योग: कर्मसु कौशलम्

[It was broadcasted by International Broadcast service, All India Radio, New Delhi in 2016 on the occasion of International Yog Day]

डॉ. श्यामदेवमिश्र

‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृतेतस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है। योग के इस हेतु को स्पष्टतया जानने के लिये, सबसे पहले यह समझना परमावश्यक है कि ‘योग क्या है’? या ‘योग किसे कहते हैं’?

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गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – समत्वं योग उच्यते(२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – पश्य मे योगमैश्वर्यम्(९/५); और ३ समाधि; जैसे – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया(६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“समत्वं योग उच्यते”(गीता २/४८)

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

‘योग: कर्मसु कौशलम्’  के दो अर्थ लिये जा सकते हैं –

1. कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।

२. कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।

यदि हम पहला अर्थ लें यानि कर्मों में कुशलता ही योग है तो, जो बड़ी ही कुशलता से सावधानी से ठगी, चोरी या फिर हत्या आदि कर्म करता है उसका कर्म भी ‘योग’ हो जाएगा! किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और फिर श्लोक में निषिद्ध कर्मों का प्रसंग भी नहीं है। अगर हम यहाँ ‘कर्म’ शब्द से केवल शुभ कर्मों का ही ग्रहण करें तब फिर ‘कर्मसु कौशलम् योग:’ इस पद के दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में भावार्थ निकलेंगे जो प्रसंग-विशेष में तो ठीक प्रतीत होते हैं किन्तु गीता में प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग के सिद्धांतों से इतर सिद्ध होते हैं। आइए उन दोनों पर ही गौर करते हैं –

शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

अब यहाँ प्रश्न यह है कि उक्त दोनों ही भावार्थ, गीता में प्रतिपादित योग की संकल्पना से किस प्रकार भिन्न हैं? इसको समझने के लिए योग की परिभाषा को समझना होगा, जिसमें कहा है  –

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है। इस श्लोक की व्याख्या में कई विद्वानों ने योग का अर्थ परमात्मा से सम्बन्ध माना है यानी परमात्मा से सम्बन्ध रखते हुए कर्म करो अर्थात जो कुछ करो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से करो और कर्मों को परमात्मा को ही अर्पण कर दिया करो।

योग या कर्मयोग के पूर्वोक्त स्वरूप के आलोक में अब हम पुन: योग: कर्मसु कौशलम् के उन पूर्वोक्त भावार्थों पर विचार करते हैं। अगर यहाँ शुभ-कर्मों को ही कुशलतापूर्वक करने का नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये हुए शुभ-कर्मों के फल से बंध जाएगा। कहा भी है– फले सक्तो निबध्यते; अत: उसकी स्थिति समता में नहीं रहेगी और उसके दुखों का नाश नहीं होगा। फलत: प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग की संगति इस अर्थ में नहीं बैठेगी।

यहाँ एक जिज्ञासा है कि शुभ कर्मों को करने के बाद भी मनुष्य दु:ख क्यूँ पाएगा? इसका समाधान यह है कि कितना भी शुभ कर्म-करने वाला क्यूँ न हो किन्तु मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं अथवा सब कुछ सर्वदा ही उसके मनोनुकूल नहीं होता; जो कि अंतत: उसे दुःख ही पहुঁचाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर सत्यवादी हरिश्चंद्र, जो कि स्वप्न में भी अशुभ कर्मों से दूर रहे, उन्हें अत्यंत कष्ट क्यों झेलना पड़ता!

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति कैसे हो? इसका उत्तर है – जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति अर्थात् मोक्ष होने पर। ये कब होगा? उत्तर है – कर्मफलों के संपूर्ण भुक्त हो जाने पर। फिर शंका हुई कि जब तक जीवन है तब तक न तो कर्म करना कभी समाप्त होगा और न ही उसके फल का भोग और बिना फल भोगे तो कृत-कर्म की समाप्ति भी नहीं होगी; कहा है –नाभुक्तं क्षीयते कर्म। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म से फल की उत्पत्ति एवं फल-भोगार्थ पुन: कर्म; इस प्रकार से तो यह अनवरत चलने वाला क्रम बन गया। दूसरे शब्दों में, जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति ही नहीं होगी। यह सुनकर तो और दुःख बढ़ ही गया। अरे भाई! जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक दु:ख भी समाप्त नहीं होगा। यह तो बड़ी ही भारी विपदा है! क्योंकि जो व्यक्ति धरती पर आया है उसका कर्मासक्त होना और फिर इस आसक्ति के कारण दु:खी होना निश्चित है। शास्त्रों में आया है –कर्मणा बध्यते जन्तु: अर्थात् कर्मों से मनुष्य बंध जाता है। कर्म कितने ही बढियां हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फल का संयोग और वियोग भी होता है। जिसका आरम्भ और अन्त संयोग और वियोग से होता है, उसके द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? साथ ही यह प्रश्न भी अनुत्तरित रह गया कि दु:ख के संयोग का वियोग कैसे हो? अर्थात् दु:ख का निवारण कैसे हो?

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु प्रभु ने योग या कर्मयोग का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए उपदेश किया कि बिना आसक्ति रखे कर्म करना ही योग है, जिससे कारण कर्म के फल अर्थात् भोग से सम्बन्ध छूट जाता है और अन्तत: मुक्त होने के कारण दुःख भी समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण प्रभु ने ‘योग’ को दु:ख के संयोग का वियोग भी ही माना है –

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

यदि उपर्युक्त अर्थ (यानि कर्मों में कुशलता ही योग है) का ही ग्रहण करना अभीष्ट हो तो फिर कुशलता का अर्थ समत्व या निष्कामभाव यानि कि ‘योग’ लेना होगा। किन्तु जब उपर्युक्त पद में ‘योग’ शब्द आया ही है तो फिर पुन: कुशलता का अर्थ योग करने की क्या आवश्यकता है? यानि “कर्मों में कुशलता ही योग है” इस अर्थ से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में “योग: कर्मसु कौशलम्” का ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाए? पूर्व के श्लोक में योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि यहाँ योग ही विधेय है कर्मों की कुशलता नहीं फिर कर्म तो नाशवान हैं; नाशवान् के द्वारा अविनाशी की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अत: महत्त्व योग का है, कर्मों का नहीं। अत: “योग: कर्मसु कौशलम्” का यही अर्थ – ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ उचित प्रतीत होता है।

(to be continued…)

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

Vedic Culture Growing Popular Among Indian Diaspora

Vedic culture is still relevant and gradually becoming more popular among Indian diaspora, especially in the youth, said researchers and scholars at a seminar held in the national capital.

The World Association for Vedic Studies (WAVES International) and Wider Association for Vedic Studies (WAVES India) organised an event titled “Scientific Aspects of Vedic Knowledge” from December 16 to 18, where the importance of Vedic culture in the contemporary world was discussed.

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An aspect which was prioritised at the event was the presence and influence of Vedic culture among Indian diaspora. The speakers emphasised that the cultural events like music and dance have contributed a lot in keeping alive the Vedic culture.

Cultural activities are contributing a lot to keep the customs alive. In the Caribbean countries like the West Indies and Jamaica, the Indian-origin people are mostly from the states of Uttar Pradesh and Bihar and they sing the folk music, this is how the customs are carried ahead,” Indrani Ramprasad, who is working as an independent researcher in Trinidad and Tobago, told IANS at the event.

Bal Ram Singh, organiser of the event and Professor at the School of Indic Studies, US, said that the Indian diaspora in the US is now gradually becoming aware of the existence of Vedic science and it is becoming popular among youths as well. “Lot of institutes and organisations like Chinamaya Mission, Ramakrishna Mission and even colleges have started organising Vedic classes in the US where the Vedic knowledge is being taught and the youths are showing interest to learn,” added Singh.

Not just the Indian diaspora, but the US people too are taking to the Vedic practices like Yoga, learning Vedas, and many are even opting for cremation instead of traditional burial.

Held at the Bharatiya Vidya Bhavan, the event saw seminars, discussions and interactive sessions on numerous topics related to Vedic culture.

Sessions were held on Vedic culture’s influence and existence in the lives of modern youth, integration of modern medical and ancient Vedic perspectives on overcoming ageing, reconstructing the contemporary world with Vedic science, nano technology and the Vedic science, rain forest and global water challenges with Vedic science, and some other.

We tried to bring into limelight the importance of Vedic culture in modern science and that’s the reason we took the angle for this year’s seminar. People are not so aware of involvement of science and Vedic culture and the seminar is to bring in focus on this subject,” Singh said.

(The above picked up from the wire service- Indo Asian News Service. IANS.)

 

Navaratri as the Celebration of the Female Shakti Culture of India

Dr. Bal Ram Singh, a Professor and Director of Botulinum Research Center, Executive Mentor of School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, a former Professor of Biophysical Chemistry and Henry Dreyfus Teacher-Scholar, and Founding Director of the Center for Indic Studies at University of Massachusetts Dartmouth, writes on value of ancient Indian traditions for the modern times.

 “Feminine force is that inner strength, that power, that will to face down any negative circumstances in life and defeat them.” -Georgette Mosbacher

India as a culture faces most negative attention, especially from the Western media and intellectuals, including political leaders who unceremoniously lecture India on things they need to learn from this ancient civilization.

There is always a hue and cry over women in India for one reason or the other, be it political leaders like Indira Gandhi, Sonia Gandhi, Smriti Irani, Mayawati, Mamta Banerjee, Jaya Lalitha, etc., object of atrocities like Nirbhaya, Phoolan Devi, and many other rape victims throughout the country, activists like Vandana Shiva, Medha Patkar, Teesta Setalavad, etc., the spiritual leaders like Ma Amritanandamayi in Kerala, Anandamurti Guruma in Haryana, the Brahmakumaris in Rajasthan, Mother Teresa in Kolkata, Dr. Niruben Amin in Gujarat, and Didi Ma Ritambhara, who have millions of followers throughout the world.

As this is Navaratri and Dussehra time, we could use this festival to highlight some of the traditional ways in which India’s deep philosophies are practiced in regards to women. If we talk about the Navaratri goddess Durga, a word that comes from durg or fort. Durga is a symbol of fortitude, which comes to women naturally but men need to seek. Fortitude is a mental power, not necessarily the physical one.

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In a recent study, scientists found women’s brain is more resilient – “Women are able to carry higher levels of genetic defects without getting brain development disorders such as autism, supporting the possibility of a ‘female protective effect’, according to the study as per a news in Australian Broadcasting News (February 28, 2014).The study published in The American Journal of Human Geneticsgives clues as to why fifty per cent more males typically have an intellectual disability than females, and why boys are four times more likely to have autism than girls.

Traditionally, women in India under ideal conditions have high place in the society – Durga, Saraswati, and Laxmi, the goddesses of strength, knowledge, and wealth, respectively. Even 30-40 years ago, at least in eastern Uttar Pradesh, the place where Nirbhaya’s parents come from, girls names had Devi added as a suffix. It reflects what society perceived and professed for women’s high place. Kanya puja is still common throughout the country. The points reflect that women in general reflect the sattvic thoughts and action. And, society prospers when that sanctity is maintained.

Manusmriti (3.56), an ancient book of memoir, states that –

yatra nāryastu pūjyante ramante tatra devtā 

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:

This is wrongly translated as  – where women are worshipped that becomes god’s abode. The real translation would be that where women raise themselves to the level of being worshipped, gods make that place as their abode. The onus here is on the women to raise their level with their knowledge, practice, management, and caring of the society. Worshipping Monica Lewinskys of this world will not make this world abode of gods.

Women in Sanskrit are known as stree, which means they can possess satva, rajas, and tamasic gunas at the same time in their role of mother, sister/daughter, and marriage partners. They are capable of performing these functions concurrently, as in multi-tasking today. Multitasking is women’s second nature, and neuro-scientific studies will be enriched by such analysis.

According a recent report published in CBC News (March 03, 2016) quoting Dr. Apostolos Georgopoulos, the director of the Brain Science Centre at the Minneapolis VA Medical Center “What we have found is that women, in many different tasks, process information about five times faster than men, and use much less of their brain to do identical cognitive performance.”

Man, on the other hand, is known as purusha (someone who pursues), because what women can accomplish/understand innately with their intuitive and perceptive power, men need to toil through learning, experiencing, and serving.

How is this difference possible? Women are right brain dominating individuals, whereas men are generally left brain dominated persons. Right brain performs intuitive functions such as art, literature, music, etc. whereas left brain is more analytical and performs math, language, technology type of operations. Right brain believed to operatefaster due to its parallel processing, and provides women with intuitive power much better than men. In India queens always sat along with kings to provide management to the kingdom, and in fact ruled their kingdoms in the absence of kings, and did well, including in battlefields.

In today’s intellectual world India as the rest of the world with few exceptions are considered as patriarchical as opposed to matriarchical society. This is not correct historically or practically, although men may have been assigned to manage the society more due to the foreign attacks the society faced in the past thousand years or so. Over five years ago, Tulsῑ Rāmayan stated that mother’s place is higher than that of the father. In Ayodhyākand Kaushalyā says –

‘jaun keval pitu ayesu tata। tau jani jahu jani badi mata’ 

जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ,

which means if only father had given orders to Rām, then he did not need to go to the forest, since as a mother she holds higher position.

In Indian tradition a child is considered the most fortunate whose father is dharmatmā (righteous) and whose mother is pativratā (devoted to the husband). So, it is not easy to be an ideal mother and father. One has to work hard to reach that level, and ideal traits come from the sanskārs (values) of the family and society.

India’s daughters make majority of female graduate students in most US engineering graduate schools. That shows the true treatment of the daughters by a society, Nearly half of the Indian banks are headed by women, and have not defaulted unlike western banks. India’s housewives contribute most to the Indian economy, and Indian space programs, including its mission to Mars, is full of Indian women engineers. These are the true cultural reflections of India’s daughters, something Western world could easily learn.

In summary, women are naturally empowered, and have been accepted in Indian society as such, but it requires hard work to maintain the empowered state. They need to realize both their empowered state and the cost to maintain it. It will not come from government or modern feminist movements, which are based on ego, control, and division of the society.

विज्ञान, कामरेड कन्हैया, एवं वेदांत

 

– प्रोफेसर बलराम सिंह, सदस्य, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर, वेव्स

BRSडॉ. बलराम सिंह, प्रोफेसर एवं प्रेजिडेंट, इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड साइंसेज, डाटर्मॉउथ, यू एस ए, २५ सालों तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेसाचुसेट्स, डाटर्मॉउथ, में केमिस्ट्री, बायोलॉजी एवं इंडिक स्टडीज के प्रोफेसर और डायरेक्टर रहे हैं। वे एक दर्जन पुस्तकों, ३०० रेसेरच आर्टिकल्स और करीब ४०० कांफ्रेंस प्रेसेंटेशन्स के लेखक रह चुके हैं।

9 फ़रवरी के जे एन यू के देशद्रोही नारों की घटना के बाद से ही कामरेड कन्हैया कुमार सिंह के बारे में बहुत कुछ सुनता आ रहा हूँ। बड़ी जिज्ञासा थी उनके बारे में जानने की विशेषरूप से जब से पता चला की वह भी मेरी तरह एक ग्रामीण क्षेत्र से है। 39 साल पहले मैंने भी गाँव से आकर जे एन यू में प्रवेश लिया था, यह बात और है कि मैं स्कूल ऑफ़ लाइफ साइंसेज में था और कामरेड कन्हैया कुमार स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज में। संभव है हम दोनों के अनुभव एक जैसे हों।

आखिर में कामरेड कन्हैया को शर्तिया जमानत मिलने के बाद पहली बार सुनने को मिला। मजा आ गया! कई कारण थे उसके। पहला तो कि उसने अपनी सारी बातें हिन्दी, वह भी ग्रामीण लहजे में कही। यह बात मुझे बड़ी भाई और मेरे अपने जे न यू में एडमिशन के इंटरव्यू का दिन याद दिला दिया। मैं स्कूल ऑफ़ लाइफ साइंसेज के 1977 तक के इतिहास में पहला व्यक्ति था जिसने हिन्दी में इंटरव्यू दिया था। दर असल पहले मेरे यह कहने पर कि मैं इंटरव्यू हिन्दी में देना चाहता था, मुझे  इंटरव्यू रूम से बाहर जाकर इन्तजार करने को कहा गया था। फिर काफी देर के बाद बुलाया गया और कहा गया कि अगर सवाल इंग्लिश मे पूछा जाय तो क्या मैं समझकर हिंदी में जबाब दे सकता था। मैंने यह शर्त स्वीकार करके इंटरव्यू दिया और सौभाग्य से मेरा सिर्फ एडमिशन ही नहीं हुआ बल्कि मुझे एडमिशन की लिस्ट में शीर्षस्थान भी प्राप्त हुआ।

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उन दिनों जे एन यू में हिन्दी बोलने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था, तो अब कन्हैया को हिन्दी में भाषण देते देख मैं तो गदगद हो गया, वह भी यह देखकर कि ना कि सिर्फ कामरेड टाइप के विद्यार्थी समझ भी रहे थे बल्कि हंसकर तालियाँ बजाकर प्रतिक्रिया भी जाहिर कर रहे थे।

मैं कन्हैया कुमार को कामरेड इसलिए सम्बोधित कर रहा हूँ क्योंकि एक तो मैं एक सेमेस्टर के लिए एस एफ आई का चरनिया सदस्य हो गया था। दूसरे उनके भाषण, खासकर उनकी वैज्ञानिकों से संवाद की रूचि से कामराडरी (सहमारगिता) उत्त्पन्न हुई है।

अभी हाल में ही  (दिसम्बर 27 – 30, 2015) मैंने कुछ देश विदेश के शिक्षक साथियों के साथ ही एक अन्तराष्ट्रीय वेदांत कांग्रेस जे एन यू में संचालित किया था। उसके पहले विंटर सेमेस्टर 2015 में जे एन यू में ही संस्कृत में विज्ञान एवं तकनीकी नामक कोर्स भी पढ़ाया था। वेदांत कांग्रेस में कई सेसन विज्ञान और समाज की समस्याओं पर थे जो की जे एन यू समेत देश विदेश के प्रोफेसरों एवं विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किये गये थे। उदाहरण के तौर पर ‘Vedantic Framework to Navigate through contention issue in contemporary science’, जिसे कि यूनिवर्सिटी ऑफ मासाचुसेट्स के प्रोफेसर सुकल्यान सेनगुप्ता ने प्रस्तुत किया था। Elizabeth Town College के प्रोफेसर जे फ्री लॉन्ग ने ‘Past life,  Memory, quantum Theory and Vedanta’ पर एक प्लेनरी प्रस्तुति की थी। यही नहीं एक पैनल डिस्कसन कामरेड के विशेष रुचिकर विषय ‘सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर वेदांत की भूमिका’ के बारे में भी था, जिसमें डॉ. कौसल पवार, एक प्रतिष्ठित दलित शोधकर्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका, जो कि जे न यू की एक शोध छात्रा भी रही है, एक एक्सपर्ट के रूप में शामिल हुई थी।

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कामरेड कन्हैया के भाषण से ऐसा लगा कि उन्हें वैज्ञानिकों से संपर्क एवं संवाद की कड़ी उत्कंठा है, इसलिए मैं अपनी अगली यात्रा के दौरान (मार्च 10 – 25, 2016) चाहूँगा कि हम लोग मिलें और उनके द्वारा चिन्हित शोषित वर्ग, महिलाएं एवं दलितों की समस्याओं पर विमर्श करें। यदि वे चाहें तो मैं जे न यू के वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित कर लूँगा जिनमें Professor R. K. Kale (दलित वर्ग) और Professor Pramod Yadav (OBC) को भी शामिल कर लेंगे।

इतने सारे प्रयासों की तत्परता के बावजूद भी मुझे कुछ अनुभाविक शंकाए हैं। उन्हें भी सबके समक्ष रखना आवश्यक समझता हूँ। ज्ञातव्य हो कि 22nd वेदांत कांग्रेस में भाग लेने के लिए स्वामी रामदेव को जे एन यू के Rector की तरफ से निमंत्रण भेजा गया था और उसका तीव्र विरोध जे न यू छात्र संघ की उपाध्यक्ष शेला रसीद ने न कि केवल विश्वविद्यालय प्रशासन से किया था बल्कि वेदांत कांग्रेस के विदेशी प्रायोजकों एवं उनके संस्थानों को भी लिखित रूप में देकर किया था। इसका मुझे साक्षात ज्ञान है क्योकि मैं भी उन विदेशी प्रायोजकों में से एक था। मैंने शेला रसीद के पत्र का 29 दिसम्बर को जबाब देते हुए उन्हें भी विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। आज तक उसका उत्तर नहीं आया है।

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फिर भी उम्मीद है इस बदले माहौल में, जहाँ कामरेड कन्हैया के भाषण के समय तिरंगा लहराया जा रहा था, देश की बर्बादी के जंग की बात दूर-दूर नजर नहीं आ रही थी, और भारत के टुकड़े करने वाले कामरेडों को अगल बगल भटकने नहीं  दिया गया था चाहे वह माननीय न्यायाधीश के आदेशों के अंतर्गत ही क्यों न किया गया हो, कामरेड कन्हैया अपने ग्रामीण परिवेश वाले इस बड़े भाई बलराम से वार्ता जरूर करेंगे।