गीता में योग की व्याख्या

डॉ. श्यामदेवमिश्र

(continued from previous article)

योग की गीता में व्याख्या से मन में शंका उठती है कि प्रभु ने योग की कई परिभाषाएं दे डालीं जिससे योग के स्वरुप को समझना सामान्य जिज्ञासु के लिए कठिन हो गया है। पहले सिद्धि और असिद्धि की समता को योग कहा; फिर कर्म की कुशलता को योग कहा और आगे दु:ख के संयोग के वियोग को भी योग कहा। किन्तु विचार करने पर यह शंका निर्मूल सिद्ध होती है। प्रभु ने योग के अनेक लक्षण नहीं बताए हैं अपितु एक ही लक्षण को अनेक प्रकार से समझाया है। वास्तव में फल की आशा छोड़कर कर्त्तव्य बुद्धि से कर्म करते रहना ही कर्मयोग है। उस फल की आशा को छोड़ने के अलग-अलग विवरण हैं। फल की आशा छोड़ देने पर सिद्धि और असिद्धि में समानता हो जायेगी। फल की आशा से ही कर्म-सिद्ध होने पर सुख और असिद्ध होने पर दुःख हुआ करता है; फलाशा न रहने पर न सुख होगा न दुःख। तब सिद्धि और असिद्धि में समता हो गयी। यही योग है। इसी प्रकार समानता रखकर कर्म करते जाने से आत्मा पर कर्म का कोई प्रभाव नहीं आता इसलिए यह अर्थात् योग एक बड़ा कौशल या चतुरता भी हुई। यहाँ फलाशा के त्याग को ही ‘कौशल’ शब्द से प्रकट किया है क्योंकि फलाशा-त्याग न करने के स्थिति में फलाशा पूर्ण न होने पर दु:ख हुआ करता है। फलाशा छोड़ देने पर दु:ख का भी प्रसंग नहीं रहेगा। अत: दु:ख संयोग-वियोगरूप लक्षण में भी वही बात प्रकारांतर से कही जाएगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही विषय को भिन्न-भिन्न शब्दों से भिन्न-भिन्न अर्थों में समझाया गया है। ‘योग’ शब्द का अर्थ कर्म-योग मान लेने पर सभी लक्षणों की सङ्गति उक्त प्रकार से हो जाती है।

यहाँ एक और प्रश्न उठता है जिसका समाधान अत्यावश्यक है कि फलाशा-त्याग अर्थात् फल की आशा को छोड़ देने से क्या अभिप्राय है?

फल की आशा छोड़ने से तात्पर्य है कि फल के प्रति चिंता ही न करे। इसके दो कारण हैं –  पहला कि फल के बारे में सोचने पर कर्म दुष्प्रभावित या विकृत होगा। दूसरा केवल कर्म के प्रति मनुष्य का अधिकार है यानी केवल कर्म करना ही उसके वश में है; फल के प्रति मनुष्य का अधिकार अर्थात् वश ही नहीं है। यानी फल क्या मिलेगा? कितना मिलेगा? कब मिलेगा? इत्यादि मनुष्य के अधिकार-क्षेत्र के बाहर की बात है। अत: अधिकार-क्षेत्र से बाहर के विषय में चिन्तना करना ही व्यर्थ है। इसीलिये प्रभु ने कहा है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि अनधिकार होने के कारण यदि मनुष्य फल की इच्छा का त्याग कर देवे यानी उसके बारे में सोचे ही नहीं तब फिर कर्म करने का प्रयोजन क्या रहा? और बिना प्रयोजन के मनुष्य कर्म ही क्यूँ करे?

इसका समाधान यह है कि प्रयोजन दो प्रकार का समझा जा सकता है – १. क्षणिक या ऐहिक और २. आत्यन्तिक या पारलौकिक । क्षणिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख की अवधि निश्चित हो; यानी जिसमें फल के उपभोग की समाप्ति अर्थात् वियोग-रूपी दु:ख भी मिलना तय है। क्षणिक प्रयोजन के ही तीन अवान्तर रूप हैं – धर्म, अर्थ और काम ये तीन पुरुषार्थ। किन्तु उत्कृष्टतम कर्म से प्राप्त ब्रह्मलोकरूपी फल के भी भोग के पश्चात् पुन: मनुष्य जीवन-मृत्यु-चक्र में फँसता है। भगवान् ने स्वयं ही कहा है – आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन (गीता )

किन्तु आत्यन्तिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख का अन्त ही नहीं है अर्थात् जिसमें लेश-मात्र भी दु:ख नहीं है। यही कारण है कि इसे परमप्रयोजन या परमपुरुषार्थ मोक्ष कहा है।

अब यह मनुष्य पर है कि वह किस प्रयोजन का चयन करता है। मनुष्य, जो कि लेश-मात्र भी दुखाकाङ्क्षी नहीं है, वह ‘दुःख हो ही न’ ऐसा प्रबंध क्यों न करे? वही आत्यन्तिक-प्रयोजन अर्थात् मोक्ष है जो केवल पूर्वोक्त योग यानि कर्मयोग  से ही संभव है।

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(Source of image : http://www.navhindu.com/bhagwad-gita-chapter-3/)

इस प्रकार जो कर्म, मनुष्य को स्वभाव से ही बांधने वाले हैं, वे ही मुक्ति देने वाले हो जाएं – यही वस्तुत: कर्मों में कुशलता है। कर्म करने की ऐसी ही चतुरता को योग कहते हैं कि मनुष्य कर्म करता भी जाए और उसके बंधन में भी न फंसे। काजल की कोठारी में जाकर बिना कालिख लगाए निकल आना ही बड़ी भारी चतुरता है। ऐसी ही कुशलता योग से प्राप्त होती है कि कर्म करता भी जाए और उसका फल भी अपने पर आने न दे।

इस प्रकार देखा जाए तो योग: कर्मसु कौशलम् योग की परिभाषा से बढ़कर उसकी महिमा का उद्घोष है।

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

 

योग: कर्मसु कौशलम्

[It was broadcasted by International Broadcast service, All India Radio, New Delhi in 2016 on the occasion of International Yog Day]

डॉ. श्यामदेवमिश्र

‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृतेतस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है। योग के इस हेतु को स्पष्टतया जानने के लिये, सबसे पहले यह समझना परमावश्यक है कि ‘योग क्या है’? या ‘योग किसे कहते हैं’?

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(Source of Image: http://www.boisetemple.org/bhakti-yoga/)

गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – समत्वं योग उच्यते(२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – पश्य मे योगमैश्वर्यम्(९/५); और ३ समाधि; जैसे – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया(६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“समत्वं योग उच्यते”(गीता २/४८)

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

‘योग: कर्मसु कौशलम्’  के दो अर्थ लिये जा सकते हैं –

1. कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।

२. कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।

यदि हम पहला अर्थ लें यानि कर्मों में कुशलता ही योग है तो, जो बड़ी ही कुशलता से सावधानी से ठगी, चोरी या फिर हत्या आदि कर्म करता है उसका कर्म भी ‘योग’ हो जाएगा! किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और फिर श्लोक में निषिद्ध कर्मों का प्रसंग भी नहीं है। अगर हम यहाँ ‘कर्म’ शब्द से केवल शुभ कर्मों का ही ग्रहण करें तब फिर ‘कर्मसु कौशलम् योग:’ इस पद के दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में भावार्थ निकलेंगे जो प्रसंग-विशेष में तो ठीक प्रतीत होते हैं किन्तु गीता में प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग के सिद्धांतों से इतर सिद्ध होते हैं। आइए उन दोनों पर ही गौर करते हैं –

शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

अब यहाँ प्रश्न यह है कि उक्त दोनों ही भावार्थ, गीता में प्रतिपादित योग की संकल्पना से किस प्रकार भिन्न हैं? इसको समझने के लिए योग की परिभाषा को समझना होगा, जिसमें कहा है  –

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है। इस श्लोक की व्याख्या में कई विद्वानों ने योग का अर्थ परमात्मा से सम्बन्ध माना है यानी परमात्मा से सम्बन्ध रखते हुए कर्म करो अर्थात जो कुछ करो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से करो और कर्मों को परमात्मा को ही अर्पण कर दिया करो।

योग या कर्मयोग के पूर्वोक्त स्वरूप के आलोक में अब हम पुन: योग: कर्मसु कौशलम् के उन पूर्वोक्त भावार्थों पर विचार करते हैं। अगर यहाँ शुभ-कर्मों को ही कुशलतापूर्वक करने का नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये हुए शुभ-कर्मों के फल से बंध जाएगा। कहा भी है– फले सक्तो निबध्यते; अत: उसकी स्थिति समता में नहीं रहेगी और उसके दुखों का नाश नहीं होगा। फलत: प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग की संगति इस अर्थ में नहीं बैठेगी।

यहाँ एक जिज्ञासा है कि शुभ कर्मों को करने के बाद भी मनुष्य दु:ख क्यूँ पाएगा? इसका समाधान यह है कि कितना भी शुभ कर्म-करने वाला क्यूँ न हो किन्तु मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं अथवा सब कुछ सर्वदा ही उसके मनोनुकूल नहीं होता; जो कि अंतत: उसे दुःख ही पहुঁचाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर सत्यवादी हरिश्चंद्र, जो कि स्वप्न में भी अशुभ कर्मों से दूर रहे, उन्हें अत्यंत कष्ट क्यों झेलना पड़ता!

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति कैसे हो? इसका उत्तर है – जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति अर्थात् मोक्ष होने पर। ये कब होगा? उत्तर है – कर्मफलों के संपूर्ण भुक्त हो जाने पर। फिर शंका हुई कि जब तक जीवन है तब तक न तो कर्म करना कभी समाप्त होगा और न ही उसके फल का भोग और बिना फल भोगे तो कृत-कर्म की समाप्ति भी नहीं होगी; कहा है –नाभुक्तं क्षीयते कर्म। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म से फल की उत्पत्ति एवं फल-भोगार्थ पुन: कर्म; इस प्रकार से तो यह अनवरत चलने वाला क्रम बन गया। दूसरे शब्दों में, जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति ही नहीं होगी। यह सुनकर तो और दुःख बढ़ ही गया। अरे भाई! जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक दु:ख भी समाप्त नहीं होगा। यह तो बड़ी ही भारी विपदा है! क्योंकि जो व्यक्ति धरती पर आया है उसका कर्मासक्त होना और फिर इस आसक्ति के कारण दु:खी होना निश्चित है। शास्त्रों में आया है –कर्मणा बध्यते जन्तु: अर्थात् कर्मों से मनुष्य बंध जाता है। कर्म कितने ही बढियां हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फल का संयोग और वियोग भी होता है। जिसका आरम्भ और अन्त संयोग और वियोग से होता है, उसके द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? साथ ही यह प्रश्न भी अनुत्तरित रह गया कि दु:ख के संयोग का वियोग कैसे हो? अर्थात् दु:ख का निवारण कैसे हो?

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु प्रभु ने योग या कर्मयोग का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए उपदेश किया कि बिना आसक्ति रखे कर्म करना ही योग है, जिससे कारण कर्म के फल अर्थात् भोग से सम्बन्ध छूट जाता है और अन्तत: मुक्त होने के कारण दुःख भी समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण प्रभु ने ‘योग’ को दु:ख के संयोग का वियोग भी ही माना है –

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

यदि उपर्युक्त अर्थ (यानि कर्मों में कुशलता ही योग है) का ही ग्रहण करना अभीष्ट हो तो फिर कुशलता का अर्थ समत्व या निष्कामभाव यानि कि ‘योग’ लेना होगा। किन्तु जब उपर्युक्त पद में ‘योग’ शब्द आया ही है तो फिर पुन: कुशलता का अर्थ योग करने की क्या आवश्यकता है? यानि “कर्मों में कुशलता ही योग है” इस अर्थ से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में “योग: कर्मसु कौशलम्” का ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाए? पूर्व के श्लोक में योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि यहाँ योग ही विधेय है कर्मों की कुशलता नहीं फिर कर्म तो नाशवान हैं; नाशवान् के द्वारा अविनाशी की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अत: महत्त्व योग का है, कर्मों का नहीं। अत: “योग: कर्मसु कौशलम्” का यही अर्थ – ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ उचित प्रतीत होता है।

(to be continued…)

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

Children in Vedas

Dr. Shashi Tiwari, General Secretary, WAVES –India & Former Prof. of Sanskrit, Maitreyi College, University of Delhi

Great seers, thinkers, warriors, visionaries graced India from the very beginning. It can be assumed that they were bright from their childhood. It is true that narration of bright children is not done separately in abundance, but undoubtedly ancient Vedic literature is not without their mention.

Nachiketā

There is an inspirational story in the Kaṭha Upaniṣad about a little boy named Nachiketā. He was the son of Vājaśravā Uddālaka Ṛṣi who once organized a great sacrifice ‘yajn᷈a’ called ‘Sarvamedha’ to please the deities for accumulating good deeds. He announced that after the sacrifice, he would be donating the bulk of his wealth including cattle to learned Brāhmaṇas as dakṣiṇā. The sacrifice was duly performed, but when time came for the donation, Vājaśravā kept some healthy cattle for himself and his son; and in place of them tried to donate those that were old, infirm and yielded no milk. Nachiketā was observing this. He got disturbed to see the unholy act of his father. He realized that these gifts would have the opposite effect on his future goal. Being adolescent son, he was not able to stop him. So he asked his father with the intention to remind him the law of complete and pure charity. He said, “O Father! To whom you would gift me in charity?” This made Ṛṣi very angry, but he decided not to say anything. When Naciketā repeated the question thrice, Uddālaka lost his temper and said, “I give you to Yama, the Lord of Death.” Yama is the king of death and resides in yamapurī. Hearing this, Nachiketā went to Yama’s kingdom. He decided to obey his father’s command.  He firmly said to himself, ‘I should fulfill my father’s wish, even if it means leaving my home’. When Ṛṣi realized his mistake and tried to stop Naciketā, he did not stop. He reached Yama’s kingdom and was told by Yama’s guards that he had gone out for three days. Naciketā decided to wait at his doorstep till he returned. He waited for three days without food, water and shelter. When Yama returned and saw little Naciketā at his doorstep, he felt sorry for keeping a Brāhmaṇa boy waiting without any welcome or rest. Not welcoming a guest means just like committing a sin in Indian tradition.Yama was very pleased with the clear thinking and honesty of the young boy. He served Nachiketā with all honour and food, but even then he was not completely satisfied, so he said, “Dear child, I have offended you by keeping you waiting for three days. To wash my sin, I request you to ask for three boons.

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Naciketā declared, “My first wish is, when I return home, may my father welcome me lovingly. My second wish is to get that knowledge by which I can be worthy of living in the heaven. My third and last wish is to achieve Atmajn᷈ānam- knowledge of the ātman from you.” Yama granted the first two boons immediately and tried to convince Naciketā to give up his third desire for higher knowledge. Instead of that, he offered him long life, gold, pearls, coins, horses, elephants and even the happiness of Swarga – heaven.  “No, I do not wish for anything else,” replied Naciketā firmly. He described all worldly objects as perishable until Lord of Death is the ruler. Finally, Yama granted him the third boon too, and the courageous boy was enlightened with the knowledge of the ātman. Naciketā came to know about the soul, life and death in his early age. Finally, he went back to his father’s house and imparted the knowledge, he obtained from Yama, to many disciples.

Naciketā as a brightest child of Vedic era inspires us to be kind to all creatures, to respect parents, to be strong-willed, to cross all obstacles with firm determination, to avoid worldly temptations, and to strive for eternal happiness.

 Satyakāma

Satyakāma Jābāla is mentioned in the Chāndogya Upaniṣad. Satyakāma in his childhood used to live in a small hut with his mother Jābālā. He had a strong wish to study, so, he desired to go out in search of a teacher ‘guru’ who would guide him in the path of self-realization, to achieve the goal of mystic life. He enquired about his Gotra from his mother. In fact he wanted to know the name of his father as in those days generally teachers accepted students only after knowing their family’s introduction.

So upon learning about her son’s wish to study, Jābālā told him, “O my Son! I don’t know your family name. I used to work earlier in many houses of different persons. I don’t know when I got pregnant. When asked by the Guru, tell him what I have told you”. Later Satyakāma left with her mother’s blessings. He reached to the āśrama of sage Gautama and requested him to make him his pupil. On seeing the boy, Ṛṣi Gautama asked him,Before I make you my pupil, I need to know about your family.” Satyakāma had no idea about his family except his mother. He said, “I asked it to my mother. She said: ‘Child, when you were born, I used to be very busy serving guests. I had no idea about your father. My name is Jābālā and your’s is Satyakāma. So call yourself Satyakāma Jābāla.” On hearing it, the Ṛṣi said with smile, “I admire you for saying the truth. I am sure you must be born of a noble gotra. I shall accept you as my student. Go and get me some samidhā. I shall initiate you in brahmacharya”. He then initiated him in meditation to calm down his mind and to experience his inner self which was like the vast ocean.The sage was pleased with his love for truth.

One day Gautama told him that before he could teach him, Satyakāma should take the herd of 400 weak cows of the āśrama and return only when it had multiplied to 1000. After that Gautama would impart him higher knowledge. Without uttering a single word, Satyakāma left with the cows. He took them to the forest. Satyakāma built an āśrama for himself in the forest and looked after the cows with loving care. All the time he carefully practiced the duties of a brahmacharī. He was no longer lonely and became friends with nature; every living creature became part of his family.

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After many years, the herd grew to 1000. Every cow was strong and healthy. It was time for Satyakāma to return to Gautama’s āśrama. All the gods and deities were happy with Satyakāma’s obedience and dedication to his guru. Along the way, he was blessed with knowledge by fire, a bull, a swan and a Sun bird. Now enlightened, Satyakāma reached the āśrama. Gautama saw the glow of enlightenment on his face. He was also very happy that Satyakāma had looked after the cows very well. He then accepted Satyakāma as his pupil and blessed him with Brahmavidyā. Guru said, “Brahmaivedamsarvam’ (Brahman is in everything). Brahman is realized by knowing yourself, at everywhere, in everything, and in every being. You are eternal and radiant because he is in you. This is Brahma-vidyā”. Satyakāma is regarded as an ideal of truth, dedication, obedience and true service to the guru in Vedic traditions.

Thus, Vedic ideals should be implanted in the early age to get strong foundation of character and intelligence for all human beings.

 

 

 

 

The Idea of God (Part-II)

– Dr. Koenraad Elst

Continued from Part-I

Mono- versus polytheism

The Sumerian ideogram Dingir was read as ElIn neighbouring Akkadian, a Mesopotamian dialect of Semitic. We know this word very well through Hebrew, a northwestern (Levantine) dialect of Semitic. Thus the names Uriel, “my light is God”; Gabriel, “my strength is God”; Michael, “who is like God?” But as we shall presently see, these names now carry a meaning of “God” that has resulted from a revolution, viz. from poly- to monotheism.

A derivative of El is Eloha, “a deity”, “a god”. We know it mainly through the plural form Elohim, “gods”, “pantheon”. Strangely, this form has survived the theological revolution described in the Bible book Exodus under the leadership of Moses, ca. 1250 BCE. Here, the many gods were replaced with a single jealous god, yet the plural form Elohim remained but with a singular meaning: God. Thus, the Bible, which received its definitive form only under the Persian empire ca. 500 BCE, when this usage was well-established, starts with the sentence: “Berešit bara Elohim et ha-šamaim ve-etha-aretz”, “In the beginning God created the heavens and the earth.” The connection with the stars was severed, at least for the Israelites, not all the other nations: “Pay attention lest ye lift your eyes up to the sky for seeing sun, moon and stars, that ye be led astray and adore and serve them, those whom the Lord your God hath assigned to all the nations under heaven.” (Deut. 4:19)

A synonym of Elohim, referring to the same jealous God, is Yahweh. Moses himself introduced this god-name into Biblical tradition. Though new to the Israelites after centuries in Egypt, it must have existed earlier among the Arab (South-Semitic) Beduins as well as among the Northwest-Semitic people of Mari. Moses, when a fugitive from Egyptian law after he was found out to have committed murder, stayed with a Beduin tribe. They had a storm-god Yahweh, best translated as a causative participle of a verb meaning “to move in the sky”, whether “to blow” or “to stoop like a bird of prey”, from an Arab root HWY later attested in the Quran (22:32), but not in the Bible. This meaning is confirmed by the fixed expression Yahweh Sabaoth, “he who causes the motion of the heavenly hosts”, i.e. of the majestic procession of the stars across heaven. Here again we find a stellar meaning associated with a god-name.

Moses saw an apparition of this god in the burning bush. When Moses asks the god who he is, the god expresses his total sovereignty: “I am who I am”, ehyeh ašer ehyeh. Theologians and translators have contemplated this sentence profusely, until in ca. 1900, the German Orientalist Julius Wellhausen hit upon its probable original meaning: it elaborates a pun on the name Yahweh, which the Hebrews misinterpreted folk-etymologically as a causative participle of the verb HYY, “to be”, hence “the being one”, “he who is”, or more philosophically, “he whose essence is existence” “he who necessarily exists”, “he who causes existence to exist”. This edifice of profundities is entirely built on a folk-etymological pun, nothing more. Or to put it more positively: a new conception of the divine was grafted onto an old god.

The Arab form of the originally polytheistic term ha-eloha, “the deity”, is al-Ilāha, also “the deity”. A contracted form is Allāh, “thé deity”, “the god par excellence”, hence “God”. Originally it could refer to any earlier-mentioned god. Thus, Mohammed’s Pagan father was called Abdallāh, “servant of the deity”. Mohammed, in a bid to establish monotheism among the Arabs, reinterpreted Allāhas a synonym of Yahweh. He saw himself as the latest (and even last) one of the line of the prophets of Yahweh, renamed Allāh in Arabia. This way, the star-god El, the Semitic form of Sumerian Dingir, ended up shedding his connection with the stars and becoming the disembodied extra-cosmic Creator-god Yahweh/Allāh. The Quran (6:78, 22:18, 41:37) simply and strictly prohibits star worship.

In the footsteps of the reform movements Brahmo Samaj and Aryan Samaj, many anglicized Hindus claim that “Hinduism too is monotheistic”. This is a very defensive stand, and it is simply not correct. If the Hindu wealth of gods and of ways of worship were not polytheistic, what other religion would be? It seems to us that they are using a word they don’t understand. Monos does not mean “one”, it means “alone”, “one and no other”. Monotheism accepts only Yahweh or Allah, and considers all others as false gods, only good to be destroyed and discarded: Marduk, Ba’al, Osiris, Ahura Mazda, Śiva, Buddha. By contrast, Hinduism is inclusive. The Vedic verse: “The wise call the one essence by many names”, means that the different gods are not false but are essentially the same as your chosen god. There are no “false gods” in Hinduism. Reality is both one and manifold, and Hinduism is not bothered with the question whether the divine is single or many.

This also counts for other Pagan civilizations. When Protestant missionaries set up shop in China, they discovered that a native term roughly meaning “God” was Shangdi, so they appropriated this term as name of the Christian God. (Catholics preferred Tianzhu, the “Heavenly Boss”.) What they did not know, is that the Chinese language mostly does without the separate category of a plural, so the same word can be both plural and singular. Shangdi does not so much mean “the Sovereign on High”, as rather “the Powers on High”. In Chinese, even the grammar militates against the contrast between one and many. To monotheists this numerical matter is all-important, worthy of the iconoclastic destruction of all the “false gods”; but to regular people such as Hindus or Confucians and Daoists, it is just not an issue.

Širk

Heaven-worship is truly the universal religion, rivalled only by ancestor-worship. And even then, these two are intertwined. Deceased ancestors are deemed to be in heaven, often actually associated with a specific star. When your father has died, you take your child on an evening walk, and when the stars appear, you point out one of them and say: “There is grandpa, watching over us.” In a Vedic ritual, a zone in the sky, in the Scorpio-Sagittarius area, is designated as the destination of the dead.

For famous people, who had become part of the collective consciousness, the procedure could be to “elevate them to godhood” (Greek: Apotheōsis) by associating them with a specific star or constellation.A case in point from antiquity is Antinoös, the lover-boy of the Roman emperor Hadrian, who drowned himself and was given a star in Aquarius, still named after him. When in the 17th century the southern sky was mapped, one constellation was named after the protection given to Vienna by Jan Sobieski against the Ottoman siege: Scutum Sobieskii, “Sobieski’s shield”, now simply Scutum.

This practice was first attested in writing in Ugarit, Syria, where in ca. 2000 BC famous people upon their deaths were identified or “associated” with a star. In the native Semitic, this practice was named Širk, “association”. The term ought to be well-known today, but with an evolved meaning. When Islam imposed monotheism, it denounced polytheism and idolatry as Širk, i.e. the “association” of a mortal, a creature, with the Supreme Being, the Creator.

India too has known this practice. The stars of the Great Bear are named after the Seven Sages who composed most of the Ŗg-Veda. There are different variations of this list of seven, but one of the Sages who returns in all of them is Vasiṣṭha. He and his wife Arundhātī are associated with the twin stars Mizar and Alcor. In a moderate way, they did graduate to godhood, with a few temples in Himachal and Uttarakhand dedicated to them. Another sage who made it to heaven is Agastya, the Sage who went to the South, and therefore has the southern star Canopus named after him.

 Conclusion

At the dawn of history, and practically since the birth of mankind, star worship, partly overlapping with ancestor worship, was the main religion worldwide. With the development of civilization, conceptions of the divine grew away from their referents in nature. India generated a spirituality implying renunciation, and the gods followed suit. The Upanishads signalled a break with the Vedic focus on the gods and reoriented mankind’s attention to the spiritual path. A kind of relation with a kind of gods was restored, but adopting the new focus on Liberation.

Star worship remained alive, as “nothing ever dies in India” (in the words of the late Girilal jain), but that old layer was overlaid with new levels of abstraction. The highest of these was the abstract concept of the Absolute (Brahmaṇ) that appeared in the Upaniṣads and remained, in various guises, in the mai sects of Hinduism. But the lower levels, including the naturalistic, star-related levels did not disappear; it was an organic evolution.

A roughly similar evolution took place in the Greek world and then in the Roman empire. The elites outgrew the colourful pantheon and, mainly through Stoicism, accepted a more abstract and more unitary concept of the divine. In Neoplatonism, which may have been influenced by Indian developments, everything was thought to emanate from “the One”. In China too, “the One” was the name of a unifying abstract concept transcending the many natural gods of everyday religion.

Unfortunately, in the Roman empire, this natural evolution was interrupted and forcibly driven in a particular direction by the imposition of Christianity. However, at the same time, to better insinuate itself in the Greco-Roman culture, Christianity also took over much from Stoicism and Neoplatonism, which appear mainly in Christian morals c.q. theology.The breakthrough of monotheism followed the same pattern as the conceptual development in Hinduism to a some extent, but was unnecessarily brutal and destructive regarding the earlier religion. The same scenario repeated itself even more abruptly with the advent of Islam.

The resulting concept of divine unity (in Islam: tawḥīd) was also much cruder than a what gradual development would have made possible. While superseding the colourful old gods, Yahweh or Allah were much like them in their negative aspects: all too human, too personal, not nirguṇa, “beyond qualities”. As India has shown, it was perfectly possible to move from a naturalistic to a more abstract conception of the divine without destroying the earlier conception.

 

The Idea of God (Part-I)

– Dr. Koenraad Elst

koenraadMarxDr. Elst, born in 1959 in Leuven, Belgium, studied Sinology, Indology and Philosophy and did his Ph.D. on the ideological development of Hindu Revivalism. He worked as a political journalist and as a foreign-policy assistent in the Belgian Senate, but mainly as a independent writer. He became fairly well-known in India with his argumentation in favour of the Ayodhya temple, now vindicated, and with his work on the Aryan homeland question, still controversial.

All known civilizations have a thing called “god”, plural or singular. They are a category of beings deemed endowed with far more power and a vastly larger longevity than us human beings. For the rest, their characters and functions may vary.

In writing, the idea of “a god” is first attested in the Sumerian ideogram Dingir, which has the physical form of a radiant star. It certainly has the meaning “god”, for it is used as the common determinative for a whole class of names signifying gods. That, indeed, was anciently how a divine being was conceived: as a radiant heaven-dweller. In Babylon and in Harran, each planet was worshipped in a temple of its own.

The pre-Islamic religion was also largely star worship (next to ancestor worship and the worship of special stones like the Black Stone in Mecca’s Ka’ba). Thus, the three Meccan goddesses of Satanic Verses fame, al-Lāt, al-Uzza and al-Manāt, are roughly the Sun, Venus and the Moon. The Ka’ba was dedicated to the moon-god Hubal, and housed a stone fallen from heaven.

Stars were explicitly recognized as gods by prominent philosophers like Socrates and Plato. Some dissident freethinkers however, like the philosopher Anaxagoras and the playwright Aristophanes, thought stars were only burning rocks. After Christianization, when all divinity was invested in an extra-cosmic Supreme Being, the planets were desacralized and reduced to cogwheels in a cosmic machinery set in motion by the Creator and operated by his angels. Though numerically, a large part of humanity now espouses this desacralizing view, it is rather exceptional in the history of religions. The association of gods with stars was pretty universal.

Other properties of a god

Because a star is radiant and stands in heaven, near-permanently visible to all, it is a part of our collective consciousness, our shared frame of reference. This, then, is the operative meaning of “a god” in human life: the personification of an important collective factor difficult to negotiate, and which you have to take into account in the things you plan to do. Thus, Dyaus = heaven, Agni = fire, Indra (“the rainer”) = storm; Vayu = wind, Pṛthivī (“the broad one”) = earth. This principle is then generalized, and gods can be personifications of any category of beings. Thus, Śiva is the personification of the renunciants, unkempt and living in the mountains.

A god is powerful in that he can impact your life. But he is not all-powerful, because he has to share his power with other gods. Rarely if ever is he seen as “the Creator” who stood outside the universe and fashioned it from nothing. Rather, he himself is a part of the universe. Creation is normally seen as only a transformation from formless matter to the present world of form, and in that process, gods may play their part. In that limited sense, the Vedas and Puranas have plenty of “creation” stories. Yet they also assume that the universe as a whole has always been there, though it cyclically becomes unmanifest, only to reappear again. It is an exclusively Biblical-Quranic belief, further propagated by thinkers who elaborate the Biblical or Quranic assumptions, that a single Supreme Being, in a single moment never to be repeated, created the whole universe from nothing.

Gods are imagined to be endowed with personalities befitting the element of which they are the personification. As such, they are also sensitive to gifts and flattery, and may thus be influenced into exercising their power in a partisan, friendly way. That is why people who would never think of appeasing the stormy sea, do devise rituals to appease the sea god, hoping that he will guarantee smooth sailing.

Finally, a star or god is also, as far as a mortal can tell, eternal: it existed before we were born and goes on existing after we have died. As suggested by the extreme longevity of the physical stars, gods are proverbially deemed immortal. Hence the binary: us mortal earthlings versus the immortal heaven-dwellers.

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Deva

The same meaning of “star”, “radiant heaven-dweller”, is present in Vedic Sanskrit Deva, “the shining one”, hence “a god”. It is also etymologically present in cognate words like Latin Deus, “a god”. One of the Sanskrit terms for “astrologer”, at least since its mention in a 4th-century dictionary, is Daiva-jña, “knower of the gods”, or in practice, “knower of destiny”. Another is Daiva-lekhaka, “gods-writer”, “destiny-writer”, i.e. horoscope-maker. Obviously, the stars here were seen as gods regulating man’s destiny.

A parallel development, but omitting (or only implying) the original link with the stars, is found in Slavic Bog, “the share-giver”, “the apportioner”, “the destiny-decider”, related to Sanskrit Bhaga, and hence to the derivative Bhagavān. Other god-names are more derived from the practice of worshipping, such as the Germanic counterpart God, “the worshipped one”, Sanskrit Huta; or the Greek counterpart Theos, “god”, related to Latin festus, “festive”; feriae, “holiday”, i.e, “religious feast”; and to Sanskrit dhiṣā, “daring, enthusiastic”, dhiṣaṇā, “goddess”, dhiṣṇya, “devout”. But even here, a stellar connection reappears, for the latter word is also a name of Śukra / ”Venus”.

More examples of the personification of heavenly phenomena as gods are found throughout the Vedas. The deities Mitra and Varuṇa represent the day sky (hence the sun, here remarkably called “the friend”) c.q. the night sky, with its stable sphere of the fixed stars, with its regular cycles representative of the world order. The Nāsatyas or Aśvins (“horse-riders”) are thought to represent the two morning- and evening stars, Mercury and Venus, who “ride” the sun, often likened to a horse. Uśa (related elsewhere to Eōs, Aurora, Ostara, and hence to “east” and “Easter”) represents the sunrise.

The Vedic gods were personifications of natural forces, with whom you could do business: do ut des, “I give to you” through sacrifice, “so that you give to me” the desire-fulfilment I want. That type of relation between man and god is pretty universal. That was the ancient worldwide conception of gods. But in auspicious circumstances, religion was to graduate from this stage, and the gods would go beyond the stars.

Transcending the stars

Hindus often react to the above-mentioned view as insufficiently respectful to Hinduism. They insist that it is a Western “Orientalist” fabrication to see the gods as mere personifications of natural forces. In foreign countries, perhaps, but not in India. They think it treats religion as essentially childish, for in children’s talk, or in that by mothers towards children, there is a lot of personification. Yet, we insist that in the Vedic stage of civilization, this conception of gods still prevailed; perhaps already as a rhetorical device built on top of an earlier more primitive stage, but still sufficiently present to leave numerous traces. It shows a deficient sense of history to project the newest insights of Hinduism back onto its past, and to deny the amount of change that has taken place in the conceptual history of Hinduism.

But then two things happened. The first is that from the Upanishads onwards, in a distinctively Indian development, the notion of Self-Realization or Liberation arose. The way to this goal, the Sādhana or what is nowadays called “the spiritual path”, is not about the fulfilment of desires; instead, the point is to decrease your desires, to renounce, to abandon. This was initially conceived as a process in which no god or other being played any role (whether they were deemed to exist or not), making way for a focus on the Self (ātman), equal to the Absolute of pure consciousness (brahman). This Absolute was conceived as being above the pairs of opposites, as devoid of characteristics (nirguṇa). Gods were relegated to the background, to the world of desire-fulfilment through rituals. Self-Realization implied renunciation from desire-fulfilment, and hence a distance from the gods and their favours.

The second development is that the gods persisted or were revived, but in a transformed role. Stellar references are explicit in the case of Sūrya, the sun, and of Soma Candra, the moon; but less so in the case of Viṣṇu, “the all-pervader” (like the sun’s rays), though he has a solar quality; and Śiva (“the auspicious one”, an apotropaeic flattery of the terrible Vedic god Rudra, “the screamer”), the Candradhāra or “moon-bearer”, the Somanātha or “lord of the moon”, has a lunar, nightly quality. The classical Hindu gods Viṣṇu and Śiva represent a revolution vis-à-vis the Vedic worldview. You don’t bring sacrifices “for Liberation” to the Vedic gods, a notion presupposing renunciation from those desires. By contrast, the later “Puranic” gods of classical Hinduism take some distance from the naturalist meaning in which they originate, and do integrate Liberation. Very soon, devotional-theistic movements adapted this new notion to their cult of Viṣṇu, Śiva or Śakti (or elsewhere, Amitābha Buddha or Avalokiteśvara), gods with a distinct personality (saguṇa) but more spiritual. In Kashmiri Shaivism, Śiva gets abstracted as pure consciousness, Śakti as pure energy. With these gods, you could “unite” so as to terminate your susceptibility to worldly suffering, to delusion, to the karmic cycle. They would grant you Liberation, just like the Vedic gods would grant you wish-fulfilment.

But that doesn’t mean Hindus have given up on wish-fulfilment. They still perform rituals to help them get what they want, and often this involves explicitly stellar gods, but conceived as lower gods or “demi-gods”. Astrologers instruct their clients to say prayers before the planet that disturbs their horoscope. The client will get advice on what ritual to practise, when and how and for which god, to ward off the negative influences of the stellar configurations indicated in his horoscope. This will remove the obstacles to his well-being and the fulfilment of his desires. The navagraha or “nine planets” (sun, moon, their two eclipse nodes, and the five visible planets) as a whole are a normal object of worship.

To be continued….

आदि-शङ्कराचार्य

-Dr. Shyam Deo Mishra, Assistant Professor, Rashtriya Sanskrit Sansthan, New Delhi
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शङ्कराचार्य ने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, तथा अटक से लेकर कटक तक सम्पूर्ण भारत में धर्म-प्रचार की मन्दाकिनी को प्रवाहित किया, जिसमें तत्कालीन पतित, पथभ्रष्ट, एवं बौद्धादि दर्शनों के कुप्रभाववश नास्तिक, एवं आध्यात्मिक रूप से निष्प्राण, जन-मानस पुनः सनातन धर्म से अनुप्राणित एवं पवित्र होकर एक सूत्र में बँध गया। जिस समय आदि-शङ्कराचार्य का जन्म हुआ, भारत में नास्तिकों के प्रभाव से अनार्य-भावों एवं तज्जन्य दुष्कर्मों के प्रगाढ अन्धकार से आच्छादित होकर सनातन धर्म का प्रकाश लुप्तप्राय हो चला था। धर्म के नाम पर नाना प्रकार के अत्याचार किए जा रहे थे। उस समय किसी व्याकुल भारतभूमि पर, वैदिक-धर्म के रक्षार्थ एवं जनता के उद्धारार्थ आदि-शङ्कराचार्य ने अवतार लिया। उन्होंने लुप्त हुए वैदिक-धर्म की रक्षा की। शङ्कराचार्य अवश्य ही भगवान् की विशेष-विभूति थे जिन्होंने अत्यन्त अल्पायु में ही भारत वर्ष से नास्तिकता की दावाग्नि को आस्तिकता रूपी वृष्टि से निर्मूल कर दिया। 
 
आचार्य शङ्कर के प्रमुख शिष्य विद्यारण्य द्वारा विरचित ‘शाङ्करदिग्विजयम्’ के अनुसार, भारत में धर्म-विप्लव से व्यथित, एवं व्याकुल देवर्षि नारद व ब्रह्मा जी जब उपाय हेतु शिवजी के पास पहुँचे तो शिवजी ने इस संकट की समाप्ति हेतु स्वयं नरदेह धारण करने की बात कहते हुए उन्हें सान्त्वना दी। तत्पश्चात् भगवान् शङ्कर ने शङ्कराचार्य के रूप में, कार्तिकेय ने कुमारिलभट्ट के रूप में, सरस्वती ने भारती के रूप में तथा इन्द्र ने राजा सुधन्वा के रूप में भारतवर्ष में जन्म लेकर अधर्म की समाप्ति की।
 
आदि-शङ्कराचार्य (शङ्करस्वामी) का जन्म 845 वि.सं. (788 ई.) में केरल प्रान्त के मालाबार पर्वतीय प्रदेश में स्थित वेदपाठी व शास्त्रपारङ्गत ब्राह्मणों से परिपूर्ण कालटी (कालडी) नामक ग्राम में नम्बूरी (नम्बूदरी) ब्राह्मण-वंश में वैशाख शुक्ल-पञ्चमी को हुआ। इनके पितामह विद्याधर (विद्याधिराज) के पाण्डित्य से प्रसन्न होकर केरल के महाराज ने इन्हें आकाशलिङ्ग के महादेव-मन्दिर के प्रधानाध्यक्ष पद से विभूषित किया। विद्याधर के पुत्र शिवगुरु भी उद्भट विद्वान् हुए। सन्तान प्राप्ति हेतु शिवगुरु ने अपनी पत्नी कामाक्षीदेवी (सुभद्रा) के साथ घोर तपस्या करके कुलदेवता पिनाकपाणि शिव से वरदान स्वरूप शङ्करस्वामी को पुत्र रूप में प्राप्त किया।
 
शैशवावस्था में ही वर्ण परिचय के समय उन्होंने दिव्य भावों का परिचय दिया था। स्वरों, व्यञ्जनों, एवं मंत्र का एक बार उच्चारण सुनकर उन्होंने उच्चारण करना एवं लिखना सीख लिया था। बचपन में ही पिता के स्वर्गवास ने संसार की असारता एवं अनिश्चितता के प्रति शङ्कर को विमुख कर दिया था। पाप-परितप्त संसार के उद्धारार्थ अवतरित शिव-अवतार शङ्कर बाल्यावस्था में ही संसार के प्रति उदासीन, विरक्त होकर स्वयं को पिञ्जर-बद्ध पक्षी के समान मानने लगे। वे कहीं भी कभी भी किसी समाधिस्थ योगी की तरह बैठकर घण्टों तल्लीन हो जाते थे। आठ वर्ष की आयु में ही शङ्कर ने ध्यानावस्थित अवस्था में ‘आत्मबोध’ नामक ग्रन्थ की रचना कर डाली। संन्यास ग्रहण करने की उनकी उत्कट अभिलाषा की पूर्ति के सामने स्नेहमयी जननी का वात्सल्य भाव आड़े आ जाता था ,जो उन्हें प्रतिक्षण व्याकुल किये जा रहा था। अन्ततोगत्वा दैवयोग से एक नाटकीय घटना-क्रम का पटाक्षेप माता द्वारा उनको संन्यास ग्रहण करने की अनुमति से हुआ।
 
आठ वर्ष की अवस्था में शङ्कर ने गौड़पाद के शिष्य आचार्य गोविन्दपाद से गुरु-दीक्षा ले कर विधिवत् संन्यासी के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया। उनकी अलौकिक तेजस्विता एवं प्रतिभा से उनके गुरु भी हतप्रभ रहते थे। उनको यह भान हो गया था कि शङ्कर कोई विशेष विभूति है, जो निश्चय ही सोद्देश्य अवतरित हुआ है। उनके गुरु गोविन्दपाद ने 17-18 वर्ष की उम्र में ही शङ्कर को स्नातक की उपाधि से विभूषित करके ‘शङ्कराचार्य’ इस नाम से सम्बोधित किया। वहाँ से अपने गुरुओं की इच्छानुसार, वैदिक धर्म के प्रचारार्थ शङ्कराचार्य ने देशाटन आरम्भ किया तथा जगह-जगह बौद्धों एवं कदाचार युक्त पाखण्डी वाममार्गियों का खण्डन करने लगे। गोविन्दपाद के आश्रम में रहते हुए एक दिन शङ्कर ने गुरु की निर्विघ्न समाधि हेतु आश्रम के समीप प्रवाहित नदी के उद्दाम वेग को अपने योग-बल से स्थिर एवं नीरव कर दिया। प्रतिदिन स्नानार्थ गमनागमन में अपनी वृद्धा माता को होने वाले असह्य शारीरिक कष्ट एवं दुर्बलता को देखकर शङ्कर ने अपने योग-बल से नदी की एक धारा घर के समीप से प्रवाहित कर दी। एक गरीब ब्राह्मण प्रभाकर के मूर्ख, रोगी एवं बर्बर पुत्र को जल के सिंचन मात्र से स्वस्थ एवं विद्वान् ‘हस्तामलक’ बना दिया।
 
शङ्कराचार्य के शिष्य सनन्दन पद्मपाद, चौलदेशीय ब्राह्मण थे। शङ्कराचार्य से दीक्षा ग्रहणार्थ वह काशी आए। उस समय गङ्गा प्रबल उत्ताल तरङ्गों से प्रवाहित होती थी। जिस दिन वह दीक्षा हेतु गङ्गा के एक छोर पर पहुंचे, प्रबल उत्ताल तरङ्गों से प्रवाहित प्रचण्ड वेगवती गङ्गा को पार करना उन्हें असम्भव प्रतीत हो रहा था। दूसरे छोर पर खड़े शंकराचार्य ने उन्हें हाथ से आने का इशारा किया। उनके संकेत पर दृढनिश्चयी सनन्दन ने जैसे ही नदी में पैर रखा उन्हें कमल-पत्र की अनुभूति हुई। इस प्रकार कमल पत्र पर पद-निक्षेप करते-करते उन्होंने अनायास ही उद्दामगतिक गङ्गा को पार कर लिया।
 
गुरुओं की आज्ञानुसार शंकर सम्पूर्ण भारत वर्ष में सनातन धर्म की प्रतिष्ठा हेतु उद्यत हुए। उन्होंने महार्जुन में स्थित वाममार्गियों के प्रधान मठ में अपनी योग-माया से सबको नतमस्तक करा दिया। तथा अपने प्रधान शिष्य सुरेश्वराचार्य को वैदिक धर्म के पुनः प्रतिष्ठापनार्थ स्थापित कर दिया। उसके बाद द्रविड़ पाण्ड्य, चोल, रामेश्वरम् में जगह-जगह शास्त्रार्थ करके सनातन धर्म के सही स्वरूप को समझाते हुए अद्वैतमत की स्थापना की। उत्तर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने काशी, कुरुक्षेत्र एवं बदरिकाश्रम तक की यात्रा की। उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष में सनातन धर्म की स्थायी प्रतिष्ठा व प्रचार हेतु चार स्थलों पर मठ स्थापित किए। अथर्ववेद के प्रचारार्थ बदरिकाश्रम में ‘जोशीमठ’ स्थापित कर अपने शिष्य सनन्दन को यहाँ अभिषिक्त किया। यजुर्वेद के प्रचारार्थ उन्होंने मध्यार्जुन प्रान्त में तुङ्गभद्रा नदी के तट पर ‘विद्या-मठ’ (वर्तमान में शृङ्गेरी मठ) की स्थापना करके अपने सुयोग्य शिष्य सुरेश्वराचार्य को वहाँ नियुक्त किया। तत्पश्चात् भगवान् के उक्त वचन ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ को चरितार्थ करने हुए शङ्कराचार्य ने श्रीकृष्ण-धाम द्वारकानगरी में ‘शारदा-मठ’ की स्थापना करके वहाँ अपने शिष्य ‘विश्वरूप’ को अध्यक्ष व संचालक नियुक्त किया। ऋग्वेद के प्रचारार्थ जगन्नाथ धाम में ‘ज्योतिर्मठ’ की स्थापना की। वहाँ से चलकर मार्ग में हिरण्यगर्भ, आदित्य, गाणपत्य प्रभृति सम्प्रदायों के आचायों को परास्त करते हुए शङ्कराचार्य बौद्ध धर्म के अनुयायी राजा हिमशीतल की नगरी काञ्ची पहुँचे तथा वहाँ बौद्धाचार्यों को शास्त्रार्थ में परास्त करके सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। यहाँ भी उन्होंने दो वैदिक-धर्म-प्रचार केन्द्रों ‘विष्णुकाञ्ची’ व ‘शिवकाञ्ची’ की स्थापना की।
 
आत्मदर्शन द्वारा क्षुद्र आत्मा महान् आत्मा में परिणत होता है। क्षुद्र मानव ब्रह्मज्ञ होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ‘ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति’। शङ्कराचार्य ने ब्रह्मत्व लाभ का यही पथ प्रकट रूप में जगत् के सामने उपस्थित किया। सुनीति एवं सद्धर्म ही उन्नति का सर्वोत्तम मार्ग है अतः, जो अधर्म एवं कुरीतियों को हटाकर इनकी प्रतिष्ठा करते हैं, वो महापुरुष कहलाते हैं। शङ्कराचार्य ने तत्कालीन वाममार्गियों एवं बौद्ध धर्म के विकृत रूप को विस्थापित करके सनातन धर्म पुनः प्रतिष्ठित किया। इनके इतिवृत्त एवं जीवन-चरित्र का अनुशीलन हमें अपने देश के गौरवशाली इतिहास का दिग्दर्शन कराता है एवं अपनी संस्कृति व सभ्यता के रक्षार्थ सतत प्रेरणा भी देता है।