विश्व लॉक, जीवन अनलॉक

डॉ. धनंजय भंज

हम मानव विज्ञान का क्या-क्या कर बैठे।

हर साधन में संशाधन का विनाश कर बैठे।

समस्या से परे सिर्फ समाधान को ढूंढे।

बिन जल चातक जैसा बेसहारा हो बैठे ॥१॥

लॉकडाउन मेरे लिए तो नयी सोच का माध्यम बना।

विश्वकल्याण में जीवन समर्पित पीडितों के लिए संवेदना ॥

धन्य है सब भारतवासी जो बने रक्षक देवस्वरूप।

धन्य है मेरी भारतमाता परिवेश को दिया नया स्वरूप ॥२॥

जिन्दगी कभी निराश न थी, शराफतों से उसे गले लगाएं।

प्रकृति माँ की गोद में क्षणभर तो अपना समय लगाएं॥

खुशी के आंसू से भी तन-मन, अधिक उष्ण, अति गंभीर।

कुछ तो कमी कभी न थी, फिर भी जीवन क्यों अधीर?॥३॥

जिस नदी में माँ को पाया, उस गंगा को रौंद दिया।

जिस मिट्टी से लिया अनाज, उसे तो कब से कब्र दिया॥

विकास के नाम विनाश को, किस प्रकार से न्यौता दिया।

कालापानी सा एकान्तवास, जीवन को कुछ अर्थ दिया॥४॥

अब ना धूल, ना कहीं धुंआ, खेत-बागान भी सदा प्रफुल्लित।

गंगा यमुना की बात छोड़ों, समुद्र तट भी प्रसन्नचित्त॥

 शिल्प प्रतिष्ठान, उद्योग जगत, बस-रेल-जहाज कैसे शान्त।

 कोरोना ग्रास ही इन्सा को, सिखा गया क्या इन्सानीयत॥५॥

 परिवेश से प्रेम करें, नद-नदी तो सब अपने हैं।

 प्रकृति से प्यार करें, जीव जन्तु इसके अपने हैं॥

 दुखः के वक्त ये साथ हमारे,  इसी बात को समझाएं।

 परिजनों से दोस्ती जैसी, वैसे धरती को अपनाएं॥६॥

अब तो जाएगा कोरोना, खुल जाएंगे बन्धन सूत्र।

जीवन फिर से सिखलाएगा नैसर्गिक वातावरण-मन्त्र॥

आओ मिलाएं सब सुर, सबका हाथ, सबका मन।

अभी भी समय है  देर नहीं, परिवेश का करें जतन॥७॥

वैद्य-पुलिस-शासन-प्रशासन कोरोना वीर कहलाते।

पर्यावरण का रक्षक बनें, स्वयं को रक्षावीर बनाते॥

एकान्तवास में कवि-चित्रकार, नवीन  सोच से पुनः प्रबुद्ध।

किताबें बने, सिनेमा बनें, परिवेश के लिए हो समर्पित॥८॥

कोरोना लोकडाउन लाया, दिशाहीन गति जीवन लाया।

भूल समस्या सांसारिक सब प्रकृति शरण में बैठा पाया॥

है क्या जीवन? कैसे जीएं? यही बात संभवतः समझाया।

परों के लिए सोचने वाले, किसको-किसको अपनाया॥९॥

परमेश्वर की कृपा धरा में, पुनः संचरित नवजीवन।

प्रकृति प्रेमियों कागज बात, भूल में भी अब करो मनन॥

देश बचाओ, बचे सभ्यता, वसुधा बचे व प्राणिजगत।

नवोदय हो अस्तमित रवि, किरणे सदा हों दिव्य-अमृत॥१०॥

वेदों में निहित, चरक प्रणीत, शास्त्रोल्लिखित सार वर्णित।

आयुर्वेद, गीता, भगवत्-नीति-नियमों का हो पालन ॥

भूले बिसरे सनातनीय परम्परा, फिर बने सहारा।

जीवन बने मधुर, असीम परमत्व को करे मनन॥११॥ 

बाइबल-कुरान-गुरुग्रंथों से प्राप्त करें हम अमूल्य सुधा।

कोरोना-निरोधी अभियान, अब विश्वपटल में हो प्रतिष्ठा॥

सकल जीवन, चराचर हो, हो अथवा नद-वन-निर्झर।

अमृतवर्षा कण-कण में अधूरा  जीवन बने मुखरित॥१२॥

हे करुणेश्वर! करो करुणा, हे मानवजाति! करो यह प्रण।

प्रयासरत हो सफल बनें, कोरोना व्याधि से मिले जीवन॥

आत्म-मंथन से राह ढूंढना नि:सार प्रयास, बेकार खोज।

करुणामय की अपार कृपा से विश्वगुरु फिर भारत आज॥१३॥

विकार मन में अस्थिरता कोरोना जैसी अराजकता।

गुरु-ज्ञान से विश्वबंधुता यह पाठ सिखाए कोरोना॥

जाति-धर्म-व वर्ण भूलकर विश्वनियन्ता शरण में जाएं।

संकटकाल का करें निवारण न प्रयास सार्थक रुक जाए॥१४॥

जीवन क्या है? संघर्ष क्या है?अधूरा संघर्ष बिना जीवन।

कोरोना एक ज्वलंत दृष्टांत, मिटेगी बाधा – मिटेगा बंधन॥

उगेगा सूरज संभावनाओं का, आत्मनिर्भर राष्ट्र का विश्वास।

शिथिल अस्तमित शुष्क-शून्यता प्राण-वाक् अन्नमय वास॥१५॥

Dr. Dhananjaya Bhanja, Life Member, WAVES, India & Sub-Editor, Vishwasya Vrutant Newspaper. 

स्वतंत्रता भारत की सतता

– प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

इंग्लिश में है इंडिपेंडेन्स, 

उर्दू में आज़ादी;

अपनी भाषा स्वतंत्रता की, 

दिल मानवतावादी। 

इन का मतलब इन्साइड से,

अर्थ आत्म बल वाला;

डिपेंडेन्स से निर्भरता की,

सभी पिरोएँ माला।

आत्मनिर्भर, इंडिपेंडेन्स,

दोनो जुड़वा भाई;

अर्थ समझ में आ जाये,

फिर कोई नहीं लड़ाई। 

आज़ादी कुछ और बात है,

ज़ादी ज़द से बनता;

ज़द का अर्थ पिटाई होती,

जग ही पीड़ित रहता। 

आज़ादी पीड़ित लोगों की,

है गुहार कहराई;

इसमें रोष ग़ुबार बड़ा है,

बोले और लड़ाई। 

स्वतंत्रता स्वावलम्बन है,

नींव आत्मनिर्भरता;

ऐसा तंत्र स्वयंभू बनकर,

जन कल्याणी बनता। 

भारत की मिट्टी से ऐसी,

परम्परा में जान है;

इसीलिए भारत की गरिमा,

जग में बनी महान है। 

भारत में तो भा का रत है,

भा सूरज की कांति है;

जहाँ के लोग सृजन में रत हों,

वहीं वास्तविक शांति है। 

भारत का ये वैदिक दर्शन,

कला ज्ञान विज्ञान है;

इसी का अनुयायी जग सारा,

भारत तभी महान है। 

विषरि गए ये प्रथा हम अपनी,

चक्रवर्त सम्राटों की;

रक्षा वाट जोहती वसुधा,

हमीं पथिक उन वाटों की। 

स्वतंत्रता दिवस ये पावन,

उसी प्रथा की शान है;

आओ मिल संकल्प लें फिर से,

स्वतंत्रता सम्मान है।

– Prof. Bal Ram Singh, Director, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

हमारा सपना ‘आत्मनिर्भर भारत’

डा. अपर्णा (धीर) खण्डेलवाल

माननीय प्रधानमंत्री के “आत्मनिर्भर भारत” मंत्र को जन-जन तक फैलाना है।

नूतन संकल्प-शक्ति के साथ इसे, नूतन पर्व के रूप में मनाना है,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥१॥

आत्मबल से गुँथा हुआ, आत्मविश्वास से भरा हुआ।

आत्मनिर्भर भारतीय से ही, विश्वपटल पर भारत को चमकाना है,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥२॥

दिखा दो हे भारतवासियों! अपनी लग्न और कुशलता।

कर्मठता की पराकाष्ठा से ही होगा, सपना आत्मनिर्भर बनने का पूरा,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥३॥

अर्थ-केंद्रित समाज को मानव-केंद्रित बनाना है।

वैश्वीकरण का रूप बदलकर, विश्व को भारत के रंग में ढालना है,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥४॥

जीव मात्र का कल्याण जिसकी संस्कृति का चिंतन।

ऐसे भारत के संस्कार, जीवन-पद्धति में लाना है,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥५॥

विश्व-प्रगति और कल्याण जिसके ध्येय में हो ध्यान।

ऐसे भारत ने पढ़ाया, “वसुधैव कुटुम्बकम्” का पाठ,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥६॥

सुख, संतोष, सशक्त है, आत्मनिर्भरता के प्रतीक।

सजग भारत का सपना, इसी से पूरा करना है,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥७॥

ग्रामीण विकास से लेकर “Make in India” के द्वारा।

“Quality products” से “Supply-chain” को मजबूत करना, है भारत का दावा,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥८॥

“Vocal for Local” ज़रूरत नहीं, ज़िम्मेदारी है|

गर्व से प्रचार करो, Local को Global बनाने के लिये,  

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥९॥

अर्थव्यवस्था के पांच स्तम्भों (इकोनॉमी, इंफ्रास्ट्रक्चर, सिस्टम, डेमोग्राफी और डिमांड) पर खड़ा यह नया भारत।

रफ़तार से आधुनिकता के साथ, युवा ऊर्जा से सम्पन्न, भारत है डिमांड का क्षेत्र,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥१०॥

इन्हीं सपनों को साकार करने खड़ा हुआ है भारतवंश।

उम्मीद की किरण लिये गरिमामय है भारतवर्ष,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…..बनाना है॥११॥

छोटे से जीवाणु ने समस्त विश्व को किया है त्रस्त।

संकट के इस दौर से, उभारना है विश्व को,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…….बनाना है॥१२॥

ठान ले तो, कोई राहा, कोई संकल्प मुश्किल नहीं।

इस अवसर से हो सके तो, पुनः बना लो भारत को “सोने की चिड़िया”,

भारत को आत्मनिर्भर बनाना है…….बनाना है …..बनाना है॥१३॥

Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal, Assistant Professor, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth