गीता में योग की व्याख्या

डॉ. श्यामदेवमिश्र

(continued from previous article)

योग की गीता में व्याख्या से मन में शंका उठती है कि प्रभु ने योग की कई परिभाषाएं दे डालीं जिससे योग के स्वरुप को समझना सामान्य जिज्ञासु के लिए कठिन हो गया है। पहले सिद्धि और असिद्धि की समता को योग कहा; फिर कर्म की कुशलता को योग कहा और आगे दु:ख के संयोग के वियोग को भी योग कहा। किन्तु विचार करने पर यह शंका निर्मूल सिद्ध होती है। प्रभु ने योग के अनेक लक्षण नहीं बताए हैं अपितु एक ही लक्षण को अनेक प्रकार से समझाया है। वास्तव में फल की आशा छोड़कर कर्त्तव्य बुद्धि से कर्म करते रहना ही कर्मयोग है। उस फल की आशा को छोड़ने के अलग-अलग विवरण हैं। फल की आशा छोड़ देने पर सिद्धि और असिद्धि में समानता हो जायेगी। फल की आशा से ही कर्म-सिद्ध होने पर सुख और असिद्ध होने पर दुःख हुआ करता है; फलाशा न रहने पर न सुख होगा न दुःख। तब सिद्धि और असिद्धि में समता हो गयी। यही योग है। इसी प्रकार समानता रखकर कर्म करते जाने से आत्मा पर कर्म का कोई प्रभाव नहीं आता इसलिए यह अर्थात् योग एक बड़ा कौशल या चतुरता भी हुई। यहाँ फलाशा के त्याग को ही ‘कौशल’ शब्द से प्रकट किया है क्योंकि फलाशा-त्याग न करने के स्थिति में फलाशा पूर्ण न होने पर दु:ख हुआ करता है। फलाशा छोड़ देने पर दु:ख का भी प्रसंग नहीं रहेगा। अत: दु:ख संयोग-वियोगरूप लक्षण में भी वही बात प्रकारांतर से कही जाएगी। कहने का तात्पर्य यह है कि एक ही विषय को भिन्न-भिन्न शब्दों से भिन्न-भिन्न अर्थों में समझाया गया है। ‘योग’ शब्द का अर्थ कर्म-योग मान लेने पर सभी लक्षणों की सङ्गति उक्त प्रकार से हो जाती है।

यहाँ एक और प्रश्न उठता है जिसका समाधान अत्यावश्यक है कि फलाशा-त्याग अर्थात् फल की आशा को छोड़ देने से क्या अभिप्राय है?

फल की आशा छोड़ने से तात्पर्य है कि फल के प्रति चिंता ही न करे। इसके दो कारण हैं –  पहला कि फल के बारे में सोचने पर कर्म दुष्प्रभावित या विकृत होगा। दूसरा केवल कर्म के प्रति मनुष्य का अधिकार है यानी केवल कर्म करना ही उसके वश में है; फल के प्रति मनुष्य का अधिकार अर्थात् वश ही नहीं है। यानी फल क्या मिलेगा? कितना मिलेगा? कब मिलेगा? इत्यादि मनुष्य के अधिकार-क्षेत्र के बाहर की बात है। अत: अधिकार-क्षेत्र से बाहर के विषय में चिन्तना करना ही व्यर्थ है। इसीलिये प्रभु ने कहा है – कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि अनधिकार होने के कारण यदि मनुष्य फल की इच्छा का त्याग कर देवे यानी उसके बारे में सोचे ही नहीं तब फिर कर्म करने का प्रयोजन क्या रहा? और बिना प्रयोजन के मनुष्य कर्म ही क्यूँ करे?

इसका समाधान यह है कि प्रयोजन दो प्रकार का समझा जा सकता है – १. क्षणिक या ऐहिक और २. आत्यन्तिक या पारलौकिक । क्षणिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख की अवधि निश्चित हो; यानी जिसमें फल के उपभोग की समाप्ति अर्थात् वियोग-रूपी दु:ख भी मिलना तय है। क्षणिक प्रयोजन के ही तीन अवान्तर रूप हैं – धर्म, अर्थ और काम ये तीन पुरुषार्थ। किन्तु उत्कृष्टतम कर्म से प्राप्त ब्रह्मलोकरूपी फल के भी भोग के पश्चात् पुन: मनुष्य जीवन-मृत्यु-चक्र में फँसता है। भगवान् ने स्वयं ही कहा है – आब्रह्मभुवनाल्लोका: पुनरावर्तिनोऽर्जुन (गीता )

किन्तु आत्यन्तिक प्रयोजन वह है जिससे प्राप्त सुख का अन्त ही नहीं है अर्थात् जिसमें लेश-मात्र भी दु:ख नहीं है। यही कारण है कि इसे परमप्रयोजन या परमपुरुषार्थ मोक्ष कहा है।

अब यह मनुष्य पर है कि वह किस प्रयोजन का चयन करता है। मनुष्य, जो कि लेश-मात्र भी दुखाकाङ्क्षी नहीं है, वह ‘दुःख हो ही न’ ऐसा प्रबंध क्यों न करे? वही आत्यन्तिक-प्रयोजन अर्थात् मोक्ष है जो केवल पूर्वोक्त योग यानि कर्मयोग  से ही संभव है।

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(Source of image : http://www.navhindu.com/bhagwad-gita-chapter-3/)

इस प्रकार जो कर्म, मनुष्य को स्वभाव से ही बांधने वाले हैं, वे ही मुक्ति देने वाले हो जाएं – यही वस्तुत: कर्मों में कुशलता है। कर्म करने की ऐसी ही चतुरता को योग कहते हैं कि मनुष्य कर्म करता भी जाए और उसके बंधन में भी न फंसे। काजल की कोठारी में जाकर बिना कालिख लगाए निकल आना ही बड़ी भारी चतुरता है। ऐसी ही कुशलता योग से प्राप्त होती है कि कर्म करता भी जाए और उसका फल भी अपने पर आने न दे।

इस प्रकार देखा जाए तो योग: कर्मसु कौशलम् योग की परिभाषा से बढ़कर उसकी महिमा का उद्घोष है।

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

 

योग: कर्मसु कौशलम्

[It was broadcasted by International Broadcast service, All India Radio, New Delhi in 2016 on the occasion of International Yog Day]

डॉ. श्यामदेवमिश्र

‘योग: कर्मसु कौशलम्’ यह श्लोकांश योगेश्वर श्रीकृष्ण के श्रीमुख से उद्गीरित श्रीमद्भगवद्गीता के द्वितीय अध्याय के पचासवें श्लोक से उद्धृत है। श्लोक इस प्रकार है –

“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृतेतस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्”।।इति।।

श्लोक के उत्तरार्ध पर यदि गौर करें तो दो बातें स्पष्ट होती हैं। पहली योग की परिभाषा एवं दूसरी योग हेतु प्रभु का स्पष्ट निर्देश। उनका उपदेश है कि ‘योगाय’ अर्थात् योग के लिए अथवा योग में, ‘युज्यस्व’ अर्थात् लग जाओ। कहने का तात्पर्य है कि ‘योग में प्रवृत्त हो जाओ’ यानि कि ‘योग करो’। अब प्रश्न यह है कि क्यूँ करें योग? इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने श्लोक के पूर्वार्ध में दिया है कि बुद्धिमान व्यक्ति अर्थात् योगी, वर्तमान में ही अथवा इस संसार में ही ‘सुकृत’ एवं ‘दुष्कृत’ अर्थात् पुण्य एवं पाप से मुक्त हो जाता है। योग के इस हेतु को स्पष्टतया जानने के लिये, सबसे पहले यह समझना परमावश्यक है कि ‘योग क्या है’? या ‘योग किसे कहते हैं’?

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(Source of Image: http://www.boisetemple.org/bhakti-yoga/)

गीता में ‘योग’ शब्द के तीन अर्थ हैं – १. समता; जैसे – समत्वं योग उच्यते(२/४८); २. सामर्थ्य, ऐश्वर्य या प्रभाव; जैसे – पश्य मे योगमैश्वर्यम्(९/५); और ३ समाधि; जैसे – यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया(६/२०)। यद्यपि गीता में ‘योग’ का अर्थ मुख्य रूप से समता ही है तथापि ‘योग’ शब्द के अंतर्गत तीनों ही अर्थ स्वीकार्य हैं। इसके अतिरिक्त गीता में योग की तीन परिभाषाएं भी मिलती हैं जो कि दूसरे अध्याय के क्रमश: ४८वें एवं ५०वें श्लोक में तथा छठे अध्याय के २३वें श्लोक में निर्दिष्ट हैं। ये परिभाषाएं क्रमश: इस प्रकार हैं –

“समत्वं योग उच्यते”(गीता २/४८)

“योग: कर्मसु कौशलम्” (गीता २/५०)

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

‘योग: कर्मसु कौशलम्’  के दो अर्थ लिये जा सकते हैं –

1. कर्मसु कौशलं योग: अर्थात् कर्मों में कुशलता ही योग है।

२. कर्मसु योग: कौशलम् अर्थात् कर्मों में योग ही कुशलता है।

यदि हम पहला अर्थ लें यानि कर्मों में कुशलता ही योग है तो, जो बड़ी ही कुशलता से सावधानी से ठगी, चोरी या फिर हत्या आदि कर्म करता है उसका कर्म भी ‘योग’ हो जाएगा! किन्तु ऐसा मानना उचित नहीं है और फिर श्लोक में निषिद्ध कर्मों का प्रसंग भी नहीं है। अगर हम यहाँ ‘कर्म’ शब्द से केवल शुभ कर्मों का ही ग्रहण करें तब फिर ‘कर्मसु कौशलम् योग:’ इस पद के दो अलग-अलग परिप्रेक्ष्य में भावार्थ निकलेंगे जो प्रसंग-विशेष में तो ठीक प्रतीत होते हैं किन्तु गीता में प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग के सिद्धांतों से इतर सिद्ध होते हैं। आइए उन दोनों पर ही गौर करते हैं –

शुभ कर्मों में कुशलता ही योग है अर्थात् शुभ कर्मों को कुशलतापूर्वक करना ही योग है। इस अर्थ में ‘योग’ शब्द से मानसिक, बौद्धिक एवं शारीरिक समन्वयन एवं तादात्म्य अभिप्रेत है। यानि मन, बुद्धि एवं शरीर इन तीनों को एक साथ जोड़कर जब हम कोई कार्य करते हैं तो निश्चित ही उस कार्य में कुशलता या संपूर्ण दक्षता प्राप्त होती है, जिसे योग कहते हैं। व्यावहारिक परिप्रेक्ष्य में, यह अर्थ सटीक है एवं सफलता के सूत्र-रूप में स्वीकार्य है। आधिदैविक या अलौकिक परिप्रेक्ष्य में इसका भावार्थ यह है कि यदि कुशलतापूर्वक अर्थात् मन, बुद्धि एवं क्रिया तीनों के ही संयोग से यदि जप-तपादि अनुष्ठान किया जाए तो निश्चित ही अभीष्ट (शक्ति/सिद्धि) से योग (या संयोग) होता है।

अब यहाँ प्रश्न यह है कि उक्त दोनों ही भावार्थ, गीता में प्रतिपादित योग की संकल्पना से किस प्रकार भिन्न हैं? इसको समझने के लिए योग की परिभाषा को समझना होगा, जिसमें कहा है  –

योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय

सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते”।। (गीता २/४८)

अर्थात्हे धनञ्जय! तुम योग में स्थित होकर शास्त्रोक्त कर्म करते जाओ। केवल कर्म में आसक्ति का त्याग कर दो और कर्म सिद्ध हो या असिद्ध अर्थात् उसका फल मिले या फिर न मिले, इन दोनों ही अवस्थाओं में अपनी चित्तवृत्ति को समान रखो। अर्थात् सिद्ध होने पर हर्ष एवं असिद्ध होने पर विषाद अपने चित्त में मत आने दो। यह सिद्धि एवं असिद्धि में सम-वृत्ति रखना ही योग है ।

यहाँ ‘योग’ शब्द कर्मयोग का ही बोधक है। यहाँ न केवल कर्म के स्वर्गादि फलों के छोड़ने की बात कही गयी है अपितु प्रातिस्विक फल की आशा छोड़कर कर्म करने से जो चित्त-शुद्धि या भगवत्प्रसाद आदि फल प्राप्त होते हैं, उनकी सिद्धि-असिद्धि में भी सामान भाव रखने की बात कही गयी है अर्थात् यह विचार मत करो कि इतने दिन मुझे कर्मयोग में लग गए अभी तक मेरी चित्त-शुद्धि कुछ नहीं हुई या भगवत्प्रसाद के कुछ लक्षण मुझे दिखाई नहीं दिए। तुम तो केवल कर्त्तव्य समझकर कर्म करते जाओ, इस कर्म का फल क्या हो रहा है इस ओर कोई दृष्टि ही न दो। इसी का नाम योग या कर्मयोग है। इस श्लोक की व्याख्या में कई विद्वानों ने योग का अर्थ परमात्मा से सम्बन्ध माना है यानी परमात्मा से सम्बन्ध रखते हुए कर्म करो अर्थात जो कुछ करो वह परमात्मा को प्रसन्न करने के ही उद्देश्य से करो और कर्मों को परमात्मा को ही अर्पण कर दिया करो।

योग या कर्मयोग के पूर्वोक्त स्वरूप के आलोक में अब हम पुन: योग: कर्मसु कौशलम् के उन पूर्वोक्त भावार्थों पर विचार करते हैं। अगर यहाँ शुभ-कर्मों को ही कुशलतापूर्वक करने का नाम योग मानें तो मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये हुए शुभ-कर्मों के फल से बंध जाएगा। कहा भी है– फले सक्तो निबध्यते; अत: उसकी स्थिति समता में नहीं रहेगी और उसके दुखों का नाश नहीं होगा। फलत: प्रभु द्वारा प्रतिपादित योग की संगति इस अर्थ में नहीं बैठेगी।

यहाँ एक जिज्ञासा है कि शुभ कर्मों को करने के बाद भी मनुष्य दु:ख क्यूँ पाएगा? इसका समाधान यह है कि कितना भी शुभ कर्म-करने वाला क्यूँ न हो किन्तु मनुष्य की सभी इच्छाएं पूर्ण नहीं होतीं अथवा सब कुछ सर्वदा ही उसके मनोनुकूल नहीं होता; जो कि अंतत: उसे दुःख ही पहुঁचाता है। यदि ऐसा नहीं होता तो फिर मर्यादा पुरुषोत्तम राम या फिर सत्यवादी हरिश्चंद्र, जो कि स्वप्न में भी अशुभ कर्मों से दूर रहे, उन्हें अत्यंत कष्ट क्यों झेलना पड़ता!

तब ऐसे में प्रश्न उठता है कि दु:ख की आत्यन्तिक निवृत्ति कैसे हो? इसका उत्तर है – जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति अर्थात् मोक्ष होने पर। ये कब होगा? उत्तर है – कर्मफलों के संपूर्ण भुक्त हो जाने पर। फिर शंका हुई कि जब तक जीवन है तब तक न तो कर्म करना कभी समाप्त होगा और न ही उसके फल का भोग और बिना फल भोगे तो कृत-कर्म की समाप्ति भी नहीं होगी; कहा है –नाभुक्तं क्षीयते कर्म। कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म से फल की उत्पत्ति एवं फल-भोगार्थ पुन: कर्म; इस प्रकार से तो यह अनवरत चलने वाला क्रम बन गया। दूसरे शब्दों में, जीवन-मरण-चक्र से मुक्ति ही नहीं होगी। यह सुनकर तो और दुःख बढ़ ही गया। अरे भाई! जब तक मुक्ति नहीं होगी तब तक दु:ख भी समाप्त नहीं होगा। यह तो बड़ी ही भारी विपदा है! क्योंकि जो व्यक्ति धरती पर आया है उसका कर्मासक्त होना और फिर इस आसक्ति के कारण दु:खी होना निश्चित है। शास्त्रों में आया है –कर्मणा बध्यते जन्तु: अर्थात् कर्मों से मनुष्य बंध जाता है। कर्म कितने ही बढियां हों, उनका आरम्भ तथा अन्त होता है और उनके फल का संयोग और वियोग भी होता है। जिसका आरम्भ और अन्त संयोग और वियोग से होता है, उसके द्वारा मुक्ति कैसे प्राप्त होगी? साथ ही यह प्रश्न भी अनुत्तरित रह गया कि दु:ख के संयोग का वियोग कैसे हो? अर्थात् दु:ख का निवारण कैसे हो?

इन्हीं समस्याओं के समाधान हेतु प्रभु ने योग या कर्मयोग का सिद्धांत प्रतिपादित करते हुए उपदेश किया कि बिना आसक्ति रखे कर्म करना ही योग है, जिससे कारण कर्म के फल अर्थात् भोग से सम्बन्ध छूट जाता है और अन्तत: मुक्त होने के कारण दुःख भी समाप्त हो जाते हैं। इसी कारण प्रभु ने ‘योग’ को दु:ख के संयोग का वियोग भी ही माना है –

तं विद्याद्दु:खसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।(गीता /२३)

यदि उपर्युक्त अर्थ (यानि कर्मों में कुशलता ही योग है) का ही ग्रहण करना अभीष्ट हो तो फिर कुशलता का अर्थ समत्व या निष्कामभाव यानि कि ‘योग’ लेना होगा। किन्तु जब उपर्युक्त पद में ‘योग’ शब्द आया ही है तो फिर पुन: कुशलता का अर्थ योग करने की क्या आवश्यकता है? यानि “कर्मों में कुशलता ही योग है” इस अर्थ से काम नहीं चलेगा। ऐसी स्थिति में “योग: कर्मसु कौशलम्” का ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ ऐसा सीधा अर्थ क्यों न ले लिया जाए? पूर्व के श्लोक में योग की परिभाषा से स्पष्ट है कि यहाँ योग ही विधेय है कर्मों की कुशलता नहीं फिर कर्म तो नाशवान हैं; नाशवान् के द्वारा अविनाशी की प्राप्ति नहीं हो सकती है। अत: महत्त्व योग का है, कर्मों का नहीं। अत: “योग: कर्मसु कौशलम्” का यही अर्थ – ‘योग ही कर्मों में कुशलता है’ उचित प्रतीत होता है।

(to be continued…)

डॉ. श्यामदेवमिश्र, सहायकाचार्य (ज्योतिष), राष्ट्रिय-संस्कृत-संस्थान, भोपाल परिसर, भोपाल, म.प्र.

Children in Epics

Children of ancient intellectual traditions that are remembered time to time in reference to spiritually, strength, determination and firmness:-

Lava and Kusha

Kuṥa and his twin brother Lava were the children of Lord Rāma and his wife Sītā, whose story is recounted in the Hindu epic Rāmāyaṇa written by Valmīki. According to Uttara Kāṇḍa of this great epic, pregnant Sītā was banished from the kingdom of Ayodhyā by Rāma due to the gossip of general folk of kingdom. She then took refuge in the ramof the sage Valmīki located on the banks of the Tamasā river. According to Rāmāyaṇa, Sītā gave birth to both Lava and Kuṥa at the same time in the support of Valmīki’s disciples. Kuṥa was the elder of the two and is said to have whitish complexion like their mother, while Lava had blue complexion like their father. Names to both kids were given by sage Valmīki. They were educated and trained in military skills and given many natural powers under the tutelage of Valmikī. When Rāma performed the Ashvamedha Yajn᷈a, Lava and Kuṥa attended it with their fatherly sage. At that occasion, they sang the story of Rāmāyaṇa in the presence of king Rāma and his vast audience. When Lava and Kuṥa recited about Sītā’s exile, Rāma became grief-stricken and Valmīki produced Sītā. Sit̄ā called upon the earth, her mother, to receive her and as the ground opened, she vanished into it. Rāma then learnt that Lava and Kuṥa were his children.  Launandan-3

Some poetic works have depicted poetically that Lava and Kuṥa caught the horse of Yajn᷈a during the phase of Aṥvamedha Yajn᷈a, and for that they also gave a good fight to Rāma. Brave sons of Rāma, Lava and Kuṥa became rulers after their father and founded the cities Lavapurī and Kasur respectively. These children are known today for their amity, fearlessness and charm.

Abhimanyu

Abhimanyu, mentioned in the great epic Mahābhārata, was the courageous son of the great Arjuna and Subhadrā, and the nephew of Lord Kṛṣṇa. His story begins just before he was born. When Abhimanyu was in his mother’s womb, Ṥri Kṛṣṇa used to take his sister Subhadrā on excursions. Kṛṣṇa used to relate many of his adventures to the pregnant Subhadrā for her delight. Once he was narrating his experience with the technique of Cakra-vyūha, a military formation which was an effective form of defense. The army would be arranged in the form of a circular grid and would then challenge the enemy to break that grid. It seems that Subhadrā did not find this topic interesting and therefore, after some time she felt asleep. However, someone else was interested in Kṛṣṇa’s narration and he was Abhimanyu in his mother womb. He was carefully following all steps of this vyūha. When Kṛṣṇa noticed that Subhadrā was not responding and she was indeep sleep, he gave up his narration and returned to the palace. Thus, Abhimanyu could only obtain the technique of entering into the circles of the cakra-vyūha. Whatever he had heard from Kṛṣṇa, he carefully preserved in his memory.Unfortunately, he could not know the technique of breaking its circles. He grew up to be a brave, handsome adolescent young man. Many years later, during the Mahābhārata war at Kurukṣetra, the Kauravas set up a cakravyūha and challenged Pāṇḍavas to break it. Only Arjuna knew the technique of doing so, but he was fighting elsewhere at that time. To meet the challenge, Abhimanyu came forward and offered his services for the task of breaking the cakra-vyūha. Despite his incomplete knowledge of the technique, he entered the grid and overcame one circle after another, until he come to the seventh one, the breaking of which he had no knowledge. Brave and ambitious Abhimanyu fought heroically in the unequal struggle but finally met his end.

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This story highlights the importance of the childhood saṁskāras and mental growth of a child. Abhimanyu is always remembered for sharp memory, intelligence, courage and bravery.

-Dr. Shashi Tiwari, President, WAVES–India & Former Prof. of Sanskrit, Maitreyi College, University of Delhi