पुस्तक की नियति

-डा. प्रवेश सक्सेना

भारत हो या विश्व के अन्य कोई देश, सर्वत्र पुस्तक आरंभिक दिनों में कहीं जीवित व्यक्तियों के रूप में, भोजपत्रों, पत्थरों या मिट्टी की गोलियों के रूप में या पिफर चर्म और धातुओं पर अंकित या उकेरी रही है। परिवर्तन संसार का शाश्वत नियम है। मानव जीवन के हर क्षेत्र में परिवर्तन होता है तो पुस्तक के क्षेत्र में भला क्यों नहीं होता? काग़ज़ के आविष्कार और मुद्रण कला ने क्रांतिकारी परिवर्तन किए हैं पुस्तक के रूप में। सबसे बड़ा परिवर्तन जो 20वीं सदी के अंत में कंप्यूटर और इंटरनेट ने किया और अब जो ‘ई-बुक’ का आधुनिकतम आविष्कार हुआ है, उसने तो न केवल पुस्तक का कलेवर बदला है, लेखक, पाठक, प्रकाशक और पुस्तकालय सबके समीकरण बदल डाले हैं।

पुस्तक के भविष्य को लेकर इस युग में प्रायः समाचार-पत्रों या पत्रिकाओं में इतस्ततः चिंता व्यक्त की जाती है। पुस्तकें गायब हैं? पुस्तक की मृत्यु हो चुकी है? आदि नकारात्मक बातें इस साइबर युग में बार-बार पढ़ी-सुनी जाती हैं? इक्कीसवीं सदी के इस साइबर युग में जबकि इंटरनेट, किंडल, ई-बुक आदि का प्रचलन बढ़ता जा रहा है तो पुस्तक के भविष्य को लेकर चिंता होना स्वाभाविक है। क्या होगा मुद्रित पुस्तक का भविष्य? क्या वह अजायबघर की एक वस्तु बनकर रह जाने वाली है? फिर पुस्तक की नियति के बारे में और भी प्रश्न मन में घुमड़ने लगते हैं? कैसे वह अस्तित्व में आई, कैसे मनुष्य ने लिखना सीखा, प्रथम पुस्तक प्रस्तर पर लिखी गई या भोजपत्र पर, काग़ज़ कब, कहाँ से आया? आदि-आदि। प्रथम मुद्रित पुस्तक किस भाषा में थी, क्या नाम था उसका? अर्थात् ‘पुस्तक की नियति’ को लेकर उसके ‘कल, आज और कल’ से संबंधित प्रश्न अगणित हैं। दूसरी ओर जब दिल्ली पुस्तक मेले या विश्व पुस्तक मेले लगते हैं तो ‘किताबें लौट आई हैं’ जैसे सकारात्मक शीर्षक भी नज़र आते हैं। जो भी हो 20वीं सदी के अंत और 21वीं सदी के इन प्रारंभिक दशकों में पुस्तक को लेकर चिंता व्याप्त है। कारण प्रथम तो यही कि कंप्यूटर, इंटरनेट और ई-बुक ने मुद्रित पुस्तक को पीछे छोड़ दिया है। द्वितीय कारण पठनीयता कम से कमतर होती गई है। यही सब कारण रहे कि ‘पुस्तक की नियति’ पर कुछ लिखने का मन बना।

पुस्तक की नियति के बारे में सोचते ही प्रश्न उभरते हैं कैसे वह अस्तित्व में आई, कैसे मनुष्य ने लिखना सीखा, प्रथम पुस्तक प्रस्तर पर लिखी गई या भोजपत्र पर? काग़ज़ कब, कहां से आया आदि-आदि? इन सब प्रश्नों के उत्तर खोजने के लिए अतीत के गर्भ में जाना जरूरी था। प्रागैतिहासिक काल में कैसे मनुष्य ने भाषा को सीखा, लिखना सीखा आदि प्रश्नों के उत्तर टटोलने ज़रूरी थे। इसलिए जितना संभव था उतना ढूँढ़ने की कोशिश की। आश्चर्य हुआ यह जानकर कि पुस्तक के जन्म या विकास को लेकर कुछ विश्वकोशों से सहायता भले ही मिल जाए परंतु ‘पुस्तक पर पुस्तक’ कहीं नहीं मिलती। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि पुस्तक के जन्म और विकास की गाथा के सूत्र जहाँ एक साथ मिल सकें-ऐसी कोई ‘पुस्तक’ पुस्तक पर नहीं मिलती है।

अनेक पुस्तकालयों के चक्कर काटे। प्रकाशकों से संपर्क किया परंतु निराश होना पड़ा। हिंदी भाषा में तो इस प्रकार की पुस्तक मिली ही नहीं। हाँ, साहित्य अकादमी में ज़रूर एक अंग्रेज़ी ग्रंथ मिला पर उसमें संस्कृत, हिंदी का उल्लेख तो था ही नहीं अंग्रेज़ी साहित्य की पुस्तकों का ही उल्लेख था। पुस्तक के जन्म और विकास की गाथा का उल्लेख भी कुछ विशेष नहीं था।

एक पुस्तक एम. आइलिन की प्राप्त हुई, जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक था ‘Black on White’ यह भी मूल रूप में नहीं मिली। ‘पुस्तक के जन्म और विकास की कहानी’ शीर्षक से जितेन्द्र शर्मा ने इसका रूपांतरण किया है और कौस्तुभ प्रकाशन, हापुड़-245101 ने इसे सन् 2010 में छापा है। अत्यंत रोचक तरीके से इस रूपांतरित पुस्तक में पुस्तक की गाथा वैश्विक संदर्भ में लिखी गई है। आश्चर्यजनक बात लगती है यह कि यहाँ संस्कृत जो कि विश्व की प्राचीनतम भाषा सर्वस्वीकृत है तथा ऋग्वेद जो विश्व-पुस्तकालय की प्राचीनतम लिखित पुस्तक मानी जाती है उसका उल्लेख तक नहीं। भाषा के अक्षरों तथा अंकों की खोज का श्रेय फोनिशियंस जो सेमिटिक जाति के थे, उन्हें दिया गया है। विश्वास है यह किसी पूर्वाग्रह या दुराग्रह के कारण नहीं हुआ होगा, संभवतः लेखक या रूपांतरकार दोनों ही संस्कृत से परिचित नहीं रहे होंगे। 

भारतीय संदर्भों में वेद मौखिक परंपरा से पीढ़ी दर पीढ़ी पहुँचे, ज्ञान दर्शन सबका संप्रेषण गुरु-शिष्य परंपरा से हुआ ज़रूर परंतु उस सुदूरकाल में लेखनकला भी उसके समानांतर चलती रही। पुस्तक के जन्म के या मूल के प्रसंग में इसे जानना रोचक और ज्ञानवर्धक रहा है। इसके लिए पुरातात्त्विक साक्ष्य जैसे शिलालेख आदि तो हैं ही साथ ही प्राचीन वाङम्य में अनेक अंतःसाक्ष्य भी उपलब्ध हैं।

इन्हीं सब विचारों को समेटे हुए तथा पुस्तक के प्रति आशावादी सोच रखते हुए ‘पुस्तक की नियति’ नामक पुस्तक को लिखने का विचार आया। कुल बारह अध्यायों में पुस्तक के मूल, उसके लेखक, पाठक और यहाँ तक कि लेखन सामग्री और पुस्तकालयों तक पर विस्तार से चर्चा; ई-बुक का चमत्कारपूर्ण संसार; समय-समय पर कथित विद्वानों द्वारा पुस्तक के महत्त्व के विषय में टिप्पणियाँ; पुस्तक को लेकर संस्कृत और हिंदी की कुछ कविताओं का संकलन; पुस्तक के विषय में प्राप्त रोचक तथ्य आदि का वर्णन है। कुल मिलाकर कहें तो यह ‘पुस्तक’ इस क्षेत्र में एक बड़े शून्य को भरती है।

इस कार्य द्वारा भारतीय और वैश्विक दोनों संदर्भों में ‘पुस्तक की नियति’ को जानने-समझने की कोशिश की गयी है। मेरा मानना है –

‘पुस्तक की नियति’ : पुस्तक थी, है और हमेशा रहेगी।

Dr. Pravesh Saxena, Former Associate Professor, Sanskrit, Zakhir Hussain College, University of Delhi

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