करुणामयी कोरोना

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

है तेरी करुणा कोरोना,   

याद मुद्दत आ गई। 

याद आयी अब वो शिरकत,     

आ नहीं, वो छा गई॥

करने का आदाब झुककर,     

बन अकल की ताज़गी। 

हाथ जोड़ प्रणाम हो या,     

हो सलाम की बंदगी॥

कर नमस्ते जोड़ कर को,   

दसेंद्रिय करबद्ध कर। 

पंचभूत शरीर को,   

तुझसे कोरोना जोड़कर॥

बुर्के की क़ीमत जगी अब,     

कोरोना की आड़ में। 

पर्दा घूँघट नए फ़ैशन,     

कोरोना तेरी बाढ़ में॥

आ तुझे इंसान की,     

फ़ितरत दिखाना है मुझे। 

किस तरह इस जन्तु भक्षी,     

को बचाना है तुझे॥

ब्रह्म की सृष्टी के,     

पाठों को पढ़ाना है तुझे। 

है तेरी करुणा कोरोना,     

जग जगाना है मुझे॥

आदि सृष्टी का है तू,     

मानव है उसका अंत अभी।

तुझसे है ये सीखना,     

कैसे रहें मिलकर सभी॥

बीते अरबों बरस से,     

सर्वत्र तू विद्यमान है।

क्या-क्या सीखा पथिक बन?       

उत्सुक हमारे कान हैं॥

ना कोई तेरी झोपड़ी,

ना आलीशान मकान है।

कैसे तू विकसित हुआ?     

उत्सुक हमारे कान हैं ॥

क्या किसी पद पर चढ़ा तू,     

या कला तेरी शान है?

किस तरह तू सतत हुआ?

उत्सुक हमारे कान हैं॥

है सुना तू है बदलता,     

बस यही तेरी जान है। 

सीखें तुम्हारी ये कला,     

उत्सुक हमारे कान हैं॥

पर सुन, कहीं मुल्ला मौलवी,     

पादरी पंडित मिलें। 

उनको पहले तू सिखाना,

होंगी कम मेरी मुश्किलें॥

फिर तु करुणा कर कोरोना,

मिलना शासक वर्ग से। 

इनकी आदत बाँटने की, 

तू जोड़ उन्हें विसर्ग से॥

कुछ और भी हैं बुद्धिशील, 

कहते स्वयं महान हैं। 

कैसे प्रवेश तू कर वहाँ? 

उत्सुक हमारे कान हैं॥

कहते तु छोटों से भी छोटा,     

निरीह नधम किटानु है। 

फिर भी इतनी ज्ञान शक्ति,     

उत्सुक हमारे कान हैं॥

(From left – Prof. Singh with his colleagues in his lab )

हम भी शायद सीख लें,     

कितने तेरे समाधान हैं।

हो तेरी करुणा कोरोना ,     

उत्सुक हमारे कान हैं।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA