आदि-शङ्कराचार्य

-Dr. Shyam Deo Mishra, Assistant Professor, Rashtriya Sanskrit Sansthan, New Delhi
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शङ्कराचार्य ने हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक, तथा अटक से लेकर कटक तक सम्पूर्ण भारत में धर्म-प्रचार की मन्दाकिनी को प्रवाहित किया, जिसमें तत्कालीन पतित, पथभ्रष्ट, एवं बौद्धादि दर्शनों के कुप्रभाववश नास्तिक, एवं आध्यात्मिक रूप से निष्प्राण, जन-मानस पुनः सनातन धर्म से अनुप्राणित एवं पवित्र होकर एक सूत्र में बँध गया। जिस समय आदि-शङ्कराचार्य का जन्म हुआ, भारत में नास्तिकों के प्रभाव से अनार्य-भावों एवं तज्जन्य दुष्कर्मों के प्रगाढ अन्धकार से आच्छादित होकर सनातन धर्म का प्रकाश लुप्तप्राय हो चला था। धर्म के नाम पर नाना प्रकार के अत्याचार किए जा रहे थे। उस समय किसी व्याकुल भारतभूमि पर, वैदिक-धर्म के रक्षार्थ एवं जनता के उद्धारार्थ आदि-शङ्कराचार्य ने अवतार लिया। उन्होंने लुप्त हुए वैदिक-धर्म की रक्षा की। शङ्कराचार्य अवश्य ही भगवान् की विशेष-विभूति थे जिन्होंने अत्यन्त अल्पायु में ही भारत वर्ष से नास्तिकता की दावाग्नि को आस्तिकता रूपी वृष्टि से निर्मूल कर दिया। 
 
आचार्य शङ्कर के प्रमुख शिष्य विद्यारण्य द्वारा विरचित ‘शाङ्करदिग्विजयम्’ के अनुसार, भारत में धर्म-विप्लव से व्यथित, एवं व्याकुल देवर्षि नारद व ब्रह्मा जी जब उपाय हेतु शिवजी के पास पहुँचे तो शिवजी ने इस संकट की समाप्ति हेतु स्वयं नरदेह धारण करने की बात कहते हुए उन्हें सान्त्वना दी। तत्पश्चात् भगवान् शङ्कर ने शङ्कराचार्य के रूप में, कार्तिकेय ने कुमारिलभट्ट के रूप में, सरस्वती ने भारती के रूप में तथा इन्द्र ने राजा सुधन्वा के रूप में भारतवर्ष में जन्म लेकर अधर्म की समाप्ति की।
 
आदि-शङ्कराचार्य (शङ्करस्वामी) का जन्म 845 वि.सं. (788 ई.) में केरल प्रान्त के मालाबार पर्वतीय प्रदेश में स्थित वेदपाठी व शास्त्रपारङ्गत ब्राह्मणों से परिपूर्ण कालटी (कालडी) नामक ग्राम में नम्बूरी (नम्बूदरी) ब्राह्मण-वंश में वैशाख शुक्ल-पञ्चमी को हुआ। इनके पितामह विद्याधर (विद्याधिराज) के पाण्डित्य से प्रसन्न होकर केरल के महाराज ने इन्हें आकाशलिङ्ग के महादेव-मन्दिर के प्रधानाध्यक्ष पद से विभूषित किया। विद्याधर के पुत्र शिवगुरु भी उद्भट विद्वान् हुए। सन्तान प्राप्ति हेतु शिवगुरु ने अपनी पत्नी कामाक्षीदेवी (सुभद्रा) के साथ घोर तपस्या करके कुलदेवता पिनाकपाणि शिव से वरदान स्वरूप शङ्करस्वामी को पुत्र रूप में प्राप्त किया।
 
शैशवावस्था में ही वर्ण परिचय के समय उन्होंने दिव्य भावों का परिचय दिया था। स्वरों, व्यञ्जनों, एवं मंत्र का एक बार उच्चारण सुनकर उन्होंने उच्चारण करना एवं लिखना सीख लिया था। बचपन में ही पिता के स्वर्गवास ने संसार की असारता एवं अनिश्चितता के प्रति शङ्कर को विमुख कर दिया था। पाप-परितप्त संसार के उद्धारार्थ अवतरित शिव-अवतार शङ्कर बाल्यावस्था में ही संसार के प्रति उदासीन, विरक्त होकर स्वयं को पिञ्जर-बद्ध पक्षी के समान मानने लगे। वे कहीं भी कभी भी किसी समाधिस्थ योगी की तरह बैठकर घण्टों तल्लीन हो जाते थे। आठ वर्ष की आयु में ही शङ्कर ने ध्यानावस्थित अवस्था में ‘आत्मबोध’ नामक ग्रन्थ की रचना कर डाली। संन्यास ग्रहण करने की उनकी उत्कट अभिलाषा की पूर्ति के सामने स्नेहमयी जननी का वात्सल्य भाव आड़े आ जाता था ,जो उन्हें प्रतिक्षण व्याकुल किये जा रहा था। अन्ततोगत्वा दैवयोग से एक नाटकीय घटना-क्रम का पटाक्षेप माता द्वारा उनको संन्यास ग्रहण करने की अनुमति से हुआ।
 
आठ वर्ष की अवस्था में शङ्कर ने गौड़पाद के शिष्य आचार्य गोविन्दपाद से गुरु-दीक्षा ले कर विधिवत् संन्यासी के रूप में अपना जीवन प्रारम्भ किया। उनकी अलौकिक तेजस्विता एवं प्रतिभा से उनके गुरु भी हतप्रभ रहते थे। उनको यह भान हो गया था कि शङ्कर कोई विशेष विभूति है, जो निश्चय ही सोद्देश्य अवतरित हुआ है। उनके गुरु गोविन्दपाद ने 17-18 वर्ष की उम्र में ही शङ्कर को स्नातक की उपाधि से विभूषित करके ‘शङ्कराचार्य’ इस नाम से सम्बोधित किया। वहाँ से अपने गुरुओं की इच्छानुसार, वैदिक धर्म के प्रचारार्थ शङ्कराचार्य ने देशाटन आरम्भ किया तथा जगह-जगह बौद्धों एवं कदाचार युक्त पाखण्डी वाममार्गियों का खण्डन करने लगे। गोविन्दपाद के आश्रम में रहते हुए एक दिन शङ्कर ने गुरु की निर्विघ्न समाधि हेतु आश्रम के समीप प्रवाहित नदी के उद्दाम वेग को अपने योग-बल से स्थिर एवं नीरव कर दिया। प्रतिदिन स्नानार्थ गमनागमन में अपनी वृद्धा माता को होने वाले असह्य शारीरिक कष्ट एवं दुर्बलता को देखकर शङ्कर ने अपने योग-बल से नदी की एक धारा घर के समीप से प्रवाहित कर दी। एक गरीब ब्राह्मण प्रभाकर के मूर्ख, रोगी एवं बर्बर पुत्र को जल के सिंचन मात्र से स्वस्थ एवं विद्वान् ‘हस्तामलक’ बना दिया।
 
शङ्कराचार्य के शिष्य सनन्दन पद्मपाद, चौलदेशीय ब्राह्मण थे। शङ्कराचार्य से दीक्षा ग्रहणार्थ वह काशी आए। उस समय गङ्गा प्रबल उत्ताल तरङ्गों से प्रवाहित होती थी। जिस दिन वह दीक्षा हेतु गङ्गा के एक छोर पर पहुंचे, प्रबल उत्ताल तरङ्गों से प्रवाहित प्रचण्ड वेगवती गङ्गा को पार करना उन्हें असम्भव प्रतीत हो रहा था। दूसरे छोर पर खड़े शंकराचार्य ने उन्हें हाथ से आने का इशारा किया। उनके संकेत पर दृढनिश्चयी सनन्दन ने जैसे ही नदी में पैर रखा उन्हें कमल-पत्र की अनुभूति हुई। इस प्रकार कमल पत्र पर पद-निक्षेप करते-करते उन्होंने अनायास ही उद्दामगतिक गङ्गा को पार कर लिया।
 
गुरुओं की आज्ञानुसार शंकर सम्पूर्ण भारत वर्ष में सनातन धर्म की प्रतिष्ठा हेतु उद्यत हुए। उन्होंने महार्जुन में स्थित वाममार्गियों के प्रधान मठ में अपनी योग-माया से सबको नतमस्तक करा दिया। तथा अपने प्रधान शिष्य सुरेश्वराचार्य को वैदिक धर्म के पुनः प्रतिष्ठापनार्थ स्थापित कर दिया। उसके बाद द्रविड़ पाण्ड्य, चोल, रामेश्वरम् में जगह-जगह शास्त्रार्थ करके सनातन धर्म के सही स्वरूप को समझाते हुए अद्वैतमत की स्थापना की। उत्तर की ओर बढ़ते हुए उन्होंने काशी, कुरुक्षेत्र एवं बदरिकाश्रम तक की यात्रा की। उन्होंने सम्पूर्ण भारतवर्ष में सनातन धर्म की स्थायी प्रतिष्ठा व प्रचार हेतु चार स्थलों पर मठ स्थापित किए। अथर्ववेद के प्रचारार्थ बदरिकाश्रम में ‘जोशीमठ’ स्थापित कर अपने शिष्य सनन्दन को यहाँ अभिषिक्त किया। यजुर्वेद के प्रचारार्थ उन्होंने मध्यार्जुन प्रान्त में तुङ्गभद्रा नदी के तट पर ‘विद्या-मठ’ (वर्तमान में शृङ्गेरी मठ) की स्थापना करके अपने सुयोग्य शिष्य सुरेश्वराचार्य को वहाँ नियुक्त किया। तत्पश्चात् भगवान् के उक्त वचन ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ को चरितार्थ करने हुए शङ्कराचार्य ने श्रीकृष्ण-धाम द्वारकानगरी में ‘शारदा-मठ’ की स्थापना करके वहाँ अपने शिष्य ‘विश्वरूप’ को अध्यक्ष व संचालक नियुक्त किया। ऋग्वेद के प्रचारार्थ जगन्नाथ धाम में ‘ज्योतिर्मठ’ की स्थापना की। वहाँ से चलकर मार्ग में हिरण्यगर्भ, आदित्य, गाणपत्य प्रभृति सम्प्रदायों के आचायों को परास्त करते हुए शङ्कराचार्य बौद्ध धर्म के अनुयायी राजा हिमशीतल की नगरी काञ्ची पहुँचे तथा वहाँ बौद्धाचार्यों को शास्त्रार्थ में परास्त करके सनातन धर्म की पुनः प्रतिष्ठा की। यहाँ भी उन्होंने दो वैदिक-धर्म-प्रचार केन्द्रों ‘विष्णुकाञ्ची’ व ‘शिवकाञ्ची’ की स्थापना की।
 
आत्मदर्शन द्वारा क्षुद्र आत्मा महान् आत्मा में परिणत होता है। क्षुद्र मानव ब्रह्मज्ञ होकर स्वयं ब्रह्म हो जाता है ‘ब्रह्मविद् ब्रह्म भवति’। शङ्कराचार्य ने ब्रह्मत्व लाभ का यही पथ प्रकट रूप में जगत् के सामने उपस्थित किया। सुनीति एवं सद्धर्म ही उन्नति का सर्वोत्तम मार्ग है अतः, जो अधर्म एवं कुरीतियों को हटाकर इनकी प्रतिष्ठा करते हैं, वो महापुरुष कहलाते हैं। शङ्कराचार्य ने तत्कालीन वाममार्गियों एवं बौद्ध धर्म के विकृत रूप को विस्थापित करके सनातन धर्म पुनः प्रतिष्ठित किया। इनके इतिवृत्त एवं जीवन-चरित्र का अनुशीलन हमें अपने देश के गौरवशाली इतिहास का दिग्दर्शन कराता है एवं अपनी संस्कृति व सभ्यता के रक्षार्थ सतत प्रेरणा भी देता है।
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Ritualistic Significance of ‘Magha-Masa’ in Hindu Calendar

– Prof. C. L. Prabhakar, President, WAVES, Bangalore Chapter

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Prof. Prabhakar obtained Ph.D. in Vedic  Studies (thesis on’ Sukla Yajurveda’) from  Poona University, Poona in 1968. He is former Professor of Sanskrit and has published many books and articles. Honored with the award ‘Veda Vaaridhi’, currently he is director of the Nada Veda Adhyayana Kendra, Bangalore. He is active to spread Vedic heritage and culture.

Magha-Masa is important among the months in Hindu calendar. This month is an opportunity to get reduced of our sins. ‘Maaghamsyaatitimaaghah’ meaning no sins more could be acquired further. Doctors know the reducing tablet to reduce pain. So like this month to reduce our sins.

Hindu calendar is invested with twelve months. Each month is covered by 30 days. Every day has the five (pancanga) elements viz. Tithi, Vara, Nakshatra, Yoga and Karanas. Everyday is important for spiritual Practices. But there is choice and special importance. We have twelve months beginning form Caitra-Masa and going upto the Phalguna-Masa. Every month has a connections of some significance and mythology to speak the importance of the month and marking auspicious days in it. Sun would be transiting every month in to one sign (rasi) to another sign. It occurs usually on the 14th day of each month called Sankramana technically. There are twelve zodiac signs to complete one year’s time.When Sun is in Makara-Rasi, from then, for six months it is called Uttarayanam and the remaining six months are known as Dakshinayanam. These indicate the direction of the Sun astronomically moving towards north and southern directions. As a result there would be effects upon the people and nature: good, bad and different due to the movement of Sun. Manasollasa of Somadeva is a source Book for us to know about the importance of days and months, festivals and more.

Magha-Masa is the eleventh Month of each Year. This year is called by name Manmatha and the next would be Durmukha year by name. Out of the cycle of sixty years, this is the 29th/30thYear of the cycle. Each month is characterized with the Nakshatra-name. For example, if Sravana-Nakshatra is there on the full moon day then it is called Sravana-Masa. Likewise the Magha-Masa is the name derived from the Magha-Nakshatra on the Purnima. Similarly the other months go by the name of a Nakshatra. Although we have many numbers of years, we have only seven days of life. One day to take birth and another some day to exit from the body and the world. However seven are the days of life beginning from Sunday to Saturday. These days too go by the names of the planets Ravi, Candra and so on. Rahus and Ketu are the two nodes who entered the count among the planets as Chayagrahas. They follow the main planets. Moreover they do not have any orbit .They are simply ascending and descending nods of ecliptic and moon orbit

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Let us know the prominent festivities in this month. At first, on 5th day of Shukla-Paksha it is called Sri Pancami or Vasanta Pancami. This is the first festival when Goddess Sarasvati is worshipped. She is known also as Sarada Devi, Syamala Devi and Vag Devi. She is called Jnanasarasvati. On this day Sarada-puja is done. She is a Goddess who blesses good knowledge and good education (sadbuddhi and vidyanaipunya). On this day many people observe the important samskara namely Aksharabhyasam to their children with a belief that the child would be good in education, learning and prosperity.The child is introduced to writing the alphabets and salutation to Lord Siva well known as Dakshinamuty, a guru to all. On this day Goddess Sarasvati is offered Payasa as food. And the child is made to write ‘Om namahsivayasiddhamnamah’. In Devi Bhagavata details of Sarasvati Aradhanaare given. We have prayer to Sarasvatiin a length of a Veda-Sukta by name Sarasvati-Sukta that could be recited on that occasion specially.The sixth day of the month namely Shashthi is festival of Lord Subrahmanya. He is born on this day and so his puja is done. Abrahmacari (unmarried Boy) is fed and worshipped symbolically on this day to get the grace of the Murugan. The next day is Rathasaptami, when Sun turns to the northern direction fully and gallops to pick up more and more heat. On this day Suryaradhana is done with offering of payasa (naivedya). Arunaprasnapurvaka Surya-namaskaras could be done to get the grace of this deity. Arunaprasna is the first section of Taittiriya Aranyaka. It contains thirty two passages reciting which 32 namaskaras are offered to Suryadeva. Surya loves prostrations (namaskarapriyobhanuh). On the Eleventh day we get Bhishma Ekadasi when Bhishamacarya gave up his body (bhautikasarira) in the presence of Sri Krishna. He is the avatar of one of the eight Vasus. This ekadasi is virtuous and people get their desires fulfilled. This day is called ‘Bhishmaikadasi’. Bhishma had the boon from his father Santanu Maharaja to leave the body whenever he desired (svacchandamarana scope). Then we get the Purnima, the full Moon day. Every month we get Full moon days (Purnimas.) But this is one of the three special Purnimas of each year. Actually Asvija Purnima, Kartika Purnima and Magha Purnima are best. Especially on this Purnima day, there would Magha Nakshatra. On this day when bath to Siva is done, it is highly fetching and beneficial. Siva Purana extols more details on this aspect. Texts like Padmapurana, Nirnayasindhu, Krityatattva elaborate on the importance of bath at early hours of the day before sunrise. Very auspicious would it be if the bath and dip is taken in the sacred river Ganges at Kasi or elsewhere where the Ganga flows. Even other sacred rivers too remain helpful for the ritual of Maghasnana with sankalpa. In Bhagavata too the merit of taking dip in Ganga is described, It is said there that no other river but ganga waters has exclusive power to undo the sins at that time. In this month not only the Devataradhana even Pitrutarpana is also recommended to be significant as it pleases the Manes (the Pitrus). Magha-Nakshatra is the constellation of Pitri-devataa (deity of ancestors).

After Purnima, New Moon days begin. On eighth day it is called ‘Anaghashtami’. Lord Dattatreya is worshipped. Anagha Devi is revered as the goddess Lakshmi herself. She is called Anagha Lakshmi. We can get the blessings of Guru as well as Goddess with this worship. He is known as Dattaguru. We recite amantram ‘Dattagurumbhaje’ simply to get his grace. Dattatreys is the avatar of three Murtis Brahma, Siva and Vishnu who are three forces and Powers creation, annihilation and maintenance of the Universe. Therefore, Dattatreya is the preceptor who blesses all the three abilities in the upasakas. Also Natya Ganapati is worshipped on this day. He provides expertise further in the performing arts and excellences in the professional career. Ganapati is known in 32 forms and therein Natya Ganapati is special.

Actually every thirteenth day (trayodasi) of each month we get Pradosha Puja when Siva is worshipped. That day is called as Masasivaratri. The next day on the caturdasi at midnight Sivaratri actually dawns. But this month alone that day is called Mahasivaratri when Siva is worshipped strongly all the time. It has three durations (yamas) of night. People worship Lord Shiva with Mahanyasapurvaka Rudrabhishekas and other pujas. They also recite many Siva stotras. All this activity provides benefit and hope for liberation and mundane prosperity. After all one of the most important is to a get masa-punya as far as possible in the given calendar of Life to everybody including gods and others. Everybody is born but never the Brahma who is Lord Purusha Narayana who is described as ‘ajayamanobahudhavijayate’ in Purushasukta of RV. It is said here that the Lord does not take birth but causes births to take place.

Besides all these festivals and vows (vratas) etc. in this month, the Sundays are auspicious and important. They are best days for Surya Anushthanas. The forms of rites and devotion like Arunaprasnaparayanam, Arunahomam and recitation of Surya Sahasranama, Adityahrudayamand more are observed these days depending on the convenience and time-scope. This is technically called as Maghabhanuvara.

All the days of this month bath before sunrise is precious. This is called as Maghasnanavratam. That itself brings merit, unknown cleansing, peace and prosperity (punya).

Thus this Magha-Masa is a month well liked by gods and more so the Goddess Saradadevi, Subrahmanyaswamy, Bhismacarya who is Vishnu Rupa only. On Purnima, Siva Parvatis, Goddess Anagha Devi, Anjaneya, Lord Narasimha, Lord Kumaraswamy etc. can be worshipped.

We have Magha Purana where we come across the super importance of this month. So let us get the special grace of the deities to smoothen our life free from hurdles and unwanted things.

Om namahsivayasivataraya ca.’