सर्वरूप अटल : हम सब अटल, हम सबमें अटल

Alok Dwivedi

-Alok Kumar Dwivedi

अटल जी का व्यक्तित्व एवम् जीवन

अटल बिहारी वाजपेयी निहसंदेह भारतीय लोकतंत्र के प्राणपुरुष रहे। ग्वालियर में जन्मे अटल जी को कवि हृदय अपने पिता जी से विरासत में प्राप्त हुई। अटल जी के सम्पूर्ण जीवन में उनका द्रवित कवि हृदय प्रवाहमान रहा। आजकल प्रशासन में नैतिकता की विवेचना करते हुए जो सर्वप्रमुख गुण बतलाया जाता है वह है- ’सम्वेगात्मक बौद्धिकत’ अर्थात् प्रज्ञा और हृदय का सम्मिलित शासन। इस अवस्था में हृदय (भावनाओं) का निर्णयन में महत्वपूर्ण स्थान होता है। भारत में प्रधानमंत्री के रूप में अटल जी अपने इसी गुण के लिए अजातशत्रु के रूप में भी सम्बोधित किए गये। समाजिक व्यक्ति के जीवन में किस प्रकार से बदलाव लाया जाय, उनके जीवन को किस प्रकार से ख़ुशहाल किया जाय, लोकतंत्र में उनकी आवाज़ को सड़क से लेकर संसद तक किस प्रकार से गतिमान किया जाय ये सारी बातें ही अटल जी के अटल अंतस में प्रवाहित होती रहती थी। इसे मूर्त रूप प्रदान करने हेतु अटल जी ने अपना सम्पूर्ण जीवन तपस्या रत रखा। अटल जी का जीवन इतने आयामों को संजोये रहा है कि उनके महाप्रयाण कर जाने पर लोग उनके जीवन के एक-एक पक्ष को अपने में प्रतिबिम्बित होते देख रहें हैं। माता-पिता के प्रति सम्मान का भाव रखने वाला व्यक्ति अटल जी के बचपन में अपना बचपन देख रहा है, पिता से मित्रवत रहने वाला बालक अटल जी के कॉलेज के दिनो में उनमें ख़ुद को देख रहा है क्यूँकि अटल जी कानपुर के डी०ए०वी० कॉलेज में लॉ की पढ़ाई में अपने पिता जी के ही साथ एक ही कक्षा में पढ़ते थे और मित्र की भाँति हॉस्टल के एक ही रूम में रहते थे। पत्रकार अटल जी में पत्रकार देखते थे क्यूँकि प्रारम्भिक दौर में अटल जी पत्रकार थे। छात्र राजनीति में भी अटल जी कॉम्युनिस्ट छात्र विंग एस॰एफ०आई॰ से जुड़े रहे तो छात्र राजनीति में रुचि रखने वाले भी उन्हें अपने आदर्शों में मानते रहे हैं। राष्ट्रप्रेम के भावों से ओतप्रोत हो स्वाधीनता, स्वाभिमान और लोकतंत्रात्मक मूल्यों हेतु राष्ट्रीय महत्व के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी करने वाले लोग अटल जी में ख़ुद को प्रतिबिम्बित मानते हैं। 1930 के दशक के मध्य में अटल जी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सक्रिय रूप में जुड़कर स्वतंत्रता आंदोलनों में भागीदारी दी। उन्होंने इस दौरान विभिन्न छात्र संगठनों के छात्रों को स्वतंत्रता आंदोलनों में भागीदारी सुनिश्चित की। आंदोलनों में सफलता या असफलता के पश्चात् किसी संगठन से वैचारिक स्तर पर मतभिन्नता होने पर नए संगठन की आधारशिला रखने वाले लोग अटल जी में अपना यह रूप देखते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् कश्मीर के मुद्दे पर विचारों की सहमति न होने पर डॉक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जब जनसंघ की नींव डाली तो अटल जी इसके संस्थापक सदस्य रहें। जो लोग अपनी कार्यक्षमता से किसी-किसी के दिल में विशेष स्थान बना लेते हैं वे लोग  भी स्वयं को अटल जी में देखते हैं। अटल जी की कार्यशैली से अत्यंत प्रभावित होकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने उन्हें संसद सदस्य बनाने हेतु तीन जगहों से लोकसभा का उम्मीदवार बनाया था अपनी कार्यशैली से विरोधियों को भी आत्ममुग्ध करने की शैली रखने वाले अटल जी में ख़ुद को देखते है । यद्यपि नेहरू जी के प्रधानमंत्री रहते हुए संसद में अटल जी कांग्रेस की नीतियों के प्रखर आलोचक रहे परन्तु उनकी वाक्शैली, कार्यक्षमता और जनहित के मुद्दों को प्रभावी रूप से उठाने से मुग्ध होकर नेहरू जी ने एक बार विदेश से आए प्रतिनिधिमंडल से इन्हें मिलवाते हुए कहा था कि यह लड़का भविष्य में इस देश का प्रधानमंत्री बनेगा। हिंदी, हिन्दू और हिंदुस्तान में आस्था रखने वाले लोग भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं जनता पार्टी की सरकार में विदेश मंत्री के रूप में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का पक्ष रखते हुए अटल जी ने अपना भाषण हिन्दी में देते हुए आपातकाल के पश्चात् भारत में हुए लोकतांत्रिक स्थिरता को मज़बूती से लोगों के सामने रखा। अपनी कविता “हिन्दू तनमन हिन्दू जीवन” में हिंदुत्व के बारे में श्रेष्ठ प्रतीकों का प्रयोग कर हिन्दुत्व का विचार दृढ़ किया। जीवन जीते हुए अपने स्वाभिमान और अपने विचारों से कभी समझौता न करने वाले भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं। अटल जी ने जब भारतीय जनता पार्टी की स्थापना की तो संसद में इसके मात्र दो सदस्य थे परंतु अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा और स्वाभिमान के आत्मबल से जन सरोकार के मुद्दों को निरन्तर प्रभावी रूप से सदन के पटल पर रखते हुए एक दिन सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आए और दुनिया  सबसे बड़े लोकतंत्र में सरकार बनाकर यह दिखा दिया कि यदि जीवन में निरन्तर हम नैतिकता के पथ पर चलते हैं तो निश्चित ही एक दिन सफलता ज़रूर प्राप्त होगी। व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और मूल्यों को आत्मसात करने वाले लोग भी अटल जी के जीवन के एक पक्ष में ख़ुद को देखते हैं। जब संसद में सरकार को बचाने के लिए एक सदस्य की आवश्यकता थी तब भी ख़रीद फ़रोख़्त की राजनीति से ख़ुद को दूर रखते हुए अपने आदर्शो से समझौता न करते हुए विपक्ष में बैठना स्वीकार किया। १३ दिन के अल्पकालिक सरकार के गिर जाने पर अटल जी के संसद में दिए गये भाषण को लोकतंत्र के श्रेष्ठ राजनीतिक मूल्यों का आप्तवाक्य कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। संसद में भाषण के दौरान अटल जी ने कहा था कि “सरकारें आएंगी-जाएंगी, पार्टियां बनेंगी-बिगड़ेंगी पर यह देश रहना चाहिए…इस देश का लोकतंत्र अमर रहना चाहिए….” इन मूल्यों के साथ अटल जी राजनीति में आगे बढ़ते गये। समाज में वे लोग जो आपसी साझेदारी और सहयोग से किसी साध्य की तरफ़ गति करने को श्रेयस्कर मानते हैं वें भी अटल जी में स्वयं को देख सकते हैं। अटल जी ने लगभग २५ पार्टियों को साथ मिलाकर केंद्र की सरकार को सफलतापूर्वक नेतृत्व प्रदान किया यह स्वयं में अद्भुत रहा। इस दौरान देश के जनहित के मुद्दों को भी अटल जी ने सामंजस्यपूर्वक हल करने का प्रयास किया। कवि जो जीवन और जगत की यथार्थता को प्रकट करते हुए अपनी बातों में भविष्य के अंकुर प्रस्फुटित करता है वह भी अटल जी में स्वयं को देख सकता है। अटल जी विशाल हृदय वाले कवि जो जनसामान्य के अंतस के भावों को शब्दों के द्वारा प्रकट कर शासनसत्ता पर बैठे लोगों को उनके कर्तव्यों के निर्वहन हेतु प्रेरित करते रहे। अटल जी की ख़ूबी यह रही कि जब उन्होंने ख़ुद शासन सत्ता की बागडोर सम्भाली तब उन्होंने ख़ुद को भी काव्य के माध्यम से अपने कर्तव्यों और दायित्वों का बोध कराना जारी रखा। जो लोग एक कुशल प्रशासक के रूप में हैं वे भी अटल जी में ख़ुद को देखते हैं। अटल जी दूरदर्शी प्रशासक थे और प्रशासन में सम्वेगात्मक बौद्धिकता को अत्यंत महत्व देते थे। वे अपने पड़ोसियों से सम्बंध को सुधारने के पक्षधर थे और इस क्रम में पाकिस्तान के लाहौर तक मैत्री बस सेवा को प्रारम्भ कर वहाँ स्वयं गये और मित्रता का हाथ बढ़ाया परंतु वहीं दूसरी तरफ़ जब पाकिस्तान ने कारगिल पर हमला किया तो सेना का साहस बढ़ाते हुए भारत के पराक्रम और शौर्य को कम नहीं होने दिया। अमेरिका की तमाम पाबंदियों के बावजूद पोखरन परीक्षण विश्व पटल पर भारत की उपस्थिति का आभास कराया। सर्व शिक्षा अभियान “सब पढ़े सब बढ़े” और स्वर्णिम चतुर्भुज योजना उनकी दूरदर्शिता को प्रकट करती है। एक प्रशासक के रूप में अटल जी पंडित दीन दयाल जी के अंत्योदय के विचार को आत्मसात करते हुए नीति निर्माण करने और उसको मूर्त रूप प्रदान करने को सदैव प्राथमिकता देते रहे। एक प्रशासक के रूप में वह समावेशी विकास के पुरोधा माने जाते हैं।

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अटल जी की विचारधारा

लोकतंत्र के प्रहरी अटल जी में स्वयं की दूरदर्शी राजनीति को प्रतिबिम्बित पाते हैं। एक बार संसद में केवल दो सदस्यों के होने पर कांग्रेस द्वारा उपहास करने पर अटल जी ने कहा था कि “आज आप लोग हमारी संख्या बल पर हँस रहें हैं, एक दिन ऐसा आएगा जब केंद्र सहित अन्य सभी राज्यों में हमारी सरकार होगी, हम सत्ता पक्ष में होंगे और आप विपक्ष में होंगे“। इस दृष्टि से अटल जी काल के चक्र घूर्णन को शाश्वत मानते थे। आज जो देश की राजनीतिक दशा है वह उनकी बातो को यथार्थ धरातल प्रदान करती हैं।

वैदिक मूल्यों के पक्षधर  ’अटल जी’ 

अटल जी इस प्रकार अन्य से भिन्न रहे। एक प्रखर राष्ट्रवादी के रूप में वह भारतीय संस्कृति और मूल्यों के उत्थान हेतु सदा प्रतिबद्ध रहे। सामान्यतः यह देखा जाता है कि राजनीतिक लाभ के लिए लोग जाति, धर्म, पंथ इत्यादि के आधार पर समाज को विभक्त करते हैं और अपना लाभ लेने की कोशिश करते हैं पर अटल जी सदा मूल्यों से युक्त राजनीति के पक्षधर रहे। मूल्य वैदिक परम्परा का आधार स्तम्भ रहा है और जब भी व्यक्ति अपने विचारों और कार्यों से मूल्यों के संवर्धन में योगदान करता है तो निश्चित ही वह कहीं न कहीं वैदिक परम्परा का ही संवर्धन करता है। वैदिक सभ्यता के इतिहास के लगभग 5000 वर्ष से अधिक के राजनीतिक इतिहास में सदा ही एक महत्वपूर्ण बात रही कि यहाँ राजनीति का धर्म रहा है, धर्म की राजनीति नहीं रही।अटल जी ने अपने कार्यों और व्यवहार से सदा ही राजनीति के धर्म की वकालत की जिसका ध्येय वाक्य रहा कि समाज में सदैव ही बिना किसी भेदभाव के समाज के समस्त वर्गों के हितो का संरक्षण करना और साथ ही समाज के वंचितो और पिछड़े तबक़ों के उत्थान के प्रयास किया जाय। एक समय देश में ऐसी स्थिति आयी जब लोग बच्चों के प्राथमिक स्तर की शिक्षा से अपने दायित्वों से विमुख होने लगे। इसके परिणाम स्वरूप देश में प्राथमिक स्तर के बच्चों में स्कूल छोड़ने की संख्या में व्यापक बढ़ोत्तरी हुयी। निश्चित ही किसी देश के लिए यह एक काफ़ी विमर्श का विषय होता है। अटल जी जैसे कवि हृदय को काफ़ी व्यथित करने वाली बात थी। इस संवेदना को महसूस करते हुए अटल जी ने शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार अधिकार माना। इसे मूल कर्तव्य की श्रेणी में भी डाला गया। इसके परिणामस्वरूप प्राथमिक स्तर की शिक्षा में बच्चों की संख्या में काफ़ी सुधार हुआ। भारत को परमाणु शक्ति बनाने के सम्बंध में अटल जी का संसद में यह सीधा वक्तव्य था कि देश को अपने सुरक्षा मानकों को लेकर सदा सचेत रहना चाहिए और हर प्रकार से सदैव तैयार रहना चाहिए। पड़ोसियों को लेकर भी अटल जी काफ़ी उदार रहे। वह सदा ही कहा करते थे कि पड़ोसियों से सम्बंध मधुर रखना एक कुशल रणनीति का हिस्सा है क्यूँकि पड़ोसी बदले नहीं जा सकते। इसी आधार पर उन्होंने पाकिस्तान से सम्बंधो को नया आयाम देते हुए भारत पाकिस्तान मैत्री बस सेवा भी शुरू की पर जब पाकिस्तान ने कारगिल पर आक्रमण किया तो उसका भी मुँहतोड़ जवाब देने से बाज़ नहीं आए।

अटल जी का महाप्रयाण अटलसत्य मृत्यु को साहचर्य प्रदान करने जैसा है। जिस प्रकार से संस्कृत का यह प्रसिद्ध श्लोक है-

   “ ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥”

अर्थात् वह जो दिखाई नहीं देता है, वह अनंत और पूर्ण है। यह दृश्यमान जगत भी अनंत है। उस अनंत से विश्व बहिर्गत हुआ। यह अनंत विश्व उस अनंत से बहिर्गत होने पर भी अनंत ही रह गया। इसी प्रकार अटल, अटल मृत्यु से समागम कर अटल सत्य ही रह गया। ना ही कुछ ह्रास हुआ ना ही कुछ वृद्धि हुई।

-Alok Kumar Dwivedi, Research scholar, Department of Philosophy, University of Allahabad

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Relevance of Gandhi in Today’s World

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Dr. Anju Seth

Looking at the present state of affairs in India, the birthplace of Gandhi, one would probably surmise that Gandhism, whatever the term may mean, cannot have any relevance in this twenty-first century. Gandhi is rightly called the Father of the Nation because he single handedly stood up against the mighty British Empire, without any arms, and brought her independence. However, today, Gandhi is mostly forgotten and his relevance questioned even by his ardent devotees. Today Gandhi is remembered in India mostly on his birthday which is celebrated as a national holiday rather as a ritual.

Gandhiji Line Drawings (1)

(Source of Image : http://devang-home.blogspot.com/2011/08/sketches-of-mahatma-gandhi.html)

As a matter of fact, India is not following any of Gandhi’s teachings which are mostly confined to text books. In fact, since independence, the country has witnessed many violent communal riots in this multi communal country. Gandhi’s message of ‘swābalambī’, self-sufficiency with home spun ‘khādī’ cloth is not used now-a-days even as a social slogan. Statistics shows that the country is definitely not following ‘sarvodaya’, a broad Gandhian term meaning ‘universal upliftment’ or ‘progress of all’ reaching the masses. On the contrary, India today has the unique distinction of being the only country in the world which has the richest man in the world while at the same time more than 30 per cent of its population lives in dire poverty.

The above shows that today, Gandhism is a very confused ‘ism’ in India. Today many politicians in India use the term merely as a slogan and the common man make Gandhi almost out of reach of the younger groups by making Gandhi an unwilling ‘avatāra’. That may be one reason why the only photo we see of Gandhi in India is always that of an old man which brings the image of a very simple and pious man who was meek and mild like Jesus Christ. While Gandhi was not a simple man to say the least, the above does not gives the right image of Gandhi and does not bring any inspiration to the younger group, the group most relevant for Gandhi.

But Mahatma Gandhi, in this twentieth century, produced a very sophisticated approach because he implemented that very noble philosophy of ahimsā in modern politics, and he succeeded. That is a very great thing.”

And that is precisely the greatness of Gandhi and that is the message of Gandhi to the modern world. In the past century many places in the world have been drastically changed through the use of brute force, by the power of guns the Soviet Union, China, Tibet, Burma, many communist countries in Africa and South America. But eventually the power of guns will have to be changed by the will of the ordinary people. If we try to analyze the secrets of Gandhi’s success, we would probably find Faith and Action and Populism, the three most important aspects of his life. Gandhi’s extra ordinary communion with the masses of ordinary people was another of his secrets. In contrast to many of our present day leaders of this highly democratic world, Gandhi was a true leader and friend of the people. Disaku Ikeda, the Japanese Buddhist leader who takes great inspiration from Gandhi has this to say about him. “His activism is not mere action but contains many aspects of a spiritual practice that is inspired by the inner urging of the conscience”.

The phenomenal success Gandhi registered in far-away South Africa fighting for human rights and civil liberties has great significance when we find that later his teachings were adopted not only by Nelson Mandela, the South African freedom fighter, but it was also subsequently revealed that the former South African president De Klerk was greatly influenced by Gandhi’s principles. In fact, from Dalai Lama to Desmond Tutu and from Martin Luther King to Nelson Mandela, many world leaders were inspired by Mahatma Gandhi, all in their own different ways.

Gandhi left many valuable sayings for the modern man to fight for goodness in society in a non-violent way. “Good” Gandhi said “travels at a snails pace.” “Non-violence” Gandhi said “is a tree of slow growth. It grows imperceptibly but surely.” And then “Mere goodness is not of much use.” Gandhi stated. “Goodness must be joined with knowledge, courage and conviction. One must cultivate the fine discriminating quality which goes with spiritual courage and character.” The modern man can also take great wisdom from what Gandhi said the seven social sins: Politics without principles; Wealth without work; Commerce without morality; Education without character; Pleasure without conscience; Science without humanity; Worship without sacrifice.

It was the unique non-violent movement under his leadership that earned for India freedom from the colonial rule. In spearheading the campaign against the alien rule, Gandhiji adopted the innovative techniques of civil disobedience and social transformation, which had several exemplary features.

The Gandhian technique of mobilizing people has been successfully employed by many oppressed societies around the world under the leadership of people like Martin Luther King in the United States, Nelson Mandela in South Africa, and now Aung Saan Sun Kyi in Myanmar, which is an eloquent testimony to the continuing relevance of Mahatma Gandhi.

In India, economic development has been mostly confined to the urban conglomerates. In the process, the rural India that comprises 700 million people has been given short shrift. Gandhiji’s philosophy of inclusive growth is fundamental to the building of a resurgent rural India. He believed in “production by the masses” rather than in mass production, a distinctive feature of the industrial revolution. It is surprising, even paradoxical, that these days Gandhian philosophy should find increasing expression through the most modern technology! Now, it is possible to establish small-scale and medium-scale factories in smaller towns and remote corners of the country, thanks to the phenomenal innovations in communication and information technologies. New technologies have brought in widespread and low-cost electronic connectivity that enables instantaneous contact between industrial units and the sellers and consumers of their products. Location and logistics are no more a limitation or constraint for industrial development.

If we say that the twenty-first century is the century of the common man, then we see that Gandhism has even more relevance in this age, and Gandhi will inspire generations of individuals fighting for goodness of the society. If today we find that Gandhism is in severe test in countries like India, it is not because there is certain inherent weakness in Gandhism, but it is because we have not seen in India strong leaders with the required courage and conviction to fight the evils in society. We may borrow Gandhi’s own words on Ahimsā, and say that Gandhism is only for the courageous people.

-Dr. Anju Seth, Associate Professor, Department of Sanskrit, Satyawati College (Day), University of Delhi, Delhi, India

स्वतंत्रता की भारतीय शैली

-प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

Independence का वास्तविक अर्थ आत्मनिर्भरता है। In का अर्थ है inside अर्थात् आत्मा के स्तर तक पहुँचना और फिर उसी पर निर्भर होना अथवा dependent हो जाना। जब व्यक्ति आत्मश: कार्यरत होता है तो उसका आत्मबल सदैव पुष्टित होता रहता है। उसके लिए सारा जग आत्मीय बन जाता है। वह ‘अयम निज: परोवेति’ की गणना लघुचेतीय समझता है। उसके अंत:करण में चिरक़ालीन उदारता झकोरे लेने लगती है, तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सम्मत भाव जागृत हो जाते हैं। यहाँ तक कि उनके यहाँ ‘संताने तनय व तनया’ तक न सीमित रहकर आत्मज और आत्मजा के रूप उत्पन्न होने लगती हैं अर्थात् आत्मबीज ही अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित. व फलित होता है। ‘अहम् ब्रह्म अस्मि’ की अनुभूति सार्थक हो जाती है। ये है independence की वास्तविक महिमा! ये एक दिन में सीमित नहीं हो सकता, ये तो कल्पों का माजरा है जनाब!!

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Independence का दूसरा अर्थ है है स्वाधीनता, अर्थात् अपने को पूरी तरह से पहचान कर उसके आधीन हो जाना अथवा उसी की सत्ता के आधीन कार्यरत हो जाना। अपने को पहचानने का अभिप्राय है अपने धर्म को पहचानना, और उसी आधार पर गुण और कर्म निर्धारित करना। स्वधर्म की पहचान का तात्पर्य है अपनी प्रकृति को गहराई से समझना, बूझना, और परखना। जब व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है तब अपनी प्रकृति को ही आधार बनाकर उसी में श्रद्धा एवं भक्ति से संलग्न होकर कर्म करता है। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं करता। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसका उद्धरण इस प्रकार किया है- ‘स्वधर्मे निधनम श्रेय: परधर्मों भयावह’, अर्थात् अपने धर्म के अनुसार आचरण में सबकुछ मिट जाना भी श्रेयस्कर है। यही नहीं किसी अन्य के धर्म अर्थात् प्रकृति का आचरण भयावह होता है इसलिए स्वाधीनता अत्यंत आवश्यक मानवीय दशा है जो मानव ही नहीं बल्कि पूरी समष्टि के लिए कल्याणकारी है।

Independence का तीसरा अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात् अपना ही तंत्र होना चाहिए चाहे वो पारिवारिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, शैक्षिक हो, अथवा राजनीतिक हो। दूसरों की व्यवस्था यद्यपि उनके लिए कितनी भी उच्च एवं सराहनीय क्यों न हो किसी और के लिए तनावपूर्ण, बलाघाती, भयंकर कलह का कारण बन सकती है। अतः किसी भी देश को एक ऐसी व्यवस्था का सृजन करना चाहिए जिसके अंतर्गत हर एक व्यक्ति को सम्पूर्ण मुक्ति रहे कि वह व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक स्तरों पर अपने ही तंत्र के अनुकूल जीवन यापन कर सके। यह व्यवस्था बाह्य रूप से प्रारम्भ में अनेकता के सिद्धांत पर ही आधारित हो सकती है, अर्थात् कोई uniform civil code नहीं, कोई संविधान नहीं, कोई अधिवक्ता या न्यूनतवक़्ता नहीं, कोई AC में विराजित न्यायाधीश नहीं। मात्र धरातलीय प्रबुद्धजनो की आवश्यकता होती है जिनमे आचार विचार से आत्मबोध झलकता हो। वही सर्वभूतानाम की स्वतंत्रता सुनियोजित व  सुनिश्चित कर सकते है इसीलिए भारत ऋषियों का देश रहा है, स्वतंत्रता के लिए। आधुनिक स्वतंत्रता दिवस  को प्रेरणा का आधार मानकर स्वतंत्रता को शाश्वत बनाने के लिए संकल्पित हों, और इसी का पर्व मनायें आज and forever!! शुभम्

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

योग का तत्कालीन क्रियात्मक बोध

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

योग: सत्तस्य पर्याय: तस्य सार्थकेव मानव जीवनस्य लक्ष्य:।

योग सत्य का पर्याय है, उसी को सार्थक बनाना जीवन का उद्देश्य है।

वैसे तो सत्य एक सरल सी धारणा है पर अधिकतर व्यक्तियों को इसका बोध नहीं हो पाता है। इसका मुख्य कारण है कि व्यक्ति कुछ विशेष वस्तुओं, स्थानों, लोगों, अथवा बातों से ही जुड़ता है और उसी को मानक बनाकर अपना दृष्टिकोण निर्धारित कर लेता है।

जैसे कि वस्तुतः व्यक्ति परिवार से या माँ से जुड़ता है और उसे प्रेम करता है। यदि उस माँ के प्रेम को सीमित न करके उसे प्रेम के अभ्यास की प्रक्रिया मान ले तो उसी प्रेम भाव को औरों के साथ जोड़ सकता है। तभी माँ के प्रेम की सार्थकता हो सकती है ठीक उसी तरह जैसे कि स्कूल में गणित सीख कर हम उसका जीवन के अन्य पहलुओं में उपयोग करते हैं।

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इस अवधारणा को प्रथम स्तर पर हम योग अभ्यास से समझ सकते हैं। स्थूल रूप से आसन एवं मुद्राएँ हमारे मन को शरीर के उन भागों पर केंद्रित करते हैं जहाँ आसन के कारण ज़ोर पड़ता है। इसका अभ्यास करते-करते हम अपने मन को इस तरह अपने वश में कर पाने में ऐसे सफल हो जाते हैं कि आसन के बिना भी अँगो और प्रत्यंगो पर ध्यान दे लेते हैं। यही प्रक्रिया हमें जुड़ने की वास्तविक विद्या प्रदान करती है। इस विद्या को ही सूक्ष्म रूप में प्राणायाम के द्वारा शरीर के उन कोशिकाओं और अणुओं परमाणुओं तक जोड़ा जा सकता है जो की हमारी ज्ञानेंद्रियों से परे होते हैं। यही शारीरिक आसन और प्राणायाम के अभ्यास हमें हर किसी से जुड़ने की योग विधि बताते हैं।

उपर्युक्त अभ्यास से जो ज्ञान प्राप्त होता है उसके उपयोग से जब हम संसार में बिना किसी भेद भाव (प्रत्याहार अभ्यास के अंतर्गत) समस्त प्राणियों से जुड़ते हैं तभी उनके जीवन सत्यार्थ से परिचित हो पाते हैं।

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(Source of Image : Prof. Singh with his younger daughter)

अथ योग: सत्यार्थ परिचायक:। ॐ!!

Honoring the Father

– Prof. Bal Ram Singh

In a country where मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, एवं आचार्य देवो भव have been the norms, designating Mother’s Day and Father’s Day may sound like a demotion of mothers and fathers. Instead, it is considered as a much needed appreciation of them in the western world.

There are several peculiarities surrounding the origin and establishment of Father’s Day here in the United States, where it is an official holiday. Interestingly, efforts to establish both Mother’s and Father’s Days were led by daughters, not sons, and both were in fact initiated by the Church (Mother May or Mothering Church for Mother’s Day and St. Joseph’s Day for Father’s Day).  While Father’s Day was established over 50 years after the Mother’s Day was already an official holiday, (in fact, after many more failed attempts at establishment than Mother’s Day) both holidays were in fact initially rejected by the US Congress: they jokingly extrapolated a future need of a “Mother-in-Law’s Day”.  Eventually, both holidays were proclaimed by presidential orders. However, the more sincere criticism from congress was that establishing appreciation for parents as holidays would lead to commercialization of these occasions, reducing a heart-to-heart moment to a hand-to-hand exchange of gifts.

During debates over the establishment of Father’s Day, it was common to argue that one parent (mother) cannot be recognized while the other (father) is not. The division of parents into distinct categories like “matriarchal” and “patriarchal” can be seen more as a lens perpetuated in my opinion by some modern social scientists than actual truth. Even in the animal kingdom, where the complexities of human society, tradition, culture, and philosophy do not exist, a child is often cared by both mother and father.  The social interpretation of the culture (sanskriti), traditions (parampara), and philosophy (darshan) needs narrational perspective and an integrative approach. Matri sattatmak (matriarchal) and Pitre sattatmak (patriarchal) societies inherently mean the motherhood and fatherhood, not simply woman and man as is generally implicated by social activists. Therein lies the narrative problem.

Indian cultures exhort raising of woman to the motherhood in perspective (not necessarily giving birth, although that reinforces it automatically). In India the nation is called motherland whereas in the West it is fatherland. Ancestors are referred to as पूर्वज in India whereas forefathers in America in a social context. Wikipedia lists 60 countries which call their native country as fatherland. Ancient Greek, Patris, fatherland, led to Latin Patrios, and finally into Patriotism. Thus father figure is a dominant cultural ethos of the western world.

In India it is, of course, Mother India or भारत माता, that is the war cry for the land. I had heard from a Swami ji (but could not find myself in any literature) that in Indian culture a child is most fortunate whose father is a dharmatma and whose mother is a pativrata. This is far cry from the competing dominance portrayed by the reference such a society as matriarchal vs. patriarchal, which Indian intellectual class apes it.

The combined differences between how Eastern and Western cultures view and treat motherhood and fatherhood indicate clearly that there is no simple mapping of words or cultural concepts from one onto the other. When comparing the two, one needs to understand the context in which terms, language, and celebrations are framed. Learning from other cultures is good, but doing so without an understanding of the differing perspectives, and without an appreciation for our own way of seeing the world, is counter-productive.

There is a book written with the title of ‘Dharti Mata aur Pita Akash’ by Pushpa Sinha, and of course the favorite Hindi song, Dharti meri mata pita Akash from Geet Gata Chal Hindi movie (1975) shows the complementarity of parents for appropriate care and growth of a child. Nevertheless, Indian culture is matriarchal right from the pauranic concept of Adya as the origin of tridevas and tridevis.  Even in modern times at least 500 years ago in Tulsi Ramayana, there is a clear mention that mother holds higher position than the father – जौ केवल पितु आयसु ताता, तौ जिन जाउ जानि बड़ि माता -as stated by Ram’s mother, Kaushalya. So, while Kerala tradition may be matriarchal (or maybe ladyarchal to be more appropriate). The matriarchal tradition of India as per Ramayana standards is widespread in the culture.

Once that narrative is accepted, it is then possible to integrate with the famous Manusmriti idea of ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता…’, which needs to be interpreted as, where women reach the status or level  of being worshiped (implying only motherhood) even gods frequent that place for pleasure.

There is much to learn from Indian philosophy as to what a mother is to be – life giver, guru, teacher, god, etc., which is what elevates her to the level of worship, not those who hire maids to take care of their children or those who do not have education, training, knowledge, and resources.

A father is a gyan guru, and is expected to give diksha to the son, and perhaps daughter by the time of the upanayana sanskar (there are instances where daughters undergo upanayana sanskar). In this ritual, the father utters some secret mantra (usually Gayatri mantra) in the ears of the child at the ceremony. This indicates the conclusion of education from father and commencement of the education from Guru. In the story of the Ganesha his father Shiva cuts off Ganesha’s head, eventually replacing it with the head of an elephant at the behest of Ganesha’s mourning mother Parvati.  Instead of taking only the story’s literal meaning, we can instead see symbolically Shiva playing his true role as a father: removing Ganesha’s ignorance, as symbolized by the head he was born with, and replacing it with a much larger head of an elephant, symbolizing his newly gained wisdom.

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(Image : Prof. Singh and his son)

In my own personal life, living in America, I try to emphasize on Father’s Day what a father is supposed to do on a regular basis: I normally cook breakfast for the family showing my cooking ability and skills (all three children learned formal cooking from me rather than their mother who is obviously more skillful at cooking than I am); I then make sure to mow the lawn, which I do despite my wife’s advice of hiring landscaper (quite common in United States); we spend time relishing some father-child memories; finally, I give some fatherly advice (lecture!!) to my children. I do not like to be pampered by any special treatment or gifts from children, as that encourages commercialization (the original concern of US lawmakers in opposing declaring Father’s Day an official holiday), and reduces the idea to materialism, which is quite different from what I consider my children as संतानाः, as in सम्यक तान्यते ते संतानाः those who reflect not only my material body but also my subtle body (ethereal, astral, mental, and spiritual) and spiritualism. May all of us have a Father’s Day by becoming and having संतानाः!

Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA 

माता की अवधारणा

मदर्स डे पर विशेषविमर्श

-डॉ. शशि तिवारी

 

यह संसार भगवान् की अद्भुत रचना है। भगवान् के इस सृजन का हम सब प्राणी उपभोग करते हैं। रचयिता होने से ही ईश्वर को ‘माता’ कहते हैं – त्वमेव माता च पिता त्वमेव । माना गया है कि हम सब ईश्वर के अंश हैं। तो जो गुण ईश्वर में हैं वे प्राणियों में भी हो सकते हैं या कि प्राकृतिक रूप से होने चाहिए। मातृत्व एक ऐसा ही गुण है। केवल मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी भी किसी न किसी प्रकार के सर्जन और निर्मिति की कला में निपुण देखे जाते हैं। हर किसी में रचनाधर्मिता होती है- कभी कम कभी अधिक। तभी देवी की स्तुति में कहा गया है –

            “या देवी सर्वभूतेषु मातॄरूपेण संस्थिता। 

            नम: तस्यै नम: तस्यै नम: तस्यै नमो नम:॥”

वेद में माता-पिता के युग्म को ‘मातरा’ या ‘मातरौ’ कहते हैं यानी माता और पिता दोनों माता ही हैं। इसी तरह द्यावापृथ्वी का नाम ‘मातरा’ है; पृथ्वी हमारी माता है और आकाश पिता। सांसारिक माता और पिता के जोडे के लिए ‘पितरौ’ या ‘पितरा’ शब्द भी प्रयोग में आए हैं; यानी दोनों ही पिता हैं। यह ठीक वैसे ही है जैसे पति-पत्नी के युग्म को ‘दम्पती’ कहते हैं। भारतीय मनीषा ने शब्दों में ही जीवन-मूल्यों को सूत्र में मणियों कि भांति पिरोया हुआ है। तात्पर्य है कि महत्व की दृष्टि से माता और पिता लगभग समान ही हैं। इसीलिए कहते हैं – ‘मातृ देवो भव, पितृ देवो भव’। परंतु जब बात जनन की होती है तो जनि, जनी, जनयित्री आदि नामों से मां को जाना जाता है क्योंकि वह उत्पन्न करने वाली है। केवल उत्पन्न ही नहीं उसके बाद जो लालन-पालन की आवश्यकता है वह भी वही करती है। एतदर्थ उसमें स्नेह और ममता की आवश्यकता है और इसके वाचक अंबा, अम्बि, अम्बी आदि शब्द मां के लिए वेद में प्राप्त होते हैं। इन सब नामों से माता जननी, स्नेहमयी, पूजनी्य़ा, आत्मीया बतायी गयी है। उत्पन्न करने वाली का साक्षात् स्वरूप ‘माता’ पद में दिखाई दे्ता है, इसलिए उसे इस सम्मान से विभूषित किया गया है कि वह जननी है और ईश्वर के समकक्ष है।

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(Source of image : https://www.pinterest.com/pin/31806741093104880/)

सतत् स्मरणीय है कि साक्षात् माताएं हमारी सम्माननीय हैं; क्योंकि ‘मातृत्व’ मानवीय गुणों में सर्वोपरि है। रचना करना तथा पालन करना – प्रत्येक मनुष्य का धर्म कर्म होना चाहिए, तभी सामजिक संतुलन बना रह सकता है। जब हम मातृ-दिवस मनाये तो ये याद रखें कि यह अपने दायित्वों को वहन करने की शिक्षा देने वाला दिन है। यह रचनाधर्मिता का दिन है या फिर रचनाधर्मिता के अभिनंदन का दिन!

– डॉ. शशि तिवारी,अध्यक्ष, वेव्सभारत