चोरनी कोरोना का उत्पाती शोर! Mischief of Madam Corona!

सुश्री अनुजा सिन्हा एवं प्रो. बलराम सिंह

कुछ दिनों से एक चोरनी ने सारी दुनिया में उत्पात मचा रखा है.. यूं तो चोरों का डर हमेशा ही रहा है.. कितने ही चोर आए और दुनिया में बवाल मचाया..

हालांकि इस चोरनी को लोग कमज़ोर समझते हैं.. आधी ही जान होती है और दूसरों के सहारे जीवन जीती है.. पर इस चोरनी की कुछ ख़ासियतें हैं..

पहली ख़ासियत यह है कि ये आज तक के सभी चोरों का सरताज बन बैठी है.. वो ऐसे कि इसके सर पर जन्म से ही ताज सुशोभित है..

दूसरी ख़ासियत ये है कि यह भेस बदलने में माहिर है, जिसको पहचान पाना बड़ा ही मुश्किल है.. इसीलिए यह हमारी नज़रों से छुपते-छुपाते अपना काम कर जाती है..

इसकी तीसरी विशेषता भी इसको बाकी सभी चोरों से अलग करती है, वो ये कि यह चोरनी बड़ी ही फुर्तीली है.. हम जब तक कुछ समझें, तब तक यह चोरी कर जाती है.. और यह उतनी ही तेज़ी से लगातार चोरियाँ करती जा रही है…

इसकी चौथी विशेषता ये है कि यह लोगों के घरों में घुसकर उनको अपना नौकर बना लेती है, उन्हीं से अपने बच्चे पैदा करती है, और फिर उनका ही सबकुछ अपने बच्चों को खिला-पिलाकर उन्हें भूखों मार डालती है.. बड़ी ही पीड़ादायक मौत ! .. ये लोगों की हवा तक छीन लेती है.. सांस भी नहीं लेने देती ये चोरनी ! …

इसकी पाँचवीं ख़ासियत है कि ये किसी के घर में छुपकर बैठ जाती है, चोरी भी नहीं करती, बस कुछ बच्चे पैदा कर लेती है.. और फिर उसी व्यक्ति के ज़रिये उसके दोस्तों और रिश्तेदारों के यहाँ अपने बच्चों को घुसाकर कईयों को चुरा लेती है..

बड़ी नन्ही-सी है, भोली भी.. इसीलिए लोग परख नहीं पाते.. दूरबीन से भी नहीं दिखती.. लेकिन ये देखनी मा बरहिया आवै पांचों पीर वाली चोरनी है..

यह चोरनी बहुत ख़तरनाक है और पूरी दुनिया में इसके खौफ़ ने लोगों की रातों की नींद दुश्वार कर दी है.. इस चोरनी को पकड़ने और खत्म करने की कोशिश सारी दुनिया में की जा रही है, लेकिन इसको बांधने या मारने की कोई तरकीब अभी तक निकाली नहीं जा सकी है.. और यदि एक-दो चोरनियों को मार भी दिया तो और पैदा हो जाएंगी.. जी हाँ, सही पढ़ा आपने .. रक्तबीज असुर का नाम तो आपने सुना ही होगा, यदि एक रक्तबीज मरता था, तो वैसे हजारों रक्तबीज पैदा हो जाते थे .. ठीक वैसे ही यह चोरनी भी लाखों की संख्या में उत्पन्न हो जाती है.. फिर जो भी इसे मारने या रोकने के चक्कर में इसके पास जाता है, उसी पर सवार हो जाती है, और बच्चे पैदा करने के लिए उसे अपना दास बना लेती है…

अब तक तो शायद आप इस चोरनी का नाम समझ गए होंगे, जी हाँ आप ठीक समझे.. इस शातिर चोरनी का नाम है ‘राजकुमारी कोरोना‘….. इसने हमारा जीना मुश्किल कर दिया है.. तो क्या इसको काबू में करने के लिए कुछ नहीं किया जा सकता ?.. क्या इसका खात्मा कभी हो भी सकेगा ?..

यह बिलकुल संभव है और इसको वश में किया जा सकता है.. यदि कहीं समस्या है तो उसका समाधान भी प्रकृति ने, सृष्टि ने प्रदान किया है.. जब रक्तबीज जैसे असुर का अंत हो गया, तब ये कोरोना जैसी चोरनी की क्या बिसात ?.. वैसे है तो ये चांडालिनी, क्योंकि ये लोगों के डीएनए में घुस जाती है, और वहीं से अपना हुक्म चलाती है.. पूरी दुनिया में इसको पकड़कर ख़त्म करने की कवायद चल रही है, पर तब तक क्या यह चोरनी ऐसे ही चोरी करती रहेगी ?.. ये तो सीधे जान ही चुरा लेती है..

जैसाकि हमने कहा कि प्रकृति में हर समस्या का समाधान मौजूद है.. वह है हमारा वफ़ादार कुत्ता, जो ऐसे चोरों से बाखूबी निपट सकता है और इसके रहते किसी कोरोना चोरनी की क्या मजाल कि चोरी कर पाये .. यह पालतू स्वामिभक्त कुत्ता हममें से हर एक के पास है, जो ऐसे चोरों को चोरी करने का कोई अवसर नहीं देगा और उन्हें सबक भी सिखा सकता है.. ये धर्मराज युधिष्ठिर के कुत्ते की तरह सदा ही हमारा साथ देता है..

इसका नाम है इंटरफेरौन (Interferon) .. यह दिन-रात चौकन्ना रहकर हमारी सुरक्षा करता है.. और हमारे शरीर-रूपी घर को ऐसे भयंकर चोरों, जैसे सार्स, HIV, फ्लू से बचाता रहता है.. इंटरफेरौन न सिर्फ हमारी रक्षा करता है, बल्कि हमारे सुरक्षा घेरे को और भी ज़्यादा मज़बूत बनाता है.. लेकिन इसके लिए हमें हमारे इस स्वामिभक्त कुत्ते को भी और शक्तिशाली बनाने की आवश्यकता होती है.. इसके लिए शुद्ध शाकाहारी भोजन के साथ ही स्वस्थ जीवन-शैली अपनाने और आयुर्वेद को अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए ..

इस वफ़ादार कुत्ते को शक्तिशाली बनाने और सतर्क रखने में मसालों का बड़ा हाथ होता है.. इसके लिए काली मिर्च, दालचीनी, अदरक, तुलसी की पत्ती, कच्ची हल्दी, इलायची, लौंग, मुलेठी, गिलोय का महत्वपूर्ण योगदान है.. इन्हीं से इसे तंदुरुस्त रखिए..

फिर तो कोई कोरोना हो या कोई भी चोर, सबको रोना पड़ेगा…

आइये, हम अपने अंदर के इंटरफेरौन कुत्ते को अपनी शक्ति के रूप में पालें, और कोरोना को कूड़े में डालें ..

सुश्री अनुजा सिन्हा एवं प्रो. बलराम सिंह*, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA (*Fellow, Jawaharlal Nehru Institute of Advanced Study, JNU, New Delhi, India)

A Spiritual Perspective on Menses (Part-I)

– Dr. Athavale & Dr. Nandini Samant

Introduction

Menstruation is basically a physiological phenomenon unique to women. In many parts of the world, menstruation is still related to a number of myths and taboos. For example, it is believed in Afghanistan that showering during menses causes infertility. According to a cultural belief held by some sushi chefs in Japan, women cannot be sushi chefs because of menstrual cycles. They believe that menstruation causes an ‘imbalance in taste’ and therefore sushi cannot possibly be properly prepared by a woman. Menses is thought of as a disease in Iran. Traditional beliefs in Bolivia misinform young women and girls that the disposal of their menstrual pads with other garbage could lead to sickness or cancer, according to UNICEF. Such myths and taboos about menstruation present in many societies adversely impact on women’s emotional state, mentality and lifestyle.

Vedas have also advised women with menses to refrain from entering holy places, cooking, etc. However, this advice is from a spiritual perspective alone and needs to be understood in that spirit. Any distortions in the implementation of the spiritual science are man-made and need to be recognized as such. However, due to a lack of understanding of the underlying spiritual science the advice of the scriptures is vastly misunderstood and hence frowned upon by society in the present times.

This resistance happens in the case of other sciences too. For example, modern medical science advises people suffering from a contagious disease like flu (Influenza), to rest and to keep to their room to prevent infecting other family members. They are asked to cover their nose with a tissue while sneezing for the same reason. When the disease spreads rampantly in society to an epidemic level, such as the Spanish flu pandemic of 1918 and Swine flu pandemic of 2009, infected people are forced to remain in isolation, away from society. All this is advised in the interests of the individual, family and society at large. It is not discriminatory to the person suffering from flu. We understand this because we are well aware of the science behind the restrictions. However, if an uneducated person from a tribal area traveling to a city suffered from flu and was advised to keep away from others, he could well feel ostracized. What would we think if he refused to believe the science and demanded to be shown the influenza virus! We understand that it would be in his best interests to believe those learned in that area, namely, the doctors. Similarly, Vedas are the authority in Spirituality. In this article we have explained the spiritual science underlying what the Sanatan Dharma says in the Vedas about menses and corroborated by research using modern scientific equipment. This is solely from the perspective of creating awareness in society about the spiritual aspects of menses.

Here, we will understand the basic principles of Sanatan Dharma and What happens at the subtle level during menstruation ?

Later (in upcoming article ) we will discuss the following topics –

A. Why is menarche celebrated ?

B. How can women by avoiding cooking or touching food during menses benefit themselves and society ?

C. How can women refraining from spiritual activities such as pooja or entering a temple during menses benefit themselves and society ?

D. Understand the underlying spiritual science and benefit from the advice of scriptures

Basic principles of Sanatan Dharma

To understand how Sanatan Dharma looks upon menstruation, let us get acquainted with some of its basic principles relevant to our topic.

A. Sanatan Dharma looks upon life as a continuum of births till the jīva (Embodied Soul) attains Mokṣa (Final Liberation or God-realisation). All efforts during one’s lifetime are looked upon from the perspective of ultimately moving towards Mokṣa.

B. Spiritual purity (Sattva subtle component) is looked upon as the foundation of any success or achievement. Subtle is that which is beyond the perception of the five senses, mind and intellect. Bhagawan Shrikrushna speaks of the 3 subtle basic components of the universe, namely Sattva, Raja and Tama

सत्त्वं रजस्तम इति गुणा: प्रकृतिसम्भवा: |

निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ||

(Śrimad Bhagawadgīta Chapter 14, Verse 5)

Sattva is the component that represents spiritual purity, equanimity and knowledge. Raja represents action, excitement and passion, while Tama represents ignorance and inertia. Each person is made up of a proportion of these three subtle components. Depending on which subtle component is predominant in a person, he or she would be either Sattva-predominant (Sāttvik), Rājasik or Tāmasik. His or her value system, attitude and behaviour will be aligned accordingly. That is why, Sanatan Dharma advises spiritualisation of all aspects of life. Spiritualisation means making every aspect of our life such as our home and premises, bath, dress, diet, jewellery, music, dance, office work sāttvik and enriched with Divine consciousness (Chaitanya). This way our day to day efforts in life lead us to eternal bliss (God-realisation).

What happens at the subtle level during menstruation ?

According to Scriptures

The Scriptures refer to a menstruating woman as ‘Rajaswala’. This is because during menses the Raja subtle component in her is increased. The increased Raja is in anticipation of conception to nourish the baby. When fertilization of ovum and consequently conception does not take place, the excess of Raja is excreted from the body in the form of menstruation.

According to Ayurveda

As per Ayurveda, during menses the Apāna Vāyu is activated in the woman. ‘Prāṇa’ is the subtle vital energy which drives the various actions at the level of the various koṣas. There are 5 Prāṇas, each with a specific action. Activation of the Apāna Vāyu causes movement in the downward direction to facilitate the excretion of uterine tissue and also body toxins (Aām). The high Raja subtle component in the woman during menses causes an imbalance of the 5 Prāṇas.

Subtle picture of a woman during menses

The true measure and analysis of what happens in the subtle dimension can only be through the medium of the sixth sense. At the Maharshi Adhyatma Vishwavidyalay (Maharshi Spiritual University), we have seekers in our spiritual research team who can actually perceive subtle vibrations emitted by an object or individual. After studying these vibrations they sketch them on paper. We call these sketches ‘Subtle pictures’. They serve as spiritual x-rays and provide clarity about the true nature of the object or individual. The readings are then confirmed or corrected by H.H. (Dr.) Athavale to get the accurate values. The following subtle picture of a woman during menses gives us an idea of what happens during menstruation in the subtle dimension.

The above subtle picture shows how there is emission of Raja-Tama subtle vibrations from a woman during menses. As a result the environment gets charged with the distressing Raja-Tama vibrations.

Universal Aura Scanner study of a woman during menses

The Universal Aura Scanner (UAS) is a scientific instrument that has been invented by Dr. Mannem Murthy, a former nuclear scientist from India. We have used this instrument extensively since 2014 and have recorded more than 10,000 readings in various experiments. It is our experience that it gives accurate readings. We have presented scientific papers based on these studies since October, 2016 in 15 National and 48 International Scientific Conferences. For more details about experiments done using UAS please refer to http://www.ssrf.org/. For more information on the instrument and its usage, please refer to http://www.vedicauraenergy.com/universal-scanner/

Please note that an average object or person can have negative energy, but it is not necessary that the positive energy be present. The negative energy readings are of 2 types and are denoted by ‘IR’ (Infrared) and ‘UV’ (Ultraviolet). IR denotes a lesser form of negative vibrations, while UV denotes a more intense form of negative vibrations. The total measured aura (TMA) is a measure of the object’s or person’s negative energy, positive energy in addition to other miscellaneous components. The TMA of an average object or person is 1 meter. When the TMA of a negativity emitting person or object (which does not have any positive energy) is high, this high TMA is a reflection of its high negativity.

We used the UAS to measure the positive and negative subtle energies and the total measured aura around a woman during menses, after chanting for 15 minutes after this reading and after her 5th and 7th day head bath. This pilot study was conducted on 1 subject only.

From the above table it is apparent that during menses high proportion of both types of negative energy with complete absence of positive energy was found in this subject.

Negativity eliminating influence of chanting

We can also see that after 15 minutes of chanting ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।’ both the types of subtle negative energies in the subject were completely wiped off. Besides, positive energy was also found in her. This shows that if a woman, though high in Raja during menses, does chanting as much as possible along with her regular activities, the negative influence of menses at the spiritual level can be reduced.

The table also shows that on the 5th day of menstruation, after the subject had taken the head bath as prescribed by Scriptures, her IR negative energy reduced by nearly 40 percent, while the more intense UV negative energy disappeared entirely and positive energy was found in her. This subtle IR negative energy further reduces or disappears in the following days with an increase in positive energy as is apparent from the last column in the table.

(continued to Part-II)

 Dr. Athavale M.B.B.S., Clinical Hypnotherapist & Dr. Nandini Samant M.B.B.S., D.P.M. (Consulting Psychiatrist), Maharshi Adhyatma Vishwavidyalay

करुणामयी कोरोना

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

है तेरी करुणा कोरोना,   

याद मुद्दत आ गई। 

याद आयी अब वो शिरकत,     

आ नहीं, वो छा गई॥

करने का आदाब झुककर,     

बन अकल की ताज़गी। 

हाथ जोड़ प्रणाम हो या,     

हो सलाम की बंदगी॥

कर नमस्ते जोड़ कर को,   

दसेंद्रिय करबद्ध कर। 

पंचभूत शरीर को,   

तुझसे कोरोना जोड़कर॥

बुर्के की क़ीमत जगी अब,     

कोरोना की आड़ में। 

पर्दा घूँघट नए फ़ैशन,     

कोरोना तेरी बाढ़ में॥

आ तुझे इंसान की,     

फ़ितरत दिखाना है मुझे। 

किस तरह इस जन्तु भक्षी,     

को बचाना है तुझे॥

ब्रह्म की सृष्टी के,     

पाठों को पढ़ाना है तुझे। 

है तेरी करुणा कोरोना,     

जग जगाना है मुझे॥

आदि सृष्टी का है तू,     

मानव है उसका अंत अभी।

तुझसे है ये सीखना,     

कैसे रहें मिलकर सभी॥

बीते अरबों बरस से,     

सर्वत्र तू विद्यमान है।

क्या-क्या सीखा पथिक बन?       

उत्सुक हमारे कान हैं॥

ना कोई तेरी झोपड़ी,

ना आलीशान मकान है।

कैसे तू विकसित हुआ?     

उत्सुक हमारे कान हैं ॥

क्या किसी पद पर चढ़ा तू,     

या कला तेरी शान है?

किस तरह तू सतत हुआ?

उत्सुक हमारे कान हैं॥

है सुना तू है बदलता,     

बस यही तेरी जान है। 

सीखें तुम्हारी ये कला,     

उत्सुक हमारे कान हैं॥

पर सुन, कहीं मुल्ला मौलवी,     

पादरी पंडित मिलें। 

उनको पहले तू सिखाना,

होंगी कम मेरी मुश्किलें॥

फिर तु करुणा कर कोरोना,

मिलना शासक वर्ग से। 

इनकी आदत बाँटने की, 

तू जोड़ उन्हें विसर्ग से॥

कुछ और भी हैं बुद्धिशील, 

कहते स्वयं महान हैं। 

कैसे प्रवेश तू कर वहाँ? 

उत्सुक हमारे कान हैं॥

कहते तु छोटों से भी छोटा,     

निरीह नधम किटानु है। 

फिर भी इतनी ज्ञान शक्ति,     

उत्सुक हमारे कान हैं॥

(From left – Prof. Singh with his colleagues in his lab )

हम भी शायद सीख लें,     

कितने तेरे समाधान हैं।

हो तेरी करुणा कोरोना ,     

उत्सुक हमारे कान हैं।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA