मकरसंक्रान्ति, लोहड़ी और पोंगल पर्व

– डॉ. अपर्णा धीर, संयुक्त-सचिव, वेव्ज़-भारत

AP1bDr. Dhir is Assistant Professor, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA. She is associated with WAVES for more than ten years. Her research interests are Vedas and Indology. She authored a book “Yajurvediye Brahamano mein Jyotish ke Tattva” and has presented about 30 papers in various national & international conferences out of which three papers are awarded.  Some of her papers have published in journals.

भारतीय त्यौहार भारतीय संस्कृति के प्रतीक हैं। समय-समय पर मनाये जाने वाले इन उत्सवों द्वारा न केवल व्यक्ति के जीवन में नई उमंग की लहर आती है बल्कि इनसे हमारी संस्कृति के मूल तत्त्वों की सुरक्षा भी हुई है। भारतीय त्यौहारों  में कितने ही त्यौहार हमारे पूर्वजों ने ऋतु-परिवर्त्तन अथवा उपज को ध्यान में रखकर आरम्भ किये हैं। इसी परंपरा का अनुसरण करते हुए आज भी भारतवासी शीत ऋतु के मध्य जनवरी मास में मकरसंक्रान्ति, लोहड़ी और पोंगल नाम के तीन त्यौहारों को प्रतिवर्ष मानते हैं। एक ही अवसर पर देश के भिन्न-भिन्न प्रान्तों में मनाये जाने वाले ये तीनों त्यौहार आयोजन की दृष्टि से आपस में एक दूसरे से पर्याप्त भिन्न हैं परन्तु सांस्कृतिक दृष्टि से ये भारतीय मनोभाव की एकता के प्रमाण हैं।  

मकरसंक्रान्ति 
ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार राशियाँ बारह हैं वर्ष के बारह महीनो में सूर्य इन राशियों में चक्कर लगाता है। जिस दिन सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उस दिन को “संक्रान्ति” कहते हैं। जिस दिन को सूर्य मकर संक्रान्ति में प्रवेश करता है, उस दिन को “मकरसंक्रान्ति” कहते हैं। प्राय: प्रतिवर्ष जनवरी मास में १४ तारीख़ को ऐसा होता है। इस दिन सूर्य उत्तर की ओर घूमना प्रारम्भ कर देता है। हिन्दू शास्त्रों के अनुसार मकरसंक्रान्ति के दिन से देवताओं के दिन का प्रारम्भ होता है, जो अगले छह मास तक चलता है – इसे ही “उत्तरायण” कहते हैं। मकरसंक्रान्ति के अवसर पर उत्तर भारत में बढ़ी हुई सर्दी कुछ कम होने लगती है, नदियों में स्नान करना संभव हो जाता है तथा देश के कई भागों में सरसों, तिल, मक्का, दाल, चावल और गन्ने की नई उपज बाज़ारों में आ जाती है। मकरसंक्रान्ति पर्व भारत के कुछ भागों में “खिचड़ी” या ” संक्रान्त”  के नाम से मनाया जाता है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान कर अपने इष्ट देव के दर्शन कर दाल-चावल की खिचड़ी, तिल, गुड, घी, नमक आदि पंडितों और याचकों के लिए दान करते हैं और स्वयं भी खिचड़ी खाते हैं। पुराणों  में तिल-दान पाप से मुक्त करने वाला बताया गया है और तिल शीत ऋतु में लाभकारी भी होती है। स्नान शुद्धि का वाचक है, तो दान लोक-कल्याण का। 
लोहड़ी 
मकरसंक्रान्ति की पूर्वसंध्या पर पंजाब और हरियाणा प्रदेशों में धूमधाम से “लोहड़ी” नामक त्यौहार मनाया जाता है। यह पंजाबियों का बहुत ही प्रिय त्यौहार है। लोहड़ी के कुछ दिन पहले से ही छोटे-छोटे बच्चे लोहड़ी के गीत जैसे, “सुन्दर मुंदरिये हो, तेरा कौन बिचारा हो” इत्यादि गाते हुए लकड़ियाँ या पैसे इकट्ठे करने लगते हैं। संध्या के समय लकड़ियों में आग जलाई जाती है। लोग अग्नि के चारों ओर चक्कर काटते हैं, उस पर रेवड़ी, चावल के बने चिवड़े, मक्का की खीलें आदि की भेंट चढ़ाते हैं और श्रद्दा से नतमस्तक होते हैं। आग के चारों ओर बैठकर सभी रेवड़ी, खीलें आदि खाते हैं और नृत्य-गीत द्वारा इस अवसर को उल्लासपूर्ण बना देते हैं। इस दिन गन्ने के रस से खीर विशेषत: बनाई जाती है। सर्दी की अधिकता को सूचित करने के साथ-साथ यह त्यौहार सर्दी से बचाने के लिए अग्नि के प्रति सम्मान और पूजाभाव व्यक्त्त करता है। सामूहिक रूप से मनाया जाने वाला यह पर्व परस्पर प्रेम और समानता का सूचक है।   
पोंगल
मकरसंक्रान्ति के अवसर पर तमिलनाडु और आन्ध्र प्रदेश में “पोंगल” नामक त्यौहार मनाया जाता है। पोंगल तमिल और दक्षिण भारत के लोगों का सबसे बड़ा पर्व है। मकरसंक्रान्ति के दिनों में तमिलनाडु में धान की फसल पककर तैयार हो जाती है। नए धान को कूटकर नया चावल नए घड़ों में उबाला जाता है और सूर्यदेव को अर्पित करके खुशियाँ मनाई जाती हैं। तमिल में “पोंगु” शब्द का अर्थ है उबालना। कुछ दूसरी चीज़ों के साथ विशेषकर दूध में उबाले गए चावल को तमिल में “पोंगल” कहते हैं इसीलिए यह पर्व “पोंगल” कहलाता है। “पोंगल” मूलतः फसल-सम्बन्धी त्यौहार है, जो तीन दिन तक  मनाया जाता है। पहला दिन “भोगी पोंगल” कहलाता है, यह सूर्य के दक्षिणायन पथ के अंतिम दिन मनाया जाता है। भोगी पोंगल पर पारिवारिक उत्सव, पूजा-पाठ, खान-पान एवं घरों की साज-सज्जा होती है। दूसरे दिन को “पोंगल” या “सूर्य पोंगल” कहते हैं, यही संक्रान्ति का दिन है। इस दिन नए धान को कूटकर निकाला गया चावल दूध, घी और गुड़ के साथ नए घड़ो में उबाला जाता है। बच्चे उन उबलते हुए चावलों के चारों ओर जुट जाते हैं और घंटियाँ बजा-बजा कर चिल्लाते हैं  “पोंगलो पोंगल”, “पोंगलो पोंगल”। इस प्रकार तैयार की गई खीर सूर्यदेव को अर्पित की जाती है। इस दिन गन्ना-चूसना आवश्यक समझा जाता है। तीसरा दिन “मट्टू पोंगल” कहलाता है। “मट्टू” का अर्थ है पशु। इस दिन खेती में उपयोगी विशेषत: बैलों की पूजा की जाती है, उन्हें नहलाकर रंगों से सजाकर उनके गले में घंटी और मालायें बांधी जाती है। बैलों के साथ-साथ अन्य पशु-पक्षियों को खाद्य-पदार्थ दिए जाते हैं। पोंगल-पर्व पर बैलों की भिड़न्त का रोमांचकारी प्रदर्शन भी होता है, इसे “जल्लीकट्टू” कहते हैं। पोंगल-पर्व की समाप्ति पर रात में भोज होता है, जिसमें सभी वर्ग के लोग बिना भेदभाव के सम्मिलित होकर प्रेमपूर्वक नई फसल के चावल खाते हैं।  
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इस प्रकार भारतवर्ष के भिन्न-भिन्न भागों में मकरसंक्रान्ति के अवसर पर मनाये जाने वाले ये तीनों त्यौहारों में विशेषकर सूर्य-पूजन का; स्नान का; दूध, चावल, गन्ना, गुड़, तिल जैसी खाद्य-पदार्थों का;  परस्पर नाच-गाकर उत्सव मनाने का महत्त्व है। अतः कृषिपरक समृद्धि और ऋतु-परिवर्तन के सूचक ये पर्व भारतवासियों की भावात्मक एकता के प्रतीक हैं।   
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हिन्दी की संपर्क भाषा शक्यता

– प्रोफेसर बलराम सिंह, सदस्य, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर, वेव्स

Dr Bal Ram Singh

Bal Ram Singh, Ph.D., Professor and President of the Institute of Advanced Sciences, has been Professor (1990-2014) of Chemistry and Biochemistry, and Biology, and the Founding Director (2000-2014) of Center for Indic Studies at UMass Dartmouth. At the Institute, he is also the Executive Mentor of the School of Indic Studies where his research includes Ayurvedic science and technology, Yoga and Consciousness, Vedic education pedagogy, and Vedic social and political traditions.

जहाँ पर भाषा किसी समाज की सभ्यता एवं संस्कृति की धरोहर तथा संयोजक होती है वहीं पर इसमे विविधता की क्षमता देश और काल की अनुकूलता को सम्बल देती है। भाषा की विविधता जिस तरह से भारत में दृष्टिगोचर होती है ऐसा किसी और देश में नही है। ऐसी अवस्था में संपर्क भाषा की नितांत आवश्यकता है। भारत के आज की राजनीतिक एवं सामाजिक सन्दर्भ में किसी एक भारतीय भाषा का संपर्क भाषा के रूप में उभरना सरल नही है। हिन्दी, ही इस प्रयोजन के लिए उपयुक्त है जो कि एक राष्ट्रीय एवं कार्यकारणी भाषा के रूप में संवैधानिक तौर पर प्रतिष्ठित है।

परन्तु इसे सर्वमान्य बनाने के लिए सरकार तथा समाज को कई गंभीर कदम उठाने होंगे। सर्वप्रथम इस विषय पर सार्वजानिक रूप से बौद्धिक चर्चाएं होनी चाहिऐ जिसमें हर वर्ग के लोगों को सम्मिलित करना होगा। चूँकि हिन्दी भाषा का विकास पहले से संघर्षमय परिस्थितियों में हुआ है, इसलिए इसमें परिस्थितियों के अनुकूलन की क्षमता अन्तर्निहित है। इस तरह हिन्दी में हिदुस्तानी भाषाओं से सम्बंधित भाषाओं के शब्दों एवं विचारों को समाहित करने की व्यवस्था पहले से ही विकसित है।  दूसरी बात जोकि ज्यादा जोर देने की है, वह यह कि हिन्दी भाषा को ज्ञान, विज्ञान, तथा व्यवसाय की औपचारिक भाषा बनाना होगा। यह क्षमता भी हिन्दी में इसके संस्कृत निष्ठ होने के कारण निहित है, परन्तु शासकीय, सामाजिक एवं प्रज्ञात्मक बल की आवश्यकता है। अंततः हिन्दी को संपर्क भाषा बनाने के लिए इसका वैष्वीकरण करना होगा जिससे यह प्रतिस्पर्धात्मक चरण से उठकर सार्वभौमिक रूप में स्वीकारणीय हो सके। इसके लिए भारतीय परम्परागत जीवन के सारभूतों को विश्व के समक्ष हिन्दी के माध्यम से रखना होगा।

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इस कार्य की सम्पन्नता के लिए एक विस्तृत रणनीति की आवश्यकता है। इसमे सर्वप्रथम है कि हिन्दी को केवल एक संपर्क भाषा के रूप मे ही देखा जाय, एक सांस्कृतिक भाषा के रूप मे नहीं।सांस्कृतिक उदगार के लिये भारत की क्षेत्रीय भाषाएँ पर्याप्त हैं। इस प्रक्रिया को अविलम्ब संबल हेतु यह आवश्यक है कि भारत की अन्य कई सांस्कृतिक भाषाओँ को हिंदी भाषा मे जोड़ने की प्रक्रिया तुरंत स्थगित कर दी जाय। इनमे मगधी, मैथिली, भोजपुरी, अवधी, ब्रजभाषा, बुन्देलखण्डी, हरियाणवी, इत्यादि भाषाएँ सम्मलित हैं, जिनका गौरव पूर्ण इतिहास, साहित्य, एवं सामाजिक उपयोगिता सदियों से चली आ रही है। जब से इन भाषाओ को हिन्दी में सम्मिलित कर लिया गया है, न केवल इन भाषाओं का विकास रुक गया है वल्कि उसके साथ ही इन भाषाओं मे सन्निहित संस्कृति भी दुबक कर रह गई है। हिन्दी सम्बंधित क्षेत्रीय भाषाओँ को अलग सम्मानित करने से अन्य क्षेत्रीय भाषीय लोगो का हिन्दी के प्रति विरोध भी कम हो जायेगा क्योकि ऐसी स्थिति में किसी एक क्षेत्र को भाषाई लाभ का तर्क प्रभावहीन साबित होगा।