आत्म–शोधन और आत्म-नियन्त्रण ही है जीने की कला

Dr. Poonam Ghai

आज विज्ञान और टेक्नोलॉजी की तरक्की के कारण इतने संसाधन विकसित हो गये हैं कि मनुष्य के आराम, मनोरंजन और रहन-सहन के ढंग में बहुत परिवर्तन आ गया है। बिजली का उत्पादन कई गुना बढ़ गया है, लेकिन ह्रदय में अंधकार भी उतना ही बढ़ गया है। कभी चिन्तन करिए कि ऐसा क्यों हो रहा है? इसके पीछे हमारी विचारधारा, कुंठित और स्वार्थी सोच, धर्म-संस्कृति के लिए अत्यधिक संकुचित विचार और भी न जाने क्या-क्या कारण हैं। एक स्वस्थ, शालीन और सद्भावपूर्ण जीवन के लिये मानवता को क्या करना चाहिए ? इस पर विचार करने की ज़रूरत है। भौतिकवाद और सुविधावाद के युग में व्यक्ति-व्यक्ति से अलग हो गया है। यही सब विचार मनोविज्ञान की ओर हमें ले जाते हैं। हम जैसा सोचते हैं वैसे ही दृष्टि हमारी बनती है, वैसा ही जीवन हम जीने लगते हैं।

इस सत्य से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हमारे उत्कर्ष के प्रथम एवं महत्त्वपूर्ण साधन हैं – हमारी स्वस्थ और सक्षम ज्ञानेन्द्रियाँ। परन्तु इन्द्रियों का प्रवर्तक है- ‘मन’। मन शरीर का नयन और नियमन दोनों करता है। यदि मन शुद्ध और पवित्र बन जाये तो हमारे जीवन की धारा बदल जायेगी। वैदिक मन्त्रदृष्टा ऋषि इसी बात को यजुर्वेद के शिवसंकल्प सूक्त के माध्यम से कहते हैं –

सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभीशुभिर्वाजिन इव ।

हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसङ्कल्पमस्तु  34.6

जो मन हर मनुष्य को इन्द्रियों के लगाम द्वारा उसी प्रकार घुमाता है, जिस प्रकार एक कुशल सारथी लगाम द्वारा रथ के वेगवान अश्वों को नियन्त्रित करता एवं उन्हें दौड़ाता है, आयु रहित (अजर) तथा अति वेगवान व प्राणियों के हृदय में स्थित मेरा वह मन शुभ संकल्प युक्त अर्थात सुंदर एवं पवित्र विचारों से युक्त हो।

Just as a good charioteer makes the horses run according to his commands so they go where he wants them too, so too the mind can guide a man towards his desire and by restraining animal instincts lead to that dweller in the heart who is immortal and free of turmoil, my mind may you have good intentions.

इसीलिए भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में कथित जीवन-दर्शन शाश्वत है, त्रैकालिक, सार्वजनीक, सार्वदेशिक माना जाता है। लेकिन वर्तमान में सब कुछ जानते समझते हुए भी एक होड़ मची हुई है, सब कुछ पा लेने की। इसी होड़ ने आज के हालात पैदा कर दिए हैं। हर समय असंतोष का जो भाव है उसी ने कुदरत के साथ छेड़छाड़ करने की हमारी प्रवृत्ति बना दी।

जब आवे सन्तोष धन सब धन धूरि समान

(तुलसीदास)

हर कोई आज कोरोना के डर के साये तले जीने को मजबूर है। हमारे देश भारत में 30 जनवरी को पहला मरीज कोरोना संक्रमित मिला था और 7 मई को यह आंकड़ा 50 हज़ार पर पहुंच गया और आज इन आंकड़ों के बारे में सोचकर भी भय लगता है और लगता है, कि जैसे हम कोई बहुत ही बुरा स्वप्न देख रहे हैं जो जल्दी टूटे और हम अपनी उसी दुनिया मे फिर से आ जाएं। इतने लोगों की बीमारी और मौत एक बार हर व्यक्ति को डरा अवश्य रही है, लेकिन डरने के बावजूद अभी भी हम अपनी कमियों को स्वीकारने के स्थान पर इन सारी परिस्थितियों के लिए अन्य चीज़ों पर दोषारोपण करने से चूक नहीं रहे। मानव जीवन भौतिक, आर्थिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्तरों पर बार-बार चोट खाकर भी सबक नहीं ले रहा।  कोरोना वायरस के सामने हम निरुपाय हैं, हमारा विज्ञान और तकनीक भी असहाय हैं।

कोरोना महामारी ने मनोवैज्ञानिक रूप से हमें तोड़ा है और छोटी-छोटी सी घटनाओं का भी हम पर बहुत प्रभाव पड़ा है। मई महीने की घटना है, लॉकडाउन के कारण सभी में किसी तरह भी अपने घर पहुंचने की होड़ थी और कुछ मजदूर इसी आपाधापी में रेलवे की पटरियों पर पैदल ही चले जा रहे थे लेकिन होनी देखिए कि ट्रेन से कुचलकर मारे गए। इस हादसे के बारे में समाचार में बताया गया कि पटरियों पर मजदूर कट गए और चारों तरफ उनकी रोटियां जो रास्ते मे खाने के लिए वे ले जा रहे थे, बिखर गयीं यह घटना मन को व्यथित करती है कि सारी कहानी सिर्फ रोटी की ही होती है क्या? रोटी कमाने ही बेचारे यह लोग परदेस गए और इस आपदा के काल में रोटी के लिए ही चार पैसे कमाकर घर लौटना चाहते थे। लेकिन होनी इतनी प्रबल रही की रेलवे पटरियों पर उनके शरीर का तो अंत हुआ ही रोटी की कहानी भी खत्म हो गई।

यह सब देखकर भी हम लोग कुछ समझ नहीं पाते।  आज हमें कोरोना से बचने के लिए कुछ नियमों का पालन करने को कहा जाता है जो आज के हालातों में बचे रहने का एकमात्र उपाय है और यह हम सभी जान समझ रहे हैं लेकिन फिर भी इन हालातों से समझौता करने की जगह बहुत से लोग सरकार, व्यवस्था, समाज, अपने परिवार और यहां तक कि ईश्वर को भी कोसना नहीं छोड़ पा रहे। भगवान ने ऐसा क्यों किया? यही उनका प्रश्न होता है और यह कभी मनन किया किसी ने कि कुदरत, प्रकृति या ईश्वर भी शायद कुछ सन्तुलन करने के मूड में है अब। इतनी बेईमानी, भ्रष्टाचार, लूट-खसोट, बलात्कार और न जाने किन-किन बुराइयों से भरे हुए इस विश्व को जैसे एक सज़ा मिली है। अपनी लाइफ एन्जॉय करने का जो फंडा लोगों पर हावी हो गया था उसे आज के हालातों ने तोड़कर रख दिया है। रोज कहीं होटल में खाना या बाहर से मंगाकर खाना, घूमना फिरना सैर सपाटे, जश्न क्लब किटी-पार्टी सब पर काफी दिन रोक रही और अब भी अंकुश तो है ही। लम्बी सूची है उन चीजों की जिन पर आज नियंत्रण है लेकिन कोविड-19 से पहले यही चीजें ज़िन्दगी का हिस्सा हो गयी थीं। घर के खाने से दूर एक फोन पर खाना ऑर्डर होता था और होम डिलीवरी होती थी। उस खाने से शरीर को क्या नुकसान थे यह सोचने की फुर्सत ही किसको थी। दलील यह दी जाती थी कि ‘मैं तो बिना बाहर का खाए जी ही नहीं सकता / सकती’। ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि अब कैसे जी रहे हैं? कहने का मतलब वह हर काम जिसे हम सालों से करते आ रहे थे और उसे करने के पक्ष में अपनी बेसिर पैर की दलीलें देते थे, उन्हीं चीजों को आज जब हमसे छीन लिया गया है तो भी हम जी रहे हैं। कुदरत ने हमें अपनी राह पर चलने के लिए बहुत आगाह किया लेकिन हम आगाह होना तो दूर बल्कि और भी इन चीज़ों में संलिप्त होते गए तो कुदरत ने भी अपना करिश्मा दिखाया कि लो जिन चीजों के बिना तुम जी नहीं सकते थे अब देखो कैसे जिया जाता है?

अभी भी लोगों में बहुत सन्ताप और असंतोष की भावना है। सोचिये आज के समय में वे ही लोग ज़्यादा दुखी और परेशान हैं जो सिर्फ अपना देख रहे हैं। ‘स्व’ में रहने की आदत या मजबूरी ने ही हमें दुखी और व्यथित किया हुआ है। प्राचीन काल में हमारी संस्कृति ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ एवं ‘सर्वेभवन्तुसुखिनःसर्वे सन्तुनिरामयाः’ का उद्घोष करती थी। आज भारत की उसी जीवन-शैली को जन-जन की जीवन-शैली बनाना होगा।

वस्तुतः चुनौती से संघर्ष करने का अनुभव कराने वाले कोरोना महासंकट ने हमें सिखाया है कि केवल उपभोक्तावादी संस्कृति से अब जीवन नहीं चलेगा। उसमें आध्यात्मिक दृष्टि लानी ही होगी। अनुशासन से परिपूर्ण आत्म-शोधन और आत्म-नियन्त्रण ही इसकी नींव है। क्यों न हम ऐसा माने कि मानो कोरोना कोई शिव जी का गण है जो दुनिया की सारी बुराई का नाश कर हमें पुनः जीने की कला सिखाने के लिए भेजा गया है ताकि इस धरती पर मानव और प्रकृति के बीच सन्तुलन बना रहे। इससे न केवल हमारा मानसिक तनाव कम होगा और स्वस्थ रहकर हम कोरोना जैसी महामारियों से सदैव बचे रहेंगे। इस समय बहुत ज़्यादा भविष्य का सोचकर अपने को परेशान नहीं करना चाहिए। हम जियेंगे तो भविष्य भी रहेगा और हम तभी जी पाएंगे जब तन और मन से स्वस्थ होंगे।कबीरदास जी की बानी आज के माहौल में बहुत ही सटीक बैठती है-

कबिरा सोच न साचिये जो आगे कू होय।

सीस चढ़ाए पोटली ले जात न देख्या कोय।।

सच में सोचना किस बात का? सिर पर रखकर तो कुछ ले नहीं जाना है सब यहीं रह जाएगा।

Dr. Poonam Ghai, Associate Professor, Sanskrit, R.S.M (P.G.) College, Dhampur, Bijnor