ज्ञान की महिमा स्वीकार करने का दिन – गुरुपूर्णिमा

– डॉ. शशि तिवारी

गुरुब्रह्मा गुरुर्विष्णु: गुरुर्देवो महेश्वर: |

 गुरु: साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

’उस गुरु को प्रणाम है जो ब्रह्मा है, जो विष्णु है और जो महेश्वर का रूप है। साक्षात् परमब्रह्म गुरु ही है।’ इसी तरह एक हिंदी दोहे में कहा गया है कि-

गुरु गोविंद दोनों खड़े काके लागू पांव ।

बलिहारी गुरु आपने जिन गोविंद दियो बताए ॥

‘यदि गुरु और गोविन्द दोनो खडे हों तो किसके पैर छुएं ? मैं तो गुरु की बलिहारी जाऊंगा  जिन्होंने गोविन्द के बारे में बताया।’

वास्तव में गुरु ब्रह्म के समान हैं; कुछ माने में उससे भी बड़े हैं क्योंकि ज्ञान का रास्ता गुरु ही बताते हैं। वेद में तो साफ-साफ निर्देश है- मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव । ’माता, पिता और आचार्य का सम्मान करने वाले बनो’। संस्कृत के एक श्लोक में कहा गया है -’जो ज्ञान की शलाका से अज्ञान के अंधकार को दूर कर आंखों को खोल देता है, ऐसी श्री गुरु को प्रणाम है।’

हिंदू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक मास के अंतिम दिन पूर्णिमा की तिथि होती है इसे ही पूर्णमासी भी कहते हैं। यह पूर्णता की प्रतीक है। देखने की बात है कि लगभग सभी माह की पूर्णिमाएं किसी विशेष नाम से भी जानी जाती है -जैसे चैत्र मास की पूर्णिमा हनुमान जयंती,  वैसाख मास की पूर्णिमा गंगा स्नान, श्रावण मास की पूर्णिमा रक्षाबंधन या श्रावणी, आश्विन मास की पूर्णिमा शरद पूर्णिमा । आषाढ़ मास की पूर्णिमा गुरुपूर्णिमा या व्यासपूर्णिमा के नाम से जानी जाती हैं ।

गुरुपूर्णिमा उन महर्षि व्यास के नाम पर है, जिन्होंने चारों वेदों का व्यास  किया था, पंचम वेद महाभारत की रचना की थी और पुराणों का प्रणयन भी किया था। ये वेदव्यास के नाम से भी जाने जाते हैं। महर्षि व्यास एक श्रेष्ठ गुरु के प्रतिनिधि हैं। विचारणीय है कि कैसे गुरुपूर्णिमा का पवित्र दिन एक बहुत बड़ा दिन हो जाता है-  गुरु की पूजन, वंदन और विश्वास का दिन। माता-पिता के बाद यदि कोई पूजनीय माना गया है तो वह गुरु ही है। वह हमें ज्ञान देता है जिससे हमारा व्यक्तित्व विकसित होता है। भारतीय संस्कृति में ज्ञान की सर्वाधिक महत्ता है, इसीलिए समाज में गुरु का भी विशेष स्थान है। वैसे तो प्रतिदिन गुरुवन्दन करणीय है, पर  इसे समारोहपूर्वक मनाने के लिए एक दिन पर्व के रूप में रखा गया है।

पिता और गुरु अपने पुत्र और शिष्य को सब कुछ दे देना चाहते हैं । उससे पराजय की कामना करते हैं जिससे उनका यश हो। कभी पिता लोभवश कुछ अपने पास बचा कर रख भी ले, परन्तु गुरु कभी भी कुछ भी ज्ञान अपने पास छुपा कर नहीं रखना चाहते, सब कुछ निस्पृह भाव से शिष्य को दे देना चाहते हैं उसके जीवन को विश्वास से परिपूर्ण करना चाहते हैं ।

गुरुपूर्णिमा मना कर हम अपने आदरणीय गुरुजनों को सादर स्मरण करते हैं और इस तरह् जीवन में ज्ञान की उपयोगिता को स्वीकार करते हैं। गुरुपूर्णिमा अप्रत्यक्ष रूप से उदात्त चरित्र, अनुशासित जीवन, और सम्यक ज्ञान की महिमा स्वीकार करने का दिन है – तस्मै श्री गुरवे नमः

– डॉशशि तिवारी,अध्यक्षवेव्स –भारत

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Sūrya Namaskār Ᾱsana (Controversy over Sūrya or God?)

Sh. Vidya Sagar Verma

Declaring International Day for Yoga is a great tribute to the seers and sages of India who propounded the Yoga Discipline.

The literal meaning of the word ‘Yoga’ is union. Union of what? Answer to this question has been given by renowned commentator on Yoga Darśana Yajñyavalkya: Samyogo Yoga Ity Ukto Jivātma-Paramātmanoriti, i.e., Yoga is the union of Soul and God. There is a divine spark in all of us and that, because of ignorance, we are not aware of it and, hence, the advice is to know ourselves. And that can be done only through Yoga. God being present everywhere is present in our souls too and can be discerned there directly.

Thus, Yoga and its purpose defined by many seers, scholars, philosophers-

Gita offers a secular definition of Yoga, viz.,

योग: कर्मसु कौशलम्

Yogah Karmasu Kaushalam

i.e., Yoga is perfection in action. By controlling the thought currents of one’s mind, one attains deep concentration on any subject matter and, thereby, attains complete knowledge of the matter pondered over.

Sage Patanjali in his Yoga-Sūtra said :

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः 

Yogah Chitta Vritti Nirodhah

i.e controlling the modifications / thought currents of mind is Yoga. It is a holistic system having both physical and psychological traits.

Rudolf Steiner has also said “Meditation is the way to knowing and beholding the eternal, indestructible, essential centre of our being” (https://timesofindia.indiatimes.com/edit-page/Dissolve-thoughts/articleshow/347676.cms).

Philosopher Allie M. Frazier has also defined Yoga: 

The purpose of Yoga is to unite man with the Divine Ground, with the Cosmic Consciousness. Yoga is the psychological linking of the mind to the super-ordinated principle ‘by which the mind knows’. 

Every human being possesses three things – Body, Mind and Soul (Spirit). Yoga aims at the composite development of human personality — physical, mental and spiritual. The Vedas and the Upaniśads advise ‘Ᾱtmānam Vidhi’, i.e., Know Thyself.

आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु।

(कठोपनिषद्, अध्याय १, वल्ली ३, मंत्र ३)

To know oneself, one has to concentrate deeper inside. Performing Yoga-Ᾱsanas is not just a way to physical fitness but also helps in deliberating deeper essence of his/her body. Out of 84 Ᾱsanas of Hatha-Yoga, two are very prominent and effective — Shirṣa-Ᾱsana and Sūrya-Namaskār Ᾱsana.

The Sūrya Namaskār Ᾱsana energises the whole body, it wards off many diseases related to the spine, stomach, thyroid gland, arthritis, et al. It is, therefore, recommended that this Ᾱsana must be learnt and performed by all the practitioners of Yoga.

It is unfortunate that the Yoga Capsule devised by the Ministry of Ayush for the International Day of Yoga Celebrations, Sūrya Namaskār Ᾱsana has been excluded, whereas, in many countries, it forms a prominent part of the Yoga Demonstration on this day celebrated by almost all the countries in the world.  

The word ‘Sūrya’ in the Sūrya Namsakar does not mean Sun, but God.

सूर्यो वै सर्वे देवा:।

(शतपथ ब्राह्मण १३.७.१.५)

In the Vedas Indra, Varun, Sūrya, et al, are all the names of God and he (Sun) is worthy of being bowed to by all. Brāhmaṇas of Yajurveda narrated various references where Sūrya is said to be ‘द्वादश’.

आदित्यो  द्वादश:।

(तैत्तिरीय ब्राह्मण १.५.३.४; शतपथ ब्राह्मण ११.६.३.५)

विष्णुर्धाता भग: पूषा मित्रेन्द्रौ वरुणोऽर्यमा….॥

सूर्य (आदित्य) के बारह नाम – विष्णु, धाता, भग, पूषा, मित्र, इन्द्र, वरुण, अर्यमा, विवस्वान्, अंशुमान्, त्वष्टा, और पर्जन्य।

(ब्रह्मपुराण ३१.१७-१८)

To avoid the controversy over Sūrya Namaskār Ᾱsana, a humble suggestion is that it be renamed as Iśa Namaskār Ᾱsana as Sūrya here means God.

Prof. Max Muller’s following words in ‘India: What Can It Teach Us’ are worthy of attention: 

“They were all meant to express the Beyond, the Invisible behind the Visible, the Infinite within the Finite, the Supernatural above the Natural, the Divine, Omnipresent, Omnipotent.”

It is not only the Vedas, but many religions, philosophers and scholars declare God as the Soul of the Universe: 

All are but parts of (the Universe is) one stupendous Whole

Whose Body Nature is, and God the Soul.

— Alexander Pope (https://www.bartleby.com/360/4/13.html)

Sh. Vidya Sagar Verma, Former Ambassador

प्राणसाधना क्यों और कैसे?

डा. राजकुमारी त्रिखा

२१ जुन, २०१५ को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा संकल्पित “अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस” ने न केवल भारत में अपितु विश्वभर में ख्याति प्राप्त की। वस्तुत: योग विद्या हमारे पूर्वजों की अत्यन्त प्राचीन और अनमोल विरासत है। आधुनिक वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा डाक्टरों ने योगसाधना से होने वाले अनेक शारीरिक और मानसिक लाभों को प्रमाणित किया है। उन्होंने सूर्य नमस्कार और अन्य सूक्ष्म व्यायामों के प्रभाव का योगक्रियाओं के प्रभाव के साथ तुलना की, और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि योग के प्रभाव अन्य व्यायामों की अपेक्षा अनेक गुणा अधिक, उत्तम गुणवत्ता वाले और व्यापक रहे। शास्त्रों में तो स्पष्ट उद्घोष किया है – नास्ति योगसमं बलम्। प्राचीन और गुरुपरम्परा से मिलने वाली इस योग-विद्या का प्रचलन धीरे-धीरे इसके जिज्ञासु और साधकों की उत्साहहीनता के कारण कम होने लगा। समय के साथ-साथ मनुष्यों की शारीरिक और नैतिक शक्ति क्षीण होने लगी। परिणाम स्वरूप धीरे-धीरे यह विद्या लुप्त होती गई । इस विद्या के जानकारों की यह भी मान्यता रही कि विद्या अपात्र व्यक्ति के पास न पहुँच  जाए तथा उसका दुरुपयोग न हो, इस कारण भी हमारे ऋषियों ने इस विद्या को वेद मंत्रों में संकेतों के माध्यम से सुरक्षित रखा। यह विद्या अत्यंत गोपनीय है और अनेक प्रकार से मानव कल्याण करने वाली है।

प्रायः आसन और प्राणायाम को ही योग समझ लिया जाता है परंतु योग के आठ अंग है – यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, और समाधि। आसन तो योग का केवल मात्र एक ही अंग है। आसन के अन्तर्गत स्वास्थ्य की दृष्टि से अत्यंत लाभकारी क्रियायें आती हैं, अतः आसन बहुत लोकप्रिय हुए। प्राणायाम भी अत्यंत ही महत्वपूर्ण और लाभकारी क्रिया है, जिसका उपदेश योग ग्रंथों में बहुत विस्तार से है। प्राणों की शक्ति को सभी जानते हैं। जब तक शरीर में प्राण हैं तभी तक व्यक्ति जीवित रहता है। हमारे ऋषियों ने बहुत सावधानी से प्राण की गतिविधियों को देखा और मनन किया। अतः प्राण-साधना को जानना परमावश्यक है।

ऋषियों ने शरीर में पंचप्राणों, उनके कार्यों और स्थानों का भी अध्ययन किया। उन्होंने बताया कि शरीर में पाँच प्राण और पाँच उपप्राण होते हैं। प्राण, अपान, उदान, व्यान और समान – यह पांच प्राण हैं तथा नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त, और धनंजय उप प्राण हैं।  इन मुख्य पांच प्राणों में भी प्राण मुख्य है। इसका स्थान हृदय में बताया है। अपान वायु का स्थान गुदा में, समान वायु का नाभि में, उदान का कण्ठ और उसके ऊपरी भाग में स्थान है। व्यान वायु सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त रहती है।

हृदि प्राणो स्थितो नित्यमपानो गुदमण्डले।

समानो नाभिदेशे तु, उदानो कंठमध्यगः।।

व्यानो व्याप्य शरीरे तु , प्रधानाः पंचवायवः।

(घेरण्ड संहिता ५.५९-६०)

शरीर में इन प्राणों और  उपप्राणों का कार्य भी अलग अलग है। प्राण शरीर में शक्ति प्रदान करता है, अपान वायु  शरीर से अशुद्धि निकाल कर बाहर कर देता है। समान वायु खाए हुए भोजन को पचाता है । उदान वायु कंठ के ऊपर के भाग में संचार करता है। व्यान वायु पूरे शरीर में विचरण करता है। नासिका द्वारा ली जाने वाली वायु जीवन दायिनी होती है। यह शरीर के अंदर जाकर आन्तरिक अशुद्धियों, रोगाणुओं और कफ, वात, पित्त (त्रिदोष) के मल दूर करती हुई उनको प्रश्वास के साथ बाहर फेंक देती है। जब तक शरीर में प्राण वायु समुचित रूप से गतिशील रहती है, तभी तक शरीर स्वस्थ रहता है। यही कारण है कि केवल प्राण का ही विस्तार किया जाता है, अर्थात् प्राणों का ही आयाम किया जाता है, अपानवायु आदि अन्य वायुओं का नहीं। विधिपूर्वक किया गया प्राणायाम अनेक रोगों को दूर करता है।

(Source of Image : https://arlivenews.com/in-udaipur-final-rehearsal-of-yog-one-day-before-of-international-yog-day/ )

दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः।

तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात्।।

(मनुस्मृति १.७१-७२)

अर्थात् जिस प्रकार लोहार की धौंकनी से तेजी से जलती हुई आग में सोना आदि धातुओं के मल जल जाते हैं, उसी प्रकार प्राणों के नियन्त्रण से सभी इन्द्रियों के दोष, मल, और अशुद्धियाँ जल जाती हैं। योग साहित्य और एलोपैथिक डाक्टर भी प्राणायाम की रोगनिवारक शक्ति को स्वीकार करते हैं। अस्थमा के रोगियों के एक समूह पर प्राणायाम के प्रभाव का अध्ययन किया गया। प्राणायाम के पहले उनके कुछ रक्त तथा श्वास संबंधी परीक्षण किए गए और प्राणायाम के कोर्स की अवधि के बाद पुनः रक्त और श्वास के वही परीक्षण  दोबारा किये गये। साधकों के परीक्षणों में सकारात्मक परिवर्तन मिले। साधकों का हीमोग्लोबिन, रेड ब्लड सेल्स तथा लिंफोसाइट काउंट्स बढ़े हुए मिले जबकि व्हाइट ब्लड सेल्स, पॉलीमर्स,  इस्नोफिल्स और मोनोसाइट्स कम हो गए। यह रक्त के बदलाव अस्थमा की तीव्रता कम होने के सूचक हैं। सबसे महत्वपूर्ण और आश्चर्यजनक उपलब्धि तो यह रही कि उपचार की अवधि में रोगियों को अस्थमा का दौरा ही नहीं पड़ा। उनके फेफड़ों की शक्ति बढ़ गई जिससे वे अधिक वायु को श्वास के द्वारा शरीर में खींच सके और अधिक समय तक उस वायु को भीतर रोकने में समर्थ भी हुए। इससे उनका श्वास का एंप्लीट्यूड और होल्डिंग टाइम बढ़ गया। यह सभी परीक्षण डॉ के. एन. उडुप ने किए और प्राणायाम के लाभों को स्वीकार किया {“Stress and it’s management by yoga”, Dr. K. N. Udupa, Delhi, 1985 and K.N.Udupa, R.H. Singh, R.M. Settiwar, and M.B.Singh. “Physiological and biochemical changes, following the practice of some yogic and non-yogic exercises,” Journal of Research in Indian medicine, 10(2)}। प्राणायाम की इस रोग निवारक शक्ति  का संकेत हमें ऋग्वेद के दशम मंडल के १३७ वें सूक्त के प्रथम और द्वितीय मंत्र में मिलते हैं, जहां प्राण को विश्वभेषज और बल दायक बताते हुए शरीर के रोगों और मलों को दूर करने वाला कहा है।

प्राण साधना कैसे करें

प्राणायाम के अनेक प्रकार हैं और अनेक विधियों से किया जाता है। रोगी की शारीरिक शक्ति और रोग की अवस्था को देख कर उसके अनुसार ही प्राणायाम का चुनाव करना चाहिए। किसी अनुभवी, स्वयं साधना करने वाले, कुशल और सज्जन स्वभाव वाले योग शिक्षक की देखरेख में उचित प्राणायाम का ज्ञान प्राप्त कर अभ्यास करना चाहिए जो पालन करने योग्य नियम भी बताएगा और सावधानियों की शिक्षा भी देगा। कुछ प्राणायाम विशेष रोगों में ही लाभकारी होते हैं जैसे शीतली और सीत्कारी प्राणायाम, जो उच्च रक्तचाप,  एसिडिटी तथा गर्मी से उत्पन्न रोगों में लाभदायक होता है परंतु निम्न रक्तचाप तथा कफ के रोगियों के लिए यह प्राणायाम हानिकारक है। इसी प्रकार श्वास को भीतर रोककर कुम्भक सहित किए जाने वाले प्राणायाम हृदय और स्ट्रोक के रोगियों के लिए हानिकारक होते हैं। सामान्य रूप से स्वस्थ व्यक्ति को नाड़ी शोधन/ अनुलोम विलोम प्राणायाम करना स्वास्थ्यवर्धक और अनुकूल रहता है। श्वास को भीतर रोके बिना बाईं नासिका से श्वास लेकर दाहिनी नासिका से निकालना और फिर दाहिनी नासिका से लेकर बाईं नासिका से निकालना नाड़ी शोधन प्राणायाम है। इसका कारण है कि बाईं नासिका में चंद्र स्वर चलता है जो ठंडा होता है और यही जीवनदायक है। दाहिनी नासिका से निकलने वाली वायु गर्म होती है, क्योंकि यह शरीर के सभी दोषों को लेकर बाहर निकलती है। अतः शरीर में पहले स्वास्थ्यवर्धक प्राणवायु को  श्वास से भीतर खींचना चाहिए और दाहिनी नासिका से सभी मलों को बाहर फेंकना चाहिए। श्वास लेते समय यही विचार करना चाहिए कि  प्रकृति से शक्तिदायक वायु के साथ मेरे शरीर में शक्ति प्रवेश कर रही है। बाहर श्वास फेंकते हुए यह विचार करें की मेरे शरीर के सभी रोगों के कीटाणु और शरीर के सभी मल श्वास के साथ बाहर निकल रहे हैं। इस प्रकार प्राणायाम द्वारा सकरात्मक विचारधारा से शरीर के साथ-साथ मानसिक बल में भी वृद्धि होती है।

प्राणायाम का मूल तत्व है गहरा श्वास लेना, इतना गहरा की नाभि तक हिलने लगे। इससे श्वास से भीतर ली गई वायु की गुदा स्थित अपान वायु से टक्कर होती है। तब अपान वायु प्राण को नीचे अपनी ओर खींचती है, और प्राणवायु अपान वायु को ऊपर अपनी ओर खींचती है। प्राण अपान का यह घर्षण से नाभि स्थित जठराग्नि तेज होती है और रोगों के कारणभूत कफ, वात, और पित्त के कुपित अंश को जला कर शरीर को रोग मुक्त कर देती है।

प्राणायाम के नियम

प्राणायाम के लिए कुछ पालनीय नियम हैं , जिनका पालन करने से प्राणायाम का पूर्ण लाभ मिलता है।

1. प्राणायाम के ३ घंटे पहले कुछ ना खाया हो और पानी आधा घंटा पहले पी सकते हैं।

2. प्राणायाम के पश्चात् स्नान लगभग १ घंटे के बाद करें। पानी आधे घंटे बाद पी सकते हैं परंतु भोजन एक से डेढ़ घंटे के बाद ही करें।

3. प्राणायाम का साधक उचित समय पर सोए और उचित समय पर जागे। वह स्वास्थ्यवर्धक और सीमित मात्रा में ऋतु अनुकूल भोजन करें। तभी प्राणायाम का पूरा लाभ मिलता है।

प्राणसाधना के लाभ

प्राणायाम से अद्भुत लाभ होते हैं- मन की एकाग्रता बढ़ती है (जिससे व्यक्ति की कार्यक्षमता बहुत बढ़ जाती है, एकाग्र मन से किया हुआ कार्य भी श्रेष्ठ गुणवत्ता वाला होता है),  मन का तनाव भी बहुत कम हो जाता है (परिणाम स्वरूप तनाव से उत्पन्न होने वाले मनोदैहिक रोगों में बहुत लाभ होता है), मन में शान्ति रहती है, काम, क्रोध, ईर्ष्या आदि के नकारात्मक भाव धीरे धीरे कम होते जाते हैं (काम, क्रोध, लोभ आदि ही अनेक सामाजिक, आर्थिक, यौन अपराधों के मूल कारण होते हैं), भावनाएँ शुद्ध होती हैं जिससे व्यक्ति समाज में शान्ति और व्यवस्था बनाए रखने में सार्थक भूमिका निभाता है। प्राणायाम से इन लौकिक लाभों के अतिरिक्त आध्यात्मिक दृष्टि से भी  बहुत लाभ होता है। शरीर की अशुद्धियां नष्ट हो जाने पर प्रकाश स्वरूप आत्मा के ऊपर से अज्ञान अंधकार का आवरण हट जाता है। तब साधक को आत्मसाक्षात्कार होता है। यह आध्यात्मिक लाभ मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य माना गया है।

ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्।

 (पतंजलि योगसूत्र २.५२)

यदि इस जीवन में आत्म स्वरूप को पहचान लिया तो बहुत उत्तम है, जीवन सफल है, और यदि न जान पाए तो बहुत बड़ी हानि है क्योंकि मानव जीवन का यही प्रथम लक्ष्य है कि वह आत्म-दर्शन का प्रयास करता रहे।

इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः।

(केनोपनिषद् २.५)

अयन्तु परमो धर्मः यद्योगेनात्मदर्शनम्।

(याज्ञवल्क्य स्मृति ८)

आशा है कि इस योग दिवस योग के इन सार्वभौमिक सकारात्मक परिणामों को स्वीकार करते हुए तथा प्रेरित होकर प्रबुद्ध जिज्ञासु प्राणायाम साधना में रुचि लेंगे।

डा. राजकुमारी त्रिखा, पूर्व अध्यापिका, संस्कृत, मैत्रेयी कालेज, दिल्ली विश्वविद्यालय

DemoNOcracy is Here – Readers offer ways out

The article “Democracy turns into DemoNOcracy!!” authored by Prof. Bal Ram Singh published on 22nd May, 2019. The title itself of the article said a lot about Prof. Singh’s view. According to Singh the purpose of the piece was not exactly to provide road map and solutions, rather raise the consciousness of intellectuals towards the problem. Therefore, VedicWAVES blog sought response from the readers of the blog.

(Source of Image: https://mastergolflivestream.com/image/democracy-clipart-government-bill/459473.html#gal_post_480_democracy-clipart-government-bill-7.jpg )

Readers were requested to consider the following questions: 

1. Whether readers are agree with the observation. 

2. What maybe the reason? 

3. What can be done from Vedic view?

Below are the short responses received –

Prof. Girish Nath Jha, Dean, School of Sanskrit and Indic Studies, Jawaharlal Nehru University, Delhi

Agree with your observation. In fact, just yesterday I was wondering [if] someone [had] compiled all the invectives used in this election. It would be a good linguistics resource for research.

The reason why politicians are using these into quickly to hone their message in a very short time. The audience would perhaps remember these more than plain talk.

The Vedic way of sound democratic ways is not possible today. The closest that we can go would be to promote leadership with Tyāga and general wellbeing of others as the guiding principles.

Dr. Pandita Indrani Rampersad, Trinidad and Tobago

I agree for a code of ethics for politicians on the campaign trail. Leaders should show restraint in speech and conduct. I found nothing wrong with the ‘termite’ metaphor because of what a termite does – it works silently from within and before you know it, your entire house falls down like a pack of cards. It is an appropriate metaphor for campaign rhetoric.

Political speech is not in the realm of religious or academic discourse. There is the element of ‘warring opponents’ – nothing wrong with that. However, while being feisty, the campaign rhetoric should aim not to injure and hurt the personhood of the ‘other’ – stick to the issues not personalities. The subtle, artistic, bringing down of your opponent with words is to be enjoyed as the art of debating. It should not descend into ridicule and slander.

Sumit Ganguly’s analysis is from a leftist perspective and nationalism for these folks is not a welcome concept. I disagree with their consistent recourse to demonization of minorities. It’s simply not true. Minorities in India have greater privileges and protections than many other parts of the world and are used by leftist activists seeking favours in foreign countries. Uplift of the economically disadvantaged is more pressing than identity politics in India. Chandra Bhan Prasad’s comment is puerile.

Criminalization in Indian politics is a real issue. Remove goondas and corruption.

India needs a vision to manage its great diversity and the socio-economic and spiritual development of its citizens. India is the spiritual capital of the world. A return to the principles of Rām Rājya is mandatory. Let the state provide the social and economic conditions for development so that people may actualize their highest goals of spirituality. 

India has to be constantly vigilant about external cultural, economic and political forces that see it citizens as ideal consumers. India has to be constantly vigilant about the constant threat to its sovereignty, for near and far, especially its neighbours.

Dr. Raju Chidambaram, USA

Democracy is a basically good concept, perhaps the second best one can have other than a Rāmraj led by a dhārmic monarch.

The problem is the Party system that plagues all democracies. Cooperation (the Yajña spirit of Gīta) needed for progress is not possible in a party-based democracy.

How do we enforce parties to cooperate? Every two years in the US the election should be about the entire House of Representatives. Instead of choosing individuals, the people should decide “Has the House worked for the people in the last 2 years? If so, all of them return for the next 2 years. If not none of them will be allowed to run for re-election and every seat filled with a new comer”. Drastic idea, maybe, but it might force all representatives to cooperate for the good of the country in order to stay elected.

Sh. Rishi Pal Chauhan, Jiva Institute, Faridabad.

I agree with your observations. Earlier social workers used to join politics. They not only used to understand the culture of the nation but lived that in their day to day life. Their life was for nation.

In seventies people started keeping muscle man. In eighties muscle man started join politics. Now people with money power and criminal record join politics.

There should be basic qualification for a politician. He should submit his achievement about the knowledge of the culture of India and the record of social work practically achieved in his constituency He should submit his individual plan for five years. There should be review of his work after every year. He or she did not achieve as per the satisfaction of people he should get grading. There should be basic qualification of voter also.

Sh. Lallan Prasad Pandey, Former Income Tax Officer, Sultanpur, Uttar Pradesh

Yes I agree with the observations made in the write up, given above. 

I think that people see the power politics an opportunity to make money and enjoy power as this was previous trend.

Democratic system of India has provisions and institutions for check and balance. But now a days there needs to come forward the learned and right thinking people to observe the conduct of Parliamentarians and issue public warnings of their observations. Some proper learning courses may be conducted for new members.

डा राजकुमारी त्रिखा, पूर्व अध्यापिका, संस्कृत, मैत्रेयी महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

डॉक्टर बलराम सिंह ने बहुत सुंदर विश्लेषण करके भारतीय राजनीति की तस्वीर प्रस्तुत की है। यह सच है कि हमारे राजनेताओं ने इलेक्शन के दौरान अनेक प्रकार के आरोप-प्रत्यारोप एक दूसरे पर लगाए, जो कि हमारी संस्कृति और नैतिकता के विरुद्ध है ।

जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रश्न है , कुछ बोलने से पहले यह सोचना जरूरी है कि हमारी बातें नैतिकता के विरूद्ध न हों। हमें अपनी डेमोक्रेसी को डेमोनोक्रेसी बनने से रोकना होगा, जो कि गिरते हुए नैतिक स्तर के कारण लगभग असंभव सा लगता है। भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी अधिकांश जनता और भ्रष्ट विरोधी पार्टियों से भरे हुए देश में डेमोक्रेसी फेल है। यहां तो समुचित और त्वरित दंड व्यवस्था, और सीमित राजतंत्र वाली ऐसी शासन पद्धति होनी चाहिये जैसी महाभारत में बताई गई है। वहां मंत्रिमंडल का कार्य था राज्य के हित को देखते हुए कानून, नियम बनाना और राजा का कार्य था उन कानूनों और नियमों को जनता में सख्ती से लागू करना। कानून के विरुद्ध आचरण करनेवाले को अपराधानुकूल निष्पक्ष दण्ड देना। यदि राजा अपने इस कार्य में असफल होता था, तो उसे गति सिंहासन से उतारा भी जा सकता था। यही उचित राजधर्म है।  महाभारत में इसी व्यवस्था को आदर्श शासन पद्धति कहा गया है। परंतु दुख की बात है कि भ्रष्टाचारी जनता और विरोधी पार्टियों के रहते हुए इस तरह का परिवर्तन संभव प्रतीत नहीं होता। फिर भी ईश्वर से प्रार्थना है कि वह हमारे नेताओं को सद्बुद्धि दे और भारत को नैतिक दृष्टि से भी समृद्ध राष्ट्र बनायें।

Prof. R.P. Singh, Professor, Philosophy, Jawaharlal Nehru University, Delhi

In Vedas, Asuras were not demonized. Demonization started in the Purānas and Epics. Since then it has been happening in one way or another. Britishers were called as mylekshas (म्लेच्छ). There is a lack public morality and predominance of civil society over the State. It will give rise to the State to become authoritative. I appreciate the paper through and through nostalgic.

Mrs. Shagufa Afzal, Principal, Kuruom Vidyalaya, Kuruown, Uttar Pradesh

First of all Sir, the content is mind blowing and is the true scene of our prevailing so called democracy. I truly agree with it. There’s no more the taste of democracy, instead every leader now just puts each other’s name down which really gives a bad impression to everyone.

According to me the reason is selfishness of political leaders. Now what has become the point that everyone somehow or the other just wants the rule …politicians instead of serving nation, they have developed the mentality of serving their pockets. Development has become a faraway point. They just put each other’s name down to move ahead.

Lastly, according to me as in each n every competition certain education is necessary, likewise it should be made mandatory for politicians as well to be qualified because its education which can mentality and bring in good leaders to the show!!

Sh.Yogendra Bhardwaj, Research Scholar, Sanskrit, Jawaharlal Nehru University, Delhi

Nice thought by you (Prof.Singh)

राजनीति में मतभेद होना संभव है, किन्तु मतभेद नहीं होना चाहिए। भारतीय संस्कृति में राजनीति के अंतर्गत ऐसी नीतियों के निर्धारण का मार्ग प्रशस्त होता है, जिसका अंतिम लक्ष्य “लोककल्याण” होता है।

Ms.Ami Shah, Corporate Legal Expert, Mumbai

Yes totally agree with the observation… The demon of politics is clearly visible now… The status has gone down significantly.

Today the scenario is such that they want to win at any cost. Losing is not am option as their fake reputation is at stake and for that they can go to any extent even if they gave to lose your moral values. They attack at personal levels… They attack your family and your morals. They attack at your weakest links. It has become a battle with no rules, just win at any cost.

In my opinion the best way to improve the practice of democracy is to conduct elections every five year plus conducting voting out every year… This will be an added responsibility and fear of getting removed in the minds of those who are elected. They won’t take their positions for granted. Introducing e-voting system to implement this. Apart from this education is a must to improve the practice of democracy.

Our View

The responders are unanimous in holding politicians responsible for the deterioration of the discourse of democracy to demonocracy. The reasons range from selfishness, no rules of engagements, criminalization of the politics, lack of public morality, power politics and money, party-based democracy, and expedient short term political gains

It is interesting that most of the readers feel that there should be some level of accountability and a provision to recall and/or the elected representatives for lack of progress on promises made. Education and training of politicians are needed, and perhaps principles of sacrifice for public good, following dhārmic principles need to be introduced and  encouraged. The concept of Rāmrajya needs to be invoked.

We feel intellectuals and policy makers need to look at the history of governance in India for inspiration of a system that can serve India’s diverse population without creating acrimony and divisiveness currently being practiced. It is important to be willing to storm out of a system that is becoming detrimental to the nation.

Editorial Team, Vedic WAVES

Democracy turns into DemoNOcracy!!

Prof.Bal Ram Singh

There have much talk about the demonization of republicans and democrats in the United States especially since Donald Trump became candidate for the position of President. He called his opponent as crooked Hillary, and Hillary Clinton called Trump supporters as basket of deplorables.

But Indian leaders, perhaps taking some cue from the politicians of the oldest democracy, yet certainly adding their own ugly flavors to it.

“There are remarkable parallels in terms of this kind of highly prejudicial and extremely parochial nationalism that both Modi and Trump have promoted and have sought to demonize minorities.”, said Sumit Ganguly, a leftist and Tagore Chair Distinguished Professor of Political Science, Indiana University at Bloomington in an interview on April 9, 2019 with Council of Foreign Relations).

Some examples of low level stench are given below:

Modi while campaigning in Himachal Pradesh for Assembly Election, branded the main opposition party Congress as termites and called the electorates to wipe them out: “There should not be one polling booth where this termite called Congress be allowed to thrive.”

Delhi Chief Minister and AAP leader Kejriwal had recently called Modi “a Coward and a psychopath” (Outlook India, 06 November 2017)

In 2007 campaign for the Gujarat assembly election, Congress President Sonia Gandhi had indirectly accused Modi and his government as “merchants of death” (Oulook India, 06 NOVEMBER 2017)

In an article on May 20, 2019 The New York Times wrote several disturbing statements on democracy in view of the Indian elections.

“In Hungary, Viktor Orban demonized immigrants and secured an expansion of his power. In Turkey, Recep Tayyip Erdogan purged his enemies and won a new term. In Australia, Scott Morrison shrugged off calls for tougher carbon-emissions rules and was unexpectedly kept on as leader.

And in India, where the world’s biggest parliamentary election appears to be boiling down to a binary choice — Yes or No on Prime Minister Narendra Modi. “

“Trump and Modi are twins separated by continents,” said Chandra Bhan Prasad, a well-known political commentator, and dalit activist. “Both are against knowledge, they consider the past as the golden period, they consider themselves the center of gravity.”

Prime Minister Narendra Modi of India during a roadshow in Varanasi, India, April, 2019 – credit Adnan Abidi/Reuters

Observers are looking at this people polarizing trend with disdain. 

“…the social media cells of the BJP and the INC seem to be projecting their star campaigners as populist leaders, demonising each other’s parties and supporters, and polarising the voters along religious lines.”, wrote Dr. Sangeeta Mahapatra, LSE Blog, January 11, 2019

“He can’t take care of his wife, he will take care of Indians?,” Mamata Banerjee said during a rally in Bishnupur. (India Today, New Delhi, May 6, 2019). She refused to even take a call from the Prime Minister to discuss the relief work on the cyclone, saying she did not recognize him as the Prime Minister of India!

“Who knew you (Modi) before you became the Prime Minister? Even now, nobody knows the name of your father. (Former Union minister Vilasrao Muttemwar, November 25, 2018).

At one time a BJP MLA, Heeralal Regar, declared his intention to “strip” Sonia and Rahul and transport them to Italy

BJP minister “Sadhvi” Niranjan Jyoti asked a gathering to choose between “Ramzaadon (followers of Lord Ram)” and “haramzaadon (illegitimately born)”

Mani Shankar Aiyar discovered Modi to be a “neech kism ka aadmi (a lowly person)”.

In 2014, a video of Trinamool Congress MP Tapas Pal went viral, where he could be seen openly threatening to rape women members of the opposition (India Today, July 20, 2016).

“I am from Chandannagar. Leaders are created by workers. I am also a goonda. I will shoot you guys if a Trinamool Congress worker is ever attacked. If you have the guts, then stop me… If you insult the mothers and daughters of Trinamool workers, I won’t spare you. I will let loose my boys in your homes and they will commit rape,” Pal said.

SP leader Mualayam Singh Yadav had shocked the nation’s conscience when he wondered aloud (about BSP leader Mayawati): “Is she so beautiful that anyone should want to rape her?

“Smriti Irani sits beside leaders like Nitin Gadkari and talks about changing the Constitution. Let me tell you a thing about Smriti Irani. She wears a big ‘bindi’ on her forehead and someone told me that when a woman changes her husbands frequently, the size of her ‘bindi’ keeps growing,” (Jaydeep Kawade, a leader from Maharashtra-based People’s Republican Party).

Insey bada kayar, insey kamjor Pradhan Mantri main jeevan me nahi dekha, (I haven’t seen a more coward and weaker PM than him in my life).” (Priyanka Gandhi Vadra, May 9, 2019)

Chowkidar (Modi) chor hai”  a phrase invented by Rahul Gandhi for 2019 elections, with nearly no truth in it as asserted by the Supreme Court of India when it made Rahul Gandhi apologize for justifying the phrase by attributing it to the honorable court.

While these utterances may have been said in the heat of political campaigns, the fact that one has to come down to this level reveals the true nature of democracy which can in fact be very dangerous in places like India with unparallel history, philosophy, continuing culture, diversity of nature, humans, languages, and freedom of thoughts.

On the other hand, when Sadhvi Pragya Singh said that she had cursed Hemant Karkare, the police officer who had supervised her torture in jail, she was banned from campaigning for three days by India’s Election Commission. This is the situation in so called free India where a person is not allowed to even moan for the extreme torture meted out to her physically and mentally!

Such a deterioration in discourses can (and perhaps meant to) be divisive and destructive to a society. In other words, democracy has become demonocracy!!

As a silver lining, it may in fact provide a pause to think of an alternative system of governance, at least for India, if not the entire world.  

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA & Board Member, WAVES-International

वैशाखी पर्व पर जलियाँवाला बाग की नृशंसता की शताब्दी (एक पुस्तकीय पुनर्वाचन)

Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal and Dr. Rishiraj Pathak

उत्सव-प्रधान भारत देश में अन्य पर्वों के समान वैशाखी पर्व का भी विशेष महत्त्व है| जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है कि यह पर्व वैशाख मास से सम्बद्ध है| ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस मास की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र पड़े, वह मास वैशाख मास कहलाता है| निम्नलिखित वचन इसके प्रमाण हैं –

’कार्त्तिक्यादिषु संयोगे कृत्तिकापि द्वयं द्वयम्| अन्त्योपान्त्यौ पञ्चमश्च त्रिधा मासत्रयं स्मृतम’||

                                                                                  (सूर्यसिद्धान्त, मानाध्याय, १४. १६)

’यस्मिन्मासे पौर्णमासी…तन्नक्षत्राह्वयो मास: पौर्णमासी तथाह्वया’।

(नारद-संहिता ३.८४)

ध्यान देने योग्य है कि मासों के नाम नक्षत्र तथा चन्द्रमा की युति के आधार पर रखे गये हैं और सूर्य के संक्रमण से मास का काल निर्धारित किया जाता है।

सूर्यस्य राशिगतिर्यत्र परिमीयते स सौर:।

सूर्य जितने समय तक एक राशि में रहता है, उसे सौर मास कहते हैं।

                                                        (कालमाधव, द्वितीय प्रकरण, पृ. ४५)

वर्त्तमान प्रचलन में वैशाखी पर्व १३ अथवा १४ अप्रैल को मनाया जाता है| इसका कारण है कि वैशाखी पर्व सौर मान पर आधारित है| जब भगवान् सूर्य मेष राशि में संक्रमण करते हैं तब मेषसंक्रान्ति होती है| सौर मान के अनुसार तभी नव वर्ष होता है| सौर मान सूर्य के अनुसार निर्धारित होता है| प्रति अंग्रेजी मास की १४ तारीख को सूर्य नयी राशि में प्रवेश करते हैं| इस प्रकार १३ अथवा १४ अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं|

उल्लेखनीय है कि वैशाख मास को ’माधव’ नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रमाण स्वयं यजुर्वेदीय संहिता ग्रन्थ हैं|

’…मधवे त्वा। उपयामगृहीतोSसि। माधवाय उपयामगृहीतोSसि। तपसे त्वा….’।

(कपिष्ठल-कठ-संहिता ३.५, काठक-संहिता ४.७.२९)

’मधुश्च  माधवश्च वासन्तिकावृतू’।

(कपिष्ठल-कठ-संहिता २६.९, काठक-संहिता १७.१०.२५-२८, मैत्रायणी-संहिता २.८.१२, तैत्तिरीय-संहिता ४.४.११, )

’मधवे स्वाहा माधवाय स्वाहा….’।

(वाजसनेयि-संहिता २२.३१, मैत्रायणी-संहिता ३.१२.१३ )

स्कन्दपुराण में ’माधव मास’ को सर्वोत्कृष्ट मास के रूप में वर्णित करते हुए उसका महत्त्व बताया गया है –

“न माधवसमो मासो….”

(स्कन्दपुराण वै. वै. मा. २.१)

माधव मास जैसा कोई अन्य मास नहीं है।

पुराणों में आए सूतजी और नारदजी के संवाद से वैशाख मास के महात्म्य को ज्ञात किया जा सकता है-  विद्या में वेद विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, गायों में कामधेनु, नागों में शेष, पक्षियों में गरुड़, देवों में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, मित्रों में भार्या, नदियों में गंगा, तेजस्वियों में सूर्य, शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णव में शिव, रत्नों में कौस्तुभमणि के समान है। भगवान् की भक्ति के लिए यह सबसे उत्तम मास है। इसमें आक, पीपल और वट वृक्षों की पूजा करते हैं। अन्न और जल के दान का विशेष महत्त्व है, प्याऊ आदि लगवाने से व्यक्ति अपने कुल का उद्धार करता है। इस मास में खड़ाऊँ, पंखा, छतरी आदि का दान दिया जाता है। वैशाख मास में केवल स्नान मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर बैकुंठ को जाता है।

पंजाब में वैशाखी पर्व की विशेष महत्ता है| इस दिन १६९९ ई. में सिक्खों के दसवें गुरु श्रीगुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पन्थ की स्थापना की थी| इस दिन पंजाब में तरन-तारन सरोवर में स्नान का विशेष महत्त्व है| ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से कुष्ठ जैसे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं|

वैशाखी पर्व के इस पुण्यवर्धक अवसर पर अतीत की कुछ दुर्दान्त नृशंस घटनाओं का स्मरण हो जाना भी स्वाभाविक है| परतन्त्र भारत में १९१९ ई. की वैशाखी भारतीय इतिहास में अति अमानवीय घटना के रूप में प्रसिद्ध है| उल्लेखनीय है कि १३ अप्रैल १९१९ ई. को अमृतसर स्थित जलियाँवाला बाग में वैशाखी पर्व के अवसर पर भारतीय जन समूह अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित रोलेट एक्ट के विरोध प्रदर्शन में एकत्रित हो गया| जब यह बात जनरल डायर को ज्ञात हुई तो उसने अचानक वहाँ आकर अपने सैनिकों के साथ मिलकर निरपराध और निःशस्त्र भारतीयों पर गोलियां चलाईं| वहाँ १५ मिनट में १६५० गोलियाँ चलीं| जलियाँवाला बाग में आने और जाने का एक ही दरवाजा था, वहाँ डायर ने तोपें लगवा दीं और हमारे निःशस्त्र भारतीय मृत्यु यज्ञ की आहुति बनते रहे| अनेक लोग अपनी प्राणरक्षा के लिए कुँए में कूद गए| आज इस कुँए को शहीदी कुँए के नाम से जाना जाता है| मृत्यु के इस क्रूर नृत्य के साक्षी श्री ऊधमसिंह जी भगवान् की कृपा से सुरक्षित बच गए| श्री ऊधमसिंह जी ने प्रतिज्ञा की कि मैं निरपराध भारतीयों की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए डायर का वध करूंगा| श्री ऊधमसिंह जी ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए बहुत संघर्ष किया| उन्होंने धन प्राप्ति के लिए बढ़ई बनकर लकड़ी का काम किया और भगत सिंह जी से प्रेरित होकर बंदूक खरीदने के लिए विदेश चले गए, किन्तु लाइसेंस न होने के कारण उन्हें पाँच वर्ष की जेल हो गयी| जेल से बाहर आकर उन्होंने पुनः तैयारी की और लन्दन चले गए| वहाँ जाकर उन्होंने एक होटल में काम किया और बंदूक खरीदने के लिए धन जुटाकर बंदूक खरीद ली| श्री ऊधमसिंह जी अपनी वीरता और चतुरता का परिचय देते हुए बन्दूक को एक पुस्तक में गोपनीय ढंग से रखकर किंग्स्टन गए| किंग्स्टन में डायर का सम्मान समारोह चल रहा था, जहाँ श्री ऊधमसिंह जी ने उसके सम्मान समारोह के उपरांत सबके सामने गोलियाँ चलाकर डायर का वध कर दिया और जलियाँवाला बाग हत्याकांड का उल्लेख करते हुए अपनी प्रतिज्ञा की सार्थकता सिद्ध की| बाद में श्री ऊधमसिंह जी को फांसी की सजा हुई और वे सदा के लिए अमर हो गए|

आधुनिक संस्कृत काव्य परम्परा में इसी घटना को आधार बनाकर डा. ऋषिराज पाठक ने श्रीमदूधमसिंहचरितम् नामक ऐतिहासिक खण्डकाव्य की रचना की है, जिसे हिन्दी, अंग्रेजी, और पंजाबी भाषाओं में अनुवाद के साथ जलियाँवाला बाग घटना के शताब्दी वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित किया जा रहा है| प्रसादगुणोपेत यह काव्य सरल तथा प्रवाहमयी भाषा में लिखा गया है| इस काव्य में जलियाँवाला बाग की वैशाखी की घटना का जीवन्त वर्णन है| अंग्रेजों के रोलेट एक्ट के विरोध में भारतीयों द्वारा विरोधप्रदर्शन, डायर द्वारा नृशंस हत्याएँ, श्रीऊधमसिंह जी की प्रतिज्ञा, उनका संघर्ष और डायर का वध, काव्य में इन सभी घटनाओं का सजीव वर्णन है| इस काव्य की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

डायर द्वारा नृशंस हत्याएँ –

यदाङ्ग्लो डायरो दुष्टो विद्रोहं ज्ञातवानिमम्|

तदादिशद् विघाताय निःशस्त्राणां सभामहे||

डायरादेशतस्तत्र सेनया प्रहृतं ततः|

चक्ररूपभुशुण्डीभिरग्निगोलकवृष्टिभिः||

(श्रीमदूधमसिंहचरितम् २०-२१)

And when General Dyer came to know about the protest,

The sadist foreigner ordered for the massacre of the unarmed people.

On Dyer’s order, the army rained ammunition from the machine guns,

On the crowd, hapless and feeble. (20-21)

जब दुष्ट डायर को इस विद्रोह के विषय में ज्ञात हुआ तो उसने सभा उत्सव में निःशस्त्र भारतीयों के विनाश के लिए आदेश दे दिया| तदनन्तर वहाँ डायर के आदेश से चक्र के समान (घूमती हुई) आग की गोलियों की वृष्टि करने वाली बन्दूकों द्वारा सेना ने निरपराध भारतीयों पर प्रहार किया| (२०-२१)

ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਅੰਗ੍ਰੇਜ਼ ਡਾਇਰ ਨੂੰ ਇਸ ਵਿਦ੍ਰੋਹ ਦਾ

ਦਿੱਤਾ ਹੁਕਮ ਨਿਹੱਥਿਆਂ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਦਾ

ਉਦੋਂ ਚਲਾਈਆਂ ਗੋਲੀਆਂ

ਡਾਇਰ ਦੀ ਸਰਕਾਰ

ਮਾਰਿਆ ਨਿਹੱਥਿਆਂ ਭਾਰਤੀਆਂ

ਨੂੰ ਸੰਗੀਨਾ ਨਾਲ

ਡਾਢੇ ਕਹਿਰਾਂ ਨਾਲ॥20-21॥

(Punjabi Translation by – Dr. Gurdeep Kaur)

श्रीऊधम सिंह जी की प्रतिज्ञा –

नरसंहारसम्भारं दृष्ट्वा भीष्मप्रतिज्ञया|

ऊधमसिंहवीरोऽसौ संकल्पं कृतवान् दृढम्||

डायरं मारयिष्यामि नूनमेष दृढव्रतः|

एतदेवास्ति लक्ष्यं मे चिन्तयामास तद्गतः||

(श्रीमदूधमसिंहचरितम् २८-२९)

After seeing the massacre,

Udham Singh took a brilliant and firm vow,

“I will kill Dyer“, he swore,

And started contemplating about how to achieve it. (28-29)

उन वीर ऊधमसिंह ने नरसंहार के समूह को देखकर भीष्मप्रतिज्ञा पूर्वक ”मैं डायर का वध करूँगा”, यह मेरा दृढ़ व्रत है और यही मेरा लक्ष्य है, यह दृढ़ संकल्प किया और उसी प्रतिज्ञा के विषय में चिन्तन करना प्रारम्भ कर दिया| (२८-२९)

ਦੇਖ ਇਹ ਨਰਸਿੰਘਾਰ

ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਆਇਆ ਰੌਹ

“ਮੈਂ ਡਾਇਰ ਨੂੰ ਮਾਰਨਾ,

ਇਹ ਮੇਰਾ ਲਕਸ਼ ਇਹੀ ਮੇਰੀ ਸੌਂਹ”॥

ਰੁੱਝਿਆ ਫਿਰ ਉਹ ਸੋਚਾਂ ਦੇ

ਕਿਵੇਂ ਵਿਉਂਤਣੀ ਹੈ ਸੌਂਹ॥28-29॥

आज हम भारत की गौरव पूर्ण परम्परा में वैशाखी पर्व के उल्लास का विस्तार करते हुए तथा अपने निरपराध भारतीय पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वीर श्री ऊधमसिंह जी को सादर स्मरण करते हैं| साथ ही हमारा मानना है कि किसी प्रकार के संबंध बनाने के लिए अथवा लोकप्रियता के लिए आज जिस प्रकार सोशल मीडिया का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार हो सकता है उस दिन वैशाखी पर्व पर एकत्रित हुए लोगो की सामाजिक सभा का राजनीतिकरण करने के लिए इस्तेमाल किया गया हो। अतः सामाजिक और धार्मिक समारोह का इस्तेमाल राजनीति के लिए करना अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो सकता है और कलह का कारण बन सकता है।

[Author’s clarification – The person who opened fire in Jallianwala Bagh was Colonel Reginald Edward Harry Dyer who died in 1927 due to cerebral haemorrhage and arteriosclerosis. It was Sir Michael Francis O’ Dyer who was assassinated by Udham Singh in 1940 in London. O’ Dyer happened to be the Lieutenant Governor of Punjab at the time of the Jallianwala Bagh massacre and a supporter of the heinous crime. This tiny nugget of information has been excluded from the poem in order to maintain the tempo and brevity of it. However, it has been mentioned here because it is an important fact of modern day History.]

Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal, Assistant Professor, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth &

Dr. Rishiraj Pathak, Assistant Professor, Sanskrit, Shyama Prasad Mukherjee College, University of Delhi, Delhi

Why Women are still considered Second Class Citizen in Indian Society?

*[‘International Women’s Day’ – celebrating Womanhood that comprises of all the attributes that are natural to Women i.e., patient, affectionate, caring, emotional, generous, devoted, elegant, calm, sensitive, strong, courageous amongst the top ones.

In this era of male dominance our society is constantly dealing with conflicting issues such as gender equality & women empowerment. Recent movies for instance, Padmaavat and Manikarnika made a huge impact on mindset of people as the portrayal of Women therein, represents & redefine the multitude characteristics of a woman. How significant is to hold on to one’s individuality, is to be learnt from such powerful characters of Indian society. In this small initiative at Vedic WAVES Blog, an effort has been made through a survey to gather an opinion over the current status as enjoyed by women in present day society, in India.]  

*Editorial note by Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal, Assistant Professor, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth, USA

Women are not just considered but are also treated as 2nd to men in current society. Ancient social engineering made women equal half. First time a woman was considered an object … Bharata rose in arms to protect Dharma of equality and respect.

Ms. Neera Mishra, Chairperson, Draupadi Dream Trust

I consider the very question based on ignorance. Granted gender discrimination occurs around the world (in case of both sexes) and India would have it’s own share of problems. I grew up in villages and also spent time in cities of India. I also lived in multiple countries. Based on my limited experience I have not seen imbalanced discrimination against women.

That remains my experience.  If at all, I have noticed discriminatory laws against men, especially in family law courts around the world.

Mr. Nilesh Oak, Adjunct Faculty, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth, USA

Theoretically, women are on a par with men but in actual practice they are considered second class citizens who suffer discrimination in almost all walks of life. This kind of mindset is starkly evident not only in the family for the upbringing of female child in comparison to the male ones but also in education, jobs, career opportunities, promotions and future expectations. The society must eradicate this obvious injustice and menace perpetrated by people in general and institutional biases in particular.

Dr. Dayanand Parashar, Former Associate Professor, Physics, ARSD College, University of Delhi, Delhi

प्राचीन भारत में महिलाओं को देवी के तुल्य सम्मान था। मनु के द्वारा भी इसकी पुष्टि की गई है। जो भी विषमताएं आईं हैं, वो निसंदेह मुस्लिम संस्कृति के प्रभाव से है और अब पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भी दृष्टिगोचर है। समाज में महिलाओं की स्थिति सुधारने के लिए सर्वप्रथम उनको शिक्षित करना होगा, सिर्फ साक्षर बनाने से बात नहीं बनेगी। अब पहले से महिलाओं की स्थिति में सुधार है, इसका कारण शिक्षा ही है। समानता में लाने के लिए महिलाओं को मुफ्त में शिक्षा, और रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

श्रीमति स्नेहलता उपाध्याय, पुस्तकालयाध्यक्ष, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान

Yes, women are better than men in respect of mental ability, farsightedness, sincerity, still they are treated as second grade citizens now. They are not getting their due recognition in nation-building. Even in Vedic times, they weren’t treated respectably. Apala can be cited as example, who was abandoned by her husband due to skin disease. Even Gargi was asked to keep shut when Yagyavalkya could not answer her queries. Situation is same even now!

Dr. Raj Kumari Trikha, Former Associate Professor, Sanskrit, Maitreyi College, University of Delhi, Delhi

In this materialistic world those who don’t earn/ have money are looked at as 2nd.

Mrs. Suvarta Vinod, Anandavan Bhakta Samudaya, Institute of Advanced Studies in Veda and Science.

Everything was balanced during Vedic period, but it is only after post Vedic era the misinterpretations of our ancient Indian texts that evolved such thought process in Indian society.

Secondly, It varies from culture to culture –via- family to family in the sense of treating their daughters-in-law, i.e., how families expect their daughter-in-law to behave in particular manner.

Dr. Pankaja Ghai Kaushik, Assistant Professor, Sanskrit, Lady Shree Ram College, University of Delhi, Delhi

भारतीय समाज में सम्बन्धों को महत्व दिया जाता है। ऐसे सामाजिक परिप्रेक्ष्य में महिला का स्थान माँ, बहन, बेटी, और धर्मपत्नी के रूप में सर्वोच्च विदित है। इन सम्बन्धों से वंचित यदि महिला का, या कि किसी और भी वर्ग का, अन्तर्राष्ट्रीय दिवस मनाना भारत में अजूबा सा लगेगा|

प्रोफेसर बलराम सिंह, सदस्य, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर, वेव्स

Maintaining balance in the society is not a woman’s problem, it’s a national issue. The race is on for the gender-balanced business, a gender-balanced government, gender-balanced media coverage, a gender-balance of employees, gender-balance in wealth… Let’s hope this race ends, balance remains with gender equality.

Happy Women’s Day!!

Mrs. Shubha Rawal Wadhawan, Chief communications Officer – IG International pvt. Ltd.

I don’t consider there is a difference between men and women. So first of all there is no need for celebrating International Women’s Day. Is there any International Men’s Day? When you celebrate something like this then you producing yourself as victim. You already give an upper hand to men. In a civilized and sensible society in reality there shouldn’t be difference between men and women. Both have their own limitations biologically, physically and mentally. We should know each other limitations and respect similar to a normal Indian family. Once we understand this we will make a better society.

Dr. Raj Kumar, Assistant Professor, Botulinum Research Center, INADS, Dartmouth, USA

We live in a patriarchal society where in male members are given more liberty and decision making choices. It’s a woman who is expected to change her surname after marriage. It’s a woman who is expected to take care of cooking, cleaning, etc. It’s a woman who works even on holidays. There is no holiday for women. It’s a woman who is expected to take care of family and children after marriage. They are made to do work both inside and outside their homes. It’s just because women are not given a friendly environment to show their talents. The problem lies in our education system and Indian values. Women are still not given adequate education. Even the text books we read show women doing all the household chores like cooking, cleaning and taking care of men. They don’t depict men doing household work rather men are shown going to work or seeking leisure in their free time. Our Indian family values also don’t support a woman standing hand in hand with her male partner. From the very initial stages girls are taught to walk properly, dress properly, keep themselves presentable. The in-laws also expect their daughter-in-law to look after the entire family needs. Even in case of major decision making events the opinion of women is kept as second choice and the ultimate decisions are still taken by male members. Even in job sectors more preference is given to male members keeping less job opportunities to women.

Ms. Tanya Kumra, Accounts Assistant, Shreeram World School, Delhi

I always believe that women are same as the men. When I was a child my MAA always fulfilled my dreams, when my family faced economic problem my elder sister has been there to support me, and now when I  face ups and down in my life  my wife becomes my strength. My supervisor (Prof. Rani Majumdar), my well wishers like Prof. Shashi mam, Dr. Aparna Dhir di and many more always teach me, support me and advise me. They all are women. Therefore how can I believe women are second in Indian society? For me without these women I (men) am incomplete!!!

Kisi ne Kya khoob kaha

Soch ko badlo sitare badal jayenge/

Nazar ko badlo nazareyin badal jayenga/

kastiyan badal ne ke zaroorat nehin hai/

dishayein badlo kinare khud badal jayenge.

Mr. Tahasin Mondal, Research scholar, Department of Sanskrit, AMU, Aligarh, U.P

I don’t think women are considered second in the society. I think there is no society without women. Women are the ones who is giving birth to a child, upbringing the child and making of a future citizen. So in short women only are shaping the thoughts, values and the culture of the society. Whatever a woman teaches a child goes on for generations!! Women are also the biggest strength of a man! A woman who is strongly supporting a man that man is definitely successful in all spheres of life. In Ramayana, it is said man and woman are two wheels of the same chariot, if somehow one wheel breakdown the chariot automatically stop. So, both have to be strong to move in the sphere of life. It is just that every individual has to play his role in life. It is not about 1st or 2nd. I think it is about how efficiently you play your role in life, the tasks assigned to you, your duties towards your people and of course yourself too! It is definitely not about 1st or 2nd at least in today’s times. All the things have to go hand in hand for the smooth running of one’s life.

Mrs. Neeti Chawla, Housewife, Delhi

“As women, we have super powers. We are sisters. We are healers. We are mothers. We are goddess warriors”

It’s International Women’s Day, a day to honor and celebrate the cultural, social, economic and political achievements of women. It’s a day to remind ourselves why women are so amazing. They are the ones who are responsible for bringing new lives to existence. There’s no field where women are lagging behind men. It’s a day to be cherished… Happy Women’s Day to all the lovely ever smiling faces no matter what comes.

Mrs. Shagufa Afzal, Principal, Kuruom Vidayalaya, U.P.

In the modern era, Indian women are no more lacking behind men. They are equally capable and talented in all the fields, e.g., doctors, teachers, astronauts, etc. But still in some places Indian women have not got the equality as men due to religious or orthodox thoughts which need to be changed by giving proper education and awareness.

Mrs. Ankita Dhir, Teacher, K.R. Mangalam World School, Delhi

In present time, Indian women doing their empowerment and society also demand for Equality. The fearless woman today raises her voice against harassment like “MeToo Campaign”.

Mr. Yogendra Bhardwaj, Research Fellow, Sanskrit, JNU, Delhi

The Indian woman has to make her way through all the social prejudices against her, and the men yet have to allow and accept the women to be equal participants in the country’s way forward.

Mrs. Rajni Bhalla, Teacher, DAV Public School, Delhi

In my point of view women are considered to be an integral part of the Indian family and society. They are not given secondary status as we can see in our families or around us in the society.

Ms. Anuja Sinha, Director and Anchor, TCN Media

भारत में आज भी स्त्री का स्थान दूसरे नंबर पर है क्योंकि भारतीय समाज पुरुषों के द्वारा ही संचालित होता रहा है और कहीं ना कहीं स्त्रियां स्वयं भी जिम्मेदार हैं| उन्हें स्वयं को उपभोग की वस्तु के दायरे से बाहर निकलना होगा| वैचारिक रूप से स्वतंत्र होना पड़ेगा|

डॉ. सुषमा चौधरी, अध्यापक, संस्कृत, कमला नेहरू महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

The position and status of women in society has been changing from time to time. In Vedic India, woman was considered like a goddess. With time, the position of women received a set- back. But in modern context, women no longer depend on others. Education has raised her status. She holds equal status in society.

Ms. Suruchi Sharma, Teacher, Modern Public School

हिन्दू संस्कृति को जीवंत रखने का श्रेय नारी को ही है। नारी को परिवार का हृदय और प्राण कहा जाता है – न गृहं गृहमित्याहु गृहिणी गृहं उच्यते ।

श्री विकास शर्मा, तदर्थ अध्यापक, संस्कॄत, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली

Women are a perfect combination of strength and beauty. 

Happy Women’s Day !!

Mrs. Rekha Khandelwal, Housewife, Mumbai