Sūrya Namaskār Ᾱsana (Controversy over Sūrya or God?)

Sh. Vidya Sagar Verma

Declaring International Day for Yoga is a great tribute to the seers and sages of India who propounded the Yoga Discipline.

The literal meaning of the word ‘Yoga’ is union. Union of what? Answer to this question has been given by renowned commentator on Yoga Darśana Yajñyavalkya: Samyogo Yoga Ity Ukto Jivātma-Paramātmanoriti, i.e., Yoga is the union of Soul and God. There is a divine spark in all of us and that, because of ignorance, we are not aware of it and, hence, the advice is to know ourselves. And that can be done only through Yoga. God being present everywhere is present in our souls too and can be discerned there directly.

Thus, Yoga and its purpose defined by many seers, scholars, philosophers-

Gita offers a secular definition of Yoga, viz.,

योग: कर्मसु कौशलम्

Yogah Karmasu Kaushalam

i.e., Yoga is perfection in action. By controlling the thought currents of one’s mind, one attains deep concentration on any subject matter and, thereby, attains complete knowledge of the matter pondered over.

Sage Patanjali in his Yoga-Sūtra said :

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः 

Yogah Chitta Vritti Nirodhah

i.e controlling the modifications / thought currents of mind is Yoga. It is a holistic system having both physical and psychological traits.

Rudolf Steiner has also said “Meditation is the way to knowing and beholding the eternal, indestructible, essential centre of our being” (https://timesofindia.indiatimes.com/edit-page/Dissolve-thoughts/articleshow/347676.cms).

Philosopher Allie M. Frazier has also defined Yoga: 

The purpose of Yoga is to unite man with the Divine Ground, with the Cosmic Consciousness. Yoga is the psychological linking of the mind to the super-ordinated principle ‘by which the mind knows’. 

Every human being possesses three things – Body, Mind and Soul (Spirit). Yoga aims at the composite development of human personality — physical, mental and spiritual. The Vedas and the Upaniśads advise ‘Ᾱtmānam Vidhi’, i.e., Know Thyself.

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)

To know oneself, one has to concentrate deeper inside. Performing Yoga-Ᾱsanas is not just a way to physical fitness but also helps in deliberating deeper essence of his/her body. Out of 84 Ᾱsanas of Hatha-Yoga, two are very prominent and effective — Shirṣa-Ᾱsana and Sūrya-Namaskār Ᾱsana.

The Sūrya Namaskār Ᾱsana energises the whole body, it wards off many diseases related to the spine, stomach, thyroid gland, arthritis, et al. It is, therefore, recommended that this Ᾱsana must be learnt and performed by all the practitioners of Yoga.

It is unfortunate that the Yoga Capsule devised by the Ministry of Ayush for the International Day of Yoga Celebrations, Sūrya Namaskār Ᾱsana has been excluded, whereas, in many countries, it forms a prominent part of the Yoga Demonstration on this day celebrated by almost all the countries in the world.  

The word ‘Sūrya’ in the Sūrya Namsakar does not mean Sun, but God.

सूर्यो वै सर्वे देवा:।

(शतपथ ब्राह्मण १३.७.१.५)

In the Vedas Indra, Varun, Sūrya, et al, are all the names of God and he (Sun) is worthy of being bowed to by all. Brāhmaṇas of Yajurveda narrated various references where Sūrya is said to be ‘द्वादश’.

आदित्यो  द्वादश:।

(तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.३.४; शतपथ ब्राह्मण ११.६.३.५)

विष्णुर्धाता भग: पूषा मित्रेन्द्रौ वरुणोऽर्यमा….॥

सूर्य (आदित्य) के बारह नाम – विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा, और पर्जन्य।

(ब्रह्मपुराण ३१.१७-१८)

To avoid the controversy over Sūrya Namaskār Ᾱsana, a humble suggestion is that it be renamed as Iśa Namaskār Ᾱsana as Sūrya here means God.

Prof. Max Muller’s following words in ‘India: What Can It Teach Us’ are worthy of attention: 

“They were all meant to express the Beyond, the Invisible behind the Visible, the Infinite within the Finite, the Supernatural above the Natural, the Divine, Omnipresent, Omnipotent.”

It is not only the Vedas, but many religions, philosophers and scholars declare God as the Soul of the Universe: 

All are but parts of (the Universe is) one stupendous Whole

Whose Body Nature is, and God the Soul.

— Alexander Pope (https://www.bartleby.com/360/4/13.html)

Sh. Vidya Sagar Verma, Former Ambassador

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प्राणसाधना क्यों और कैसे?

डा. राजकुमारी त्रिखा

२१ जुन, २०१५ को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संकल्पित “अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस” ने न केवल भारत में अपितु विश्वभर में ख्याति प्राप्त की। वस्तुत: योग विद्या हमारे पूर्वजों की अत्यन्त प्राचीन और अनमोल विरासत है। आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा डाक्टरों ने योगसाधना से होने वाले अनेक शारीरिक और मानसिक लाभों को प्रमाणित किया है। उन्होंने सूर्य नमस्कार और अन्य सूक्ष्म व्यायामों के प्रभाव का योगक्रियाओं के प्रभाव के साथ तुलना की, और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि योग के प्रभाव अन्य व्यायामों की अपेक्षा अनेक गुणा अधिक, उत्तम गुणवत्ता वाले और व्यापक रहे। शास्त्रों में तो स्पष्ट उद्घोष किया है – नास्ति योगसमं बलम्। प्राचीन और गुरुपरम्परा से मिलने वाली इस योग-विद्या का प्रचलन धीरे-धीरे इसके जिज्ञासु और साधकों की उत्साहहीनता के कारण कम होने लगा। समय के साथ-साथ मनुष्यों की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्षीण होने लगी। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे यह विद्या लुप्त होती गई । इस विद्या के जानकारों की यह भी मान्यता रही कि विद्या अपात्र व्यक्ति के पास न पहुँच  जाए तथा उसका दुरुपयोग न हो, इस कारण भी हमारे ऋषियों ने इस विद्या को वेद मंत्रों में संकेतों के माध्यम से सुरक्षित रखा। यह विद्या अत्यंत गोपनीय है और अनेक प्रकार से मानव कल्याण करने वाली है।

प्रायः आसन और प्राणायाम को ही योग समझ लिया जाता है परंतु योग के आठ अंग है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि। आसन तो योग का केवल मात्र एक ही अंग है। आसन के अन्तर्गत स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी क्रियायें आती हैं, अतः आसन बहुत लोकप्रिय हुए। प्राणायाम भी अत्यंत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी क्रिया है, जिसका उपदेश योग ग्रंथों में बहुत विस्तार से है। प्राणों की शक्ति को सभी जानते हैं। जब तक शरीर में प्राण हैं तभी तक व्यक्ति जीवित रहता है। हमारे ऋषियों ने बहुत सावधानी से प्राण की गतिविधियों को देखा और मनन किया। अतः प्राण-साधना को जानना परमावश्यक है।

ऋषियों ने शरीर में पंचप्राणों, उनके कार्यों और स्थानों का भी अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि शरीर में पाँच प्राण और पाँच उपप्राण होते हैं। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान – यह पांच प्राण हैं तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, और धनंजय उप प्राण हैं।  इन मुख्य पांच प्राणों में भी प्राण मुख्य है। इसका स्थान हृदय में बताया है। अपान वायु का स्थान गुदा में, समान वायु का नाभि में, उदान का कण्ठ और उसके ऊपरी भाग में स्थान है। व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है।

हृदि प्राणो स्थितो नित्यमपानो गुदमण्डले।

समानो नाभिदेशे तु, उदानो कंठमध्यगः।।

व्यानो व्याप्य शरीरे तु , प्रधानाः पंचवायवः।

(घेरण्ड संहिता ५.५९-६०)

शरीर में इन प्राणों और  उपप्राणों का कार्य भी अलग अलग है। प्राण शरीर में शक्ति प्रदान करता है, अपान वायु  शरीर से अशुद्धि निकाल कर बाहर कर देता है। समान वायु खाए हुए भोजन को पचाता है । उदान वायु कंठ के ऊपर के भाग में संचार करता है। व्यान वायु पूरे शरीर में विचरण करता है। नासिका द्वारा ली जाने वाली वायु जीवन दायिनी होती है। यह शरीर के अंदर जाकर आन्तरिक अशुद्धियों, रोगाणुओं और कफ, वात, पित्त (त्रिदोष) के मल दूर करती हुई उनको प्रश्वास के साथ बाहर फेंक देती है। जब तक शरीर में प्राण वायु समुचित रूप से गतिशील रहती है, तभी तक शरीर स्वस्थ रहता है। यही कारण है कि केवल प्राण का ही विस्तार किया जाता है, अर्थात् प्राणों का ही आयाम किया जाता है, अपानवायु आदि अन्य वायुओं का नहीं। विधिपूर्वक किया गया प्राणायाम अनेक रोगों को दूर करता है।

(Source of Image : https://arlivenews.com/in-udaipur-final-rehearsal-of-yog-one-day-before-of-international-yog-day/ )

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।।

(मनुस्मृति १.७१-७२)

अर्थात् जिस प्रकार लोहार की धौंकनी से तेजी से जलती हुई आग में सोना आदि धातुओं के मल जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणों के नियन्त्रण से सभी इन्द्रियों के दोष, मल, और अशुद्धियाँ जल जाती हैं। योग साहित्य और एलोपैथिक डाक्टर भी प्राणायाम की रोगनिवारक शक्ति को स्वीकार करते हैं। अस्थमा के रोगियों के एक समूह पर प्राणायाम के प्रभाव का अध्ययन किया गया। प्राणायाम के पहले उनके कुछ रक्त तथा श्वास संबंधी परीक्षण किए गए और प्राणायाम के कोर्स की अवधि के बाद पुनः रक्त और श्वास के वही परीक्षण  दोबारा किये गये। साधकों के परीक्षणों में सकारात्मक परिवर्तन मिले। साधकों का हीमोग्लोबिन, रेड ब्लड सेल्स तथा लिंफोसाइट काउंट्स बढ़े हुए मिले जबकि व्हाइट ब्लड सेल्स, पॉलीमर्स,  इस्नोफिल्स और मोनोसाइट्स कम हो गए। यह रक्त के बदलाव अस्थमा की तीव्रता कम होने के सूचक हैं। सबसे महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक उपलब्धि तो यह रही कि उपचार की अवधि में रोगियों को अस्थमा का दौरा ही नहीं पड़ा। उनके फेफड़ों की शक्ति बढ़ गई जिससे वे अधिक वायु को श्वास के द्वारा शरीर में खींच सके और अधिक समय तक उस वायु को भीतर रोकने में समर्थ भी हुए। इससे उनका श्वास का एंप्लीट्यूड और होल्डिंग टाइम बढ़ गया। यह सभी परीक्षण डॉ के. एन. उडुप ने किए और प्राणायाम के लाभों को स्वीकार किया {“Stress and it’s management by yoga”, Dr. K. N. Udupa, Delhi, 1985 and K.N.Udupa, R.H. Singh, R.M. Settiwar, and M.B.Singh. “Physiological and biochemical changes, following the practice of some yogic and non-yogic exercises,” Journal of Research in Indian medicine, 10(2)}। प्राणायाम की इस रोग निवारक शक्ति  का संकेत हमें ऋग्वेद के दशम मंडल के १३७ वें सूक्त के प्रथम और द्वितीय मंत्र में मिलते हैं, जहां प्राण को विश्वभेषज और बल दायक बताते हुए शरीर के रोगों और मलों को दूर करने वाला कहा है।

प्राण साधना कैसे करें

प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं और अनेक विधियों से किया जाता है। रोगी की शारीरिक शक्ति और रोग की अवस्था को देख कर उसके अनुसार ही प्राणायाम का चुनाव करना चाहिए। किसी अनुभवी, स्वयं साधना करने वाले, कुशल और सज्जन स्वभाव वाले योग शिक्षक की देखरेख में उचित प्राणायाम का ज्ञान प्राप्त कर अभ्यास करना चाहिए जो पालन करने योग्य नियम भी बताएगा और सावधानियों की शिक्षा भी देगा। कुछ प्राणायाम विशेष रोगों में ही लाभकारी होते हैं जैसे शीतली और सीत्कारी प्राणायाम, जो उच्च रक्तचाप,  एसिडिटी तथा गर्मी से उत्पन्न रोगों में लाभदायक होता है परंतु निम्न रक्तचाप तथा कफ के रोगियों के लिए यह प्राणायाम हानिकारक है। इसी प्रकार श्वास को भीतर रोककर कुम्भक सहित किए जाने वाले प्राणायाम हृदय और स्ट्रोक के रोगियों के लिए हानिकारक होते हैं। सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति को नाड़ी शोधन/ अनुलोम विलोम प्राणायाम करना स्वास्थ्यवर्धक और अनुकूल रहता है। श्वास को भीतर रोके बिना बाईं नासिका से श्वास लेकर दाहिनी नासिका से निकालना और फिर दाहिनी नासिका से लेकर बाईं नासिका से निकालना नाड़ी शोधन प्राणायाम है। इसका कारण है कि बाईं नासिका में चंद्र स्वर चलता है जो ठंडा होता है और यही जीवनदायक है। दाहिनी नासिका से निकलने वाली वायु गर्म होती है, क्योंकि यह शरीर के सभी दोषों को लेकर बाहर निकलती है। अतः शरीर में पहले स्वास्थ्यवर्धक प्राणवायु को  श्वास से भीतर खींचना चाहिए और दाहिनी नासिका से सभी मलों को बाहर फेंकना चाहिए। श्वास लेते समय यही विचार करना चाहिए कि  प्रकृति से शक्तिदायक वायु के साथ मेरे शरीर में शक्ति प्रवेश कर रही है। बाहर श्वास फेंकते हुए यह विचार करें की मेरे शरीर के सभी रोगों के कीटाणु और शरीर के सभी मल श्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। इस प्रकार प्राणायाम द्वारा सकरात्मक विचारधारा से शरीर के साथ-साथ मानसिक बल में भी वृद्धि होती है।

प्राणायाम का मूल तत्व है गहरा श्वास लेना, इतना गहरा की नाभि तक हिलने लगे। इससे श्वास से भीतर ली गई वायु की गुदा स्थित अपान वायु से टक्कर होती है। तब अपान वायु प्राण को नीचे अपनी ओर खींचती है, और प्राणवायु अपान वायु को ऊपर अपनी ओर खींचती है। प्राण अपान का यह घर्षण से नाभि स्थित जठराग्नि तेज होती है और रोगों के कारणभूत कफ, वात, और पित्त के कुपित अंश को जला कर शरीर को रोग मुक्त कर देती है।

प्राणायाम के नियम

प्राणायाम के लिए कुछ पालनीय नियम हैं , जिनका पालन करने से प्राणायाम का पूर्ण लाभ मिलता है।

1. प्राणायाम के ३ घंटे पहले कुछ ना खाया हो और पानी आधा घंटा पहले पी सकते हैं।

2. प्राणायाम के पश्चात् स्नान लगभग १ घंटे के बाद करें। पानी आधे घंटे बाद पी सकते हैं परंतु भोजन एक से डेढ़ घंटे के बाद ही करें।

3. प्राणायाम का साधक उचित समय पर सोए और उचित समय पर जागे। वह स्वास्थ्यवर्धक और सीमित मात्रा में ऋतु अनुकूल भोजन करें। तभी प्राणायाम का पूरा लाभ मिलता है।

प्राणसाधना के लाभ

प्राणायाम से अद्भुत लाभ होते हैं- मन की एकाग्रता बढ़ती है (जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बहुत बढ़ जाती है, एकाग्र मन से किया हुआ कार्य भी श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला होता है),  मन का तनाव भी बहुत कम हो जाता है (परिणाम स्वरूप तनाव से उत्पन्न होने वाले मनोदैहिक रोगों में बहुत लाभ होता है), मन में शान्ति रहती है, काम, क्रोध, ईर्ष्या आदि के नकारात्मक भाव धीरे धीरे कम होते जाते हैं (काम, क्रोध, लोभ आदि ही अनेक सामाजिक, आर्थिक, यौन अपराधों के मूल कारण होते हैं), भावनाएँ शुद्ध होती हैं जिससे व्यक्ति समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखने में सार्थक भूमिका निभाता है। प्राणायाम से इन लौकिक लाभों के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टि से भी  बहुत लाभ होता है। शरीर की अशुद्धियां नष्ट हो जाने पर प्रकाश स्वरूप आत्मा के ऊपर से अज्ञान अंधकार का आवरण हट जाता है। तब साधक को आत्मसाक्षात्कार होता है। यह आध्यात्मिक लाभ मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।

 (पतंजलि योगसूत्र २.५२)

यदि इस जीवन में आत्म स्वरूप को पहचान लिया तो बहुत उत्तम है, जीवन सफल है, और यदि न जान पाए तो बहुत बड़ी हानि है क्योंकि मानव जीवन का यही प्रथम लक्ष्य है कि वह आत्म-दर्शन का प्रयास करता रहे।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

(केनोपनिषद् २.५)

अयन्तु परमो धर्मः यद्योगेनात्मदर्शनम्।

(याज्ञवल्क्य स्मृति ८)

आशा है कि इस योग दिवस योग के इन सार्वभौमिक सकारात्मक परिणामों को स्वीकार करते हुए तथा प्रेरित होकर प्रबुद्ध जिज्ञासु प्राणायाम साधना में रुचि लेंगे।

डा. राजकुमारी त्रिखा, पूर्व अध्यापिका, संस्कृत, मैत्रेयी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

योग का तत्कालीन क्रियात्मक बोध

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

योग: सत्तस्य पर्याय: तस्य सार्थकेव मानव जीवनस्य लक्ष्य:।

योग सत्य का पर्याय है, उसी को सार्थक बनाना जीवन का उद्देश्य है।

वैसे तो सत्य एक सरल सी धारणा है पर अधिकतर व्यक्तियों को इसका बोध नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण है कि व्यक्ति कुछ विशेष वस्तुओं, स्थानों, लोगों, अथवा बातों से ही जुड़ता है और उसी को मानक बनाकर अपना दृष्टिकोण निर्धारित कर लेता है।

जैसे कि वस्तुतः व्यक्ति परिवार से या माँ से जुड़ता है और उसे प्रेम करता है। यदि उस माँ के प्रेम को सीमित न करके उसे प्रेम के अभ्यास की प्रक्रिया मान ले तो उसी प्रेम भाव को औरों के साथ जोड़ सकता है। तभी माँ के प्रेम की सार्थकता हो सकती है ठीक उसी तरह जैसे कि स्कूल में गणित सीख कर हम उसका जीवन के अन्य पहलुओं में उपयोग करते हैं।

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इस अवधारणा को प्रथम स्तर पर हम योग अभ्यास से समझ सकते हैं। स्थूल रूप से आसन एवं मुद्राएँ हमारे मन को शरीर के उन भागों पर केंद्रित करते हैं जहाँ आसन के कारण ज़ोर पड़ता है। इसका अभ्यास करते-करते हम अपने मन को इस तरह अपने वश में कर पाने में ऐसे सफल हो जाते हैं कि आसन के बिना भी अँगो और प्रत्यंगो पर ध्यान दे लेते हैं। यही प्रक्रिया हमें जुड़ने की वास्तविक विद्या प्रदान करती है। इस विद्या को ही सूक्ष्म रूप में प्राणायाम के द्वारा शरीर के उन कोशिकाओं और अणुओं परमाणुओं तक जोड़ा जा सकता है जो की हमारी ज्ञानेंद्रियों से परे होते हैं। यही शारीरिक आसन और प्राणायाम के अभ्यास हमें हर किसी से जुड़ने की योग विधि बताते हैं।

उपर्युक्त अभ्यास से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके उपयोग से जब हम संसार में बिना किसी भेद भाव (प्रत्याहार अभ्यास के अंतर्गत) समस्त प्राणियों से जुड़ते हैं तभी उनके जीवन सत्यार्थ से परिचित हो पाते हैं।

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(Source of Image : Prof. Singh with his younger daughter)

अथ योग: सत्यार्थ परिचायक:। ॐ!!

गीता में योग की व्याख्या

डॉ. श्यामदेवमिश्र

(continued from previous article)

योग की गीता में व्याख्या से मन में शंका उठती है कि प्रभु ने योग की कई परिभाषाएं दे डालीं जिससे योग के स्वरुप को समझना सामान्य जिज्ञासु के लिए कठिन हो गया है। पहले सिद्धि और असिद्धि की समता को योग कहा; फिर कर्म की कुशलता को योग कहा और आगे दु:ख के संयोग के वियोग को भी योग कहा। किन्तु विचार करने पर यह शंका निर्मूल सिद्ध होती है। प्रभु ने योग के अनेक लक्षण नहीं बताए हैं अपितु एक ही लक्षण को अनेक प्रकार से समझाया है। वास्तव में फल की आशा छोड़कर कर्त्तव्य बुद्धि से कर्म करते रहना ही कर्मयोग है। उस फल की आशा को छोड़ने के अलग-अलग विवरण हैं। फल की आशा छोड़ देने पर सिद्धि और असिद्धि में समानता हो जायेगी। फल की आशा से ही कर्म-सिद्ध होने पर सुख और असिद्ध होने पर दुःख हुआ करता है; फलाशा न रहने पर न सुख होगा न दुःख। तब सिद्धि और असिद्धि में समता हो गयी। यही योग है। इसी प्रकार समानता रखकर कर्म करते जाने से आत्मा पर कर्म का कोई प्रभाव नहीं आता इसलिए यह अर्थात् योग एक बड़ा कौशल या चतुरता भी हुई। यहाँ फलाशा के त्याग को ही ‘कौशल’ शब्द से प्रकट किया है क्योंकि फलाशा-त्याग न करने के स्थिति में फलाशा पूर्ण न होने पर दु:ख हुआ करता है। फलाशा छोड़ देने पर दु:ख का भी प्रसंग नहीं रहेगा। अत: दु:ख संयोग-वियोगरूप लक्षण में भी वही बात प्रकारांतर से कही जाएगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही विषय को भिन्न-भिन्न शब्दों से भिन्न-भिन्न अर्थों में समझाया गया है। ‘योग’ शब्द का अर्थ कर्म-योग मान लेने पर सभी लक्षणों की सङ्गति उक्त प्रकार से हो जाती है।

यहाँ एक और प्रश्न उठता है जिसका समाधान अत्यावश्यक है कि फलाशा-त्याग अर्थात् फल की आशा को छोड़ देने से क्या अभिप्राय है?

फल की आशा छोड़ने से तात्पर्य है कि फल के प्रति चिंता ही न करे। इसके दो कारण हैं –  पहला कि फल के बारे में सोचने पर कर्म दुष्प्रभावित या विकृत होगा। दूसरा केवल कर्म के प्रति मनुष्य का अधिकार है यानी केवल कर्म करना ही उसके वश में है; फल के प्रति मनुष्य का अधिकार अर्थात् वश ही नहीं है। यानी फल क्या मिलेगा? कितना मिलेगा? कब मिलेगा? इत्यादि मनुष्य के अधिकार-क्षेत्र के बाहर की बात है। अत: अधिकार-क्षेत्र से बाहर के विषय में चिन्तना करना ही व्यर्थ है। इसीलिये प्रभु ने कहा है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि अनधिकार होने के कारण यदि मनुष्य फल की इच्छा का त्याग कर देवे यानी उसके बारे में सोचे ही नहीं तब फिर कर्म करने का प्रयोजन क्या रहा? और बिना प्रयोजन के मनुष्य कर्म ही क्यूँ करे?

इसका समाधान यह है कि प्रयोजन दो प्रकार का समझा जा सकता है – १. क्षणिक या ऐहिक और २. आत्यन्तिक या पारलौकिक । क्षणिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख की अवधि निश्चित हो; यानी जिसमें फल के उपभोग की समाप्ति अर्थात् वियोग-रूपी दु:ख भी मिलना तय है। क्षणिक प्रयोजन के ही तीन अवान्तर रूप हैं – धर्म, अर्थ और काम ये तीन पुरुषार्थ। किन्तु उत्कृष्टतम कर्म से प्राप्त ब्रह्मलोकरूपी फल के भी भोग के पश्चात् पुन: मनुष्य जीवन-मृत्यु-चक्र में फँसता है। भगवान् ने स्वयं ही कहा है – आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन (गीता )

किन्तु आत्यन्तिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख का अन्त ही नहीं है अर्थात् जिसमें लेश-मात्र भी दु:ख नहीं है। यही कारण है कि इसे परमप्रयोजन या परमपुरुषार्थ मोक्ष कहा है।

अब यह मनुष्य पर है कि वह किस प्रयोजन का चयन करता है। मनुष्य, जो कि लेश-मात्र भी दुखाकाङ्क्षी नहीं है, वह ‘दुःख हो ही न’ ऐसा प्रबंध क्यों न करे? वही आत्यन्तिक-प्रयोजन अर्थात् मोक्ष है जो केवल पूर्वोक्त योग यानि कर्मयोग  से ही संभव है।

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(Source of image : http://www.navhindu.com/bhagwad-gita-chapter-3/)

इस प्रकार जो कर्म, मनुष्य को स्वभाव से ही बांधने वाले हैं, वे ही मुक्ति देने वाले हो जाएं – यही वस्तुत: कर्मों में कुशलता है। कर्म करने की ऐसी ही चतुरता को योग कहते हैं कि मनुष्य कर्म करता भी जाए और उसके बंधन में भी न फंसे। काजल की कोठारी में जाकर बिना कालिख लगाए निकल आना ही बड़ी भारी चतुरता है। ऐसी ही कुशलता योग से प्राप्त होती है कि कर्म करता भी जाए और उसका फल भी अपने पर आने न दे।

इस प्रकार देखा जाए तो योग: कर्मसु कौशलम् योग की परिभाषा से बढ़कर उसकी महिमा का उद्घोष है।

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

 

योग: कर्मसु कौशलम्

[It was broadcasted by International Broadcast service, All India Radio, New Delhi in 2016 on the occasion of International Yog Day]

डॉ. श्यामदेवमिश्र

‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृतेतस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है। योग के इस हेतु को स्पष्टतया जानने के लिये, सबसे पहले यह समझना परमावश्यक है कि ‘योग क्या है’? या ‘योग किसे कहते हैं’?

httpwww.boisetemple.orgbhakti-yoga

(Source of Image: http://www.boisetemple.org/bhakti-yoga/)

गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – समत्वं योग उच्यते(२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – पश्य मे योगमैश्वर्यम्(९/५); और ३ समाधि; जैसे – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया(६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“समत्वं योग उच्यते”(गीता २/४८)

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

‘योग: कर्मसु कौशलम्’  के दो अर्थ लिये जा सकते हैं –

1. कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।

२. कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।

यदि हम पहला अर्थ लें यानि कर्मों में कुशलता ही योग है तो, जो बड़ी ही कुशलता से सावधानी से ठगी, चोरी या फिर हत्या आदि कर्म करता है उसका कर्म भी ‘योग’ हो जाएगा! किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और फिर श्लोक में निषिद्ध कर्मों का प्रसंग भी नहीं है। अगर हम यहाँ ‘कर्म’ शब्द से केवल शुभ कर्मों का ही ग्रहण करें तब फिर ‘कर्मसु कौशलम् योग:’ इस पद के दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में भावार्थ निकलेंगे जो प्रसंग-विशेष में तो ठीक प्रतीत होते हैं किन्तु गीता में प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग के सिद्धांतों से इतर सिद्ध होते हैं। आइए उन दोनों पर ही गौर करते हैं –

शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

अब यहाँ प्रश्न यह है कि उक्त दोनों ही भावार्थ, गीता में प्रतिपादित योग की संकल्पना से किस प्रकार भिन्न हैं? इसको समझने के लिए योग की परिभाषा को समझना होगा, जिसमें कहा है  –

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है। इस श्लोक की व्याख्या में कई विद्वानों ने योग का अर्थ परमात्मा से सम्बन्ध माना है यानी परमात्मा से सम्बन्ध रखते हुए कर्म करो अर्थात जो कुछ करो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से करो और कर्मों को परमात्मा को ही अर्पण कर दिया करो।

योग या कर्मयोग के पूर्वोक्त स्वरूप के आलोक में अब हम पुन: योग: कर्मसु कौशलम् के उन पूर्वोक्त भावार्थों पर विचार करते हैं। अगर यहाँ शुभ-कर्मों को ही कुशलतापूर्वक करने का नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये हुए शुभ-कर्मों के फल से बंध जाएगा। कहा भी है– फले सक्तो निबध्यते; अत: उसकी स्थिति समता में नहीं रहेगी और उसके दुखों का नाश नहीं होगा। फलत: प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग की संगति इस अर्थ में नहीं बैठेगी।

यहाँ एक जिज्ञासा है कि शुभ कर्मों को करने के बाद भी मनुष्य दु:ख क्यूँ पाएगा? इसका समाधान यह है कि कितना भी शुभ कर्म-करने वाला क्यूँ न हो किन्तु मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं अथवा सब कुछ सर्वदा ही उसके मनोनुकूल नहीं होता; जो कि अंतत: उसे दुःख ही पहुঁचाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर सत्यवादी हरिश्चंद्र, जो कि स्वप्न में भी अशुभ कर्मों से दूर रहे, उन्हें अत्यंत कष्ट क्यों झेलना पड़ता!

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति कैसे हो? इसका उत्तर है – जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति अर्थात् मोक्ष होने पर। ये कब होगा? उत्तर है – कर्मफलों के संपूर्ण भुक्त हो जाने पर। फिर शंका हुई कि जब तक जीवन है तब तक न तो कर्म करना कभी समाप्त होगा और न ही उसके फल का भोग और बिना फल भोगे तो कृत-कर्म की समाप्ति भी नहीं होगी; कहा है –नाभुक्तं क्षीयते कर्म। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म से फल की उत्पत्ति एवं फल-भोगार्थ पुन: कर्म; इस प्रकार से तो यह अनवरत चलने वाला क्रम बन गया। दूसरे शब्दों में, जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति ही नहीं होगी। यह सुनकर तो और दुःख बढ़ ही गया। अरे भाई! जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक दु:ख भी समाप्त नहीं होगा। यह तो बड़ी ही भारी विपदा है! क्योंकि जो व्यक्ति धरती पर आया है उसका कर्मासक्त होना और फिर इस आसक्ति के कारण दु:खी होना निश्चित है। शास्त्रों में आया है –कर्मणा बध्यते जन्तु: अर्थात् कर्मों से मनुष्य बंध जाता है। कर्म कितने ही बढियां हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फल का संयोग और वियोग भी होता है। जिसका आरम्भ और अन्त संयोग और वियोग से होता है, उसके द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? साथ ही यह प्रश्न भी अनुत्तरित रह गया कि दु:ख के संयोग का वियोग कैसे हो? अर्थात् दु:ख का निवारण कैसे हो?

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु प्रभु ने योग या कर्मयोग का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए उपदेश किया कि बिना आसक्ति रखे कर्म करना ही योग है, जिससे कारण कर्म के फल अर्थात् भोग से सम्बन्ध छूट जाता है और अन्तत: मुक्त होने के कारण दुःख भी समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण प्रभु ने ‘योग’ को दु:ख के संयोग का वियोग भी ही माना है –

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

यदि उपर्युक्त अर्थ (यानि कर्मों में कुशलता ही योग है) का ही ग्रहण करना अभीष्ट हो तो फिर कुशलता का अर्थ समत्व या निष्कामभाव यानि कि ‘योग’ लेना होगा। किन्तु जब उपर्युक्त पद में ‘योग’ शब्द आया ही है तो फिर पुन: कुशलता का अर्थ योग करने की क्या आवश्यकता है? यानि “कर्मों में कुशलता ही योग है” इस अर्थ से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में “योग: कर्मसु कौशलम्” का ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाए? पूर्व के श्लोक में योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि यहाँ योग ही विधेय है कर्मों की कुशलता नहीं फिर कर्म तो नाशवान हैं; नाशवान् के द्वारा अविनाशी की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अत: महत्त्व योग का है, कर्मों का नहीं। अत: “योग: कर्मसु कौशलम्” का यही अर्थ – ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ उचित प्रतीत होता है।

(to be continued…)

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.