Holi: The Feast of Multidimensional Harmony and Divine Love: The Yajna and Yoga for All

Prof. Shive K. Chaturvedi

In the age of prevailing conflicts, confusions, emptiness, and meaninglessness, many leaders of all kinds and creeds-intellectuals, social scientists, physical scientists, theologians, and politicians have suddenly started preaching about the urgent need of harmony and love within this variegated world. The irony is that these words and concepts remain evasive and elusive to most of us. In the absence of real active participation (with mind, speech, and action) in the feast of harmony and love, the entire endeavor of leaders of all colors and creeds appears to be nothing more than a sonorous verbiage-an utter nominalism. Do we have an opportunity for such a feast of inviting harmony and unalloyed love? Yes we do! And that is what the Holi is all about.

The historical origin of Holi is still shrouded in mystery; however, many good indications place it in very remote times, all the way back when Bhagavan Krishna spent his miraculous and divine playful boyhood in Vrindavan, Braj-Bhoomi, India (more than 5000 years ago). Its current traditions and practices appear to have evolved from harmonizing of many dharmic, adhyatmic, social, and folk traditions.

The Holi celebration begins with a bonfire. The bonfire is started by collecting, from every house in the village, the accumulated trash, garbage, and waste. This clean-up act is the reminder of the necessity of cleaning all the physical, as well as mental, spaces where lots of polluting elements have grown out of our material nature, such as uncontrolled sensual desires, anger, delusion, hatred, violence, lust, and greed. People gather around the bonfire and make offerings that might include roasting ears of new, still green barley crops which are still in the fields (this act is a kind of Vedic Yagna), and sing and dance around the fire, with songs, including the chants written in local vernacular. After all, this is New Year’s Day; a day to welcome the most colorful, joyful spring season-the king of all seasons. This is the Holika-Dahan.

In the Braj-Bhoomi, Holi playing is a battle of divine love. Young wives of the village are ready to attack the best men of the village with their sticks. It is time for colors; the wet and dry, all kinds. Everyone has been transfigured; no one is recognizable; the whole Braj-Bhoomi appears to be in great social turmoil, chaos, craziness, and good humor–yet everyone is in a state of great joy. The erotic mood is in full swing, yet within the expanded bounds of ethical and moral norms. People are impersonating Shri Radha and Krishna; the roles have been reversed; the genders gone astray. This continues for a day or two, and then purification and restructuring starts by washing, cleaning up, and donning new clothes.

This is a new beginning. Everyone greets one another with a new promise of cooperation, support, and love for the rest of the year. Radha-Krishna Bhajans (devotional songs) go on with joyful celebrations, with intense divine passion and love (Bhakti Yoga), after all, the Holi of Krishna is no mere intellectual exercise; no mere theory of love, no mere academic play: rather it is Divine Lila that each one of us must actively participate in and play our respective sva-dharmic roles with great passion and joy.

The richness, variety, and beauty of Holi Colors are the metaphors for the colors and the moods of five basic elements of Prakriti (material Nature), the changing world, seasons, and mind-an aspect of Divine Shakti Maya. The new beginning, the adhyatmic renewal for a better future for all must start by smearing out and covering up all worldly, social and physical and mental distinctions and categories. The Holi celebration tends to transcend all the established differences and diversity of varna, caste, color, sex, age, wealth, power, and attitudes. The social destruction and renewal, world pollution and purification, smearing out the diversity to re-enact harmony and unity occur, not only on intellectual planes but it is played out physically and mentally by each and everyone with great joy. After all, it is Holi of Radha- Krishna-the feast of multidimensional harmony and divine love.

Prof. Shive K. Chaturvedi, Los Angeles, California, USA

क्रांतिकारी नारीवाद में सू-फेमिनिज़्म (Sū-Feminism) और सी-फेमिनिज़्म (Sī-Feminism) के भारतीय विकल्प

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस इस बार सीता जयंती के आस-पास होने से स्वाभाविक विचार आया कि क्या होता यदि सीता नारीवादी होतीं? यदि होतीं, तो किस तरह का नारीवाद प्रतिपादित करतीं? क्या आज का नारीवादी समूह (फेमिनिस्ट ग्रुप) उन्हें स्वीकार करता? ऐसा माना जाता है कि संसार में ऐसी कोई विचारधारा नहीं, जो महाभारत काव्य में न मिले, और उसी तरह विश्व में ऐसा कोई चरित्र नहीं, जो रामायण अथवा रामचरित मानस में न मिले। इस प्रकार नारियों के अनेक रूप रामायण के घटनाक्रमों में दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें कैकेयी, कैकसी, कौशल्या, मंथरा, ताड़का, तारा, मंदोदरी, रुमा, सूरसा, सिंहिका, शबरी, सीता, शूर्पणखा, स्वयंप्रभा, सुलक्षणा, मांडवी, उर्मिला, श्रुतकीर्ति, अहिल्या, अनुसूइया, लंकिनी, इत्यादि उल्लेखनीय नारियाँ रही हैं। वैसे तो इन सभी नारियों के साहस, स्वातन्त्र्य, सामर्थ्य एवं समर्पण की अपनी अद्भुत कहानियां हैं, नारीवाद के प्रसंग का यथोचित प्रतिपादन सीता और शूर्पणखा चरित्र से प्राप्त हो सकता है।

हम देखते हैं कि सीता और शूर्पणखा ये दोनों क्रान्तिकारी महिलाएँ थीं। शूर्पणखा ने उस त्रेता काल में अपने मन से विवाह किया था। हालांकि, रावण ने उसे स्वीकार नहीं किया था। लेकिन, उसके बावजूद वह सेना की एक कमांडर, हुआ करती थी, और पूरा दंडकारण्य उसके अधीन था। इसलिए उसने राम को, जब वे  वहाँ पहुँचे, तो ललकारा। तो ऐसी वैसी महिला नहीं थी शूर्पणखा। वह बलिष्ठ थी और अपने क्रान्तिकारी विचारों के आधार पर ही उसने कार्य किए। उसने अपने महाबली भाई रावण से एक समझौते के अंतर्गत उस क्षेत्र का कार्यभार संभाला था, वह सबला थी, अबला नहीं। वह कूटनीति में निपुण थी, रणनीतिज्ञ थी। रूप, रंग, तेवर बदलने के गुण थे, उसके अंदर। खर, दूषण जैसे सेना नायक उसके आदेश का पालन करते थे। और वह यह सब अपने क्रान्तिकारी विचारों के कारण थी। वह स्वच्छंद, मनचली थी। उसके राम या लक्षमण के ऊपर आसक्ति केवल स्वच्छंदता ही नहीं, बल्कि रणनीति को भी दर्शाती है। राम रावण युद्ध की मुख्य पात्र वही थी।

सीता भी कम नहीं थीं, लेकिन व्यतिरेक है। सीता को प्रायः एक अनुसेवी, आज्ञाकारी, समर्पित महिला के रूप में दिखाया जाता रहा है, परन्तु सीता जन्म से ही एक क्रांतिकारी स्वभाव की व्यक्ति थीं। दो घटनाओं से यह पता लगता है – एक कि, राजा जनक ने कहा था कि, ये धनुष शिवजी का है, कोई उसको उठाएगा नहीं। और क्या किया सीताजी ने? पहले धनुष को उठा दिया। अपने पिता की अवज्ञा करके उठा दिया। ये तो दूसरी बात है कि धनुष बहुत भारी था, उठाईं कैसे। लेकिन उन्होंने कहा कि, शिव का धनुष है, तो मैं क्यों नहीं उठाऊँ, मैं साफ करूँगी, मैं उठाऊँगी। और दूसरा, जब राम और लक्ष्मण जब वन जाने लगे, तो कैसे उर्मिला नहीं गईं, कैसे सुमित्रा ने इस बात के लिए लक्ष्मण को मनाया, लेकिन सीता को कोई नहीं मना पाया। बहुत सारे सन्दर्भ कहे गए हैं, जिसमें सीता को प्रकृति के बारे में बहुत ज्ञान था, लेकिन दर्शन की भी वह बहुत बड़ी ज्ञाता थीं, और उन्होंने दर्शन के आधार पर राम से वाद-विवाद करके ये सिद्ध किया कि, नारी का स्थान पति से परे नहीं हो सकता है, खासकर अगर पति विपत्ति में हो तो। इसलिए वह भी एक ऐसी नारी थीं, जिन्होंने क्रान्तिकारी विचारों का आचरण करके अपने जीवन के आदर्शों का पालन किया।

सीता के विद्रोही विचारों की और भी झलक मिलती है, जब उन्होंने अपने देवर लक्षमण की खींची रेखा को भी भिक्षा देने हेतु पार किया, और लंका से हनुमान जी के साथ अकेले आने से इंकार कर दिया था। लेकिन इन विद्रोही कार्यों में भी उनके कर्तव्य पालन की ही छवि दिखती है। लक्षमण रेखा भी पार कर उन्होंने रघुकुल को किसी भिक्षुक को खाली हाथ लौटने के कलंक से बचाने, तथा पापी रावण को दंड दिलवाये बिना हनुमान जी के साथ लंका से वापस आने से इंकार किया था। 

अंत में सीता जी अयोध्या आने के पश्चात् निष्कासन की बात आती है, जिस पर लोग (विशेषतः महिलाएं) बहुत सारी आपत्तियाँ जाहिर करते हैं। वह घटना भी एक सन्दर्भ में ही समझी जा सकती है। भारत की परम्पराओं में खासकर के उस समय की परम्परा में जब राजा सिंहासन पर बैठता था, उसका राज्याभिषेक होता था, तो रानी का भी राज्याभिषेक होता था। सिर्फ राजा का राज्याभिषेक नहीं होता था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि, रानी राजा से किसी तरह से कम हो सकती है। तो राम कौन होते हैं उनको निकालने वाले? अगर उनका भी राज्याभिषेक हुआ, तो ऐसा नहीं हो सकता है।

दूसरी बात यह है कि, उस समय राजतंत्र नहीं हुआ करता था, बल्कि प्रजातंत्र हुआ करता था। प्रजा का जो मूल रूप है, वह आज वाला प्रजातंत्र नहीं है, जिसको लोग कभी-कभी प्रजातंत्र कह देते हैं। प्रजा की एक सबसे बड़ी विशेषता है कि, प्रजा जो है वह आत्मनिर्भर होती है। वह किसी सरकार की नौकरी के चक्कर में नहीं होती, किसी सरकार से उसको कुछ नहीं चाहिए। जब वह आत्मनिर्भर होगी, तो जैसे अभी कुछ लोग गाँव से जुड़े होंगे, तो धोबी, नाई, कारपेंटर, कुम्हार, ये सारे लोग अभी भी नौकरी नहीं करते हैं, और ये अपने जीवन को स्वयं पालते हैं। उस समय राम के राज्य में किसी को नौकरी नहीं करनी पड़ती थी। सब लोग अपनी, जो भी उनके सृजनात्मक भाव थे, विचार थे, कुशलता थी, उन्हीं के आधार पर जीते थे। इसलिए वे पूरी तरह से स्वतंत्र थे, और राम इस बात को मानते थे कि, अगर स्वतंत्र व्यक्ति कुछ कहता है, तो उसे हमको मानना पड़ेगा।

राम की अपनी बात नहीं थी, बल्कि वो इस प्रणाली या व्यवस्था के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध थे। सीता जी भी कटिबद्ध थीं, क्योंकि दोनों का राज्याभिषेक हुआ था। धोबी आता है, तो धोबी प्रजा में आता है, और जो भी कहते हैं, जो भी ऐसी बातें होती हैं, सीता जी स्वयं इसका निर्णय लेकर वह जाती हैं जंगल में। अब लोग बोलेंगे कि, कैसे ये निर्णय लेकर जाएँगी जंगल में?

आज के युग में अगर आधुनिकता देखनी है, तो अगर मियाँ बीवी में कोई बातचीत हो जाती है, तो पहले तो माताजी के यहाँ फोन जाता है, मायके में, भाई को बुलाओ, बाप को बुलाओ इनको समझाएँ, नहीं तो पुलिस को बुलाओ। लोग कहेंगे कि, उस समय पुलिस नहीं थी, गुरु तो थे, गुरु के यहाँ जा सकतीं थीं। लेकिन वह गईं कहाँ? जंगल में। उनका बाप झोपड़ी में रहने वाला तो था नहीं। मान लीजिए नहीं बुलातीं, तो राजा था उनका बाप, मायके चली जातीं। लेकिन क्यों नहीं गईं? इससे लगता है कि उनका निर्णय उनका था। अगर उनको निकाला जाता तो ऐसा वो नहीं कर सकतीं थीं। अगर उनका निर्णय उनका था, तो उनके व्यवहार को देखना पड़ेगा। उन्होंने राम के प्रति नकारात्मक एक भी शब्द न तो कभी खुद कहा, न अपने बच्चों से कहने दिया? और अन्त में उनकी मुलाकात राम से होती है, तब राम की बात का विद्रोही भाव से उल्लंघन करते हुए धरती में समाती हैं, ये कह के समाती हैं कि, आगे कभी भी मेरा जन्म होगा, तो मैं आपको ही पति-रूप में पाना चाहती हूँ। आजकल के ज़माने में जहाँ डिवोर्स बहुत बढ़ता जा रहा है, ऐसी नारी जो इतनी यातनाओं के बाद भी अपने कुल की परम्पराओं के आधार पर अपने जीवन को कठोरता से भोगते हुए, अपने बच्चों का पालन करते हुए, मान मर्यादा से रहते हुए और इस संसार से जाती है, वह नारी रामराज्य लाने में, रामराज्य प्रकट करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। 

इसलिए,

‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाइ पर वचन न जाई।

जैसी कुलरीति को सीता ने पूरी तरह संजोकर अपने आचरण में, अपने चरित्र में प्रकट किया। इस प्रकार सीता का वैदेही नहीं, बल्कि ये विद्रोही भाव ही रामायण की जड़, आधार, एवं सम्पूरण है, और रामायण को सीतायण कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालाँकि इस बात के लिए सीता की सम्मति संभवतः नहीं होगी।

आज की महिलाएँ, आज की बहू, बेटियाँ, बहनें, माताएँ व् पत्नियां अगर क्रान्तिकारी नारीवादी बनना चाहती हैं, तो उनके सन्मुख दो सशक्त भारतीय विकल्प मौजूद हैं, एक सू-नारीवाद (सू -फेमिनिज्म), जिसमे शूर्पणखा वाला क्रान्तिकारी, बलिष्ठ, स्वच्छंद, और बराबरी का भाव-विचार व आचरण हैं, तथा दूसरा सी-नारीवाद (सी-फेमिनिज्म), जिसमें सीता वाला विद्रोही, कर्तव्यनिष्ठ, परम्परावादी, व धार्मिक भाव-विचार व आचरण हैं।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA and Fellow, Jawaharlal Nehru Institute of Advanced Study, JNU, Delhi, India

Women Shaping the World as ‘Mothers’

Mrs. Rati Hegde

One of the most beautiful roles that a woman can play in her life is that of a Mother. It is said that “the hand that rocks the cradle rules the world”. What is it about motherhood that is so appealing? Is it just about carrying a life within one, nourishing it for 9 months within and then bringing forth life into the world? Or is it about shaping a personality and then giving the civilization a mature individual who can shape other lives in this world? Or is it about prayers and sacrifices which a woman undertakes to give her child the best in this world? In a way, I guess we all feel that motherhood is a little of all this and more.

In the Mārkandeya Purana, we read about the story of Rānī Madalasa, who was the wife of Rājā Ritdhwaja. When she was carrying her first three children and while bringing them up she sang to them verses which illumined the children about the true nature of their Atman. On growing up, the children went on to do Tapasyā and became realized souls. The Rājā worried about the future of his Prajā and he requested Madalasa to give thought to them too. When she became pregnant with the fourth child, Madalasa sang songs of valour so that he would imbibe the qualities of a great warrior and enable him to protect his kingdom and make it prosperous. She also taught him to look at other women as his mother, to care for his subjects and become established in Dharma and Viveka Buddhi. This boy, Alarka, grew up to be a righteous king and a mighty warrior.

In the Māhābhārata, we come across the story of Yayati and his wives Devyani and Sharmishtha. Sharmishtha sacrificed every pleasure known to her as a youngster, to satisfy her father’s Guru Shukracharya’s daughter, Devyani. Her son was Puru who was the youngest son of Rājā Yayati. When Yayati wanted to continue with enjoying the pleasures of life despite his nearing old age, he was told that if any of his sons would exchange his youth for his father’s old age, Yayati could enjoy many more years of youth. It was only Sharmishtha’s son Puru who intrinsically understood the futile search to satisfy physical and materialistic pleasures of life. He offered to take his father’s old age in return for his youth. After many years Yayati came to the realisation that physical pleasures could never be completely satiated and that the search for uniting the Atman with the Brahmn was the only search worth aiming for. He gave back his youth and the entire kingdom to Puru and blessed him. Puru went on to rule justly for thousands of years.

In the Māhābhārata, we also come across the story of a mother who fell asleep. This normal action of hers caused the loss of her very valiant son’s life. Yes, I’m referring to Subhadra and Abhimanyu.  Abhimanyu learnt about entering the Chakravyuha because he as an unborn baby, paid attention to his uncle Sri Krishna telling Subhadra about the interesting formation of the Chakravyuha. But when Subhadra fell asleep, Sri Krishna did not continue with the secret of coming out of the Chakravyuha because of which Abhimanyu never learnt about it. In the war, he managed to break through the formation and cause great havoc but was not able to come out of it alive. This story is generally used to warn mothers that whenever Mothers are not alert, it spells disaster to their progeny.

Our scriptures also talk about a child who learnt all about the Mantras, the Vedas and other texts while in the womb itself, so well that he could correct his father when he made a mistake. The father was Kahoda and the child was Ashtavakra. Ashtavakra learnt all the Vedas in the womb of his mother Sujata who was the daughter of Rishi Uddalaka. Sujata used to be seated near the place where her father Uddalaka taught everyday and her son learnt the scriptures before he was born. Though he got a curse from his father Kahoda for correcting him, Ashtavakra forgave him because he was a realized soul.

The best example of learning about devotion to Bhagawan comes from the story of Bhakta Prahlada. His mother Kayadhu stayed at the Ashrama of Narada Muni during her pregnancy and she kept listening to the various leelas of MahaVishnu from him. As her devotion to MahaVishnu grew, so did Prahalada’s. In fact his devotion was so unshakable that even when repeatedly threatened with death by his father, Bhakta Prahlada remained rooted in his faith in Bhagawan.

One may have a doubt in one’s mind that the above tales are of those mothers who do not feature in modern history, so maybe they are just tales and not completely believable. The truth is that even in reasonably modern history we see the repeat of these tales in our lives. Meerabai, the great devotee of Sri Krishna was introduced to Him by her mother. Chhattrapati Shivaji Maharaj became an epitome of bravery and warrior of Dharma because of his mother Jijabai. Adi Shankaracharya was born a realized soul because of the penance of his mother Aryaamba. It is said that Rahul Dev Barman, the famous music director of Hindi films, could understand ‘sur-taal’ even as an infant and hence he was given the nickname Pancham.

Indeed, a mother has in her, the capacity to shape the world through her offspring. It is one of the most elevated roles of a human life because mothers can bring forth a race of humane, wise and caring people if they set their minds to it. The only condition is that they have to align themselves to the positive vibrations that surround us and mold their thoughts to merge with that of a higher self. Human beings feel complete only when they are emotionally and spiritually satisfied. Mothers can play an important role in this by not just caring for the physical self while pregnant and while bringing up their child, but also fill their entire being with good thoughts and devotion to the Supreme One.

Becoming a Mother is important but more important is becoming a channel for good, kind and wise souls to enter our earth.

“Mātrudevo Bhava”.

Mrs. Rati Hegde, columnist and author

गणतंत्र दिवस 2021 और अराजकता

ब्रिगेडियर (डा.) जीवन राजपुरोहित

देश की सेहत ज़रा नासाज़ है।

कोरोना का कहर असर दिखा रहा है,

अर्थव्यवस्था को डरा रहा है,

उद्योग की गर्दन दबा रहा है,

जनमानस को डरा रहा है।

इस साल गणतंत्र दिवस ख़ास था, 

तैयारी पूरी थी, पर आने वाले नहीं थे, 

आगंतुक बहुत थे, पर पाबंदी भी थी।

कोरोना  की धाक इतनी कि,

बोरिस जॉनसन भी आने से मुकर गए।

दिल्ली रानी की तरह सजाई गई थी,

सुंदरता  चरमोत्कर्ष पर थी,

सुरक्षा का घेरा भी कवच मंडल की तरह था,

और दिलों की गरमी  पूरे देश में छाई थी।

उधर साज़िश की तैयारी में,

कौन थे वो  किसानों के भेष में,

बिल संशोधन के नाम पर, ना जाने क्या चाह रहे थे,

किसानों के विकास के नाम पर, लोकतंत्र को डरा रहे थे। 

सत्ताधारी थे या विरोधी, आवाज़ें उनकी बुलंद थीं, 

कुछ समझ नहीं आ रहा था कि,

दिन गणतंत्र दिवस था, या तांडव हैवानियत का।

किसानों का यह हाल, जो पिछले 70 साल में बदल नहीं पाया,

अब उन्हें यह एक बिल अखरने लगा,

संशोधन मंजूर नहीं, पूरे बिल को ही निरस्त करना चाह रहे थे।

किसानों के हाथों उन्हीं की, किस्मत को गर्दिश में झोंके जा रहे थे।

मान लिया, आपको बिल पर ऐतराज़ है, 

कुछ विषयों पर आप नाराज़ हैं।

राजनीति झलक रही, आपकी बातों और व्यवहार से,

फिर भी लोकतंत्र के नाते, आपसे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ।

सोचा था…

सामाजिक सोच झलकेगी,

 भारतीयता,  विश्वास और विकास में लक्षित होगी।

पर यह क्या?

गणतंत्र दिवस पर ही तिरंगे को बदरंग कर दिया,

देश और संविधान को अपमानित कर दिया।

विश्वास दिलाया था कि रैली शांतिपूर्ण होगी,

सभी मिलकर ट्रैक्टर रैली से अपना विरोध प्रकट करेंगे।

शांति दूत बन, किसानों का भला करेंगे,

राजनीति से हट, देशप्रेम से विकास करेंगे।

पर…

आपने तो विश्वासघात कर दिया,

देश में हिंसा फैला, सभी को हतप्रभ कर दिया।

किसानों के नाम पर, विकास और किसानी छोड़,

देश को  देश -विरोधी गतिविधियों से ही तोल दिया।

लगता है आप किसान नहीं, किसानों के भेष में हैवान हो,

किसानों के नाम पर राजनीति कवचित आडंबरी हो।

अगर वास्तव में आप देशप्रेमी हैं, 

देश के सच्चे किसान हैं,

देश पर आपको अभिमान है,

तो…

विरोध की जगह, प्रबोध को जगाओ,

विरोध में इतना धान उगाओ,

विकास में इतना ज्ञान और ध्यान लगाओ,

कि…

विश्वास का प्रकाश हो, सत्यता प्रमाणित हो,

और जो अब तक ना हो सका,

किसानों का जीवन-विकास पूर्ण हो।

और सरकार बाध्य हो, संशोधन की ओर अग्रसर हो।

आओ मिलकर प्रण करें,

तिरंगे की आन को, इसकी शान को, 

कोई छू ना पाए।

यह ना पूछें कि,

देश ने क्या दिया,

बस यही कहें-

मैंने देश के लिए क्या किया।

ये जो भी किसानों के वेश में,

शांति दूत बन किसानों का भला कर रहे।

राजपुरोहित चिंतित है,

ऐसी राजनीति निंदित है।

Brig JS Rajpurohit, Ph.D. Group Commander, Group HQ NCC, Gorakhpur (UP)

Republic Day, Gaṇarājya, and Ganesha!!

-Prof. Bal Ram Singh

Symbolic representation of nature and deities has been a practice throughout the world, but it is extensively used in India. Understanding meanings of such representations requires deep understanding the culture, and also scientific approach of objectivity and unbiasedness.

The culture, traditions, symbolism, language, communications, etc. are living elements of life for people, that includes living under or creating a political system for governance. A majority of the countries in the world today practices of some form of democracy, even in the mode of monarchy, such as Britain. Of course oldest (United States of America) and largest (India) are representative republic democracies. According to Wikipedia (accessed on January 24, 2020), a republic (Latin: res publica, meaning “public affair”) is a form of government in which the country is considered a “public matter”, not the private concern or property of the rulers. The primary positions of power within a republic are attained, through democracy, oligarchy, autocracy, or a mix thereof, rather than being unalterably occupied. 

India became Republic of India (bharatiya ganarajya; भारतीय गणराज्य) on January 26, 1950, when it adopted the constitution of India, the largest constitution document in the entire world. Interestingly, the gaṇa (used in gaṇarājya to mean kingdom or state of gaṇas) in Sanskrit means flock, troop, multitude, number, tribe, series, or class. While gaṇas are variously described in the history and culture of India, referring to them as members of governing assembly, warriors, farmers, etc. Vrātam Vrātam gaṇam gaṇam (व्रातं व्रातं गणम् गणम् ) Rigveda 3-26-6, these all are ultimately derived from or are linked to Shiva gaṇas, Gaṇapati, and Ganesha.

The gaṇas are in fact Shiva gaṇas, and Ganesha being his son was chosen as their leader by Shiva, hence Ganesha’s title gaṇa-īśa or gaṇa-pati, “lord of the gaṇas” (Wikipedia –https://en.wikipedia.org/wiki/Shiva, accessed January 24, 2020).

According to legends, Shiva gaṇas are attendants of Shiva and live in Kailāśa. They are often referred to as the bhutagaṇas, or ghostly hosts, on account of their nature. Generally benign, except when their lord is transgressed against, they are often invoked to intercede with the lord on behalf of the devotee. The Shiva gaṇas also include nāgās, yakśas, pramathis, pisācās, rākśa gaṇas, vināyakas, guhyākas, manuṣya and deva gandharvas, vidhyādharas, and siddhas. Sadhguru describes gaṇas are described as distorted, demented beings. It is said that they had limbs without bones coming out of odd parts of their bodies, so they are described as distorted and demented beings. (Shiva’s Gaṇas – Demented or Celestial? https://isha.sadhguru.org/in/en/wisdom/article/shivas-gaṇas-demented-or-celestial). According to Sadhguru, Shiva meaning the Yakkśaswarūpa (a celestial being), and the gaṇas, Shiva’s friends, were not like human beings, and it is clearly said that they never spoke any of the human languages. They spoke in utter cacophony when Shiva and his friends communicated. They spoke a language that nobody understood, so human beings described it as total, chaotic cacophony. But the gaṇas were the ones that Shiva was really close with.

The bottom line of the description of gaṇas is that it basically addresses a wide group of people from ghosts and globulins to warrior, rulers, and celestial beings, thus essentially expressing the group as everything seen or perceived in the universe. In other words, they represent Shiva himself, who is the lord of expressed physical world, with Brahmā as the lord of the subtle and creative world, and Viṣṇu as the lord of the causal world, to complete the trilogy concept of Hindu tradition. Ganesha being Shiva’s son despite the legend suggesting he was created by Pārvatī alone, and he being appointed as the lord of the gaṇas, it is important to understand the symbolic features represented by Ganesha. Ganesha is the ideal of gaṇas, meaning that gaṇas are supposed to attain the traits possessed by Ganesha. What are the major traits of Ganesha? Let us consider the following features amongst others shown in the symbolic diagram of Ganesha – large stomach, elephant head, large ears, the hidden mouth, long trunk, and mouse as his vehicle. Interestingly he was not referred to as a Gajesha despite having the head of a gaja or elephant), one can proceed to understand the traits/features of Ganesha in the form of symbolism.

The large head represents the use of wisdom in approaching any problem or hurdles, the large ears mean that one must listen to issues of the day as much as possible, the small hidden mouth symbolizes less need to speak, and the large stomach means big churning or digestion of the information received before making any decisions. The trunk represents flexibility and adaptability of one’s personality for efficient operations. Elephant trunk is the only known organ that can perceive an ant on the ground with its subtle nerve receptors, and it possesses such a gross strength that it can uproot a tree. Such a dynamic range of sense and strength can overcome any obstacle in any person or organism.  Finally, the mouse at the feet of Ganesha represents the complete control over one’s mind and desires for success.

Thus, gaṇatantra or gaṇarājya that is celebrated every year on January 26 must remind people of at least India that they need to aspire to the qualities of gaṇas, with the goal of acquiring and achieving the qualities of Ganesha. This will more than anything help people with their trials and tribulations of life and place their nation above all in the comity of nations of the world today!!

Symbols have been the earliest for way of communications throughout the world, and even today’s writings are basically symbols we put together and call them words, and attach meanings to those words in the context of human experience and observations. This is pretty similar to how we put together atoms to depict molecules, like H2O as water. There is solid understanding behind H2O being written as water in Chemistry, and unless one understands that meaning, it makes no sense to an uninitiated reader. Many of the early scripts, such as Indus script, have not been deciphered even today. Interesting, the Devanāgari script reading activates different and more comprehensive parts of the brain that for example reading Roman script, as demonstrated by functional magnetic resonance imaging (fMRI) studies.

To understand the symbols of Ganesha, for any other deity for that matter, is critical to understand the meaning, and more importantly imbibe the values. Thus, Ganesha is not a religious symbol to divide people, rather a universal symbol to unite people from all walks of life.  A nation or the entire world empowered with such self-knowledge can only be prosperous and peaceful!

Jai Ganesha!

Jay Bharat Gaṇarājya!!

Happy Republic Day!!! 

-Prof. Bal Ram Singh, President, Institute of Advances Sciences, Dartmouth, MA, USA and Fellow, Jawaharlal Nehru Institute of Advanced Study, JNU, Delhi, India

आत्म–शोधन और आत्म-नियन्त्रण ही है जीने की कला

Dr. Poonam Ghai

आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी की तरक्की के कारण इतने संसाधन विकसित हो गये हैं कि मनुष्य के आराम, मनोरंजन और रहन-सहन के ढंग में बहुत परिवर्तन आ गया है। बिजली का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है, लेकिन ह्रदय में अंधकार भी उतना ही बढ़ गया है। कभी चिन्तन करिए कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे हमारी विचारधारा, कुंठित और स्वार्थी सोच, धर्म-संस्कृति के लिए अत्यधिक संकुचित विचार और भी न जाने क्या-क्या कारण हैं। एक स्वस्थ, शालीन और सद्भावपूर्ण जीवन के लिये मानवता को क्या करना चाहिए ? इस पर विचार करने की ज़रूरत है। भौतिकवाद और सुविधावाद के युग में व्यक्ति-व्यक्ति से अलग हो गया है। यही सब विचार मनोविज्ञान की ओर हमें ले जाते हैं। हम जैसा सोचते हैं वैसे ही दृष्टि हमारी बनती है, वैसा ही जीवन हम जीने लगते हैं।

इस सत्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हमारे उत्कर्ष के प्रथम एवं महत्त्वपूर्ण साधन हैं – हमारी स्वस्थ और सक्षम ज्ञानेन्द्रियाँ। परन्तु इन्द्रियों का प्रवर्तक है- ‘मन’। मन शरीर का नयन और नियमन दोनों करता है। यदि मन शुद्ध और पवित्र बन जाये तो हमारे जीवन की धारा बदल जायेगी। वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषि इसी बात को यजुर्वेद के शिवसंकल्प सूक्त के माध्यम से कहते हैं –

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  34.6

जो मन हर मनुष्य को इन्द्रियों के लगाम द्वारा उसी प्रकार घुमाता है, जिस प्रकार एक कुशल सारथी लगाम द्वारा रथ के वेगवान अश्वों को नियन्त्रित करता एवं उन्हें दौड़ाता है, आयु रहित (अजर) तथा अति वेगवान व प्राणियों के हृदय में स्थित मेरा वह मन शुभ संकल्प युक्त अर्थात सुंदर एवं पवित्र विचारों से युक्त हो।

Just as a good charioteer makes the horses run according to his commands so they go where he wants them too, so too the mind can guide a man towards his desire and by restraining animal instincts lead to that dweller in the heart who is immortal and free of turmoil, my mind may you have good intentions.

इसीलिए भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में कथित जीवन-दर्शन शाश्वत है, त्रैकालिक, सार्वजनीक, सार्वदेशिक माना जाता है। लेकिन वर्तमान में सब कुछ जानते समझते हुए भी एक होड़ मची हुई है, सब कुछ पा लेने की। इसी होड़ ने आज के हालात पैदा कर दिए हैं। हर समय असंतोष का जो भाव है उसी ने कुदरत के साथ छेड़छाड़ करने की हमारी प्रवृत्ति बना दी।

जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान

(तुलसीदास)

हर कोई आज कोरोना के डर के साये तले जीने को मजबूर है। हमारे देश भारत में 30 जनवरी को पहला मरीज कोरोना संक्रमित मिला था और 7 मई को यह आंकड़ा 50 हज़ार पर पहुंच गया और आज इन आंकड़ों के बारे में सोचकर भी भय लगता है और लगता है, कि जैसे हम कोई बहुत ही बुरा स्वप्न देख रहे हैं जो जल्दी टूटे और हम अपनी उसी दुनिया मे फिर से आ जाएं। इतने लोगों की बीमारी और मौत एक बार हर व्यक्ति को डरा अवश्य रही है, लेकिन डरने के बावजूद अभी भी हम अपनी कमियों को स्वीकारने के स्थान पर इन सारी परिस्थितियों के लिए अन्य चीज़ों पर दोषारोपण करने से चूक नहीं रहे। मानव जीवन भौतिक, आर्थिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर बार-बार चोट खाकर भी सबक नहीं ले रहा।  कोरोना वायरस के सामने हम निरुपाय हैं, हमारा विज्ञान और तकनीक भी असहाय हैं।

कोरोना महामारी ने मनोवैज्ञानिक रूप से हमें तोड़ा है और छोटी-छोटी सी घटनाओं का भी हम पर बहुत प्रभाव पड़ा है। मई महीने की घटना है, लॉकडाउन के कारण सभी में किसी तरह भी अपने घर पहुंचने की होड़ थी और कुछ मजदूर इसी आपाधापी में रेलवे की पटरियों पर पैदल ही चले जा रहे थे लेकिन होनी देखिए कि ट्रेन से कुचलकर मारे गए। इस हादसे के बारे में समाचार में बताया गया कि पटरियों पर मजदूर कट गए और चारों तरफ उनकी रोटियां जो रास्ते मे खाने के लिए वे ले जा रहे थे, बिखर गयीं यह घटना मन को व्यथित करती है कि सारी कहानी सिर्फ रोटी की ही होती है क्या? रोटी कमाने ही बेचारे यह लोग परदेस गए और इस आपदा के काल में रोटी के लिए ही चार पैसे कमाकर घर लौटना चाहते थे। लेकिन होनी इतनी प्रबल रही की रेलवे पटरियों पर उनके शरीर का तो अंत हुआ ही रोटी की कहानी भी खत्म हो गई।

यह सब देखकर भी हम लोग कुछ समझ नहीं पाते।  आज हमें कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन करने को कहा जाता है जो आज के हालातों में बचे रहने का एकमात्र उपाय है और यह हम सभी जान समझ रहे हैं लेकिन फिर भी इन हालातों से समझौता करने की जगह बहुत से लोग सरकार, व्यवस्था, समाज, अपने परिवार और यहां तक कि ईश्वर को भी कोसना नहीं छोड़ पा रहे। भगवान ने ऐसा क्यों किया? यही उनका प्रश्न होता है और यह कभी मनन किया किसी ने कि कुदरत, प्रकृति या ईश्वर भी शायद कुछ सन्तुलन करने के मूड में है अब। इतनी बेईमानी, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, बलात्कार और न जाने किन-किन बुराइयों से भरे हुए इस विश्व को जैसे एक सज़ा मिली है। अपनी लाइफ एन्जॉय करने का जो फंडा लोगों पर हावी हो गया था उसे आज के हालातों ने तोड़कर रख दिया है। रोज कहीं होटल में खाना या बाहर से मंगाकर खाना, घूमना फिरना सैर सपाटे, जश्न क्लब किटी-पार्टी सब पर काफी दिन रोक रही और अब भी अंकुश तो है ही। लम्बी सूची है उन चीजों की जिन पर आज नियंत्रण है लेकिन कोविड-19 से पहले यही चीजें ज़िन्दगी का हिस्सा हो गयी थीं। घर के खाने से दूर एक फोन पर खाना ऑर्डर होता था और होम डिलीवरी होती थी। उस खाने से शरीर को क्या नुकसान थे यह सोचने की फुर्सत ही किसको थी। दलील यह दी जाती थी कि ‘मैं तो बिना बाहर का खाए जी ही नहीं सकता / सकती’। ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि अब कैसे जी रहे हैं? कहने का मतलब वह हर काम जिसे हम सालों से करते आ रहे थे और उसे करने के पक्ष में अपनी बेसिर पैर की दलीलें देते थे, उन्हीं चीजों को आज जब हमसे छीन लिया गया है तो भी हम जी रहे हैं। कुदरत ने हमें अपनी राह पर चलने के लिए बहुत आगाह किया लेकिन हम आगाह होना तो दूर बल्कि और भी इन चीज़ों में संलिप्त होते गए तो कुदरत ने भी अपना करिश्मा दिखाया कि लो जिन चीजों के बिना तुम जी नहीं सकते थे अब देखो कैसे जिया जाता है?

अभी भी लोगों में बहुत सन्ताप और असंतोष की भावना है। सोचिये आज के समय में वे ही लोग ज़्यादा दुखी और परेशान हैं जो सिर्फ अपना देख रहे हैं। ‘स्व’ में रहने की आदत या मजबूरी ने ही हमें दुखी और व्यथित किया हुआ है। प्राचीन काल में हमारी संस्कृति ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ एवं ‘सर्वेभवन्तुसुखिनःसर्वे सन्तुनिरामयाः’ का उद्घोष करती थी। आज भारत की उसी जीवन-शैली को जन-जन की जीवन-शैली बनाना होगा।

वस्तुतः चुनौती से संघर्ष करने का अनुभव कराने वाले कोरोना महासंकट ने हमें सिखाया है कि केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से अब जीवन नहीं चलेगा। उसमें आध्यात्मिक दृष्टि लानी ही होगी। अनुशासन से परिपूर्ण आत्म-शोधन और आत्म-नियन्त्रण ही इसकी नींव है। क्यों न हम ऐसा माने कि मानो कोरोना कोई शिव जी का गण है जो दुनिया की सारी बुराई का नाश कर हमें पुनः जीने की कला सिखाने के लिए भेजा गया है ताकि इस धरती पर मानव और प्रकृति के बीच सन्तुलन बना रहे। इससे न केवल हमारा मानसिक तनाव कम होगा और स्वस्थ रहकर हम कोरोना जैसी महामारियों से सदैव बचे रहेंगे। इस समय बहुत ज़्यादा भविष्य का सोचकर अपने को परेशान नहीं करना चाहिए। हम जियेंगे तो भविष्य भी रहेगा और हम तभी जी पाएंगे जब तन और मन से स्वस्थ होंगे।कबीरदास जी की बानी आज के माहौल में बहुत ही सटीक बैठती है-

कबिरा सोच न साचिये जो आगे कू होय।

सीस चढ़ाए पोटली ले जात न देख्या कोय।।

सच में सोचना किस बात का? सिर पर रखकर तो कुछ ले नहीं जाना है सब यहीं रह जाएगा।

Dr. Poonam Ghai, Associate Professor, Sanskrit, R.S.M (P.G.) College, Dhampur, Bijnor

आर्यों का आगमन : हीनता और बँटवारें का एजेण्डा

Sh. Alok Kumar Dwivedi

हरियाणा के हिंसार जिले में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र में स्थित राखीगढ़ी, सिंधु घाटी सभ्यता का भारतीय क्षेत्रों में धालवीरा के पश्चात् दूसरा विशालतम् ऐतिहासिक नगर है। 5th September, 2019 को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘Cell’ में प्रकाशित शोध An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Pastoralists and Iranian Farmersने भारतीय पुरातन ऐतिहासिक विमर्श को नया आयाम प्रदान किया है। राखीगढ़ी से प्राप्त एक नर कंकाल जो कि लगभग 2500 ईसा०पू० का है, के डी०एन०ए० जाँच के बाद Deccan College of Archaeology के प्रो.वसन्त शिंदे तथा डी.एन.ए. वैज्ञानिक डा. नीरज राय ने दावा किया कि हड़प्पा सभ्यता को विकसित करने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के लोग थे। आर्य और द्रविड़ सभ्यता में संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले हैं। आर्य भारतीय उपमहाद्वीप के थे तथा मोहनजोदाडो, हड़प्पा सभ्यता और वैदिक काल के लोग एक ही थे।यहाँ के लोग ईरान और मध्यएशिया में व्यापार और खेती करने गये थे|

मिथ्या प्रचार का कारण

2018 में इस अध्ययन से सम्बन्धित पहला ड्राफ़्ट निकला था जिसमें बताया गया था कि यहाँ मिले कंकालो में ‘R-1 A-1’ जीन नहीं पाया गया था जो कि मध्यएशिया में पाया जाने वाला एक सामान्य जीन है। यह इस बात को ग़लत ठहराती है कि भारत को संस्कारित, समृद्ध एवं कौशलयुक्त बनाने हेतु मध्यएशिया से आर्य भारत आए अर्थात् यह शोध आर्यों के आगमन के सिद्धान्त (Aryan Invasion Theory) को चुनौती देता है। इस शोध के अनुसार आर्य और अनार्य का भेद निरर्थक है। सभी लोग यहीं के मूल निवासी हैं। औपनिवेशिक युग में भारत में आर्य और अनार्य का भेद कर आर्य और द्रविड़ संघर्ष की बात कर यूरोपीय देशों ने एक ओर भारत में आन्तरिक फूट और हलचल करने का प्रयत्न किया तो वहीं दूसरी ओर ‘आर्य मध्यएशिया और यूरोप से आए’ ऐसा कहकर भारतीय स्थानीय लोगों के असभ्य होने का भी प्रचार किया। उनका उद्घोष था कि मध्यएशिया और यूरोप से आर्य भारत आकर यहाँ की बर्बर और असभ्य स्थानीय अनार्यों को दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया तथा भारत के उत्तरी भागों में वेदों और अन्य ग्रंथो की रचना कर ज्ञान का प्रसार किया। इस प्रकार यूरोपियों की चाल यह साबित करने की थी कि भारतीय ज्ञान परम्परा एवं मनीषा यहाँ बाहर से आयी है। अंग्रेज़ों ने 16वीं शताब्दी में इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में अपने आगमन को आर्यों के द्वितीय आगमन (2nd Aryan Invasion) के रूप में प्रदर्शित करना प्रारम्भ किया। इस प्रकार अंग्रेजों ने यह प्रचारित किया कि भारतीय लोग असभ्य, बर्बर, अवैज्ञानिक तथा रूढ़िवादी हैं। अतः बाइबिल की मान्यता के अनुसार उनका यह दायित्व है कि वे इन्हें सभ्य बनावें। इसके साथ ही आर्यों के आगमन सिद्धांत के सहारे उन्होंने आर्य-अनार्य, बाहरी वनाम स्थानीय एवं आर्य – द्रविड़ के मध्य संघर्ष को हवा देकर अपनी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को सफल बनाते रहे। पर यह नवीन खोज भारतीय परम्परा, विरासत एवं संस्कृति के उन्नत स्तर को स्थापित करने एवं स्थानीय वनाम बाहरी के आपसी विवाद को समाप्त करने की दिशा में इतिहास को नए रूप में विचार हेतु विमर्श एवं लेखन का अवसर प्रदान करती है।

वास्तविकता

सिंधु घाटी सभ्यता जो (5000-3500) ई०पू० पूरे विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानी जाती है। उसकी विशेषता है कि यह एक नगरीकृत सभ्यता थी।उस समय विश्व के अनेक भागों मे अनेक सभ्यतायें थी- सुमेर सभ्यता (2300-2150) ई०पू०, बेबेलोनिया सभ्यता (2000-400) ई०पू०, ईरान की सभ्यता (2000-250) ई०पू, मिस्र की सभ्यता (2000-150) ई०पू०, ग्रीस (यूनान) की सभ्यता (1450-150) ई०पू० इत्यादि। इन सभी में सिंधु घाटी सभ्यता सर्वाधिक विकसित थी। भवन निर्माण हेतु वास्तुकला, चित्रित धूसर मृदभाण्ड, रथ, आभूषण बनाने की कला, स्नानागार, कृषि का ज्ञान, अनाजों के संरक्षण की व्यवस्था इत्यादि सिन्धु घाटी सभ्यता की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार भारत प्रारम्भ से ही विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी रहा है और वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक इत्यादि भारत के स्थानीय लोगों द्वारा ही रचित हैं, ऐसा विचार नवीन शोध उद्भाषित करती है। अतः यह अतिशयोक्ति नहीं कि आने वाले समय में Aryan Invasion Theory के स्थान पर Out of India को स्वीकार किया जाने लगे कि विश्व में ज्ञान का प्रचार भारत से ही हुआ। आर्य और द्रविड़ को प्रजाति के आधार पर विभाजित करना भी अब वर्तमान वैज्ञानिक शोध के अनुसार अमान्य है। कैम्र्बिज विश्वविद्यालय के Estonian Biocentre के निर्देशक  Prof. Kivisild T, तातूर विश्वविद्यालय के शोधछात्र तथा ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिद्ध किया कि सारे भारतवासी जीन अर्थात् गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संताने हैं। आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्र के आधार पर नहीं मिलता तथा जो आनुवंशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डी॰एन॰ए० गुणसूत्र दुनिया के किसी भी अन्य देश में नहीं पाए जाते। इस प्रकार आर्य कोई प्रजाति जो बाहर से भारत आए ऐसा नहीं है वरन इसका अर्थ है कि श्रेष्ठ आचरण करने वाला जिसमें श्वेत, पितरक्त, श्याम, अश्वेत सभी लोग शामिल हैं –

महकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधव: (अमरकोश 7/3)

इस प्रकार भारतीयों में उनकी समृद्ध विरासत एवं ज्ञान परम्परा के प्रति हीन भावना विकसित करने का षड्यन्त्र यूरोपियों द्वारा किया गया, जिसके प्रभाव में तत्कालीन बौद्धिक वर्ग भी आ गया तथा जब उसे इस बात का एहसास हुआ तब तक काफ़ी समय व्यतीत हो चुका था तथा अंग्रेज़ पूर्णतया भारत को सभ्य बनाने के आधार पर यहाँ अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके थे। अंग्रेज़ों ने इस कार्य को रणनीतिक रूप से अंजाम दिया। उन्होंने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को परिवर्तित कर यहाँ के ज्ञान परम्परा के प्रति लोगों में हीन भावना को विकसित किया।

इसके प्रमाण मकाले की इस बात में है -“मैं भारत के कोने-कोने में घूमा हूँ तथा मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा दिखाई नहीं दिया जो भिखारी हो, चोर हो। इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊँचे चरित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी इस देश को जीत पाएँगे, जब तक कि उसकी रीढ़ की हड्डी नहीं तोड़ देते और वह है इसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत। इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम इसकी पुरातन शिक्षाव्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डाले क्यूँकि यदि भारतीय सोचने लगे कि जो भी विदेशी है और अंग्रेज़ी है वह अच्छा है तथा उसकी अपनी चीज़ों से बेहतर है तो वें अपने आत्मगौरव व अपनी संस्कृति को ही भुलाने लगेंगे तथा वे वैसा बन जाएँगे जैसा हम चाहते हैं – एक पूरी तरह से दमित देश”.

मिथ्या विचार स्थापन का प्रभाव

अंग्रेज़ों की इस कूटनीति के फलस्वरूप हमने अपने ज्ञान परम्परादर्शन, अध्यात्म, यौगिक विधियों इत्यादि के प्रति हीनभावना (Inferiority complex) विकसित कर ली तथा यूरोपीय ज्ञान एवं जीवन-पद्धति को अधिक विकसित मानते हुए उसका अंधानुकरण करना प्रारम्भ कर दिया। इस क्रम में यूरोपीय शक्तियों ने भारत में उपलब्ध संस्कृत ग्रंथो का अपनी भाषा में अनुवाद किया तथा महत्वपूर्ण जानकारियो एवं शब्दों को लैटिन से उत्पन्न हुआ स्वीकार किया जाने लगा। भारतीय वनस्पतिशास्त्र, जड़ी बूटियों एवं विभिन्न आयुर्वेदिक पौधों को लैटिन नाम दिया गया तथा इस प्रकार भारतीय वनस्पतिशास्त्र के ज्ञानपरम्परा की चोरी सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने भारत से मसालों के व्यापार के रूप में करना प्रारम्भ किया। मसालों के लिए वे विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों एवं पौधों को अपने देश ले जाते, वहाँ पर संस्कृत के अनुवादित ग्रंथो के आधार पर वे उनका प्रसंस्करण कर अपना पेटेंट कराकर सारे यूरोप में अपने नाम से बेचते थे। इसके प्रमाण गोवा में पुर्तगालियों के जाने के पश्चात् वहाँ मिले कुछ अभिलेखों एवं पत्रव्यवहारों के रूप में सुरक्षित हैं। इस रूप में यूरोपियों का प्रमुख उद्देश्य एक योजनाबद्ध तरीक़े से भाषा को लैटिन में परिवर्तित कर एक तो भाषाई उपनिवेशीकरण करना था तो वहीं दूसरी तरफ़ श्रेष्ठ एवं उन्नत विचारों को अपने यहाँ से उत्पन्न प्रदर्शित करना था। इस रूप वे सम्पूर्ण विश्व में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करना चाहते थे तथा इसको बल प्रदान करने में ईसाई मान्यताओं ने भी काफ़ी सहयोग किया।ईसाई खोज का सिद्धांत यह कहता है कि यदि चर्च के नाम पर किसी का अधिकरण किया जाता है तो वह चर्च की सम्पत्ति मानी जाएगी। इसी क्रम में वे मानते थे कि सम्पूर्ण विश्व असभ्य और बर्बर है तथा इन्हें सभ्य बनाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है।

इसी प्रकार 1950 के दशक में जिस जैविक खेती को पिछड़ा माना जाता था तथा यूरिया इत्यादि का व्यापक प्रचार किया गया उसे ही अब रिवर्स इजीनियरिंग के नाम पर अच्छा घोषित किया जा रहा है। भारत में कुम्भ जो की प्रत्येक 12 वर्ष पर आता है को एक अवैज्ञानिक मान्यता के रूप में विदेशियों ने अस्वीकार किया, वैज्ञानिक खोजो के पश्चात् यह सिद्ध हो गया कि यह कुम्भ आयोजन बृहस्पति के सूर्य के चक्कर लगाने के आधार पर मनाया जाता है तथा बृहस्पति सूर्य का एक चक्कर 12 वर्ष में पूर्ण करता है। यूरोप में यह माना जाता था कि भारी धातुओं का शरीर में पाया जाना शरीर के लिए नुक़सानदेय है परंतु भारतीय आयुर्वेदशास्त्र इस बात को लेकर स्पष्ट एवं वैज्ञानिक रहा है कि किसी एक ही धातु के आकार में भिन्नता होने पर उनके गुणधर्म बदल जाते हैं। इसी के आधार पर नैनो कणों को आयुर्वेदिक उपचार हेतु प्रयोग में लाया जाता है। इस प्रकार विभिन्न रूपों में नाम परिवर्तित कर भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विचारों की चोरी पाश्चात्य देशों द्वारा की जाती रही है। जॉन कबाँर्ड जिन जो कि ध्यानविज्ञान के संस्थापक माने जाते हैंने विपश्यना को सचेतनता (Mindfullness) के रूप में प्रचारित किया जबकि उन्होंने यह ख़ुद स्वीकार किया कि उन्हें यह ज्ञान सत्य नारायण गोयनका से प्राप्त हुआ जो कि भारतीय थे। इसी प्रकार भारतीय योगनिद्रा को Stanford  के स्टीफ़न लाबर्स ने ल्युसिड ड्रीमिंग के नाम से प्रचारित किया अब स्थिति यह है हम अंग्रेज़ों एवं पश्चिमी लोगों द्वारा दिए हुए नामों से ही अपनी विरासत को जान रहे हैं तथा इसे उन्हीं का मानकर व्यवहार कर रहे है (द्रष्टव्य – Rajiv Malhotra’s Breaking India)।

अतः आवश्यकता है कि हम अपनी संस्कृति, सभ्यता, ज्ञानपरम्परा, व्यवहार इत्यादि के प्रति बाहरी लोगों द्वारा बनाई गयी कृत्रिम हीनभावना का त्याग करें  तथा इसके रहस्यों को समझते हुए आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का प्रयास करें। हमें इन सब के लिए अपनी समृद्ध विरासत एवं ज्ञान विज्ञान की परम्परा को समझकर तथा स्वीकार कर आने वाली पीढ़ी हेतु संरक्षित करने की आवश्यकता है।

Sh. Alok Kumar Dwivedi, Senior Research Fellow, Philosophy, University of Allahabad, Prayagraj

स्वतंत्रता भारत की सतता

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

इंग्लिश में है इंडिपेंडेन्स, 

उर्दू में आज़ादी;

अपनी भाषा स्वतंत्रता की, 

दिल मानवतावादी। 

इन का मतलब इन्साइड से,

अर्थ आत्म बल वाला;

डिपेंडेन्स से निर्भरता की,

सभी पिरोएँ माला।

आत्मनिर्भर, इंडिपेंडेन्स,

दोनो जुड़वा भाई;

अर्थ समझ में आ जाये,

फिर कोई नहीं लड़ाई। 

आज़ादी कुछ और बात है,

ज़ादी ज़द से बनता;

ज़द का अर्थ पिटाई होती,

जग ही पीड़ित रहता। 

आज़ादी पीड़ित लोगों की,

है गुहार कहराई;

इसमें रोष ग़ुबार बड़ा है,

बोले और लड़ाई। 

स्वतंत्रता स्वावलम्बन है,

नींव आत्मनिर्भरता;

ऐसा तंत्र स्वयंभू बनकर,

जन कल्याणी बनता। 

भारत की मिट्टी से ऐसी,

परम्परा में जान है;

इसीलिए भारत की गरिमा,

जग में बनी महान है। 

भारत में तो भा का रत है,

भा सूरज की कांति है;

जहाँ के लोग सृजन में रत हों,

वहीं वास्तविक शांति है। 

भारत का ये वैदिक दर्शन,

कला ज्ञान विज्ञान है;

इसी का अनुयायी जग सारा,

भारत तभी महान है। 

विषरि गए ये प्रथा हम अपनी,

चक्रवर्त सम्राटों की;

रक्षा वाट जोहती वसुधा,

हमीं पथिक उन वाटों की। 

स्वतंत्रता दिवस ये पावन,

उसी प्रथा की शान है;

आओ मिल संकल्प लें फिर से,

स्वतंत्रता सम्मान है।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

Management Lessons from Migration of Yadu Community to Dwārkā and Contemporary Labour Migration During COVID-19 (Part-III)

(Continued from Part-II)

Brig JS Rajpurohit, Ph.D.

Introduction

Dvāpara era of four-fold cyclical theory of Socio-political and religious change observed in the ancient Indian history, mass exodus from Mathura to Dwārkā is an exemplary case of management of human resource and disciplined crowd. The then elite section of society not only denoted but connoted Śri Kṛśṇa with the derogatory word, “Ranchod” (who flees from battle Jarāsandha, the king of Magadha wanted to take revenge from Śri Kṛśṇa for, he has killed his son-in-law, Kansa.

He had attacked Mathura seventeen times and had damaged the city, mired growth, hampered normal peace, civic life and progress. Jarāsandha was defeated by Lord Kṛśṇa in all the seventeen attacks. In his eighteenth attack, Jarāsandha made alliances with friendly forces to exterminate Yadu community. Realizing the gravity of situation, Śri Kṛśṇa acted wisely and decided to migrate majority of inhabitants from Mathura to Dwārkā.

This was the straw that broke camel’s back and forced Lord Kṛśṇa to take immediate action for survival of his clan or be prepared to suffer major losses. Lord Kṛśṇa took a bold decision and migrated Yadu community to Dwārkā. He had no time to plan the migration and was forced to migrate with almost no preparatory time. It would have taken him over a month (considering distance and resources available) a long time to reach Dwārkā but he had organized the migration with a fore thought, detailed planning and meticulous execution.

Management of people, animals and bullock carts all along 800 miles was a grand feat in those days, and has a number of lessons for us to follow, especially in times of COVID-19 crisis when labour migration became a major management issue. Migration of labor from a number of states back to their native villages was an unprecedented move that Indian government was unprepared for and actions taken by the government have lessons from ancient Indian migration organized by Lord Kṛśṇa.

Some questions arise in the present context; What forced Kṛśṇa to migrate? Why did he select Dwārkā only and not any other city? How did he organize the migration? Time taken and overcoming major turbulence due to migration? Could the contemporary migration of labour have been better organized than what was witnessed and our lessons from Lord Kṛśṇa?

Migration Lessons from Study of Contemporary Migration with the One Organized by Lord Kṛśṇa

Reasons to Migrate

Primary reason was fear of King Jarāsandha attacking Mathura in alliance with Kala Yavana (the Mlecchha king), Emperor Damghosha of Chedi, king Dantavakra of Karusa, Rukmi of Vidarbha and Avnti brothers Vind and Anuvinda. The main aim of Jarāsandha was to completely destroy Mathura and kill Kṛśṇa and Balrām. Jarāsandha had offered to Yadavas to hand over both brothers Kṛśṇa and Balrām to him failing which he would destroy Mathura. Kṛśṇa sought help of Hastināpur but they also expressed inability to help, and hence, Kṛśṇa was left with no choice. In contemporary issue of migration of labour,

the fear of death and destruction was very strong; death either by COVID-19 or by hunger; as there was complete lockdown in the country and with no job, survival was difficult. Decision was to migrate with families and children added to misery of migrants. There was no transport and hence journey was on foot, cycle or rikshaws. Time and distance from Delhi (taken as one central location) was almost 1300 kilometres (800 miles) that Kṛśṇa moved. Though Kṛśṇa, being avatar of Lord Viśṇu, could have killed Jarāsandha but spared him to be later killed by Bhīma, a devotee of Lord Viśṇu.

Selection of Dwārkā as destination

Primary reason was to move to a safe place where Jarāsandha would not be able to reach. Northern and central Bharat was within reach of Jarāsandha, the Magadh emperor, and hence were vulnerable. South was a suitable area; Gomantaka mountain and king of Raivata of Ikṣavāku Vamsa were strong obstacles for Jarāsandha as compared to northern region. Sea on the west coast was invincible by Jarāsandha and hence Kṛśṇa planned to migrate to Kaushasthali which he later named as Dwārkā (Dwār meaning gate and kā meaning mokṣa i.e. gateway to mokṣa).

In present scenario, migrating labour moved from states like Maharashtra, Gujrat, Punjab, Delhi and others to their native places in Uttar Pradesh, Bihar, West Bengal, Assam, etc. Last census by the government was conducted in 2011 that shows an existing and known pattern of migration within India that people undertake in search of jobs. But this was an unexpected and unique reverse migration due to unprecedented pandemic that created panic among labour and

temporary social instability in India. Timely assessment of situation and planning of movement could have prevented the circumstances becoming serious and masses moving on the streets. The state governments like UP and Bihar became active and started sending buses for their respective labour that the centre and Delhi governments also started helping. The situation took political, economic and social complex web and took longer to settle.

The migration plans

Lord Kṛśṇa had to migrate over night against will of Balrām, king Agrasen and many others. They all were ready to fight Jarāsandha and even prepared to die. But that was not acceptable to Kṛśṇa. He preferred his clan to migrate and survive. The move was majority on foot and in bullock carts. Mythology also says that Lord Kṛśṇa prayed and Bhu devī moved them overnight in their sleep to Kaushalsthali to which the author has reservations as it appears more of philosophical construct about the migration. Move of ladies, children and animals would have been slow, difficult and torturous. Kṛśṇa organized their stay enroute in Gomanatak mountains and with Raivata king. To that end, he even accepted marriage of princess Revati daughter of King Raivata with Balrām.

Resource management and controlling movement of the clan with the help of friendly kings ensured safety and well-being of his people. A contemporary analysis of labour migration during pandemic suggests that this movement was sudden and possibly administration was taken aback and had no plans in place at the outset for labour migrating from west to east. It was a graduated response

from government officials and plans were implemented as per the developing situation. Trains like Shramjivi Express were pressed into service much later. The dilemma of letting them migrate or stop all movements itself was not clear. Adhoc administrative arrangements were made by various districts’ administration, Non-government Organisations, and local people between Delhi and Lucknow and beyond to Patna.

Leadership

The leadership during the migration of Yādavas was well defined; Lord Kṛśṇa was in charge and he along with his brother Balrām orchestrated entire journey. Kṛśṇa had his share of social, physical, economic threats before, during and post migration which he tackled through flexibility of thought and decisive in action. In contemporary migration of labour, there were number of leaders in the fray, each one with personal, social and national goals. Though the common aim was safety of the migrants but whether they should move or stay in respective locations itself was a major decision dilemma.

Meanwhile, the labour continued to travel, which posed leadership challenges at both state and centre level. Despite a sincere leader like Mr Narendra Modi being at the helm of affairs, the situation got out of control. The realization dawned much later when integrated and collective decisions were taken to use public transport for movement of the migrants. The democratic challenges could have been overcome if, civil administration had adapted a flexible style of collaborative leadership style. May be some political leaders could have risen to visionary and servant leadership levels, the situation would have been different.

Conclusion

The two cases of migration are far different in time zones, yuga zones, technology and almost in every other sense; some readers may even find it comparing apples with oranges, the fact still remains that people migrated and they suffered the agony of leadership crises and consequent physical, economic and psycho- socio predicaments. The datum shows that a huge number of men and women was humiliated, they became outcastes within their own nation. Empathy and physical support were

so much more needed during migration as compared to any other time in recent history. When the well to-do people in the society needed them, they enjoyed their at services but when that need was temporarily ended due to COVID-19; we did not look after them and they were forced to migrate back to their villages and towns. Once the realization dawned that these very people are the working force of India; measures were put in place to help them out. Gradually the situation eased out.

We needed a Kṛśṇa in present crisis who could have reduced their agony, if not fully overcome.

We have a charismatic leader who can impact the situation in future

Brig JS Rajpurohit, Ph.D. Group Commander, Group HQ NCC, Gorakhpur (UP)

Dvāpara Management Perspective of Migrants in India during COVID-19 : The Fixes that Failed (Part-II)

(Continued from Part-I)

Brig JS Rajpurohit, Ph.D.

“Fixes that fail”; Systems View of COVID-19

This is an analysis of the labour migration crisis from system’s view though one of the archetypes known as “Fixes that fail”. 

Government of India declared Lockdown on 22nd March, 2020 that had unintended consequences of labour from various metros migrating to their home towns. These unintended outcomes were rectified by fresh measures to prevent migration but unfortunately further deteriorated into complex psycho-social dilemma and a crisis. This cycle of actions and reactions was repeated till some acceptable solution was arrived at. The situation should have been dealt with, in a more rational manner to stop migration or manage it effectively. Cause and effect and circles of causality (Figure 1 of fixes that fail) identify the problem with two feedback loops; Balancing loop B1 and Reinforcing loop R1. System’s view shows balancing B1 loop where in due to country wide lockdown due to COVID-19, the labour class working in metros e.g. Delhi, started migrating back to their home towns in UP, Bihar, West Bengal, Assam and other states.

As the pandemic spread, migration numbers swell; depicted by ‘S’ in Figure 1; meaning rising migration rates which caused people to violate law and order. It forced the government to take harsh measures to prevent migration to protect people from getting infected. Steps by the Delhi government reduced the migration temporarily as shown by balancing part by ‘O’ in B1 loop. This was the first set of fixes or measures by the government that should have solved the problem. By these measures, part of migrating population was checked and stopped either within Delhi or at the borders of Delhi and UP. Since the measures put in place by the government were not strong enough, the impact multiplied and more labour started migrating as shown by ‘S1’ in R1 loop.

Multiplying effect led to people congregating at various places for buses and not finding them started hiring other means of transport or started walking along highways. Actions by the government, halted the migration temporarily but accentuated the problem with every passing day (time delay) called ‘Delay’ in Reinforcing loop R1 and it was visible on ground. Poverty and hunger added fuel to the fire. There was pandemonium across the nation and uneasy tension among Indians for inability of government to resolve the challenge could be felt. This impact is depicted by ‘S2’ in R1 loop. The entire issue is analysed with a holistic or ‘system’s view’ that says that for every problem, there are solutions that have to be assessed and applied in a holistic manner, failing which the measures fail and problem gets compounded. As problem gets compounded, further actions are initiated by the actors and situation improves only to worsen. The process continues till problem is resolved with a long time and suffering of people as penalty. In the instant case of migration, it could have been appreciated by administration and dealt with holistically before it became a social challenge. The police actions to maintain law and order became part of vicious cycle. Governments of Delhi, UP and Bihar got involved for their respective interests. State governments wanted safe return of their people from Delhi, Mumbai etc. and in the milieu, migrating people violated government rules of social distancing and lockdown, which led to Delhi government issuing next  set of orders to improve upon previous orders to stop the movement (depicted in Figure 1 by ‘S”).

These are the remedial measures adopted by the government in R1 reinforcing loop and as shown by blue stars in Figure 2 based on feedback of the unintended consequences of the first set of corrective actions taken by the government.

B1 loop could have been closed with the situation balancing out and with no side effects. However, the loop caused delay in seeking solutions or the repercussions of the corrective actions by the government were not strong enough. As a result, the situation had side effects that required immediate attention of the government. Attempts of migrants to reach home earliest led to actions by the police, imposition of curfew, violation of curfew by migrating labour and social disharmony. This was not the desired outcome by the government and hence led to additional measures till situation was resolved. A graphical representation of the situation of Fixes that fail in Figure 2 shows improvement in the situation over a long period but with a dip after every action by the government.

COVID-19 has posed a crisis the world has not witnessed since Spanish flu of 1918-1919. It is an unprecedented history in the making. Indian government response and handling of the pandemic has been one of the best in the world. In the instant situation that India is in; threat of COVID-19 is a real one and the migration is similar to the one Lord Kṛśṇa faced. Facing the calamity of an impending terrible war he was able to move a large chunk of population from Mathura to Dwarika without much upheaval.

Government under leadership of Mr. Narendra Modi deserves accolades for serving the humanity and saving millions of lives in the country from COVID-19. The government administration has effectively managed spread of the pandemic and Indian response has been appreciated the world over. However, response to deal with the migration of labour, consequent to pandemic and orders of Lockdown, requires deliberations. The measures taken by the government to fix the problems ended up creating different yet more problems instead and logical planning to deal with socio-economic issues needed to be developed. Preventing migration was the right decision but survival package in places of residence was a must in such sensitive circumstances. A planned operation to keep the labour wherever they were and looking after them would have been possibly an effective way to deal with the reverse migration.

And if the decision of the Government was to move the labour back to their villages, this too could have been planned systematically and entire movement could have been made comfortable and rejoicing journey for the poor and homeless. Any more politics on the issue is detrimental to our very existence as a nation and our economy, as our survival base depends on these humble, poor, shell shocked silent migrants.

If Lord Kṛśṇa could succeed in his times, so can we in our times.

To be continued…..

Brig JS Rajpurohit, Ph.D. Group Commander, Group HQ NCC, Gorakhpur (UP)