Holi: The Feast of Multidimensional Harmony and Divine Love: The Yajna and Yoga for All

Prof. Shive K. Chaturvedi

In the age of prevailing conflicts, confusions, emptiness, and meaninglessness, many leaders of all kinds and creeds-intellectuals, social scientists, physical scientists, theologians, and politicians have suddenly started preaching about the urgent need of harmony and love within this variegated world. The irony is that these words and concepts remain evasive and elusive to most of us. In the absence of real active participation (with mind, speech, and action) in the feast of harmony and love, the entire endeavor of leaders of all colors and creeds appears to be nothing more than a sonorous verbiage-an utter nominalism. Do we have an opportunity for such a feast of inviting harmony and unalloyed love? Yes we do! And that is what the Holi is all about.

The historical origin of Holi is still shrouded in mystery; however, many good indications place it in very remote times, all the way back when Bhagavan Krishna spent his miraculous and divine playful boyhood in Vrindavan, Braj-Bhoomi, India (more than 5000 years ago). Its current traditions and practices appear to have evolved from harmonizing of many dharmic, adhyatmic, social, and folk traditions.

The Holi celebration begins with a bonfire. The bonfire is started by collecting, from every house in the village, the accumulated trash, garbage, and waste. This clean-up act is the reminder of the necessity of cleaning all the physical, as well as mental, spaces where lots of polluting elements have grown out of our material nature, such as uncontrolled sensual desires, anger, delusion, hatred, violence, lust, and greed. People gather around the bonfire and make offerings that might include roasting ears of new, still green barley crops which are still in the fields (this act is a kind of Vedic Yagna), and sing and dance around the fire, with songs, including the chants written in local vernacular. After all, this is New Year’s Day; a day to welcome the most colorful, joyful spring season-the king of all seasons. This is the Holika-Dahan.

In the Braj-Bhoomi, Holi playing is a battle of divine love. Young wives of the village are ready to attack the best men of the village with their sticks. It is time for colors; the wet and dry, all kinds. Everyone has been transfigured; no one is recognizable; the whole Braj-Bhoomi appears to be in great social turmoil, chaos, craziness, and good humor–yet everyone is in a state of great joy. The erotic mood is in full swing, yet within the expanded bounds of ethical and moral norms. People are impersonating Shri Radha and Krishna; the roles have been reversed; the genders gone astray. This continues for a day or two, and then purification and restructuring starts by washing, cleaning up, and donning new clothes.

This is a new beginning. Everyone greets one another with a new promise of cooperation, support, and love for the rest of the year. Radha-Krishna Bhajans (devotional songs) go on with joyful celebrations, with intense divine passion and love (Bhakti Yoga), after all, the Holi of Krishna is no mere intellectual exercise; no mere theory of love, no mere academic play: rather it is Divine Lila that each one of us must actively participate in and play our respective sva-dharmic roles with great passion and joy.

The richness, variety, and beauty of Holi Colors are the metaphors for the colors and the moods of five basic elements of Prakriti (material Nature), the changing world, seasons, and mind-an aspect of Divine Shakti Maya. The new beginning, the adhyatmic renewal for a better future for all must start by smearing out and covering up all worldly, social and physical and mental distinctions and categories. The Holi celebration tends to transcend all the established differences and diversity of varna, caste, color, sex, age, wealth, power, and attitudes. The social destruction and renewal, world pollution and purification, smearing out the diversity to re-enact harmony and unity occur, not only on intellectual planes but it is played out physically and mentally by each and everyone with great joy. After all, it is Holi of Radha- Krishna-the feast of multidimensional harmony and divine love.

Prof. Shive K. Chaturvedi, Los Angeles, California, USA

क्रांतिकारी नारीवाद में सू-फेमिनिज़्म (Sū-Feminism) और सी-फेमिनिज़्म (Sī-Feminism) के भारतीय विकल्प

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस इस बार सीता जयंती के आस-पास होने से स्वाभाविक विचार आया कि क्या होता यदि सीता नारीवादी होतीं? यदि होतीं, तो किस तरह का नारीवाद प्रतिपादित करतीं? क्या आज का नारीवादी समूह (फेमिनिस्ट ग्रुप) उन्हें स्वीकार करता? ऐसा माना जाता है कि संसार में ऐसी कोई विचारधारा नहीं, जो महाभारत काव्य में न मिले, और उसी तरह विश्व में ऐसा कोई चरित्र नहीं, जो रामायण अथवा रामचरित मानस में न मिले। इस प्रकार नारियों के अनेक रूप रामायण के घटनाक्रमों में दृष्टिगोचर होते हैं। इनमें कैकेयी, कैकसी, कौशल्या, मंथरा, ताड़का, तारा, मंदोदरी, रुमा, सूरसा, सिंहिका, शबरी, सीता, शूर्पणखा, स्वयंप्रभा, सुलक्षणा, मांडवी, उर्मिला, श्रुतकीर्ति, अहिल्या, अनुसूइया, लंकिनी, इत्यादि उल्लेखनीय नारियाँ रही हैं। वैसे तो इन सभी नारियों के साहस, स्वातन्त्र्य, सामर्थ्य एवं समर्पण की अपनी अद्भुत कहानियां हैं, नारीवाद के प्रसंग का यथोचित प्रतिपादन सीता और शूर्पणखा चरित्र से प्राप्त हो सकता है।

हम देखते हैं कि सीता और शूर्पणखा ये दोनों क्रान्तिकारी महिलाएँ थीं। शूर्पणखा ने उस त्रेता काल में अपने मन से विवाह किया था। हालांकि, रावण ने उसे स्वीकार नहीं किया था। लेकिन, उसके बावजूद वह सेना की एक कमांडर, हुआ करती थी, और पूरा दंडकारण्य उसके अधीन था। इसलिए उसने राम को, जब वे  वहाँ पहुँचे, तो ललकारा। तो ऐसी वैसी महिला नहीं थी शूर्पणखा। वह बलिष्ठ थी और अपने क्रान्तिकारी विचारों के आधार पर ही उसने कार्य किए। उसने अपने महाबली भाई रावण से एक समझौते के अंतर्गत उस क्षेत्र का कार्यभार संभाला था, वह सबला थी, अबला नहीं। वह कूटनीति में निपुण थी, रणनीतिज्ञ थी। रूप, रंग, तेवर बदलने के गुण थे, उसके अंदर। खर, दूषण जैसे सेना नायक उसके आदेश का पालन करते थे। और वह यह सब अपने क्रान्तिकारी विचारों के कारण थी। वह स्वच्छंद, मनचली थी। उसके राम या लक्षमण के ऊपर आसक्ति केवल स्वच्छंदता ही नहीं, बल्कि रणनीति को भी दर्शाती है। राम रावण युद्ध की मुख्य पात्र वही थी।

सीता भी कम नहीं थीं, लेकिन व्यतिरेक है। सीता को प्रायः एक अनुसेवी, आज्ञाकारी, समर्पित महिला के रूप में दिखाया जाता रहा है, परन्तु सीता जन्म से ही एक क्रांतिकारी स्वभाव की व्यक्ति थीं। दो घटनाओं से यह पता लगता है – एक कि, राजा जनक ने कहा था कि, ये धनुष शिवजी का है, कोई उसको उठाएगा नहीं। और क्या किया सीताजी ने? पहले धनुष को उठा दिया। अपने पिता की अवज्ञा करके उठा दिया। ये तो दूसरी बात है कि धनुष बहुत भारी था, उठाईं कैसे। लेकिन उन्होंने कहा कि, शिव का धनुष है, तो मैं क्यों नहीं उठाऊँ, मैं साफ करूँगी, मैं उठाऊँगी। और दूसरा, जब राम और लक्ष्मण जब वन जाने लगे, तो कैसे उर्मिला नहीं गईं, कैसे सुमित्रा ने इस बात के लिए लक्ष्मण को मनाया, लेकिन सीता को कोई नहीं मना पाया। बहुत सारे सन्दर्भ कहे गए हैं, जिसमें सीता को प्रकृति के बारे में बहुत ज्ञान था, लेकिन दर्शन की भी वह बहुत बड़ी ज्ञाता थीं, और उन्होंने दर्शन के आधार पर राम से वाद-विवाद करके ये सिद्ध किया कि, नारी का स्थान पति से परे नहीं हो सकता है, खासकर अगर पति विपत्ति में हो तो। इसलिए वह भी एक ऐसी नारी थीं, जिन्होंने क्रान्तिकारी विचारों का आचरण करके अपने जीवन के आदर्शों का पालन किया।

सीता के विद्रोही विचारों की और भी झलक मिलती है, जब उन्होंने अपने देवर लक्षमण की खींची रेखा को भी भिक्षा देने हेतु पार किया, और लंका से हनुमान जी के साथ अकेले आने से इंकार कर दिया था। लेकिन इन विद्रोही कार्यों में भी उनके कर्तव्य पालन की ही छवि दिखती है। लक्षमण रेखा भी पार कर उन्होंने रघुकुल को किसी भिक्षुक को खाली हाथ लौटने के कलंक से बचाने, तथा पापी रावण को दंड दिलवाये बिना हनुमान जी के साथ लंका से वापस आने से इंकार किया था। 

अंत में सीता जी अयोध्या आने के पश्चात् निष्कासन की बात आती है, जिस पर लोग (विशेषतः महिलाएं) बहुत सारी आपत्तियाँ जाहिर करते हैं। वह घटना भी एक सन्दर्भ में ही समझी जा सकती है। भारत की परम्पराओं में खासकर के उस समय की परम्परा में जब राजा सिंहासन पर बैठता था, उसका राज्याभिषेक होता था, तो रानी का भी राज्याभिषेक होता था। सिर्फ राजा का राज्याभिषेक नहीं होता था, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि, रानी राजा से किसी तरह से कम हो सकती है। तो राम कौन होते हैं उनको निकालने वाले? अगर उनका भी राज्याभिषेक हुआ, तो ऐसा नहीं हो सकता है।

दूसरी बात यह है कि, उस समय राजतंत्र नहीं हुआ करता था, बल्कि प्रजातंत्र हुआ करता था। प्रजा का जो मूल रूप है, वह आज वाला प्रजातंत्र नहीं है, जिसको लोग कभी-कभी प्रजातंत्र कह देते हैं। प्रजा की एक सबसे बड़ी विशेषता है कि, प्रजा जो है वह आत्मनिर्भर होती है। वह किसी सरकार की नौकरी के चक्कर में नहीं होती, किसी सरकार से उसको कुछ नहीं चाहिए। जब वह आत्मनिर्भर होगी, तो जैसे अभी कुछ लोग गाँव से जुड़े होंगे, तो धोबी, नाई, कारपेंटर, कुम्हार, ये सारे लोग अभी भी नौकरी नहीं करते हैं, और ये अपने जीवन को स्वयं पालते हैं। उस समय राम के राज्य में किसी को नौकरी नहीं करनी पड़ती थी। सब लोग अपनी, जो भी उनके सृजनात्मक भाव थे, विचार थे, कुशलता थी, उन्हीं के आधार पर जीते थे। इसलिए वे पूरी तरह से स्वतंत्र थे, और राम इस बात को मानते थे कि, अगर स्वतंत्र व्यक्ति कुछ कहता है, तो उसे हमको मानना पड़ेगा।

राम की अपनी बात नहीं थी, बल्कि वो इस प्रणाली या व्यवस्था के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध थे। सीता जी भी कटिबद्ध थीं, क्योंकि दोनों का राज्याभिषेक हुआ था। धोबी आता है, तो धोबी प्रजा में आता है, और जो भी कहते हैं, जो भी ऐसी बातें होती हैं, सीता जी स्वयं इसका निर्णय लेकर वह जाती हैं जंगल में। अब लोग बोलेंगे कि, कैसे ये निर्णय लेकर जाएँगी जंगल में?

आज के युग में अगर आधुनिकता देखनी है, तो अगर मियाँ बीवी में कोई बातचीत हो जाती है, तो पहले तो माताजी के यहाँ फोन जाता है, मायके में, भाई को बुलाओ, बाप को बुलाओ इनको समझाएँ, नहीं तो पुलिस को बुलाओ। लोग कहेंगे कि, उस समय पुलिस नहीं थी, गुरु तो थे, गुरु के यहाँ जा सकतीं थीं। लेकिन वह गईं कहाँ? जंगल में। उनका बाप झोपड़ी में रहने वाला तो था नहीं। मान लीजिए नहीं बुलातीं, तो राजा था उनका बाप, मायके चली जातीं। लेकिन क्यों नहीं गईं? इससे लगता है कि उनका निर्णय उनका था। अगर उनको निकाला जाता तो ऐसा वो नहीं कर सकतीं थीं। अगर उनका निर्णय उनका था, तो उनके व्यवहार को देखना पड़ेगा। उन्होंने राम के प्रति नकारात्मक एक भी शब्द न तो कभी खुद कहा, न अपने बच्चों से कहने दिया? और अन्त में उनकी मुलाकात राम से होती है, तब राम की बात का विद्रोही भाव से उल्लंघन करते हुए धरती में समाती हैं, ये कह के समाती हैं कि, आगे कभी भी मेरा जन्म होगा, तो मैं आपको ही पति-रूप में पाना चाहती हूँ। आजकल के ज़माने में जहाँ डिवोर्स बहुत बढ़ता जा रहा है, ऐसी नारी जो इतनी यातनाओं के बाद भी अपने कुल की परम्पराओं के आधार पर अपने जीवन को कठोरता से भोगते हुए, अपने बच्चों का पालन करते हुए, मान मर्यादा से रहते हुए और इस संसार से जाती है, वह नारी रामराज्य लाने में, रामराज्य प्रकट करने में सहायक सिद्ध हो सकती है। 

इसलिए,

‘रघुकुल रीति सदा चलि आई, प्राण जाइ पर वचन न जाई।

जैसी कुलरीति को सीता ने पूरी तरह संजोकर अपने आचरण में, अपने चरित्र में प्रकट किया। इस प्रकार सीता का वैदेही नहीं, बल्कि ये विद्रोही भाव ही रामायण की जड़, आधार, एवं सम्पूरण है, और रामायण को सीतायण कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालाँकि इस बात के लिए सीता की सम्मति संभवतः नहीं होगी।

आज की महिलाएँ, आज की बहू, बेटियाँ, बहनें, माताएँ व् पत्नियां अगर क्रान्तिकारी नारीवादी बनना चाहती हैं, तो उनके सन्मुख दो सशक्त भारतीय विकल्प मौजूद हैं, एक सू-नारीवाद (सू -फेमिनिज्म), जिसमे शूर्पणखा वाला क्रान्तिकारी, बलिष्ठ, स्वच्छंद, और बराबरी का भाव-विचार व आचरण हैं, तथा दूसरा सी-नारीवाद (सी-फेमिनिज्म), जिसमें सीता वाला विद्रोही, कर्तव्यनिष्ठ, परम्परावादी, व धार्मिक भाव-विचार व आचरण हैं।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA and Fellow, Jawaharlal Nehru Institute of Advanced Study, JNU, Delhi, India

Women Shaping the World as ‘Mothers’

Mrs. Rati Hegde

One of the most beautiful roles that a woman can play in her life is that of a Mother. It is said that “the hand that rocks the cradle rules the world”. What is it about motherhood that is so appealing? Is it just about carrying a life within one, nourishing it for 9 months within and then bringing forth life into the world? Or is it about shaping a personality and then giving the civilization a mature individual who can shape other lives in this world? Or is it about prayers and sacrifices which a woman undertakes to give her child the best in this world? In a way, I guess we all feel that motherhood is a little of all this and more.

In the Mārkandeya Purana, we read about the story of Rānī Madalasa, who was the wife of Rājā Ritdhwaja. When she was carrying her first three children and while bringing them up she sang to them verses which illumined the children about the true nature of their Atman. On growing up, the children went on to do Tapasyā and became realized souls. The Rājā worried about the future of his Prajā and he requested Madalasa to give thought to them too. When she became pregnant with the fourth child, Madalasa sang songs of valour so that he would imbibe the qualities of a great warrior and enable him to protect his kingdom and make it prosperous. She also taught him to look at other women as his mother, to care for his subjects and become established in Dharma and Viveka Buddhi. This boy, Alarka, grew up to be a righteous king and a mighty warrior.

In the Māhābhārata, we come across the story of Yayati and his wives Devyani and Sharmishtha. Sharmishtha sacrificed every pleasure known to her as a youngster, to satisfy her father’s Guru Shukracharya’s daughter, Devyani. Her son was Puru who was the youngest son of Rājā Yayati. When Yayati wanted to continue with enjoying the pleasures of life despite his nearing old age, he was told that if any of his sons would exchange his youth for his father’s old age, Yayati could enjoy many more years of youth. It was only Sharmishtha’s son Puru who intrinsically understood the futile search to satisfy physical and materialistic pleasures of life. He offered to take his father’s old age in return for his youth. After many years Yayati came to the realisation that physical pleasures could never be completely satiated and that the search for uniting the Atman with the Brahmn was the only search worth aiming for. He gave back his youth and the entire kingdom to Puru and blessed him. Puru went on to rule justly for thousands of years.

In the Māhābhārata, we also come across the story of a mother who fell asleep. This normal action of hers caused the loss of her very valiant son’s life. Yes, I’m referring to Subhadra and Abhimanyu.  Abhimanyu learnt about entering the Chakravyuha because he as an unborn baby, paid attention to his uncle Sri Krishna telling Subhadra about the interesting formation of the Chakravyuha. But when Subhadra fell asleep, Sri Krishna did not continue with the secret of coming out of the Chakravyuha because of which Abhimanyu never learnt about it. In the war, he managed to break through the formation and cause great havoc but was not able to come out of it alive. This story is generally used to warn mothers that whenever Mothers are not alert, it spells disaster to their progeny.

Our scriptures also talk about a child who learnt all about the Mantras, the Vedas and other texts while in the womb itself, so well that he could correct his father when he made a mistake. The father was Kahoda and the child was Ashtavakra. Ashtavakra learnt all the Vedas in the womb of his mother Sujata who was the daughter of Rishi Uddalaka. Sujata used to be seated near the place where her father Uddalaka taught everyday and her son learnt the scriptures before he was born. Though he got a curse from his father Kahoda for correcting him, Ashtavakra forgave him because he was a realized soul.

The best example of learning about devotion to Bhagawan comes from the story of Bhakta Prahlada. His mother Kayadhu stayed at the Ashrama of Narada Muni during her pregnancy and she kept listening to the various leelas of MahaVishnu from him. As her devotion to MahaVishnu grew, so did Prahalada’s. In fact his devotion was so unshakable that even when repeatedly threatened with death by his father, Bhakta Prahlada remained rooted in his faith in Bhagawan.

One may have a doubt in one’s mind that the above tales are of those mothers who do not feature in modern history, so maybe they are just tales and not completely believable. The truth is that even in reasonably modern history we see the repeat of these tales in our lives. Meerabai, the great devotee of Sri Krishna was introduced to Him by her mother. Chhattrapati Shivaji Maharaj became an epitome of bravery and warrior of Dharma because of his mother Jijabai. Adi Shankaracharya was born a realized soul because of the penance of his mother Aryaamba. It is said that Rahul Dev Barman, the famous music director of Hindi films, could understand ‘sur-taal’ even as an infant and hence he was given the nickname Pancham.

Indeed, a mother has in her, the capacity to shape the world through her offspring. It is one of the most elevated roles of a human life because mothers can bring forth a race of humane, wise and caring people if they set their minds to it. The only condition is that they have to align themselves to the positive vibrations that surround us and mold their thoughts to merge with that of a higher self. Human beings feel complete only when they are emotionally and spiritually satisfied. Mothers can play an important role in this by not just caring for the physical self while pregnant and while bringing up their child, but also fill their entire being with good thoughts and devotion to the Supreme One.

Becoming a Mother is important but more important is becoming a channel for good, kind and wise souls to enter our earth.

“Mātrudevo Bhava”.

Mrs. Rati Hegde, columnist and author