड़ता है। इसका अभ्यास करते-करते हम अपने मन को इस तरह अपने वश में कर पाने में ऐसे सफल हो जाते हैं कि आसन के बिना भी अँगो और प्रत्यंगो पर ध्यान दे लेते हैं। यही प्रक्रिया हमें जुड़ने की वास्तविक विद्या प्रदान करती है। इस विद्या को ही सूक्ष्म रूप में प्राणायाम के द्वारा शरीर के उन कोशिकाओं और अणुओं परमाणुओं तक जोड़ा जा सकता है जो की हमारी ज्ञानेंद्रियों से परे होते हैं। यही शारीरिक आसन और प्राणायाम के अभ्यास हमें हर किसी से जुड़ने की योग विधि बताते हैं।

उपर्युक्त अभ्यास से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके उपयोग से जब हम संसार में बिना किसी भेद भाव (प्रत्याहार अभ्यास के अंतर्गत) समस्त प्राणियों से जुड़ते हैं तभी उनके जीवन सत्यार्थ से परिचित हो पाते हैं।

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(Source of Image : Prof. Singh with his younger daughter)

अथ योग: सत्यार्थ परिचायक:। ॐ!!

Honoring the Father

– Prof. Bal Ram Singh

In a country where मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, एवं आचार्य देवो भव have been the norms, designating Mother’s Day and Father’s Day may sound like a demotion of mothers and fathers. Instead, it is considered as a much needed appreciation of them in the western world.

There are several peculiarities surrounding the origin and establishment of Father’s Day here in the United States, where it is an official holiday. Interestingly, efforts to establish both Mother’s and Father’s Days were led by daughters, not sons, and both were in fact initiated by the Church (Mother May or Mothering Church for Mother’s Day and St. Joseph’s Day for Father’s Day).  While Father’s Day was established over 50 years after the Mother’s Day was already an official holiday, (in fact, after many more failed attempts at establishment than Mother’s Day) both holidays were in fact initially rejected by the US Congress: they jokingly extrapolated a future need of a “Mother-in-Law’s Day”.  Eventually, both holidays were proclaimed by presidential orders. However, the more sincere criticism from congress was that establishing appreciation for parents as holidays would lead to commercialization of these occasions, reducing a heart-to-heart moment to a hand-to-hand exchange of gifts.

During debates over the establishment of Father’s Day, it was common to argue that one parent (mother) cannot be recognized while the other (father) is not. The division of parents into distinct categories like “matriarchal” and “patriarchal” can be seen more as a lens perpetuated in my opinion by some modern social scientists than actual truth. Even in the animal kingdom, where the complexities of human society, tradition, culture, and philosophy do not exist, a child is often cared by both mother and father.  The social interpretation of the culture (sanskriti), traditions (parampara), and philosophy (darshan) needs narrational perspective and an integrative approach. Matri sattatmak (matriarchal) and Pitre sattatmak (patriarchal) societies inherently mean the motherhood and fatherhood, not simply woman and man as is generally implicated by social activists. Therein lies the narrative problem.

Indian cultures exhort raising of woman to the motherhood in perspective (not necessarily giving birth, although that reinforces it automatically). In India the nation is called motherland whereas in the West it is fatherland. Ancestors are referred to as पूर्वज in India whereas forefathers in America in a social context. Wikipedia lists 60 countries which call their native country as fatherland. Ancient Greek, Patris, fatherland, led to Latin Patrios, and finally into Patriotism. Thus father figure is a dominant cultural ethos of the western world.

In India it is, of course, Mother India or भारत माता, that is the war cry for the land. I had heard from a Swami ji (but could not find myself in any literature) that in Indian culture a child is most fortunate whose father is a dharmatma and whose mother is a pativrata. This is far cry from the competing dominance portrayed by the reference such a society as matriarchal vs. patriarchal, which Indian intellectual class apes it.

The combined differences between how Eastern and Western cultures view and treat motherhood and fatherhood indicate clearly that there is no simple mapping of words or cultural concepts from one onto the other. When comparing the two, one needs to understand the context in which terms, language, and celebrations are framed. Learning from other cultures is good, but doing so without an understanding of the differing perspectives, and without an appreciation for our own way of seeing the world, is counter-productive.

There is a book written with the title of ‘Dharti Mata aur Pita Akash’ by Pushpa Sinha, and of course the favorite Hindi song, Dharti meri mata pita Akash from Geet Gata Chal Hindi movie (1975) shows the complementarity of parents for appropriate care and growth of a child. Nevertheless, Indian culture is matriarchal right from the pauranic concept of Adya as the origin of tridevas and tridevis.  Even in modern times at least 500 years ago in Tulsi Ramayana, there is a clear mention that mother holds higher position than the father – जौ केवल पितु आयसु ताता, तौ जिन जाउ जानि बड़ि माता -as stated by Ram’s mother, Kaushalya. So, while Kerala tradition may be matriarchal (or maybe ladyarchal to be more appropriate). The matriarchal tradition of India as per Ramayana standards is widespread in the culture.

Once that narrative is accepted, it is then possible to integrate with the famous Manusmriti idea of ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता…’, which needs to be interpreted as, where women reach the status or level  of being worshiped (implying only motherhood) even gods frequent that place for pleasure.

There is much to learn from Indian philosophy as to what a mother is to be – life giver, guru, teacher, god, etc., which is what elevates her to the level of worship, not those who hire maids to take care of their children or those who do not have education, training, knowledge, and resources.

A father is a gyan guru, and is expected to give diksha to the son, and perhaps daughter by the time of the upanayana sanskar (there are instances where daughters undergo upanayana sanskar). In this ritual, the father utters some secret mantra (usually Gayatri mantra) in the ears of the child at the ceremony. This indicates the conclusion of education from father and commencement of the education from Guru. In the story of the Ganesha his father Shiva cuts off Ganesha’s head, eventually replacing it with the head of an elephant at the behest of Ganesha’s mourning mother Parvati.  Instead of taking only the story’s literal meaning, we can instead see symbolically Shiva playing his true role as a father: removing Ganesha’s ignorance, as symbolized by the head he was born with, and replacing it with a much larger head of an elephant, symbolizing his newly gained wisdom.

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(Image : Prof. Singh and his son)

In my own personal life, living in America, I try to emphasize on Father’s Day what a father is supposed to do on a regular basis: I normally cook breakfast for the family showing my cooking ability and skills (all three children learned formal cooking from me rather than their mother who is obviously more skillful at cooking than I am); I then make sure to mow the lawn, which I do despite my wife’s advice of hiring landscaper (quite common in United States); we spend time relishing some father-child memories; finally, I give some fatherly advice (lecture!!) to my children. I do not like to be pampered by any special treatment or gifts from children, as that encourages commercialization (the original concern of US lawmakers in opposing declaring Father’s Day an official holiday), and reduces the idea to materialism, which is quite different from what I consider my children as संतानाः, as in सम्यक तान्यते ते संतानाः those who reflect not only my material body but also my subtle body (ethereal, astral, mental, and spiritual) and spiritualism. May all of us have a Father’s Day by becoming and having संतानाः!

Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA 

माता की अवधारणा

मदर्स डे पर विशेषविमर्श

-डॉ. शशि तिवारी

 

यह संसार भगवान् की अद्भुत रचना है। भगवान् के इस सृजन का हम सब प्राणी उपभोग करते हैं। रचयिता होने से ही ईश्वर को ‘माता’ कहते हैं – त्वमेव माता च पिता त्वमेव । माना गया है कि हम सब ईश्वर के अंश हैं। तो जो गुण ईश्वर में हैं वे प्राणियों में भी हो सकते हैं या कि प्राकृतिक रूप से होने चाहिए। मातृत्व एक ऐसा ही गुण है। केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी किसी न किसी प्रकार के सर्जन और निर्मिति की कला में निपुण देखे जाते हैं। हर किसी में रचनाधर्मिता होती है- कभी कम कभी अधिक। तभी देवी की स्तुति में कहा गया है –

            “या देवी सर्वभूतेषु मातॄरूपेण संस्थिता। 

            नम: तस्यै नम: तस्यै नम: तस्यै नमो नम:॥”

वेद में माता-पिता के युग्म को ‘मातरा’ या ‘मातरौ’ कहते हैं यानी माता और पिता दोनों माता ही हैं। इसी तरह द्यावापृथ्वी का नाम ‘मातरा’ है; पृथ्वी हमारी माता है और आकाश पिता। सांसारिक माता और पिता के जोडे के लिए ‘पितरौ’ या ‘पितरा’ शब्द भी प्रयोग में आए हैं; यानी दोनों ही पिता हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे पति-पत्नी के युग्म को ‘दम्पती’ कहते हैं। भारतीय मनीषा ने शब्दों में ही जीवन-मूल्यों को सूत्र में मणियों कि भांति पिरोया हुआ है। तात्पर्य है कि महत्व की दृष्टि से माता और पिता लगभग समान ही हैं। इसीलिए कहते हैं – ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’। परंतु जब बात जनन की होती है तो जनि, जनी, जनयित्री आदि नामों से मां को जाना जाता है क्योंकि वह उत्पन्न करने वाली है। केवल उत्पन्न ही नहीं उसके बाद जो लालन-पालन की आवश्यकता है वह भी वही करती है। एतदर्थ उसमें स्नेह और ममता की आवश्यकता है और इसके वाचक अंबा, अम्बि, अम्बी आदि शब्द मां के लिए वेद में प्राप्त होते हैं। इन सब नामों से माता जननी, स्नेहमयी, पूजनी्य़ा, आत्मीया बतायी गयी है। उत्पन्न करने वाली का साक्षात् स्वरूप ‘माता’ पद में दिखाई दे्ता है, इसलिए उसे इस सम्मान से विभूषित किया गया है कि वह जननी है और ईश्वर के समकक्ष है।

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(Source of image : https://www.pinterest.com/pin/31806741093104880/)

सतत् स्मरणीय है कि साक्षात् माताएं हमारी सम्माननीय हैं; क्योंकि ‘मातृत्व’ मानवीय गुणों में सर्वोपरि है। रचना करना तथा पालन करना – प्रत्येक मनुष्य का धर्म कर्म होना चाहिए, तभी सामजिक संतुलन बना रह सकता है। जब हम मातृ-दिवस मनाये तो ये याद रखें कि यह अपने दायित्वों को वहन करने की शिक्षा देने वाला दिन है। यह रचनाधर्मिता का दिन है या फिर रचनाधर्मिता के अभिनंदन का दिन!

– डॉ. शशि तिवारी,अध्यक्ष, वेव्सभारत 

Ram’s Dharma: Leadership Secrets of the Ultimate Warrior~Sage~Prince

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-Michael Sternfeld

[Excerpted from the audio-bookRam’s Dharma: Leadership Secrets of the Ultimate Warrior~Sage~Prince— published by Vedic Audio Knowledge (VAK). VAK created by  author, an independent scholar has made a tradition of preserving the essential oral tradition of the Vedic literature with dramatic productions in English. ]

Introduction

Now begins the inquiry into Dharma.  This one line, expressive of much of the potency within all Vedic knowledge, is an apt beginning in our exploration of the epic Ramayana.  The Ramayana can be seen as one grand heroic quest into all the power and subtlety of Dharma.  Dharma means more than just duty, as it is often understood in the West.  At its most comprehensive level, Dharma is the inexorable movement of evolution in the universe. All activity in the universe is orderly because of that inexorable flow of Dharma.

Alignment of Our Dharma With the Big Picture

To the degree that we align our own nature with this grand vision of Dharma, the more we align ourselves with the natural flow of all that was meant to be.  This seems to be the true quest—to move our own consciousness, our own deepening awareness–to become more and more in-tune with Dharma at every step of our evolution.  There is not one “be-all, end-all” state that captures this, because Dharma, as structured in consciousness, is a sequential process of unfolding deeper and deeper levels of order or Dharma in the fabric of our own awareness.

Hierarchies of Dharma

Dharma is structured in layers, or in hierarchies, which reveal more and more comprehensive levels of intelligence in nature.  On one level, we could experience our personal career Dharma–expressive of the work we do to earn a living.  At a deeper level, we can own our soul level Dharma–expressive of our own fundamental nature and the development of higher states of consciousness.  On a more expanded level, there can be a Dharma of a country or civilization, which may express the unique design or “chosen-ness” for a group of people to serve and enrich the world in a particular way.  The Dharma of a star is to spread life-giving light into the world, while the Dharma of the universe may reach to the fields of unfathomable infinity.

Evolution of Dharma

Every level of life has a Dharma that is woven together with all the other streams to create a majestic tapestry reflecting the never-ending flow of life from lesser states to more and more fullness of life and evolution.  From this perspective, all of our growth can be seen as an opportunity to continually deepen our understanding of our own Dharma and how it fits into the larger Dharma of the world.  As we grow and evolve, we find that those values that seemed so significant when we were younger fall away and new doorways open to greater and greater levels of service, authenticity and an expanding sphere of influence to enrich the world.

Ram’s Dharma and the Ramayana

Now this is where the power of Ram and the Ramayana enter the picture.  Ram is an embodiment of the total potential of Dharma.  All different levels and streams of Dharma seem to converge into his comprehensive personality. This power is first expressed on the human level, the level of heroic action. Like all the great heroic figures that have preceded us, we gain so much from following in his epic footsteps.  Ram’s heroic quests become our own; and his journey—imbued with near-impossible challenges as well as great victories and blessed boons–become the cherished guideposts in the journey of our own lives.

But this outer value of Ram is only a projection and expression of the deeper, absolute level of life, from which the full potential of being fully-human emerges—a divine being in human form. Ram is an extraordinary personage in that he is both an ideal man and an avatar. Human and divine. The juxtaposition of these two values stretches our comprehension to span its gulf.

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Why is Ram So Special?

In the pantheon of all great epic heroes, Ram seems to hold a special status. On a human level, his entire life and story are based upon explicitly discriminating and integrating finer and finer levels of Dharma.  Our behavior can be refined at each step of this journey by integrating these deeper values into our lives. But the deepest level of Dharma reveals Ram’s full potential as an embodiment of the Absolute level of life–Ram Brahm Paramarath Rupa.

The great modern-day Vedic sage Maharishi Mahesh Yogi explains this mahavakya by describing Ram as the embodiment of Brahman, the supreme Totality of life. This Totality is not just outside of us as some ruling power, but inside us as well. In this view, Ram represents the essential nature of ourselves and the whole creation, governing and sustaining it from the transcendental level.  Maharishi clarifies: “Ram is the embodiment of pure spirituality, of pure being–totality in its absolute unity. All activity in the universe is orderly because of that eternal law of life, the administration of Ram, which establishes and maintains harmony in all relationships; which harmonizes everything with every other thing in the universe.”

This quote underscores why experiencing the Ramayana yields such profound results. If Ram embodies all the diverse relationships in the universe, then the study of his story is essentially the study of our Self and our evolving relationship with creation—the full potential of Dharma. In this view, the impulses of the Ramayana are the structures of our own consciousness, our own Self, and challenge us to grow towards our own divine status as humans.

This vision may sound quite cosmic, but we must remember that this divine story unfolds on a completely human level, as Ram was born a mortal man–the son of the illustrious King Dasharata in Ayodhya.  The story begins as the wise sage Valmiki pondered the question he had often reflected upon: “Is there a perfect man among us?”.

We now begin our journey following the footsteps of Ram—along with Sita and all the characters of the Ramayana–on an epic quest to discover Ram’s Dharma on all its levels.  Our ultimate goal: to emerge with a profound ownership of that full potential of Dharma that animates the entire universe.

Audio Sample Link:  http://www.ramayanaudio.com/otherproducts.html#ramsd

Michael Sternfeld, MA, is an independent scholar and  a producer/director, USA 

 

वेदों के प्रकाश में अपने स्त्रीत्व को खोजें व सही अर्थों में स्वतंत्रता प्राप्त करें

– Mrs. Suvrata Vinod

[ Editor’s Note – शास्त्रार्थ की संवाद शैली का प्रयोग करते हुए लेखिका ने अपने विचारों को यहाँ रखा है।]

शंका – वेद है क्या?

समाधान – वेद एक नियत शब्दराशि है।

शंका  – फिर ये शब्द दूसरे शब्दों से विशेष क्यों? इतिहास के गर्त में न जाने कितनी संस्कृतियाँ, राष्ट्र, समाज, व्यक्ति आए गए।बहुत थोडों का स्मरण शेष रहता है।वह भी अंशों में।वेद भी तो किसी के द्वारा बनाये गये थे और अत एव नष्ट हो रहे है।

समाधान – क्या सब कुछ मनुष्यकृत होना जरुरी है?

शंका – अर्थात् नही।

समाधान – तो सब वाक्य मनुष्यकृत होना जरुरी है?

शंका – हाँ।

समाधान -क्या कोई मनुष्य बिना किसी का वाक्य सुने, वाक्योच्चारण करते देखा गया है?

शंका – नही।परंतु पुरा काल में ऐसा हुआ होगा।

समाधान – अदृष्टपूर्वकल्पना बिना हेतु के करना अंधश्रद्धा है।फिर देखो जीवित कोष से ही कोषांतर देख रहे हो, मान भी रहे हो। ऐसे ही गुरु के पूर्वोच्चारण से शिष्य का अनूच्चारण होता है ऐसा दीख रहा है। फिर सदा से ऐसा हो रहा है ऐसा मानने में क्या आपत्ति है। इन वेदवाक्यों को गुरुशिष्य परंपरा से अत्यंत पवित्रता व परिश्रम से हृदयाकाश में सुरक्षित रक्खा जाता है। वेद किसी लिखित-मुद्रित पुस्तक का नाम नही है।वेद गुरु के हृदय में निवास करते है। उपदेशद्वारा गुरु उसे शिष्य के हृदय में संक्रामित करते है। तब शिष्य भी गुरु होने योग्य हो जाता है। जो वेदों को हृदय में धारण करते है उन्हें हम वेदवित् कहते है। ऐसे व्यक्ति के लिए उसके अपने राग-द्वेष, likes-dislikes, अच्छा-बुरा एक तरफऔर दुसरी तरफ वेदों के विधि-निषेध दोनों ही सामने उपस्थित होते हैं। यही पर पुरुषार्थ का अवसर है जो हमे प्रत्येक व्यक्ति में भिन्न भिन्न स्तर का ज्ञात होता है। जिसके पास पूर्ण स्वातंत्र्य हो उसे सिद्ध वा स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन्।आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति। श्रीमद्भगवदगीता २.६४

(राग और द्वेष से वियुक्त होकर विषयों का इंद्रिय से ग्रहण करते हुए, उन इंद्रियों को अपने वश ऱखते हुए, न कि उनके दास बनकर, जो व्यक्ति शास्त्रविधि से प्रेरित होकर कार्य करता है वह प्रसन्नता को पाता है। )

यह स्वतंत्रता ही आर्य जीवन में श्रेष्ठता का मापदंड है। जिसमें यह स्वतंत्रता नहीवत् होती है उसे दूसरों के द्वारा नियंत्रित करना आवश्यक हो जाता है। एवं जो व्यक्ति राग-द्वेषों पर नियंत्रण रखते हुए विधि-निषेध का पालन कर सके वह दूसरों को अपने अधीन रखने की योग्यता पाता है। विचारशील व्यक्ति को स्वयं के राग-द्वेष तो विना उपदेश स्वयमेव ज्ञात होते है परंतु विधि-निषेध का ज्ञान तो मनुष्यमात्र को उपदेश से ही प्राप्त होता है।

शंका – उपदेश ग्रहण करने की योग्यता वा पात्रता क्या है?

समाधान – पवित्र वेदों के धारण के लिए योग्य शिष्य चाहिए। जैसे पानी भरने के लिए मजबुत साफ घडा चाहिए।

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः। कठोपनिषद् २.२४

(दुश्चरित से जो बाज नही आया, जो शान्त और समाहित-चित्त नही है, वह केवल प्रज्ञान से उसे (परमात्मा को) नही पा सकता।) 

तदेतत् सत्यमृषिरंगिराः पुरोवाच नैतदचीर्णव्रतोऽधीते। मुण्डकोपनिषद् ३.२.११

(इस (औपनिषदिक आत्म) सत्य को ऋषि अंगिरा ने पहले कहा, इसे वह व्यक्ति न पढे जिसने व्रताचरण न कर लिया हो।) 

तस्मै स विद्वानुपसन्नाय सम्यक् प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय प्रोवाच। मुण्डकोपनिषद् १.२.१३

(विद्वान् गुरु उसे उपदेश करे जो पास रहकर सेवा करता है, जिसका चित्त ठीक से शान्त है और जिसकी वासना भी शमन हो गई है।) 

यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः। श्रीमद्भगवदगीता १५.११

(प्रयत्न करते हुए भी, जिसने अपने कर्तव्य को पुरा नही किया है, वैसे मूढ जन उसे (परमात्मा को) नही देखते।) 

शंका – कहाँ से आयेगा ऐसा शिष्य?

समाधान -परमेश्वर ने यह दायित्व स्त्री को दिया है।

मातृमान् पितृमान् आचार्यवान् पुरुषो वेद। बृहदारण्यकोपनिषद् ४.१.२-७

उत्तम माता, उत्तम पिता और श्रेष्ठ गुरु हो जिसका वही पुरुष उसे (परमात्मा को) जानता है। 

माता पतिव्रता यस्य पिता यस्य शुचिव्रतः। वाल्मीकि रामायण

माता जिसकी पतिव्रता हो और पिता जिसका शुचिव्रत अर्थात् वेदानुयायी है, उसी का मन ललचाता नही है। 

वह क्या है जो स्त्री के पास विशेष है? क्या में इस बहुमूल्य योग्यता को पहिचानती हूँ? क्या मैं इसका सही मूल्य कर पा रही हूँ? इसे संजोए रखने के लिए कुछ त्याग करने को भी तैयार हूँ?

शंका -आप किस बारे में बात कर रहे है हमें नहीं पता।

समाधान -यूरोप अमेरिका में 50 % स्त्रियाँ विवाह करना ही नहीं चाहती।क्या आजकल इंद्रिय-संयम ब्रह्मचर्य बहुत आसान हो गया है? 16 साल से कम उम्र में ही 90% से अधिक कन्याएं अपने कौमार्य को खो देती है।क्या हम भी इनके पिछे चल नहीं रहे? हमारी वेशभूषा तो कुछ ऐसा ही कह रही है।

शंका – क्या ऐसा होने से योग्य शिष्य पैदा नहीं हो सकेंगे? आजकल तो सब बहुत चमक-धमक वाला दीखता है।चारों ओर सुंदर-सुंदर स्त्री-पुरुष।कितना मनोहारी दृश्य है।कितने रंग! कितने स्वाद! कितनी सुगंध! इतनी विविधता प्रचुरता क्या पहले कभी थी? विज्ञान ने हर क्षेत्र मे नई ऊँचाईयों को छु लिया है। हमारे कई प्रश्नों के उत्तर दिये है। मानव आज अधिक सामर्थ्यवान् है।

समाधान – बिलकुल ठीक।मेरे अपने अनुभव से गत 30-40 वर्षों में हम बहुत बदल गये है। हमारे सही-गलत के मापदंड ही परिवर्तीत हो गये। कई बाते जो पूर्व में निंदात्मक थी वे आज प्रतिष्ठित है।जैसे मदिरापान, विवाहपूर्व संबंध, भ्रष्टाचार-रिश्वतखोरी।सर्वत्र दोगला व्यवहार दीख रहा है।अंदर एक बाहर एक।हमारे मापदंड तो परिवर्तनशील है पर क्या प्रकृति के मापदंड भी बदलते है। और अगर प्रकृति के मापदंड नही बदलते तो क्या हम अब सिर्फ नाम के फलाना-फलाना रह गये। संज्ञामात्र! वस्तु बदल गयी लेबल पुराना। प्रश्न है, वेद को धारण करना, आत्मज्ञान प्राप्त करना, इसकी योग्यता पात्रता हमारे मापदंड बदलने मात्र से क्या बदल जायेंगी? क्या पोथी-पुस्तक पढ कर पंडित हो जा सकता है क्या? शुद्धचित्तता हमारी कल्पना का विषय नहीं अपितु नितांत वास्तविकता है जैसे की सुवर्ण की सुवर्णता। हमारे purity standard घटाने मात्र से क्या सुवर्ण अपने स्वरूप को पा सकता है? यदि नहीं, तो हमे याद रखना होगा की वेदों को धारण करने की योग्यता भी हमें यथार्थ में प्राप्त करनी पडेगी। ऐसे अधिकारी शिष्य को जन्म देना और उसका संगोपन करके पिता एवं अनन्तर आचार्य के अधीन करना यह स्त्री का अनन्य कर्तव्य है।

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(Source of image: https://www.menstrupedia.com/articles)

क्या हमे सोचना चाहिये कि नारी स्वतंत्रता हमे कौन सिखा रहा है।क्या हमारे सुसंस्कृत समाज को इसकी जरूरत थी।कहते है-

न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हति । मनुस्मृति

स्त्री को यथोचित पुरुष को पुछे बिना कार्य नही करना चाहिए। 

यह अन्याय है। परंतु स्त्री ही नहीं धर्म किसी को भी स्वतंत्र मनमाना व्यवहार करने की अनुमति नही देता।

कः स्वतंत्रः यः ईश्वरतंत्रः।कः परतंत्रः यः इन्द्रियतंत्रः ।मधुसूदन सरस्वती

कौन स्वतंत्र है? जो ईश्वर के अधीन है। कौन परतंत्र है? जो इंद्रियों के अधीन है।

या तो आप साक्षात् वेद को धारण कर आत्मानुशासन में रहें या…। पर समाज में बहुत कम लोगों की यह काबिलियत होती है। इसलिए अधिकांश लोगों को उन आत्मानुशासित वेदपुरुष के मार्गदर्शन में रहने को कहा।जो कि निरहंकार भाव से देखने पर आसान विकल्प है सुखकर भी। If benefit is the same then why carry the burden of freedom.जो तो आत्मनियंत्रण से अथवा स्वेच्छा से किसी के नियंत्रण में रहकर प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए निर्दिष्ट दायित्वों का निर्वाह करता है वह उन दायित्वों से मुक्त होकर अधिकाधिक आनन्द अनुभव करता है।इसके विपरीत स्वेच्छाचारी अधिकाधिक बंधनों मे जकड़ता चला जाता है।

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः।।बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।आत्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्।।जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। श्रीमद्भगवदगीता 6.5-6

अपना उद्धार करे न की अपने आप को गिरा दे। स्वयं ही अपना बंधु है, जिसने अपने आप को जीत लिया। अन्य व्यक्ति जिसका इंद्रिय एवं चित्त स्वयं के वश में नही है, वह तो स्वयं ही स्वयं का शत्रु है। जितात्म-प्रसन्नचित्त व्यक्ति के परमात्मा सदैव पास ही है। 

आइये! वेदों के प्रकाश मे अपने स्त्रीत्व को खोजे व सही अर्थों मे स्वतंत्रता प्राप्त करे।

– Mrs. Suvrata Vinod, Anandavan Bhakta Samudaya, Institute of Advanced Studies in Veda and Science.