सर्वरूप अटल : हम सब अटल, हम सबमें अटल

Alok Dwivedi

-Alok Kumar Dwivedi

अटल जी का व्यक्तित्व एवम् जीवन

अटल बिहारी वाजपेयी निहसंदेह भारतीय लोकतंत्र के प्राणपुरुष रहे। ग्वालियर में जन्मे अटल जी को कवि हृदय अपने पिता जी से विरासत में प्राप्त हुई। अटल जी के सम्पूर्ण जीवन में उनका द्रवित कवि हृदय प्रवाहमान रहा। आजकल प्रशासन में नैतिकता की विवेचना करते हुए जो सर्वप्रमुख गुण बतलाया जाता है वह है- ’सम्वेगात्मक बौद्धिकत’ अर्थात् प्रज्ञा और हृदय का सम्मिलित शासन। इस अवस्था में हृदय (भावनाओं) का निर्णयन में महत्वपूर्ण स्थान होता है। भारत में प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी अपने इसी गुण के लिए अजातशत्रु के रूप में भी सम्बोधित किए गये। समाजिक व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार से बदलाव लाया जाय, उनके जीवन को किस प्रकार से ख़ुशहाल किया जाय, लोकतंत्र में उनकी आवाज़ को सड़क से लेकर संसद तक किस प्रकार से गतिमान किया जाय ये सारी बातें ही अटल जी के अटल अंतस में प्रवाहित होती रहती थी। इसे मूर्त रूप प्रदान करने हेतु अटल जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन तपस्या रत रखा। अटल जी का जीवन इतने आयामों को संजोये रहा है कि उनके महाप्रयाण कर जाने पर लोग उनके जीवन के एक-एक पक्ष को अपने में प्रतिबिम्बित होते देख रहें हैं। माता-पिता के प्रति सम्मान का भाव रखने वाला व्यक्ति अटल जी के बचपन में अपना बचपन देख रहा है, पिता से मित्रवत रहने वाला बालक अटल जी के कॉलेज के दिनो में उनमें ख़ुद को देख रहा है क्यूँकि अटल जी कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज में लॉ की पढ़ाई में अपने पिता जी के ही साथ एक ही कक्षा में पढ़ते थे और मित्र की भाँति हॉस्टल के एक ही रूम में रहते थे। पत्रकार अटल जी में पत्रकार देखते थे क्यूँकि प्रारम्भिक दौर में अटल जी पत्रकार थे। छात्र राजनीति में भी अटल जी कॉम्युनिस्ट छात्र विंग एस॰एफ०आई॰ से जुड़े रहे तो छात्र राजनीति में रुचि रखने वाले भी उन्हें अपने आदर्शों में मानते रहे हैं। राष्ट्रप्रेम के भावों से ओतप्रोत हो स्वाधीनता, स्वाभिमान और लोकतंत्रात्मक मूल्यों हेतु राष्ट्रीय महत्व के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी करने वाले लोग अटल जी में ख़ुद को प्रतिबिम्बित मानते हैं। 1930 के दशक के मध्य में अटल जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय रूप में जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलनों में भागीदारी दी। उन्होंने इस दौरान विभिन्न छात्र संगठनों के छात्रों को स्वतंत्रता आंदोलनों में भागीदारी सुनिश्चित की। आंदोलनों में सफलता या असफलता के पश्चात् किसी संगठन से वैचारिक स्तर पर मतभिन्नता होने पर नए संगठन की आधारशिला रखने वाले लोग अटल जी में अपना यह रूप देखते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कश्मीर के मुद्दे पर विचारों की सहमति न होने पर डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब जनसंघ की नींव डाली तो अटल जी इसके संस्थापक सदस्य रहें। जो लोग अपनी कार्यक्षमता से किसी-किसी के दिल में विशेष स्थान बना लेते हैं वे लोग  भी स्वयं को अटल जी में देखते हैं। अटल जी की कार्यशैली से अत्यंत प्रभावित होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने उन्हें संसद सदस्य बनाने हेतु तीन जगहों से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया था अपनी कार्यशैली से विरोधियों को भी आत्ममुग्ध करने की शैली रखने वाले अटल जी में ख़ुद को देखते है । यद्यपि नेहरू जी के प्रधानमंत्री रहते हुए संसद में अटल जी कांग्रेस की नीतियों के प्रखर आलोचक रहे परन्तु उनकी वाक्शैली, कार्यक्षमता और जनहित के मुद्दों को प्रभावी रूप से उठाने से मुग्ध होकर नेहरू जी ने एक बार विदेश से आए प्रतिनिधिमंडल से इन्हें मिलवाते हुए कहा था कि यह लड़का भविष्य में इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा। हिंदी, हिन्दू और हिंदुस्तान में आस्था रखने वाले लोग भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का पक्ष रखते हुए अटल जी ने अपना भाषण हिन्दी में देते हुए आपातकाल के पश्चात् भारत में हुए लोकतांत्रिक स्थिरता को मज़बूती से लोगों के सामने रखा। अपनी कविता “हिन्दू तनमन हिन्दू जीवन” में हिंदुत्व के बारे में श्रेष्ठ प्रतीकों का प्रयोग कर हिन्दुत्व का विचार दृढ़ किया। जीवन जीते हुए अपने स्वाभिमान और अपने विचारों से कभी समझौता न करने वाले भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं। अटल जी ने जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की तो संसद में इसके मात्र दो सदस्य थे परंतु अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा और स्वाभिमान के आत्मबल से जन सरोकार के मुद्दों को निरन्तर प्रभावी रूप से सदन के पटल पर रखते हुए एक दिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आए और दुनिया  सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार बनाकर यह दिखा दिया कि यदि जीवन में निरन्तर हम नैतिकता के पथ पर चलते हैं तो निश्चित ही एक दिन सफलता ज़रूर प्राप्त होगी। व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और मूल्यों को आत्मसात करने वाले लोग भी अटल जी के जीवन के एक पक्ष में ख़ुद को देखते हैं। जब संसद में सरकार को बचाने के लिए एक सदस्य की आवश्यकता थी तब भी ख़रीद फ़रोख़्त की राजनीति से ख़ुद को दूर रखते हुए अपने आदर्शो से समझौता न करते हुए विपक्ष में बैठना स्वीकार किया। १३ दिन के अल्पकालिक सरकार के गिर जाने पर अटल जी के संसद में दिए गये भाषण को लोकतंत्र के श्रेष्ठ राजनीतिक मूल्यों का आप्तवाक्य कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संसद में भाषण के दौरान अटल जी ने कहा था कि “सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी पर यह देश रहना चाहिए…इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए….” इन मूल्यों के साथ अटल जी राजनीति में आगे बढ़ते गये। समाज में वे लोग जो आपसी साझेदारी और सहयोग से किसी साध्य की तरफ़ गति करने को श्रेयस्कर मानते हैं वें भी अटल जी में स्वयं को देख सकते हैं। अटल जी ने लगभग २५ पार्टियों को साथ मिलाकर केंद्र की सरकार को सफलतापूर्वक नेतृत्व प्रदान किया यह स्वयं में अद्भुत रहा। इस दौरान देश के जनहित के मुद्दों को भी अटल जी ने सामंजस्यपूर्वक हल करने का प्रयास किया। कवि जो जीवन और जगत की यथार्थता को प्रकट करते हुए अपनी बातों में भविष्य के अंकुर प्रस्फुटित करता है वह भी अटल जी में स्वयं को देख सकता है। अटल जी विशाल हृदय वाले कवि जो जनसामान्य के अंतस के भावों को शब्दों के द्वारा प्रकट कर शासनसत्ता पर बैठे लोगों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन हेतु प्रेरित करते रहे। अटल जी की ख़ूबी यह रही कि जब उन्होंने ख़ुद शासन सत्ता की बागडोर सम्भाली तब उन्होंने ख़ुद को भी काव्य के माध्यम से अपने कर्तव्यों और दायित्वों का बोध कराना जारी रखा। जो लोग एक कुशल प्रशासक के रूप में हैं वे भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं। अटल जी दूरदर्शी प्रशासक थे और प्रशासन में सम्वेगात्मक बौद्धिकता को अत्यंत महत्व देते थे। वे अपने पड़ोसियों से सम्बंध को सुधारने के पक्षधर थे और इस क्रम में पाकिस्तान के लाहौर तक मैत्री बस सेवा को प्रारम्भ कर वहाँ स्वयं गये और मित्रता का हाथ बढ़ाया परंतु वहीं दूसरी तरफ़ जब पाकिस्तान ने कारगिल पर हमला किया तो सेना का साहस बढ़ाते हुए भारत के पराक्रम और शौर्य को कम नहीं होने दिया। अमेरिका की तमाम पाबंदियों के बावजूद पोखरन परीक्षण विश्व पटल पर भारत की उपस्थिति का आभास कराया। सर्व शिक्षा अभियान “सब पढ़े सब बढ़े” और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उनकी दूरदर्शिता को प्रकट करती है। एक प्रशासक के रूप में अटल जी पंडित दीन दयाल जी के अंत्योदय के विचार को आत्मसात करते हुए नीति निर्माण करने और उसको मूर्त रूप प्रदान करने को सदैव प्राथमिकता देते रहे। एक प्रशासक के रूप में वह समावेशी विकास के पुरोधा माने जाते हैं।

Atal ji

अटल जी की विचारधारा

लोकतंत्र के प्रहरी अटल जी में स्वयं की दूरदर्शी राजनीति को प्रतिबिम्बित पाते हैं। एक बार संसद में केवल दो सदस्यों के होने पर कांग्रेस द्वारा उपहास करने पर अटल जी ने कहा था कि “आज आप लोग हमारी संख्या बल पर हँस रहें हैं, एक दिन ऐसा आएगा जब केंद्र सहित अन्य सभी राज्यों में हमारी सरकार होगी, हम सत्ता पक्ष में होंगे और आप विपक्ष में होंगे“। इस दृष्टि से अटल जी काल के चक्र घूर्णन को शाश्वत मानते थे। आज जो देश की राजनीतिक दशा है वह उनकी बातो को यथार्थ धरातल प्रदान करती हैं।

वैदिक मूल्यों के पक्षधर  ’अटल जी’ 

अटल जी इस प्रकार अन्य से भिन्न रहे। एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में वह भारतीय संस्कृति और मूल्यों के उत्थान हेतु सदा प्रतिबद्ध रहे। सामान्यतः यह देखा जाता है कि राजनीतिक लाभ के लिए लोग जाति, धर्म, पंथ इत्यादि के आधार पर समाज को विभक्त करते हैं और अपना लाभ लेने की कोशिश करते हैं पर अटल जी सदा मूल्यों से युक्त राजनीति के पक्षधर रहे। मूल्य वैदिक परम्परा का आधार स्तम्भ रहा है और जब भी व्यक्ति अपने विचारों और कार्यों से मूल्यों के संवर्धन में योगदान करता है तो निश्चित ही वह कहीं न कहीं वैदिक परम्परा का ही संवर्धन करता है। वैदिक सभ्यता के इतिहास के लगभग 5000 वर्ष से अधिक के राजनीतिक इतिहास में सदा ही एक महत्वपूर्ण बात रही कि यहाँ राजनीति का धर्म रहा है, धर्म की राजनीति नहीं रही।अटल जी ने अपने कार्यों और व्यवहार से सदा ही राजनीति के धर्म की वकालत की जिसका ध्येय वाक्य रहा कि समाज में सदैव ही बिना किसी भेदभाव के समाज के समस्त वर्गों के हितो का संरक्षण करना और साथ ही समाज के वंचितो और पिछड़े तबक़ों के उत्थान के प्रयास किया जाय। एक समय देश में ऐसी स्थिति आयी जब लोग बच्चों के प्राथमिक स्तर की शिक्षा से अपने दायित्वों से विमुख होने लगे। इसके परिणाम स्वरूप देश में प्राथमिक स्तर के बच्चों में स्कूल छोड़ने की संख्या में व्यापक बढ़ोत्तरी हुयी। निश्चित ही किसी देश के लिए यह एक काफ़ी विमर्श का विषय होता है। अटल जी जैसे कवि हृदय को काफ़ी व्यथित करने वाली बात थी। इस संवेदना को महसूस करते हुए अटल जी ने शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार अधिकार माना। इसे मूल कर्तव्य की श्रेणी में भी डाला गया। इसके परिणामस्वरूप प्राथमिक स्तर की शिक्षा में बच्चों की संख्या में काफ़ी सुधार हुआ। भारत को परमाणु शक्ति बनाने के सम्बंध में अटल जी का संसद में यह सीधा वक्तव्य था कि देश को अपने सुरक्षा मानकों को लेकर सदा सचेत रहना चाहिए और हर प्रकार से सदैव तैयार रहना चाहिए। पड़ोसियों को लेकर भी अटल जी काफ़ी उदार रहे। वह सदा ही कहा करते थे कि पड़ोसियों से सम्बंध मधुर रखना एक कुशल रणनीति का हिस्सा है क्यूँकि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते। इसी आधार पर उन्होंने पाकिस्तान से सम्बंधो को नया आयाम देते हुए भारत पाकिस्तान मैत्री बस सेवा भी शुरू की पर जब पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण किया तो उसका भी मुँहतोड़ जवाब देने से बाज़ नहीं आए।

अटल जी का महाप्रयाण अटलसत्य मृत्यु को साहचर्य प्रदान करने जैसा है। जिस प्रकार से संस्कृत का यह प्रसिद्ध श्लोक है-

   “ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”

अर्थात् वह जो दिखाई नहीं देता है, वह अनंत और पूर्ण है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ। यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया। इसी प्रकार अटल, अटल मृत्यु से समागम कर अटल सत्य ही रह गया। ना ही कुछ ह्रास हुआ ना ही कुछ वृद्धि हुई।

-Alok Kumar Dwivedi, Research scholar, Department of Philosophy, University of Allahabad

Advertisements