सूर्य और सृष्टि

Mummy

– प्रो. माला रानी गुरु

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं

भर्गो देवस्यः धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!!

“तेजस्वी, सर्वश्रेष्ठ, वंदनीय तीनों लोकों पृथ्वी, अंतरिक्ष और द्युलोक में विचरण करने वाले भगवान सूर्य हमारी बुद्धियों को सन्मार्ग में प्रेरित करें”

यह वैदिक मूलमंत्र समस्त जीवधारियों का आलम्बन है| इन महिमामंडित, मण्डलाकार, ज्योतिस्वरूप सूर्यदेव को बारम्बार नमस्कार हों| उनके इस सृष्टि और सृजन के प्रति, सभी के जीवनदान के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रगट करने के लिए उत्तर-भारत में सूर्योपासना के लिए किया जाने वाला छठव्रत, बड़ी ही श्रध्दा से प्रत्येक वर्ष कार्तिक एवं चैत्र मास में संपन्न किया जाता हैं| अन्य प्रदेशों में भी सूर्य उपासना के विभिन्न प्रकार हैं|

समस्त वनस्पतियों फल-फूल-ईंख-अन्न-मिष्ठान से भगवान भास्कर को संध्या समय तथा प्रातःकाल सूर्योदय के समय श्रध्दापूर्वक अर्घ्य प्रदान किया जाता हैं| अस्त हों रहे अथवा उदय हों रहे सूर्य की आराधना निरन्तर चल रहे कालक्रम-समय को ही धोतित करता हैं| यह आराधना आडम्बर रहित जनसाधारण का महापर्व है| श्रध्दापूर्ण श्रद्धालु-जन इस प्रकार अर्घ्य प्रदान कर कृतज्ञता प्रकट करते हैं|

एहि सूर्य सहस्त्रांशो तेजो राशे: जगत्पते !

अनुकम्पय मां देवो गृहाणार्घ्यं  दिवाकर: !!

इस छठ पर्व में स्वयं सुर्योत्पन (जैसा की किवदंती है) शाकद्वीपीय ‘मग’ ब्राह्मणों का विशिष्ट महत्त्व है| ये वही समुदाय है, जिनके पूर्वजों को भगवान श्रीकृष्ण अपने पुत्र साम्ब के उपचार के लिए शाकद्वीप से भारत लेकर आये थे, और कालांतर में ये ब्राहमण समुदाय वैद्य के रूप में प्रतिष्ठित हुए| कहने का तात्पर्य है की सूर्य के किरणों की महता प्राचीनकाल से ही रोगनिवारक के रूप में स्थापित है|

हमारी संस्कृति की अनुपम ज्ञानप्रद श्रृंखला जो पूर्वकाल में शिष्यों तथा ऋषि पुत्रों की श्रवण और मनन परम्परा से आगे बढ़ी थी| श्रवण और मनन में श्लोक केवल शाब्दिक अर्थ ही नहीं बल्कि उसके उच्चारण और अनुकम्पन से किसी खास अर्थ या प्रयोजन निमित्त होता है| आर्य ऋषियों की श्रवण-मनन वाली ज्ञान परम्परा के धूमिल पड़ने के बाद, आधुनिक युग में यह श्रुश्रुत परम्परा क्रमशः लेखन एवं दृश्यज्ञान में परिवर्तित हो गयी| परन्तु नई पीढ़ी तकनीक की अंधी दौड़ में ज्ञान के आधुनिक प्रकल्पों में अग्रसरित है, और शाब्दिक अर्थ से इतर प्रभावों से अनभिग्य होती जा रही है| शब्द ज्ञान से इतर की समझ के लिए किसी के पास समय नहीं| परन्तु इस समृद्ध ज्ञान वैभव के विरासत अगली पीढियों तक पहुचे, जिससे वे सार्थक जीवन जी सके, भौतिकता के दुष्परिणामों से बच सके और अध्यात्म की ओर मुड सके, और हमारी आर्य परम्परा की विरासत को जान सके, इसके लिए चित्रात्मक अभिव्यक्ति एक ससक्त माध्यम हो सकता है| इसीलिए यहाँ आदिदेव, प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरुप भगवान सूर्य की उपासना को चित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति दी गई है|

sun

(Editor’s note – The author has painted this image. Her present work is themed at  Sanskrit literature from where she picked up the myriad colors which make her painting style vibrant and classy. )

“सूर्य और सृष्टि” शीर्षक वाला यह चित्र सूर्य-वन्दना को स्पष्ट कर रहा है| आकाश में दर्शित तीन मंद्लाकृति भूलोक, अन्तरिक्षलोक, तथा द्युलोक को प्रकाशित करने वाले सूर्य की महिमा को प्रकट कर रहा है| परमात्मास्वरुप सूर्यदेव पंच आदि तत्वो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश से सृष्टि का निर्माण करते हैं| इस सृष्टि के निर्माण में प्रकृति देवी के सहयोग से, छः ऋतुओं की शक्ति से नित-नूतन समस्त जड़चेतन जगत की सरंचना करते हैं|

चित्र में सात-स्त्रियों की जो आकृति है, उसमे प्रकृति देवी सहित छह ऋतुओं के व्यहार एवं प्रभाव को दर्शाया गया है| उनके बस्त्रों का रंग उस ऋतु विशेष की प्रकृति एवं कार्य का परिचायक है| चित्र में दायी ओर की प्रथम स्त्री वसंत ऋतु की परिचायक है, जिसका पीला वासंती वस्त्र पृथ्वी को पुष्पित एवं पल्लवित कर संसार को सृजन शक्ति के आनंद से भर देता है, तभी तो बसंत को ‘ऋतुराज’ भी कहा जाता है| दूसरी स्त्री ग्रीष्म ऋतु का प्रतीक है, जिसका लाल वस्त्र मौसम के परिताप को प्रकट करता है| ग्रीष्म ऋतु में पृथ्वी गर्म होकर सृजन की ओर प्रवृत होती है| तीसरी स्त्री स्वयं प्रकृति देवी है, जो सभी ऋतुओ को स्वयं के कार्य निष्पादन को प्रेरित करती है| चौथे स्थान पर हरे वस्त्र में हरियाली की प्रतीक वर्षा ऋतु है, जो ग्रीष्म के ताप से संतप्त प्रकृति और जनजीवन में सृजन शक्ति भर कर जीवन का श्रृंगार करती है| तदन्तर हलके नील वर्ण वाली पांचवी आकृति शरद ऋतु की है, जो नव सृजित वस्तुओं में जीवन का संचार कर संरक्षित रखती है| उसके बाद छठी और सातवी आकृति हेमंत और शिशिर की है, जो वस्तुओं और जीवन को संपुष्टि प्रदान कर परिपक्वता देती है, उसमें जीवनदायी रस का संचार करती हैं| इस प्रकार छह ऋतुएँ समस्त चराचर जगत में सृजन-स्थिति एवं परिपक्वता से सृष्टि का क्रमिक संपादन करती हैं|   

इस प्रकार सूर्यदेव ही अन्न-जल, वन-उपवन, पर्वत-झरने, जीव-जंतु-पक्षीगण, कीट-पतंग, मानवादि का निर्माण कर संपोषण करते हैं| इस चित्र में आदिपुरुष मनु और आदिस्त्री शतरूपा (हिन्दू मान्यतानुसार) सूर्य का वंदन करते हुए दिख रहे हैं| भारतीय आर्य परम्परा में ‘यज्ञ’ को विशेष महत्त्व मिला है| हवन कुण्ड से उठती अग्नि की लपटें आदि पंचतत्वों में से एक अग्नि तत्व के निर्देशित कर रही है| अग्नि जल की भी सृजक है और जल जीव-सृजन की प्रथम कड़ी है| इस प्रकार सूर्य ही सृष्टी के केंद्र में विराजमान हैं, ज्ञान-विज्ञान की धुरी हैं|

सूर्य की दिव्य शक्तियों की जानकारी हमें बहुत अल्प हैं| हमारी आर्य ऋषि परम्परा से प्राप्त ज्ञान का मंतव्य है कि ब्रह्मांड में अनेकानेक सूर्य और उनका सौरमंडल हैं|अनेकानेक ग्रह-नक्षत्र-निहारिका-उल्कायें, तारागण और आकाशगंगाए हैं, कुछ अज्ञात शून्य भी हैं, जो एक दिव्यप्रकाश स्वरुप से संचालित एवं नियंत्रित हैं| गणित और विज्ञान का “शुन्य” घटक भी संभवतः सुर्याकृति पर ही निर्धारित हैं| समस्त गणना विज्ञान शुन्य से प्रारम्भ होकर असीमित शून्यों तक के माप का सफ़र तय करती हैं, जिसकी अवधारणा पूर्ण रूप से भारतीय है| खगोलीय दुरी की व्याख्या भी प्रकाश वर्ष में की जाती है| अतः सूर्य के बिना आधुनिक विज्ञान के परिकल्पना दुरूह है|

अतः हम परमात्मा की कल्पना प्रत्यक्ष प्रमाणस्वरुप भगवान सूर्य में कर सकते हैं| विश्व के अनेकानेक देशो में, विभिन्न धर्मों में किसी न किसी रूप में सूर्य उपासना का रूप मिलता है| मानव तथा अन्य जीवधारियों को सूर्य की दिव्य शक्तियों की प्रतीती होती है, उसी प्रकार से जिस प्रकार वायु तथा जल की जीवनधारण क्षमता का अनुभव होता है| इस प्रकार सूर्य की दैवीय शक्तियों को नकारना अपनी वास्तविकता को नकारने के सदृश्य है|

ज्ञान जीवन की सार्थकता और आनंद को संपुष्टी करता है, अततः ज्ञान की ही सर्वत्र पूजा होती है इसीलिए ज्ञान का अन्वेषण तथा अर्चना अनिवार्य है| सद्यः जन्मा बालक जीवनदायनी दुग्धाहार के लिए स्वतः ही दुग्धधारा को ढूंढता है| जन्मदात्री माँ के अस्तित्व-बोध से रहित वह उस व्यक्तित्व (माँ) से अगाध प्रेम और श्रध्दा से जुड़ जाता है, जीवन पर्यंत यही जुडाव ही पूजा अर्चना है| निष्कर्षतः शाश्वत शक्ति जो सृष्टि का सृजन करती है, उसके प्रति प्रेम और श्रध्दा, पूजा और समर्पण स्वाभाविक ही है|

वेदों में सूर्य की विभिन्न शक्तियों का ज्ञान, अन्तरिक्ष के रहस्य, अग्नि, जल-पिंडो इत्यादि की अन्तरिक्ष में उपस्थिति का ज्ञान और विज्ञान प्रतीकात्मक शैली में उपलब्ध है, उदहारणस्वरुप ऋग्वेद के प्रथम मण्डल के सवितृ सूक्त 35 में हिरण्यस्तूप ऋषि के अनुसार इस कथन की पुष्टी हो रही है|

ति॒स्रो द्याव॑: सवि॒तुर्द्वा उ॒पस्थाँ॒ एका॑ य॒मस्य॒ भुव॑ने विरा॒षाट् ।

आ॒णिं न रथ्य॑म॒मृताधि॑ तस्थुरि॒ह ब्र॑वीतु॒ य उ॒ तच्चिके॑तत् ॥

सवितृ सूक्त ऋगवेद| मण्डल (1:35) मन्त्र 6

स्वर्ग से उपलक्षित प्रकाशमान लोक तीन हैं| उनमें से दो लोक सूर्य के समीप है अर्थात् दो लोक-भूलोक और द्युलोक सूर्य से प्रकाशित होते हैं| एक तीसरा लोक अन्तरिक्ष है जो यम के घर जाने वाले प्रेतों को सहन करता है अर्थात् मरने के बाद पुरुष अन्तरिक्ष के मार्ग से यम लोक को जाता है| जिस प्रकार रथ के अक्ष में डाली गई आणि (किल) से रथ अवस्थित रहता है, उसी प्रकार अमृत अर्थात चन्द्र, तारे आदि प्रकाशमान नक्षत्र अथवा जल उस सूर्य के समीप अवस्थित हो गये है, और इस प्रकार के सूर्य को जो मनुष्य जानता है, वही मनुष्य सूर्य की महिमा का वर्णन कर सकता है|

इस प्रकार वेदों उपनिषदों इत्यादि के मनन, अनुशीलन एवं वैज्ञानिक गवेषणा से अद्भुत खगोलीय तथ्यों की बृहद जानकारी को मानवोपयोगी बनाया जा सकता है| इन्हीं सब तथ्यों को चित्र के माध्यम से व्यक्त कर, युद्ध, अशांति और प्राकृतिक असंतुलन की विभीषिका को झेलती मानवता की कुछ त्राण मिल सके, इसका एक छोटा सा प्रयास किया गया है|    

प्रो. माला रानी गुरु, संस्कृत विभाग, राम कृष्ण महिला महाविद्यालय, गिरिडीह, झारखण्ड

Advertisements

Vibration: The Cause of Our Existence and its connection with Vedic Philosophy (Part-II)

-Dr. Raj Kumar

(continued from part-I)

The ancient Vedic text also provides ideas about this concept. According to Veda, the entire universe is a manifestation of Prakriti, which is nothing but Parabrahman or the Purush. The Purush is the manifestation of a vibration called Svara, a life force. I would like to refer to the Nachiketa’s story in which Yama gave a very realistic answer to the Nachiketa’s question. Yama said “perception of sense is bigger than sense, mind is bigger than perception, knowledge is bigger than mind, Atma is bigger than knowledge, undefined (avayakt) is bigger than the Atma, and Purush is bigger than avayakt (Kathopnishad).

 यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्वं स्थावरजङ्गमम् |
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ || 26||

yāvat sañjāyate kiñchit sattva sthāvara-jagamam
k
hetra-khetrajña-sanyogāt tad viddhi bharatarhabha

                                         (Bhagvatgita: Chapter Thirteen verse 26)

In this shloka, Sri Krishna said to Arjuna —– “Wherever a being is born, whether unmoving or moving, knows that it is from the union between the field and the knower of the field. (Purusha is the knower of the field; Prakriti is the field).

So, this Purush uses his Prakriti to manifest five different vibrations which causes the production of five basic physical elements; Akasha (Ether), Tejas (energy), Vayu (forces/fields), Pritvhi (atomic elements), and Apah (fluid). Apart from these five basic physical elements, the universe is composed of four non-physical elements; space, time, mind and Atma (space is a non-physical element of panchmahabhuta). I will describe the Atma later in this article. For now, we would concentrate on space, time and mind.

spirit

The concept of the body chakra in the Vedic text is nothing but energy point. These energy points are also defined by their vibrational frequency. For example, Muladhara (Cervix) frequency is 261.6, 523.3, 1046.5, 2093, 4186 Hz and denoted by sound note C (https://www.booksfact.com/mantra-sastra/mantras-frequencies-heal-kill-transcend.html). Also, modern science showed us that the best way of communication is vibration, for example WiFi, radio telescope, satellite communication, etc. These technologies prove one very important point that locality (or nearness) is not an important requirement for communication, as hypothesized previously. The idea of locality illustrates that if anything moved it was because of the action of something else on it. However, the idea of non-locality suggests that distant systems can be connected differently—— in a totally new way—— in which distance does not matter (Shacklett and Gough, 1991; Massar and Pironio, 2012). When we talk about a locality effect, we are talking about space time. We know the cause and we can trace the mechanism of the signal. On the other hand, when we talk about non-locality cause and effect are not linked —we can know the cause, we can know the effect —but cause and effect are not linked in the space-time because there is no measurable signal (very weak signal) or mechanism, or in space-time they are separated. Now let’s examine if it is true for the system where space-time is concentrated, for example the human body. The human body is made of 70 to 100 trillion cells of many different types. These cells need to exist in harmony and require very effective cellular communication process. When there is noise, interference, and misinformation enter into this communication process, the human body suffers. The cellular communication is through either electromagnetic or chemical communication systems. So, it is the information which provides an instruction to the system to acquire some form, structure and direction. And this information comes from the manipulation of energy which gives power to move the system, connects different aspects of a system, and helps in communications. Therefore, good cellular communication is the key to successfully create a healthy human body. Probably that is the reason why mothers are advised to have a nice and conducive environment around her, avoid drinking or eating bad foods, listen good music and avoid particle radiation. Environmental input is very important to the fetus and developing the body for healthy evolution of body and brain. Dr. Francis Rene Van de Carr (Chief Obstetrics and Gynecology, St. Rose Hospital, Hayward, CA) has shown that there exists a developmental window of time during which wiring in the brain grows (from four months into the pregnancy until the three months after birth) and it is very sensitive to sensory input (Van de Carr, 1996; Gough, 1999). Sensory inputs include tactile patting, vibratory movement, and sounds from voice to music are needed to simulate heart beats. It also includes non-local inputs such as loving thoughts and feelings. Such sensory inputs are vibratory in nature and shown to increase growth rate, improve motor functions, enhance intelligence, and change the sense of self for life. So, one can hypothesize, at this point, that the initial input for the differentiation of cells in the human body is a non-local phenomenon. Another evidence of a non-local phenomenon comes from the concept of magnetic field. Magnetic field with electrical field creates an electromagnetic field (although the magnetic field itself can create an electric field and vice versa…..), which generates the non-local aspects of the reality. For example, we know that the earth has a magnetic field and life cannot exist without this, but in reality we never feel this. Can you imagine, we never feel the cause of our existence? Isn’t that interesting? The same way the Atma is the cause of our existence, which is the principle force of life representing the non-local aspects of our reality. Very often we connect Atma to the heart. Scientifically the magnetic flux density of heart is over 5000 times larger than that of the brain (Pearsall 1998; Clarke, 1994). Therefore, the Atma is also a non-local aspect of reality that retains patterns or forms beyond ordinary 3D space and time.

Various scriptures of Veda discussed that the universe created by sound or cosmic vibrations.

चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्रह्माणा ये मनीषिण: गुहा त्रीणि निहिता….मनुष्या वदन्ति।

“catvari vak parimita padani tani vidur brahmana ye minishinah, guha trini nihita neengayanti turiyam vaco manushya vadanti” 

                                                                                                            (Rig Veda 1.164.45) 

Vak that exists in four forms; three are hidden and the fourth is what we speak. These four levels are Para Vak (the highest form of sound), Pashyanti (the sound vibration heard in the causal worlds), Madhyama (the sound as perceived in the subtle or Pranic world) and Vaikhari (the lowest sound). In other words, thinking with words is Vaikhari, with ideas is Madhyama, with spirituality is Pashyanti, and with truth, it is Para-Vak.

Thought itself is a vibratory energy, which creates everything around us. So, in conclusion, reality is not what you see. Reality is the manifestation of the rate of frequencies in which an object is vibrating. Even object, phenomenon, thought, emotions or mental state has its corresponding rate and mode of vibration. Since the universe is also made up of vibration at the deepest level, manipulation of vibration of thoughts can affect that too.

References

Carr, Van de, F. R. (1996). The Ins and Outs of Communication with a Preborn Baby. FMBR Video tapes.

Clark, J. (1994). “SQUIDs.” Scientific American, 271, 73 – 74.

Massar, S., and Pironio, S. (2012). Viewpoint: A closer connection between entanglement and nonlocality. Physics, 5, 56.

Gough, W. C. (1999). The cellular communication process and alternative modes of healing. Subtle Energies and Energy Medicine: An interdisciplinary journal of Energetic and informational interactions, 8, 56 – 60.

Shacklett, R. L. and Gough, W. C. (1991). The unification of mind and matter: A proposed Scientific Model. Foundation of Mind-Being Research, Technical Report.

Pearsall, P. (1998). The Heart’s Code: Tapping the wisdom and power of our heart energy. NY: Broadway Books.

– Dr. Raj Kumar, Assistant Professor, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA.

 

 

Vibration: The Cause of Our Existence and its connection with Vedic Philosophy (Part-I)

– Dr. Raj Kumar

“If you want to find the secrets of the universe, think in terms of energy, frequency and vibration.” – Nicole Tesla

Evolution over time….. one of the most intriguing and central theme of biology….. the past is the defining feature to the present. Life on this earth is a combination of chance and necessity which define evolutionary process. Necessity is facilitated by physical forces, chemical reactions, and is driven by survival tendencies. On the other hand, chance is associated with uncertainty of things, and is driven by randomness characteristics of the universe. But one thing is for sure, that all these things are associated with physical and chemical tendencies of molecules floating around us.

If we want to understand the nature and evolution of this world, then we need to understand the fundamental basis of the existence of matter. It is well known that the world is made of matter, but we do not understand the fundamental basis of working of this material world. How the material world is created and how it maintains its perpetual motion are a few of fundamental questions. To study this we need to study the code —— the energy code, which is essentially made of light, sound, frequency and vibration. At the fundamental level, all forms of this code are the same.

At a first glance, frequency and vibration appear to be the same. People often use vibration and frequency interchangeably, but there is a difference between both terms. When you consider the flow of energy then you can see the difference. When something vibrates, then energy contracts towards the center point from which it first came out of. In case of oscillation, the energy expands away from the center point and, and one unit of contraction and expansion is frequency. So, how fast an energy unit contract (vibration) and expands (oscillation) will determine the frequency rate of all things. This process also determines the density levels of the matter in the material realm. As the frequency rate of matter increases or decreases, matter becomes lighter and less dense. Since our body is made of matter, it will also become lighter and less dense as our frequency increases.

tumblr_niqqdmiRlP1qjz43ho1_1280

(Source of Image : https://theawakenedstate.net/how-to-tune-your-own-frequency/)

 

In fact, the true state of reality is made from pattern of energy that flashes on and off frequency patterns that are perceived by our consciousness to give us the perception of time and the solidity of matter. In other words, matter behaves more like an illusion which is one of the conclusion of Indian ancient texts. However, the illusion should be taken seriously because it is a form of energy manifestation (in fact, it is the reality which we perceive). So, it is the frequency which gives matter its uniqueness and characteristics, and combination of frequency, vibration and oscillation are a further manifestation of geometries and structure. In my view, the best expression of illusion in Vedic text is the representation of the divine dance of Lord Shiva. The dance represents Shiva’s five activities (Panchakriya); Shrishti (creation), Sthiti (preservation), Samhara (destruction), Maya (illusion) and Moksha (salvation). There are three main essential significance of this divine dance; a) it is an image of rhythmic activities (vibration), which is the source of all movement in the universe, b) the purpose of this dance to make us aware of the illusionary characteristic of the world, and c) the place of happening is within us, whether it is the creation or destruction or illusion.

There is no solidity in the universe, it is just a manifestation of vibration. For example, a crystal structure is a collection of different bodies of the elements according to its particular vibrational frequency. One simple experiment can be set up with sand and tuning fork. Spread some sand over the head of a drum, then take a tuning fork and stick a note just above the drum. You will see the shifting of sand and acquiring a geometrical shape. Change into a different sound, the sand will shift to assume another geometrical feature. This is happening just because of the vibration that sound produces (Cynamatics experiments https://www.youtube.com/watch?v=GtiSCBXbHAg).

Sound Frequencies + Vibration = Geometry

Another complex example is the universe and the Big Bang theory. The universe is continually expanding as suggested by the Big Bang theory, which is again the manifestation of push-pull (contraction-expansion) effect of gravitational force. This is also gravitational vibration, which balances the gravity and levity between objects in the universe. So, the origin of the universe is nothing but the manifestation of vibration. In the QFT (Quantum Field Theory) approach, the photon field is created by a vibration of electrons. The vibrational energy generated by the photon field transport energy and momentum. It is well-known from the pair production concept that a photon can create an electron-positron pair. Two sets of vibrations are set up by this process….. one is consistent with an electron vibration and other is consistent with the antimatter electron or positron vibration. So, again the behavior of our fundamental particles is dependent on the vibrations. Even Higgs Boson (a fundamental particle with even parity and no spin; popularly known as God particle), which is responsible for interaction with particles and gives them their mass, is detectable when it starts vibrating. This particle is only detectable when the particle collision in high field is allowed, which caused the Higgs field to vibrate and make detection possible.

 तेजो यत्ते रूपं कल्याणतमं तत्ते पश्यामि योऽसावसौ पुरुषः सोऽहमस्मि ॥ Isha Upanishad Verse 16.

The light which is the fairest form, I see it. I am what he is.

Ancient Indian sages may have figured out this phenomenon which may have been esoterically connected to the Vedic education system that includes oral traditions/techniques to transfer knowledge from one generation to another. Although the characteristics of Vedic oral traditions/techniques is not in the scope of this article, I mentioned this here to make a point and connection.

In universe, everything is energy vibration and all the geometric shapes are due to these vibrations, including our consciousness (Brian Waves; Table 1).

Table 1: Frequencies of brain waves

Frequency Range Name Associated With
>40 Hz Gamma waves Higher mental activity, including perception, problem solving, fear, and consciousness
13 – 39 Hz Beta waves Active, busy or anxious thinking and active concentration, arousal, cognition, and or paranoia
7 – 13 Hz Alpha waves Relaxation (while awake), pre-sleep and pre-wake drowsiness, REM sleep, dreams
8 – 12 Hz Mu waves Mu rhythm, Sensorimotor rhythm
4 – 7 Hz Theta waves Deep meditation/relaxation, NREM sleep
<4 Hz Delta waves Deep dreamless sleep, loss of body awareness

All the stellar communications on earth and beyond are happening through vibration only. For example, the satellite radio offers an endless amount of stations all at once, and one can dial into any frequency they want. Just because one may turn to FM 88.7 Hz on the radio dial, it doesn’t mean that FM 90.1 Hz or AM 55.1 Hz doesn’t exist, it’s just that these particular frequencies were not resonating at one’s receiver, rather it is just that FM 88.7 Hz vibrates at the frequency that you prefer to vibrate on. Same thing in our perception of reality, we have a resonance of the things which we want to perceive, we want to vibrate on or say our perception wants to vibrate on….. it doesn’t mean the other things do not exist. Veda also developed this concept and mentioned that we are not the creator of the knowledge, we are just the transmitter, knowledge is available out (in the Akash tatva) there….. we need to resonate with those to get the sense of it. My biochemistry experience also substantiates this, the molecular interaction is not just a binding event, it is an event when molecules are in perfect rhythm of each other which allows them to come close, talk to each other and interact.

(to be continued…)

– Dr. Raj Kumar, Assistant Professor, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA.