प्राणसाधना क्यों और कैसे?

डा. राजकुमारी त्रिखा

२१ जुन, २०१५ को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संकल्पित “अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस” ने न केवल भारत में अपितु विश्वभर में ख्याति प्राप्त की। वस्तुत: योग विद्या हमारे पूर्वजों की अत्यन्त प्राचीन और अनमोल विरासत है। आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा डाक्टरों ने योगसाधना से होने वाले अनेक शारीरिक और मानसिक लाभों को प्रमाणित किया है। उन्होंने सूर्य नमस्कार और अन्य सूक्ष्म व्यायामों के प्रभाव का योगक्रियाओं के प्रभाव के साथ तुलना की, और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि योग के प्रभाव अन्य व्यायामों की अपेक्षा अनेक गुणा अधिक, उत्तम गुणवत्ता वाले और व्यापक रहे। शास्त्रों में तो स्पष्ट उद्घोष किया है – नास्ति योगसमं बलम्। प्राचीन और गुरुपरम्परा से मिलने वाली इस योग-विद्या का प्रचलन धीरे-धीरे इसके जिज्ञासु और साधकों की उत्साहहीनता के कारण कम होने लगा। समय के साथ-साथ मनुष्यों की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्षीण होने लगी। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे यह विद्या लुप्त होती गई । इस विद्या के जानकारों की यह भी मान्यता रही कि विद्या अपात्र व्यक्ति के पास न पहुँच  जाए तथा उसका दुरुपयोग न हो, इस कारण भी हमारे ऋषियों ने इस विद्या को वेद मंत्रों में संकेतों के माध्यम से सुरक्षित रखा। यह विद्या अत्यंत गोपनीय है और अनेक प्रकार से मानव कल्याण करने वाली है।

प्रायः आसन और प्राणायाम को ही योग समझ लिया जाता है परंतु योग के आठ अंग है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि। आसन तो योग का केवल मात्र एक ही अंग है। आसन के अन्तर्गत स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी क्रियायें आती हैं, अतः आसन बहुत लोकप्रिय हुए। प्राणायाम भी अत्यंत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी क्रिया है, जिसका उपदेश योग ग्रंथों में बहुत विस्तार से है। प्राणों की शक्ति को सभी जानते हैं। जब तक शरीर में प्राण हैं तभी तक व्यक्ति जीवित रहता है। हमारे ऋषियों ने बहुत सावधानी से प्राण की गतिविधियों को देखा और मनन किया। अतः प्राण-साधना को जानना परमावश्यक है।

ऋषियों ने शरीर में पंचप्राणों, उनके कार्यों और स्थानों का भी अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि शरीर में पाँच प्राण और पाँच उपप्राण होते हैं। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान – यह पांच प्राण हैं तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, और धनंजय उप प्राण हैं।  इन मुख्य पांच प्राणों में भी प्राण मुख्य है। इसका स्थान हृदय में बताया है। अपान वायु का स्थान गुदा में, समान वायु का नाभि में, उदान का कण्ठ और उसके ऊपरी भाग में स्थान है। व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है।

हृदि प्राणो स्थितो नित्यमपानो गुदमण्डले।

समानो नाभिदेशे तु, उदानो कंठमध्यगः।।

व्यानो व्याप्य शरीरे तु , प्रधानाः पंचवायवः।

(घेरण्ड संहिता ५.५९-६०)

शरीर में इन प्राणों और  उपप्राणों का कार्य भी अलग अलग है। प्राण शरीर में शक्ति प्रदान करता है, अपान वायु  शरीर से अशुद्धि निकाल कर बाहर कर देता है। समान वायु खाए हुए भोजन को पचाता है । उदान वायु कंठ के ऊपर के भाग में संचार करता है। व्यान वायु पूरे शरीर में विचरण करता है। नासिका द्वारा ली जाने वाली वायु जीवन दायिनी होती है। यह शरीर के अंदर जाकर आन्तरिक अशुद्धियों, रोगाणुओं और कफ, वात, पित्त (त्रिदोष) के मल दूर करती हुई उनको प्रश्वास के साथ बाहर फेंक देती है। जब तक शरीर में प्राण वायु समुचित रूप से गतिशील रहती है, तभी तक शरीर स्वस्थ रहता है। यही कारण है कि केवल प्राण का ही विस्तार किया जाता है, अर्थात् प्राणों का ही आयाम किया जाता है, अपानवायु आदि अन्य वायुओं का नहीं। विधिपूर्वक किया गया प्राणायाम अनेक रोगों को दूर करता है।

(Source of Image : https://arlivenews.com/in-udaipur-final-rehearsal-of-yog-one-day-before-of-international-yog-day/ )

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।।

(मनुस्मृति १.७१-७२)

अर्थात् जिस प्रकार लोहार की धौंकनी से तेजी से जलती हुई आग में सोना आदि धातुओं के मल जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणों के नियन्त्रण से सभी इन्द्रियों के दोष, मल, और अशुद्धियाँ जल जाती हैं। योग साहित्य और एलोपैथिक डाक्टर भी प्राणायाम की रोगनिवारक शक्ति को स्वीकार करते हैं। अस्थमा के रोगियों के एक समूह पर प्राणायाम के प्रभाव का अध्ययन किया गया। प्राणायाम के पहले उनके कुछ रक्त तथा श्वास संबंधी परीक्षण किए गए और प्राणायाम के कोर्स की अवधि के बाद पुनः रक्त और श्वास के वही परीक्षण  दोबारा किये गये। साधकों के परीक्षणों में सकारात्मक परिवर्तन मिले। साधकों का हीमोग्लोबिन, रेड ब्लड सेल्स तथा लिंफोसाइट काउंट्स बढ़े हुए मिले जबकि व्हाइट ब्लड सेल्स, पॉलीमर्स,  इस्नोफिल्स और मोनोसाइट्स कम हो गए। यह रक्त के बदलाव अस्थमा की तीव्रता कम होने के सूचक हैं। सबसे महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक उपलब्धि तो यह रही कि उपचार की अवधि में रोगियों को अस्थमा का दौरा ही नहीं पड़ा। उनके फेफड़ों की शक्ति बढ़ गई जिससे वे अधिक वायु को श्वास के द्वारा शरीर में खींच सके और अधिक समय तक उस वायु को भीतर रोकने में समर्थ भी हुए। इससे उनका श्वास का एंप्लीट्यूड और होल्डिंग टाइम बढ़ गया। यह सभी परीक्षण डॉ के. एन. उडुप ने किए और प्राणायाम के लाभों को स्वीकार किया {“Stress and it’s management by yoga”, Dr. K. N. Udupa, Delhi, 1985 and K.N.Udupa, R.H. Singh, R.M. Settiwar, and M.B.Singh. “Physiological and biochemical changes, following the practice of some yogic and non-yogic exercises,” Journal of Research in Indian medicine, 10(2)}। प्राणायाम की इस रोग निवारक शक्ति  का संकेत हमें ऋग्वेद के दशम मंडल के १३७ वें सूक्त के प्रथम और द्वितीय मंत्र में मिलते हैं, जहां प्राण को विश्वभेषज और बल दायक बताते हुए शरीर के रोगों और मलों को दूर करने वाला कहा है।

प्राण साधना कैसे करें

प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं और अनेक विधियों से किया जाता है। रोगी की शारीरिक शक्ति और रोग की अवस्था को देख कर उसके अनुसार ही प्राणायाम का चुनाव करना चाहिए। किसी अनुभवी, स्वयं साधना करने वाले, कुशल और सज्जन स्वभाव वाले योग शिक्षक की देखरेख में उचित प्राणायाम का ज्ञान प्राप्त कर अभ्यास करना चाहिए जो पालन करने योग्य नियम भी बताएगा और सावधानियों की शिक्षा भी देगा। कुछ प्राणायाम विशेष रोगों में ही लाभकारी होते हैं जैसे शीतली और सीत्कारी प्राणायाम, जो उच्च रक्तचाप,  एसिडिटी तथा गर्मी से उत्पन्न रोगों में लाभदायक होता है परंतु निम्न रक्तचाप तथा कफ के रोगियों के लिए यह प्राणायाम हानिकारक है। इसी प्रकार श्वास को भीतर रोककर कुम्भक सहित किए जाने वाले प्राणायाम हृदय और स्ट्रोक के रोगियों के लिए हानिकारक होते हैं। सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति को नाड़ी शोधन/ अनुलोम विलोम प्राणायाम करना स्वास्थ्यवर्धक और अनुकूल रहता है। श्वास को भीतर रोके बिना बाईं नासिका से श्वास लेकर दाहिनी नासिका से निकालना और फिर दाहिनी नासिका से लेकर बाईं नासिका से निकालना नाड़ी शोधन प्राणायाम है। इसका कारण है कि बाईं नासिका में चंद्र स्वर चलता है जो ठंडा होता है और यही जीवनदायक है। दाहिनी नासिका से निकलने वाली वायु गर्म होती है, क्योंकि यह शरीर के सभी दोषों को लेकर बाहर निकलती है। अतः शरीर में पहले स्वास्थ्यवर्धक प्राणवायु को  श्वास से भीतर खींचना चाहिए और दाहिनी नासिका से सभी मलों को बाहर फेंकना चाहिए। श्वास लेते समय यही विचार करना चाहिए कि  प्रकृति से शक्तिदायक वायु के साथ मेरे शरीर में शक्ति प्रवेश कर रही है। बाहर श्वास फेंकते हुए यह विचार करें की मेरे शरीर के सभी रोगों के कीटाणु और शरीर के सभी मल श्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। इस प्रकार प्राणायाम द्वारा सकरात्मक विचारधारा से शरीर के साथ-साथ मानसिक बल में भी वृद्धि होती है।

प्राणायाम का मूल तत्व है गहरा श्वास लेना, इतना गहरा की नाभि तक हिलने लगे। इससे श्वास से भीतर ली गई वायु की गुदा स्थित अपान वायु से टक्कर होती है। तब अपान वायु प्राण को नीचे अपनी ओर खींचती है, और प्राणवायु अपान वायु को ऊपर अपनी ओर खींचती है। प्राण अपान का यह घर्षण से नाभि स्थित जठराग्नि तेज होती है और रोगों के कारणभूत कफ, वात, और पित्त के कुपित अंश को जला कर शरीर को रोग मुक्त कर देती है।

प्राणायाम के नियम

प्राणायाम के लिए कुछ पालनीय नियम हैं , जिनका पालन करने से प्राणायाम का पूर्ण लाभ मिलता है।

1. प्राणायाम के ३ घंटे पहले कुछ ना खाया हो और पानी आधा घंटा पहले पी सकते हैं।

2. प्राणायाम के पश्चात् स्नान लगभग १ घंटे के बाद करें। पानी आधे घंटे बाद पी सकते हैं परंतु भोजन एक से डेढ़ घंटे के बाद ही करें।

3. प्राणायाम का साधक उचित समय पर सोए और उचित समय पर जागे। वह स्वास्थ्यवर्धक और सीमित मात्रा में ऋतु अनुकूल भोजन करें। तभी प्राणायाम का पूरा लाभ मिलता है।

प्राणसाधना के लाभ

प्राणायाम से अद्भुत लाभ होते हैं- मन की एकाग्रता बढ़ती है (जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बहुत बढ़ जाती है, एकाग्र मन से किया हुआ कार्य भी श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला होता है),  मन का तनाव भी बहुत कम हो जाता है (परिणाम स्वरूप तनाव से उत्पन्न होने वाले मनोदैहिक रोगों में बहुत लाभ होता है), मन में शान्ति रहती है, काम, क्रोध, ईर्ष्या आदि के नकारात्मक भाव धीरे धीरे कम होते जाते हैं (काम, क्रोध, लोभ आदि ही अनेक सामाजिक, आर्थिक, यौन अपराधों के मूल कारण होते हैं), भावनाएँ शुद्ध होती हैं जिससे व्यक्ति समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखने में सार्थक भूमिका निभाता है। प्राणायाम से इन लौकिक लाभों के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टि से भी  बहुत लाभ होता है। शरीर की अशुद्धियां नष्ट हो जाने पर प्रकाश स्वरूप आत्मा के ऊपर से अज्ञान अंधकार का आवरण हट जाता है। तब साधक को आत्मसाक्षात्कार होता है। यह आध्यात्मिक लाभ मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।

 (पतंजलि योगसूत्र २.५२)

यदि इस जीवन में आत्म स्वरूप को पहचान लिया तो बहुत उत्तम है, जीवन सफल है, और यदि न जान पाए तो बहुत बड़ी हानि है क्योंकि मानव जीवन का यही प्रथम लक्ष्य है कि वह आत्म-दर्शन का प्रयास करता रहे।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

(केनोपनिषद् २.५)

अयन्तु परमो धर्मः यद्योगेनात्मदर्शनम्।

(याज्ञवल्क्य स्मृति ८)

आशा है कि इस योग दिवस योग के इन सार्वभौमिक सकारात्मक परिणामों को स्वीकार करते हुए तथा प्रेरित होकर प्रबुद्ध जिज्ञासु प्राणायाम साधना में रुचि लेंगे।

डा. राजकुमारी त्रिखा, पूर्व अध्यापिका, संस्कृत, मैत्रेयी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

Indian Festivals based on the Concept of Yajña (Part -I)

Sh. Anand Gaikwad

Introduction

While I was studying Varāh Mihir’s “Brihat Samhitā” and participating in the exercise of validation of his Rain conception and Rain Delivery (RCRD) theory for Monsoon -2016; the basis of Yajña concept being incorporated in some of the Indian Festivals came to my mind as a realisation. I have been thinking about it ever since the publication of the report about this validation exercise in Asian Agri-History Journal 2018 Vol.22 (2), the International Quarterly Journal of Asian Agri- History Foundation. My association with late Ashwamedhayaji Shri Nanaji Kale for  validation of Suvrushti  Project and RCRD Theory for Monsoon 2016, was a wonderful experience for me; particularly for understanding the greatness of our Ṛśis in theorizing their observations  of nature, environment, atmospheric order and the  Cosmological  System consisting of Sun, Moon, Planets and Nakṣatras. One marvels at the wisdom and expertise in interweaving these theories in social and cultural life for the common benefit of mankind.

All of us are familiar with the Indian Monsoon. The word Monsoon has its origin in Arabic word, ‘Mausam’ which means ‘season’. The word which was originally referred to wind reversals in the Arabian sea, has come to mean the whole range of the phenomena associated with the annual weather cycles in tropical and sub-tropical Asia, Australia and Africa. Therefore, the study of Monsoon weather patterns is of great importance for every Indian farmer, every student of Environmental Science and for that matter every Indian citizen, because Monsoon is the life-line of India. According to world climate patterns and regional geography of Asia and India, Monsoon climate patterns are characterized by large scale seasonal reversals of winds, giving very distinct seasons, ’Summer’ and ‘Winter’. In summer moist air is carried northwards from the Indian Ocean over the Indian sub-continent bringing rains. In winter, cool dry weather is carried southwards. Thus, the year gets divided into wet and dry seasons. In addition a short North-East Monsoon affects the south-east coastal states of India due to winds bringing moisture from Bay of Bengal. The Summer Monsoon arrives in southern India in late May or early June and gradually advances northwards and westwards reaching Jammu-Kashmir, Pakistan by early July. It begins to retreat from north western regions and Pakistan by September and withdraws from south India by November. This pattern of advancement and withdrawal gives Indian sub-continent its characteristic seasonal rainfall pattern which is called Indian Monsoon.

Our great Ṛśis and seers during Vedic Period and Post Vedic Period had studied these weather patterns and encapsulated their findings in scriptures like , “ Brihat Samhitā“ of  Varāh Mihir, “Arthaśastra“ of Kautilya  and “Kṛśi Parashar“ of  Parashar. In addition to these examples of the Science of Rainfall Prediction and Rain Conception Signals, there are many ancient texts of Astrometerology of Vedic traditions like –Parashar Samhitā, Garg Samhitā, Kashyap Samhitā, Maghmala Samhitā, Narad Samhitā etc. which have been mentioned in the reports/ books published by Shri Yogiraj Ved Vidnyan Aśram, Barshi, Dist. Solapur Maharashtra, (Vedaśram) founded by late Ashwamedhayaji Shri Nanaji Kale mentioned above. Vedaśram carried out various experiments of, Suvrushti Projects and Validation of Varāh Mihir’s RCRD Theory by performing Somyāgas, Parjanya Yāgas for establishing scientifically the relationship between Yajñas, Agriculture, Environment and Rainfall.

Varāh Mihir’s Theory of Rain Conception and Rain Delivery ( RCRD):

Varāh Mihir in his, “Brihat Samhitā” gives his theory of Vṛśṭi Garbhadhārana (Rain conception) and Vṛśṭi Prasav (Rain delivery). Chapters 21 to 28 of this book are devoted to this subject-matter. Before laying down his theory, Varāh Mihir explains the importance of the knowledge of Rainfall Prediction, Rain Conception Signals and Rain Delivery at the beginning of chapter 21 entitled “Garbh Lakṣaṇam” (Pregnancy of clouds) in the first verse as follows:

अन्नम् जगत: प्राणा: प्रावृट्कालस्य चान्नमायत्तम् |

यस्मादत: परीक्ष्य: प्रावृट्काल: प्रयत्नेन् ||१||

Annam Jagataḥ Prāṇāḥ Prāvṛṭkālasya Chānnamāyattam  I

Yasmādataḥ Parīkṣyaḥ Prāvṛṭkālaḥ Prayatnen  II1II

It means that as the food is life-giving and life-sustaining force to all living beings and the food is dependent on rainfall (Monsoon) it should be observed, investigated and studied carefully. In India only 35% of the cultivated land is an irrigated land, which means that almost 65% is rain-fed area, which is entirely dependent upon Monsoon. Hence farmer’s knowledge about Rain Conception Signals and Rainfall Prediction is of great significance.

केजिद्वदन्ती कार्तिक शुक्लान्तमतीत्य गर्भदिवसा: स्यु: |

न च तन्मतं बहुनां गर्गादीनां मतं वक्ष्ये II II

Kejidvadantī Kārtika Śuklāntamatītya Garbhadivasāḥ Syuḥ  I

Na Cha Tanmataṁ Bahunāṁ Gargādināṁ  Mataṁ Vakṣye II5II

Thus, some sages say that the days of pregnancy of clouds begins after the full moon of Kārtika month but the opinion is not shared by the majority. Therefore he further says:

मार्गशिर: सितपक्षप्रतिपत्प्रभृति क्षपाकरेआषाढाम् |

पूर्वा वा समुपगते गर्भाणां लक्षणं ज्ञेयम् ||||

Mārgśiraḥ Sitpakṣapratipatbhṛti Kṣapākareāṣāḍhām I

Pūrvā Vā Samupagate Garbhāṇāṁ Lakṣaṇaṁ Jñeyam II 6 II

The symptoms of pregnancy of clouds are to be detected / observed when Moon transits Purvāśāḍha asterism commencing from the first day of Mārgaśirsya. Varāh Mihir’s prime RCRD Theory is stated in verse 7 :

यन्नक्षत्रमुपगते गर्भश्चंद्रे भावेत्स चन्द्रवशात् |

पन्चनवते दिनशते तत्रैव प्रसवमायाति || ||  

Yannakṣatramupagate Garbhaśchandre Bhāvetsa Chandravaśāt I

Panchanavate Dinśate Tatraiva Prasavmāyāti  II7II

The rain-foetus formed during the Moon stay in a particular asterism (Nakṣatra) will be born 195 days (192 calendar days  + or – one day ) later at the time when the Moon will be again in the same asterism according to the laws of her revolution (Moon Cycle). Thus, the RCRD Theory of Varāh Mihir in simple words is that rain conception takes place during dry period (Mārgaśir to Chaitra).The rain conception signals can be observed from the first day of Mārgaśir till Chaitra Māsa. The rain-foetus conceived during this period will give rain delivery after the gestation period of 195 days (approx. six and half months later) at the time of same asterism when the foetus was conceived. The various rain conception signals to be observed are given in other verses and depending on the rain conception signals observed the rain delivery after the gestation period of 195 days  can be predicted . One can prepare a local calendar of rainfall prediction and validate the same with actual rainfall on those days. A farmer can plan his agricultural operations based on this local Agro-climatic calendar.

The relationship of Yajña with Agriculture and Environment :

When one reads the RCRD Theory of Varāh Mihir along with the gospel truth given in Bhagavadagītā Chapter 3 Śloka 14:

अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्ज्यन्यात् अन्नसंभव: |

यज्ञात् भवन्ति भूतानि पर्ज्यन्या: यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ||३.१४|| 

Annād bhavanti bhutāni parjanyāt Annasambhavaḥ I

Yajñāt Bhavanti Bhutāni Parjyanyāḥ Yajñaḥ Karmasamudbhavaḥ  II3.14 II

One leads to logical conclusion that Yajñas be performed during the dry period to facilitate rain conception and rain-foetus nourishment during the gestation period. This very concept has been incorporated in our festivals which are based on Yajña/ Havans starting from Durgā Navrātri in Aświn to Rāma Navmī in Chaitra and Akaya-Ttīyā in Vaiśākha. The deities worshipped are Ādi Śakti, Puruśa, Śiva, Agnī and Surya and the offerings are preparations of cereals and pulses of newly harvested crops. Our Ṛśis have interwoven these festivals which are based on ’Suryōpasana’ and ‘Agniupasana’ in our cultural system for celebration / participation by masses.

(to be continued…..)

Sh. Anand GaikwadKrishi Bhushan Sendriya  Sheti  M. S. & Retd. Executive Director/Company Secretary