स्वतंत्रता की भारतीय शैली

-प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

Independence का वास्तविक अर्थ आत्मनिर्भरता है। In का अर्थ है inside अर्थात् आत्मा के स्तर तक पहुँचना और फिर उसी पर निर्भर होना अथवा dependent हो जाना। जब व्यक्ति आत्मश: कार्यरत होता है तो उसका आत्मबल सदैव पुष्टित होता रहता है। उसके लिए सारा जग आत्मीय बन जाता है। वह ‘अयम निज: परोवेति’ की गणना लघुचेतीय समझता है। उसके अंत:करण में चिरक़ालीन उदारता झकोरे लेने लगती है, तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सम्मत भाव जागृत हो जाते हैं। यहाँ तक कि उनके यहाँ ‘संताने तनय व तनया’ तक न सीमित रहकर आत्मज और आत्मजा के रूप उत्पन्न होने लगती हैं अर्थात् आत्मबीज ही अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित. व फलित होता है। ‘अहम् ब्रह्म अस्मि’ की अनुभूति सार्थक हो जाती है। ये है independence की वास्तविक महिमा! ये एक दिन में सीमित नहीं हो सकता, ये तो कल्पों का माजरा है जनाब!!

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Independence का दूसरा अर्थ है है स्वाधीनता, अर्थात् अपने को पूरी तरह से पहचान कर उसके आधीन हो जाना अथवा उसी की सत्ता के आधीन कार्यरत हो जाना। अपने को पहचानने का अभिप्राय है अपने धर्म को पहचानना, और उसी आधार पर गुण और कर्म निर्धारित करना। स्वधर्म की पहचान का तात्पर्य है अपनी प्रकृति को गहराई से समझना, बूझना, और परखना। जब व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है तब अपनी प्रकृति को ही आधार बनाकर उसी में श्रद्धा एवं भक्ति से संलग्न होकर कर्म करता है। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं करता। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसका उद्धरण इस प्रकार किया है- ‘स्वधर्मे निधनम श्रेय: परधर्मों भयावह’, अर्थात् अपने धर्म के अनुसार आचरण में सबकुछ मिट जाना भी श्रेयस्कर है। यही नहीं किसी अन्य के धर्म अर्थात् प्रकृति का आचरण भयावह होता है इसलिए स्वाधीनता अत्यंत आवश्यक मानवीय दशा है जो मानव ही नहीं बल्कि पूरी समष्टि के लिए कल्याणकारी है।

Independence का तीसरा अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात् अपना ही तंत्र होना चाहिए चाहे वो पारिवारिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, शैक्षिक हो, अथवा राजनीतिक हो। दूसरों की व्यवस्था यद्यपि उनके लिए कितनी भी उच्च एवं सराहनीय क्यों न हो किसी और के लिए तनावपूर्ण, बलाघाती, भयंकर कलह का कारण बन सकती है। अतः किसी भी देश को एक ऐसी व्यवस्था का सृजन करना चाहिए जिसके अंतर्गत हर एक व्यक्ति को सम्पूर्ण मुक्ति रहे कि वह व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक स्तरों पर अपने ही तंत्र के अनुकूल जीवन यापन कर सके। यह व्यवस्था बाह्य रूप से प्रारम्भ में अनेकता के सिद्धांत पर ही आधारित हो सकती है, अर्थात् कोई uniform civil code नहीं, कोई संविधान नहीं, कोई अधिवक्ता या न्यूनतवक़्ता नहीं, कोई AC में विराजित न्यायाधीश नहीं। मात्र धरातलीय प्रबुद्धजनो की आवश्यकता होती है जिनमे आचार विचार से आत्मबोध झलकता हो। वही सर्वभूतानाम की स्वतंत्रता सुनियोजित व  सुनिश्चित कर सकते है इसीलिए भारत ऋषियों का देश रहा है, स्वतंत्रता के लिए। आधुनिक स्वतंत्रता दिवस  को प्रेरणा का आधार मानकर स्वतंत्रता को शाश्वत बनाने के लिए संकल्पित हों, और इसी का पर्व मनायें आज and forever!! शुभम्

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

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माता की अवधारणा

मदर्स डे पर विशेषविमर्श

-डॉ. शशि तिवारी

 

यह संसार भगवान् की अद्भुत रचना है। भगवान् के इस सृजन का हम सब प्राणी उपभोग करते हैं। रचयिता होने से ही ईश्वर को ‘माता’ कहते हैं – त्वमेव माता च पिता त्वमेव । माना गया है कि हम सब ईश्वर के अंश हैं। तो जो गुण ईश्वर में हैं वे प्राणियों में भी हो सकते हैं या कि प्राकृतिक रूप से होने चाहिए। मातृत्व एक ऐसा ही गुण है। केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी किसी न किसी प्रकार के सर्जन और निर्मिति की कला में निपुण देखे जाते हैं। हर किसी में रचनाधर्मिता होती है- कभी कम कभी अधिक। तभी देवी की स्तुति में कहा गया है –

            “या देवी सर्वभूतेषु मातॄरूपेण संस्थिता। 

            नम: तस्यै नम: तस्यै नम: तस्यै नमो नम:॥”

वेद में माता-पिता के युग्म को ‘मातरा’ या ‘मातरौ’ कहते हैं यानी माता और पिता दोनों माता ही हैं। इसी तरह द्यावापृथ्वी का नाम ‘मातरा’ है; पृथ्वी हमारी माता है और आकाश पिता। सांसारिक माता और पिता के जोडे के लिए ‘पितरौ’ या ‘पितरा’ शब्द भी प्रयोग में आए हैं; यानी दोनों ही पिता हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे पति-पत्नी के युग्म को ‘दम्पती’ कहते हैं। भारतीय मनीषा ने शब्दों में ही जीवन-मूल्यों को सूत्र में मणियों कि भांति पिरोया हुआ है। तात्पर्य है कि महत्व की दृष्टि से माता और पिता लगभग समान ही हैं। इसीलिए कहते हैं – ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’। परंतु जब बात जनन की होती है तो जनि, जनी, जनयित्री आदि नामों से मां को जाना जाता है क्योंकि वह उत्पन्न करने वाली है। केवल उत्पन्न ही नहीं उसके बाद जो लालन-पालन की आवश्यकता है वह भी वही करती है। एतदर्थ उसमें स्नेह और ममता की आवश्यकता है और इसके वाचक अंबा, अम्बि, अम्बी आदि शब्द मां के लिए वेद में प्राप्त होते हैं। इन सब नामों से माता जननी, स्नेहमयी, पूजनी्य़ा, आत्मीया बतायी गयी है। उत्पन्न करने वाली का साक्षात् स्वरूप ‘माता’ पद में दिखाई दे्ता है, इसलिए उसे इस सम्मान से विभूषित किया गया है कि वह जननी है और ईश्वर के समकक्ष है।

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(Source of image : https://www.pinterest.com/pin/31806741093104880/)

सतत् स्मरणीय है कि साक्षात् माताएं हमारी सम्माननीय हैं; क्योंकि ‘मातृत्व’ मानवीय गुणों में सर्वोपरि है। रचना करना तथा पालन करना – प्रत्येक मनुष्य का धर्म कर्म होना चाहिए, तभी सामजिक संतुलन बना रह सकता है। जब हम मातृ-दिवस मनाये तो ये याद रखें कि यह अपने दायित्वों को वहन करने की शिक्षा देने वाला दिन है। यह रचनाधर्मिता का दिन है या फिर रचनाधर्मिता के अभिनंदन का दिन!

– डॉ. शशि तिवारी,अध्यक्ष, वेव्सभारत 

Hanumān Approach after Overcoming the Hanumān Syndrome

Prof. Bal Ram Singh

[Editor’s noteA version of this article had appeared in MyIndMakers ( www.myind.net)]

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(Source of Image: https://sites.google.com/site/hanumanlivestoday/hanuman-s-birth)

People have heard many miraculous and not so miraculous things about Shri Hanumān, many times erroneously referred to as Monkey God, including by the former President of America, Barrack Obama, who kept a statuette of Hanumān as part of his lucky charm collections in his pocket.

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Whether Hanumān was a monkey or vānara, which mean people who lived with nature in forests, there are numerous stories of Hanumān which could inspire or at least provide learning lessons. As a young boy I had chosen Hanumān as my personal deva or ishtadeva to whom I used to offer sweets after my annual exam results were announced. I started wearing dhoti-kurta on the days I went to offer sweets. That skill of wearing dhoti kurta has remained with me even today. Many a time it is not as important what one believes when one performs particular action, rather the lessons one learns in performing the action. The lessons are for the life where the beliefs are for the moment.

Hanumān Background

Hanumān was son of Kesari, a vānar king of Sumerū, for which there are several claimants in Jharkhand, Maharashtra, and Karnataka, and Anjana, a wise woman with divine background. It is known that Hanumān was born with blessings from Shiva and Pārvati, and also was helped by Vāyu devatā. All of them are well grounded in mountain, forest, and air. In other words Hanumān was influenced mostly by the nature and was connected to native people with wisdom from nature.

Hanumān State

Hanumān state of mind is that of someone who is bereft of ego and arrogance. “Hanu” means to kill and “mān” means the ego. That is why one sees and hears about Hanumān being very powerful yet always seen with folded hands and humble in service. There are stories about him getting a curse so that he would forget his power. However, given the Hanumān state of mind it will in fact be considered a boon. Certainly going by his great accomplishments and virtues, and the following even today, his traits can easily be considered as footsteps of success.

Hanumān Syndrome

Hanumān ji’s humility and determination are considered part of his real character that led him to win any mission he embarked upon. In the infinite states of consciousness, most people are focused on only limited tracks of the consciousness, and are in fact not aware of the existence (ego) of the other domains of their consciousness until they are reminded of by someone they believe and trust, such as parents, teachers, guru, etc.

Children and students are particularly vulnerable to the hidden capacity and potential unknown to them. This is the Hanumān syndrome that the whole humanity suffers from. This syndrome is treated by only wise and caring teachers or elders, who remove the syndrome with inspiration and infusion of courage through a series of steps to build confidence via knowledge and practice. This is what was done by Jāmvant, represented by as a Rikshraj and mānsputra of Brahmā, the creator of the universe. Jāmvant is not an ordinary bear, rather an individual with power and adaptability of a bear. He along with Hanumān and Paraśurām has distinction of being present in both Rāmāyana and Mahābhārata time. In other words, for Hanumān syndrome to be removed, an extraordinary teacher or guru is needed, by awakening the hidden consciousness.

Hanumān Approach

Once the Hanumān syndrome is treated, a person can achieve extraordinary feats. There is nothing that such an individual cannot do. Their approach becomes that of in improvisation rather than strategic and tactical. Since they are capable of doing anything they do not sit down to plan and process the goals. They actually begin to do what needs to be done, notwithstanding what may seem impossible to others. This is what Hanumān did when Lakśmana was hit with Shakti weapon of Meghnād. With Suśen (an Ayurvedic Vaidya) suggesting a prescription requiring Sanjīvanī from Himalayas in less than 12 hours, everyone is Ramā’s army had given up, except for the Hanumān free of his syndrome. He was the only one who could leap forward to Himalayas without any forethoughts, driven only by what needed to be done. He did not spend a semester learning the geography of Himalayas, asked for a GPS to reach there, or a long lesson on different types of plants, shrubs, and herbs.

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(Source of Image: https://ramleela.wordpress.com/2012/10/22/ramayana-viii-the-vanar-sena-to-the-rescue/)

He reached Himalayas after overcoming intentional hurdles thrown in his way represented by Kālanemī, which also means the perimeter of the time. Symbolically it means that Hanumān had to cross the limit of time to reach Himalayas and return. One there, he could not identify Sanjīvanī from many other medicinal herbs. He decided right then and there to bring the entire mountain so that Suśen can pick what was rightly needed. This is the Hanumān approach. Once awakened of one’s hidden capabilities, one does not look for everything favorable and in place to do one’s duty. In Hanumān approach, you do whatever is needed to accomplish the goal. If the world’s system does not allow one to do right things, then begin changing the world, whether it is for peace, food, health, equality, education, or the planet.

So, go ahead try the Hanumān approach, and let the world know the results! The Hanumān principle lives in all of us.

Prof. Bal Ram Singh, Director, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth, USA

Ram’s Dharma: Leadership Secrets of the Ultimate Warrior~Sage~Prince

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-Michael Sternfeld

[Excerpted from the audio-bookRam’s Dharma: Leadership Secrets of the Ultimate Warrior~Sage~Prince— published by Vedic Audio Knowledge (VAK). VAK created by  author, an independent scholar has made a tradition of preserving the essential oral tradition of the Vedic literature with dramatic productions in English. ]

Introduction

Now begins the inquiry into Dharma.  This one line, expressive of much of the potency within all Vedic knowledge, is an apt beginning in our exploration of the epic Ramayana.  The Ramayana can be seen as one grand heroic quest into all the power and subtlety of Dharma.  Dharma means more than just duty, as it is often understood in the West.  At its most comprehensive level, Dharma is the inexorable movement of evolution in the universe. All activity in the universe is orderly because of that inexorable flow of Dharma.

Alignment of Our Dharma With the Big Picture

To the degree that we align our own nature with this grand vision of Dharma, the more we align ourselves with the natural flow of all that was meant to be.  This seems to be the true quest—to move our own consciousness, our own deepening awareness–to become more and more in-tune with Dharma at every step of our evolution.  There is not one “be-all, end-all” state that captures this, because Dharma, as structured in consciousness, is a sequential process of unfolding deeper and deeper levels of order or Dharma in the fabric of our own awareness.

Hierarchies of Dharma

Dharma is structured in layers, or in hierarchies, which reveal more and more comprehensive levels of intelligence in nature.  On one level, we could experience our personal career Dharma–expressive of the work we do to earn a living.  At a deeper level, we can own our soul level Dharma–expressive of our own fundamental nature and the development of higher states of consciousness.  On a more expanded level, there can be a Dharma of a country or civilization, which may express the unique design or “chosen-ness” for a group of people to serve and enrich the world in a particular way.  The Dharma of a star is to spread life-giving light into the world, while the Dharma of the universe may reach to the fields of unfathomable infinity.

Evolution of Dharma

Every level of life has a Dharma that is woven together with all the other streams to create a majestic tapestry reflecting the never-ending flow of life from lesser states to more and more fullness of life and evolution.  From this perspective, all of our growth can be seen as an opportunity to continually deepen our understanding of our own Dharma and how it fits into the larger Dharma of the world.  As we grow and evolve, we find that those values that seemed so significant when we were younger fall away and new doorways open to greater and greater levels of service, authenticity and an expanding sphere of influence to enrich the world.

Ram’s Dharma and the Ramayana

Now this is where the power of Ram and the Ramayana enter the picture.  Ram is an embodiment of the total potential of Dharma.  All different levels and streams of Dharma seem to converge into his comprehensive personality. This power is first expressed on the human level, the level of heroic action. Like all the great heroic figures that have preceded us, we gain so much from following in his epic footsteps.  Ram’s heroic quests become our own; and his journey—imbued with near-impossible challenges as well as great victories and blessed boons–become the cherished guideposts in the journey of our own lives.

But this outer value of Ram is only a projection and expression of the deeper, absolute level of life, from which the full potential of being fully-human emerges—a divine being in human form. Ram is an extraordinary personage in that he is both an ideal man and an avatar. Human and divine. The juxtaposition of these two values stretches our comprehension to span its gulf.

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Why is Ram So Special?

In the pantheon of all great epic heroes, Ram seems to hold a special status. On a human level, his entire life and story are based upon explicitly discriminating and integrating finer and finer levels of Dharma.  Our behavior can be refined at each step of this journey by integrating these deeper values into our lives. But the deepest level of Dharma reveals Ram’s full potential as an embodiment of the Absolute level of life–Ram Brahm Paramarath Rupa.

The great modern-day Vedic sage Maharishi Mahesh Yogi explains this mahavakya by describing Ram as the embodiment of Brahman, the supreme Totality of life. This Totality is not just outside of us as some ruling power, but inside us as well. In this view, Ram represents the essential nature of ourselves and the whole creation, governing and sustaining it from the transcendental level.  Maharishi clarifies: “Ram is the embodiment of pure spirituality, of pure being–totality in its absolute unity. All activity in the universe is orderly because of that eternal law of life, the administration of Ram, which establishes and maintains harmony in all relationships; which harmonizes everything with every other thing in the universe.”

This quote underscores why experiencing the Ramayana yields such profound results. If Ram embodies all the diverse relationships in the universe, then the study of his story is essentially the study of our Self and our evolving relationship with creation—the full potential of Dharma. In this view, the impulses of the Ramayana are the structures of our own consciousness, our own Self, and challenge us to grow towards our own divine status as humans.

This vision may sound quite cosmic, but we must remember that this divine story unfolds on a completely human level, as Ram was born a mortal man–the son of the illustrious King Dasharata in Ayodhya.  The story begins as the wise sage Valmiki pondered the question he had often reflected upon: “Is there a perfect man among us?”.

We now begin our journey following the footsteps of Ram—along with Sita and all the characters of the Ramayana–on an epic quest to discover Ram’s Dharma on all its levels.  Our ultimate goal: to emerge with a profound ownership of that full potential of Dharma that animates the entire universe.

Audio Sample Link:  http://www.ramayanaudio.com/otherproducts.html#ramsd

Michael Sternfeld, MA, is an independent scholar and  a producer/director, USA 

 

वासन्ती पर्व ’होली’

 – डॉ. शशि तिवारी

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हमारी कृषि-व्यवस्था दो भागों में बँटी है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय फसलें कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। होली पर्व का एक प्राचीन नाम ’वासन्ती नवसस्येष्ट’ है। यह मूलतया वसन्त ऋतु में नये अनाजों से किये जाने वाले यज्ञ कर्म (इष्टि) का नाम है। हमारी वैदिक परम्परा है कि  नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव को समर्पित करते हैं, तत्पश्चात् स्वयं भोग करते हैं। वसन्त ऋतु में चना, मटर, अरहर एवं जौ आदि अनेक अन्न पक चुकते हैं। अत: उनको देवों को समर्पित करते हैं। चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते हैं। आहुति देते हैं और परिक्रमा करतॆ हैं, यह यज्ञ की प्रक्रिया ही है।

संस्कॄत की परिभाषा ’तृणाग्निं भ्रष्टार्धपक्वशमी धान्य: होलक:’ के अनुसार तिनके की अग्नि में भुने हुए अधपके धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। होली शब्द होलक से बना है। इसी कारण इस पर्व को ’होली’ या ’होलिकोत्सव’ कहते है। होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है। लॊग प्रतिवर्ष सामूहिक रूप से होली जलाते हैं।

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(Source of Image : httpswww.jansatta.comlifestyleholi-2018)

ऋतुओं का सन्धिकाल रोग उत्पन्न करता हैं । होली का समय हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग-निवारण के लिए यज्ञ उत्तम साधन है। अत: होली जलने का संबन्ध फसलों के साथ-साथ ऋतु-परिवर्तन से भी है।

एक पौराणिक कथा होली जलाने को भगवान् से जोडती है―होलिका हिरण्यकश्यपु नामक राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का बालक पुत्र था जो विष्णु की पूजा करता था। पर हिरण्यकश्यपु पुत्र को रोकता था कि “तू विष्णु की  पूजा न कर मेरी पूजा किया कर“। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठ जाये। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई,  वह जल गई और प्रह्लाद बच गया। तब से प्रह्लाद, होलिका तथा विष्णु की कथा की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है l

होली उत्सव एवं यज्ञ का सांस्कृतिक प्रतीक है। स्वयं को प्रकॄति से जोड़ने का पर्व है।

आप सभी को इस उत्सव की हार्दिक शुभकामनायें।

डॉ. शशि तिवारी,अध्यक्ष, वेव्स -भारत 

Mahā Śivarātri

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– Mrs. Kamlesh Kapur

Worship of Śiva as part of Holy Trinity

Śivarātri is celebrated by all Hindus. Many Hindus go to the temple and spend the evening singing devotional songs. Some celebrate it in home temple observing fast and doing prayers. The main places where this festival is celebrated with great pomp are at the twelve Jyotir Lingas—Śiva temples. These are at Kedarnath, Varanasi, Vaidynath, Ujjain (Avanti), Somnath, Dwaraka, Omkareshwar, Trimbakeshwar, Ghrishneshwar, Srisailam, Bhimashankar, and Rameshweram. For Hindus, these are the place for pilgrimage.

Many Hindus believe that Śiva as the life force is the creator of the universe. They believe in the ancient saying, “The creation is neither characterized by Lotus (the emblem of Brahma) nor by the Chakra (the emblem of Vishnu) nor by the Vajra (the emblem of Indra). Therefore, all creations are born of Maheshwara.” (Ganapati: Song of the Self by John A. Grimes)

Ten Praanas and atman are eleven Rudras mentioned by Yajanvalkya in Upanishad. The same are also mentioned in Yajurveda. As ten Rudras and the atman enters a living being, life begins. As these depart, life ends for that person. Rudras being good and mangalmai (auspicious) are known as Śiva or Śivam. Below is the picture of Lord Śiva as Nataraja. In Tamilnadu, India, there is a temple at Chidambaram. It is believed that at this place, Śiva performed the dance of creation. There are beautifully sculpted figures showing 108 postures and mudras (hand gestures) of Śiva’s dance.

Procedure and Ceremony on Śivarātri

Devas are invited. Śiva is invited. Yajna is performed by the community. Offerings are made with chants. Devotees sing devotional music. Ceremony ends with peace prayer. On Śivarātri, Hindus pray to the pillar of light for strength to keep peace within and in the world. Śiva manifested Himself as a pillar of light/ fire. Students may remember that the light in Hindu tradition refers to enlightenment, knowledge, vision, good speech, and wisdom. On the darkest night of the month in February, Śiva appears as the pillar of light to end ignorance. Ignorance gives birth to anger, violence, untruth, conflict, and darkness. All these are dark forces disturbing not only a person’s mental peace, but these forces also destroy peace in the society and in the nation.

Prayers are offered for the well-being of all the people in the world:

Asdo ma sad gamyo, tamso ma joyitir gamyo

Mrityor mam amritam gamyo

Sarve bhavantu sukhinah, sarve santu niramya

Sarve bhadarani pachyantu ma kaschit dukha bhagbhavet

Karpur Gouram karunavtaram, samsara saram bhujgendra haaram,

Sada vasantam, hrideya arvinde, bhavam Bhawani sahitam namami

On Śivarātri, during the prayer ceremony, usually, eleven kalashas (earthen round pots with water) are placed in a circle, symbolizing ten Praanas. The eleventh kalasha, the symbol of the Atman is placed in the middle.

In Kalahasti temple at Varanasi, the puja is performed showing the hand of time moving. In creation, transformation, and destruction, it is the hand of time that carries us forward. Thus, Śiva Linga is that pillar of two tattavas (elements) responsible for the formation of the earth and its atmosphere.

Śivalinga

The most popular form worshipped is the Śivalinga. Śivalinga is the bottomless pillar of light. In the beginning, there was only space; then a lighted pillar appeared—the echo sounded as the vibration of Aum, air (Vayuh) filled the atmosphere. The friction caused fire (Agni). In one of the Yajurvedic mantras, this pillar of light is referred to as Svastambhitam. It is believed that this happened on the day of Śivarātri. Śivarātri, that is, Śiva’s Night, is the famous festival in honor of Lord Śiva. The pillar has no base, for the space has no beginning or end. At best we can compare it with a shooting star. The light appeared and vanished having created the two tattavas (elements of air and fire), essential elements for sustaining life. There is a sculptured fresco of this stambha in the ASI archives. During the Indus-Sarasvati age (5000 BC to 1900 BC), people offered prayers to Śivalinga.

Below is the picture of Śivalinga

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Linga means a pillar (stambha)- a pillar of light Linga means a “mark” in Sanskrit. It is a symbol that points to an inference. For he is the life force, the air we breathe. The pillar of light arising from Agni, the fire, and fanned by the pure air makes the shape of Śivalinga. In the evolution of elements, air fills the space followed by fire making the unfathomable base of the pillar, and thus, together they complete the basic sustenance for life on earth. Hindus worship this pillar as Śivalinga, knowing fully well that Śiva is unfathomable and formless. He has no form of his own, and yet all forms are his forms. Śiva is everywhere all the time. Stark and geometric, the linga is meant to represent, in an abstract fashion, a pillar. As a pillar, it stands for Śiva as the axis of existence, which Hindus believe extends from the Absolute to the everyday world. From this axis, the world is born, and it is to this axis that it will return to before complete annihilation at the end of time (end of the kalpa).

“Every form is the form or Linga of Lord Śiva. The Linga is only the outward symbol of the formless being, Lord Śiva—Lord Śiva incarnate, who is the indivisible, all-pervading, eternal, auspicious, ever-pure, immortal essence of this vast universe, who is the undying soul seated in the chambers of one’s heart, who is one’s Indweller, innermost Self or Atman and who is identical with the Supreme Brahman.”

There is also the literary evidence of puja of this stambha in Valmiki’s Ramayana. Ravana prayed to Śiva for a long time, and then he wanted to take him along with the Kailash Mountain. He shook it hard and was able to take an elongated piece of the rock, which he thought was the essence of Śiva’s being. Ravana started the puja of this stambha. Sri Rama also performed puja of this stambha before crossing the ocean. This story is sculpted in part at Kailash cave 16 at Ellora. Worked from top to bottom, the temple happens to be the largest monolithic temple made out of one rock. Ravana’s chariot is also carved. This archaeological evidence also reveals the idea of the Stambha. Long pillar, if constructed needs a base, and the base is in the diya; the combination of Vayu and Agni was thus completed. Artists down the ages created amazing pieces of art using diverse art media. Though early paintings did not survive the ravages of time and the invasions, cave temples, frescoes, rock temples and bronze statues have survived.

Here is another picture of Śiva created by the artists.

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Śiva is sitting in yogic posture. The river Ganges is falling from his hair. He has snakes around his neck, blue patch of poison on the throat, moon on his forehead; and his third eye is closed. A yogi is not afraid of the obstacles. In Hindu tradition, snakes usually symbolize worries, negative emotions, temptations, and obstacles. The blue patch on the throat is poison. A yogi digests the good and the bad equally well. Because of the blue patch on his throat, he is also called Nilakantha. The river Ganges is known as Sursari, which means its origin is Devaloka (associated with the cloud system or the atmosphere). The river may not descend with the full destructive force; so Śiva releases it slowly. The abode of Śiva is Mount Kailash in the Himalayas. Snow is the symbol of purity and austerity of mind. Thus, through this symbol, several concepts are connected—the origin of the Ganges from the Himalayas, the rainwater swelling the river and the rain originating from the cloud system. Śiva’s eyes are half closed, which indicates even though he is in meditation, he is aware of the material world. Śiva’s third eye signifies the eye of wisdom. Śiva is worshipped as Śiva and Parvati. He is also worshipped as Nataraja: King of Dance or Simply Dancing Śiva.

Below is another picture of Śiva as Nataraja which symbolizes Kaal and Mahakaal:

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Śiva as the king of dance shows the rhythmic cycle of birth, transformation, and death of life. It also signifies that the world as we see today may not be there at the end of the kalpa. Both the Creation and the annihilation are an integral part of all life. The upper right hand has tabor (dummaroo), which symbolizes the sound of creation. The lower right hand is raised in half-moon gesture, the upper left hand has flame of destruction in its palm, and the lower left hand is showering blessings. One leg is raised indicating remaining above the material world, and the other leg presses hard on all that is negative and evil.The late astrophysicist, Carl Sagan (1934-1996) in his book, Cosmos, asserts that the Dance of Nataraja (Tandava) signifies the cycle of evolution and destruction of the cosmic universe. Carl Sagan further says, “The most elegant and sublime of these is a representation of the creation of the universe at the beginning of each cosmic cycle, a motif known as the cosmic dance of Lord Śiva. The God called in this manifestation Nataraja, the Dance King. In the upper right hand is a drum whose sound is the sound of creation. In the upper left hand is a tongue of flame, a reminder that the universe, now newly created, will billions of years from now be utterly destroyed.”

No matter, how we worship, Śiva is the ultimate reality of the cosmic reality as well as the life circle of all life anywhere and everywhere.

 Mrs. Kamlesh Kapur, Author and Educator, USA

सूर्य और सृष्टि

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– प्रो. माला रानी गुरु

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!!

“तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, वंदनीय तीनों लोकों पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक में विचरण करने वाले भगवान सूर्य हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रेरित करें”

यह वैदिक मूलमंत्र समस्त जीवधारियों का आलम्बन है| इन महिमामंडित, मण्डलाकार, ज्योतिस्वरूप सूर्यदेव को बारम्बार नमस्कार हों| उनके इस सृष्टि और सृजन के प्रति, सभी के जीवनदान के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रगट करने के लिए उत्तर-भारत में सूर्योपासना के लिए किया जाने वाला छठव्रत, बड़ी ही श्रध्दा से प्रत्येक वर्ष कार्तिक एवं चैत्र मास में संपन्न किया जाता हैं| अन्य प्रदेशों में भी सूर्य उपासना के विभिन्न प्रकार हैं|

समस्त वनस्पतियों फल-फूल-ईंख-अन्न-मिष्ठान से भगवान भास्कर को संध्या समय तथा प्रातःकाल सूर्योदय के समय श्रध्दापूर्वक अर्घ्य प्रदान किया जाता हैं| अस्त हों रहे अथवा उदय हों रहे सूर्य की आराधना निरन्तर चल रहे कालक्रम-समय को ही धोतित करता हैं| यह आराधना आडम्बर रहित जनसाधारण का महापर्व है| श्रध्दापूर्ण श्रद्धालु-जन इस प्रकार अर्घ्य प्रदान कर कृतज्ञता प्रकट करते हैं|

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे: जगत्पते !

अनुकम्पय मां देवो गृहाणार्घ्यं  दिवाकर: !!

इस छठ पर्व में स्वयं सुर्योत्पन (जैसा की किवदंती है) शाकद्वीपीय ‘मग’ ब्राह्मणों का विशिष्ट महत्त्व है| ये वही समुदाय है, जिनके पूर्वजों को भगवान श्रीकृष्ण अपने पुत्र साम्ब के उपचार के लिए शाकद्वीप से भारत लेकर आये थे, और कालांतर में ये ब्राहमण समुदाय वैद्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए| कहने का तात्पर्य है की सूर्य के किरणों की महता प्राचीनकाल से ही रोगनिवारक के रूप में स्थापित है|

हमारी संस्कृति की अनुपम ज्ञानप्रद श्रृंखला जो पूर्वकाल में शिष्यों तथा ऋषि पुत्रों की श्रवण और मनन परम्परा से आगे बढ़ी थी| श्रवण और मनन में श्लोक केवल शाब्दिक अर्थ ही नहीं बल्कि उसके उच्चारण और अनुकम्पन से किसी खास अर्थ या प्रयोजन निमित्त होता है| आर्य ऋषियों की श्रवण-मनन वाली ज्ञान परम्परा के धूमिल पड़ने के बाद, आधुनिक युग में यह श्रुश्रुत परम्परा क्रमशः लेखन एवं दृश्यज्ञान में परिवर्तित हो गयी| परन्तु नई पीढ़ी तकनीक की अंधी दौड़ में ज्ञान के आधुनिक प्रकल्पों में अग्रसरित है, और शाब्दिक अर्थ से इतर प्रभावों से अनभिग्य होती जा रही है| शब्द ज्ञान से इतर की समझ के लिए किसी के पास समय नहीं| परन्तु इस समृद्ध ज्ञान वैभव के विरासत अगली पीढियों तक पहुचे, जिससे वे सार्थक जीवन जी सके, भौतिकता के दुष्परिणामों से बच सके और अध्यात्म की ओर मुड सके, और हमारी आर्य परम्परा की विरासत को जान सके, इसके लिए चित्रात्मक अभिव्यक्ति एक ससक्त माध्यम हो सकता है| इसीलिए यहाँ आदिदेव, प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरुप भगवान सूर्य की उपासना को चित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति दी गई है|

sun

(Editor’s note – The author has painted this image. Her present work is themed at  Sanskrit literature from where she picked up the myriad colors which make her painting style vibrant and classy. )

“सूर्य और सृष्टि” शीर्षक वाला यह चित्र सूर्य-वन्दना को स्पष्ट कर रहा है| आकाश में दर्शित तीन मंद्लाकृति भूलोक, अन्तरिक्षलोक, तथा द्युलोक को प्रकाशित करने वाले सूर्य की महिमा को प्रकट कर रहा है| परमात्मास्वरुप सूर्यदेव पंच आदि तत्वो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश से सृष्टि का निर्माण करते हैं| इस सृष्टि के निर्माण में प्रकृति देवी के सहयोग से, छः ऋतुओं की शक्ति से नित-नूतन समस्त जड़चेतन जगत की सरंचना करते हैं|

चित्र में सात-स्त्रियों की जो आकृति है, उसमे प्रकृति देवी सहित छह ऋतुओं के व्यहार एवं प्रभाव को दर्शाया गया है| उनके बस्त्रों का रंग उस ऋतु विशेष की प्रकृति एवं कार्य का परिचायक है| चित्र में दायी ओर की प्रथम स्त्री वसंत ऋतु की परिचायक है, जिसका पीला वासंती वस्त्र पृथ्वी को पुष्पित एवं पल्लवित कर संसार को सृजन शक्ति के आनंद से भर देता है, तभी तो बसंत को ‘ऋतुराज’ भी कहा जाता है| दूसरी स्त्री ग्रीष्म ऋतु का प्रतीक है, जिसका लाल वस्त्र मौसम के परिताप को प्रकट करता है| ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी गर्म होकर सृजन की ओर प्रवृत होती है| तीसरी स्त्री स्वयं प्रकृति देवी है, जो सभी ऋतुओ को स्वयं के कार्य निष्पादन को प्रेरित करती है| चौथे स्थान पर हरे वस्त्र में हरियाली की प्रतीक वर्षा ऋतु है, जो ग्रीष्म के ताप से संतप्त प्रकृति और जनजीवन में सृजन शक्ति भर कर जीवन का श्रृंगार करती है| तदन्तर हलके नील वर्ण वाली पांचवी आकृति शरद ऋतु की है, जो नव सृजित वस्तुओं में जीवन का संचार कर संरक्षित रखती है| उसके बाद छठी और सातवी आकृति हेमंत और शिशिर की है, जो वस्तुओं और जीवन को संपुष्टि प्रदान कर परिपक्वता देती है, उसमें जीवनदायी रस का संचार करती हैं| इस प्रकार छह ऋतुएँ समस्त चराचर जगत में सृजन-स्थिति एवं परिपक्वता से सृष्टि का क्रमिक संपादन करती हैं|   

इस प्रकार सूर्यदेव ही अन्न-जल, वन-उपवन, पर्वत-झरने, जीव-जंतु-पक्षीगण, कीट-पतंग, मानवादि का निर्माण कर संपोषण करते हैं| इस चित्र में आदिपुरुष मनु और आदिस्त्री शतरूपा (हिन्दू मान्यतानुसार) सूर्य का वंदन करते हुए दिख रहे हैं| भारतीय आर्य परम्परा में ‘यज्ञ’ को विशेष महत्त्व मिला है| हवन कुण्ड से उठती अग्नि की लपटें आदि पंचतत्वों में से एक अग्नि तत्व के निर्देशित कर रही है| अग्नि जल की भी सृजक है और जल जीव-सृजन की प्रथम कड़ी है| इस प्रकार सूर्य ही सृष्टी के केंद्र में विराजमान हैं, ज्ञान-विज्ञान की धुरी हैं|

सूर्य की दिव्य शक्तियों की जानकारी हमें बहुत अल्प हैं| हमारी आर्य ऋषि परम्परा से प्राप्त ज्ञान का मंतव्य है कि ब्रह्मांड में अनेकानेक सूर्य और उनका सौरमंडल हैं|अनेकानेक ग्रह-नक्षत्र-निहारिका-उल्कायें, तारागण और आकाशगंगाए हैं, कुछ अज्ञात शून्य भी हैं, जो एक दिव्यप्रकाश स्वरुप से संचालित एवं नियंत्रित हैं| गणित और विज्ञान का “शुन्य” घटक भी संभवतः सुर्याकृति पर ही निर्धारित हैं| समस्त गणना विज्ञान शुन्य से प्रारम्भ होकर असीमित शून्यों तक के माप का सफ़र तय करती हैं, जिसकी अवधारणा पूर्ण रूप से भारतीय है| खगोलीय दुरी की व्याख्या भी प्रकाश वर्ष में की जाती है| अतः सूर्य के बिना आधुनिक विज्ञान के परिकल्पना दुरूह है|

अतः हम परमात्मा की कल्पना प्रत्यक्ष प्रमाणस्वरुप भगवान सूर्य में कर सकते हैं| विश्व के अनेकानेक देशो में, विभिन्न धर्मों में किसी न किसी रूप में सूर्य उपासना का रूप मिलता है| मानव तथा अन्य जीवधारियों को सूर्य की दिव्य शक्तियों की प्रतीती होती है, उसी प्रकार से जिस प्रकार वायु तथा जल की जीवनधारण क्षमता का अनुभव होता है| इस प्रकार सूर्य की दैवीय शक्तियों को नकारना अपनी वास्तविकता को नकारने के सदृश्य है|

ज्ञान जीवन की सार्थकता और आनंद को संपुष्टी करता है, अततः ज्ञान की ही सर्वत्र पूजा होती है इसीलिए ज्ञान का अन्वेषण तथा अर्चना अनिवार्य है| सद्यः जन्मा बालक जीवनदायनी दुग्धाहार के लिए स्वतः ही दुग्धधारा को ढूंढता है| जन्मदात्री माँ के अस्तित्व-बोध से रहित वह उस व्यक्तित्व (माँ) से अगाध प्रेम और श्रध्दा से जुड़ जाता है, जीवन पर्यंत यही जुडाव ही पूजा अर्चना है| निष्कर्षतः शाश्वत शक्ति जो सृष्टि का सृजन करती है, उसके प्रति प्रेम और श्रध्दा, पूजा और समर्पण स्वाभाविक ही है|

वेदों में सूर्य की विभिन्न शक्तियों का ज्ञान, अन्तरिक्ष के रहस्य, अग्नि, जल-पिंडो इत्यादि की अन्तरिक्ष में उपस्थिति का ज्ञान और विज्ञान प्रतीकात्मक शैली में उपलब्ध है, उदहारणस्वरुप ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सवितृ सूक्त 35 में हिरण्यस्तूप ऋषि के अनुसार इस कथन की पुष्टी हो रही है|

ति॒स्रो द्याव॑: सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट् ।

आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत् ॥

सवितृ सूक्त ऋगवेद| मण्डल (1:35) मन्त्र 6

स्वर्ग से उपलक्षित प्रकाशमान लोक तीन हैं| उनमें से दो लोक सूर्य के समीप है अर्थात् दो लोक-भूलोक और द्युलोक सूर्य से प्रकाशित होते हैं| एक तीसरा लोक अन्तरिक्ष है जो यम के घर जाने वाले प्रेतों को सहन करता है अर्थात् मरने के बाद पुरुष अन्तरिक्ष के मार्ग से यम लोक को जाता है| जिस प्रकार रथ के अक्ष में डाली गई आणि (किल) से रथ अवस्थित रहता है, उसी प्रकार अमृत अर्थात चन्द्र, तारे आदि प्रकाशमान नक्षत्र अथवा जल उस सूर्य के समीप अवस्थित हो गये है, और इस प्रकार के सूर्य को जो मनुष्य जानता है, वही मनुष्य सूर्य की महिमा का वर्णन कर सकता है|

इस प्रकार वेदों उपनिषदों इत्यादि के मनन, अनुशीलन एवं वैज्ञानिक गवेषणा से अद्भुत खगोलीय तथ्यों की बृहद जानकारी को मानवोपयोगी बनाया जा सकता है| इन्हीं सब तथ्यों को चित्र के माध्यम से व्यक्त कर, युद्ध, अशांति और प्राकृतिक असंतुलन की विभीषिका को झेलती मानवता की कुछ त्राण मिल सके, इसका एक छोटा सा प्रयास किया गया है|    

प्रो. माला रानी गुरु, संस्कृत विभाग, राम कृष्ण महिला महाविद्यालय, गिरिडीह, झारखण्ड