आर्यों का आगमन : हीनता और बँटवारें का एजेण्डा

Sh. Alok Kumar Dwivedi

हरियाणा के हिंसार जिले में सरस्वती और दृषद्वती नदियों के शुष्क क्षेत्र में स्थित राखीगढ़ी, सिंधु घाटी सभ्यता का भारतीय क्षेत्रों में धालवीरा के पश्चात् दूसरा विशालतम् ऐतिहासिक नगर है। 5th September, 2019 को प्रतिष्ठित पत्रिका ‘Cell’ में प्रकाशित शोध An Ancient Harappan Genome Lacks Ancestry from Pastoralists and Iranian Farmersने भारतीय पुरातन ऐतिहासिक विमर्श को नया आयाम प्रदान किया है। राखीगढ़ी से प्राप्त एक नर कंकाल जो कि लगभग 2500 ईसा०पू० का है, के डी०एन०ए० जाँच के बाद Deccan College of Archaeology के प्रो.वसन्त शिंदे तथा डी.एन.ए. वैज्ञानिक डा. नीरज राय ने दावा किया कि हड़प्पा सभ्यता को विकसित करने वाले भारतीय उपमहाद्वीप के लोग थे। आर्य और द्रविड़ सभ्यता में संघर्ष के कोई निशान नहीं मिले हैं। आर्य भारतीय उपमहाद्वीप के थे तथा मोहनजोदाडो, हड़प्पा सभ्यता और वैदिक काल के लोग एक ही थे।यहाँ के लोग ईरान और मध्यएशिया में व्यापार और खेती करने गये थे|

मिथ्या प्रचार का कारण

2018 में इस अध्ययन से सम्बन्धित पहला ड्राफ़्ट निकला था जिसमें बताया गया था कि यहाँ मिले कंकालो में ‘R-1 A-1’ जीन नहीं पाया गया था जो कि मध्यएशिया में पाया जाने वाला एक सामान्य जीन है। यह इस बात को ग़लत ठहराती है कि भारत को संस्कारित, समृद्ध एवं कौशलयुक्त बनाने हेतु मध्यएशिया से आर्य भारत आए अर्थात् यह शोध आर्यों के आगमन के सिद्धान्त (Aryan Invasion Theory) को चुनौती देता है। इस शोध के अनुसार आर्य और अनार्य का भेद निरर्थक है। सभी लोग यहीं के मूल निवासी हैं। औपनिवेशिक युग में भारत में आर्य और अनार्य का भेद कर आर्य और द्रविड़ संघर्ष की बात कर यूरोपीय देशों ने एक ओर भारत में आन्तरिक फूट और हलचल करने का प्रयत्न किया तो वहीं दूसरी ओर ‘आर्य मध्यएशिया और यूरोप से आए’ ऐसा कहकर भारतीय स्थानीय लोगों के असभ्य होने का भी प्रचार किया। उनका उद्घोष था कि मध्यएशिया और यूरोप से आर्य भारत आकर यहाँ की बर्बर और असभ्य स्थानीय अनार्यों को दक्षिण भारत की ओर खदेड़ दिया तथा भारत के उत्तरी भागों में वेदों और अन्य ग्रंथो की रचना कर ज्ञान का प्रसार किया। इस प्रकार यूरोपियों की चाल यह साबित करने की थी कि भारतीय ज्ञान परम्परा एवं मनीषा यहाँ बाहर से आयी है। अंग्रेज़ों ने 16वीं शताब्दी में इंग्लिश ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में अपने आगमन को आर्यों के द्वितीय आगमन (2nd Aryan Invasion) के रूप में प्रदर्शित करना प्रारम्भ किया। इस प्रकार अंग्रेजों ने यह प्रचारित किया कि भारतीय लोग असभ्य, बर्बर, अवैज्ञानिक तथा रूढ़िवादी हैं। अतः बाइबिल की मान्यता के अनुसार उनका यह दायित्व है कि वे इन्हें सभ्य बनावें। इसके साथ ही आर्यों के आगमन सिद्धांत के सहारे उन्होंने आर्य-अनार्य, बाहरी वनाम स्थानीय एवं आर्य – द्रविड़ के मध्य संघर्ष को हवा देकर अपनी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति को सफल बनाते रहे। पर यह नवीन खोज भारतीय परम्परा, विरासत एवं संस्कृति के उन्नत स्तर को स्थापित करने एवं स्थानीय वनाम बाहरी के आपसी विवाद को समाप्त करने की दिशा में इतिहास को नए रूप में विचार हेतु विमर्श एवं लेखन का अवसर प्रदान करती है।

वास्तविकता

सिंधु घाटी सभ्यता जो (5000-3500) ई०पू० पूरे विश्व की प्राचीनतम सभ्यता मानी जाती है। उसकी विशेषता है कि यह एक नगरीकृत सभ्यता थी।उस समय विश्व के अनेक भागों मे अनेक सभ्यतायें थी- सुमेर सभ्यता (2300-2150) ई०पू०, बेबेलोनिया सभ्यता (2000-400) ई०पू०, ईरान की सभ्यता (2000-250) ई०पू, मिस्र की सभ्यता (2000-150) ई०पू०, ग्रीस (यूनान) की सभ्यता (1450-150) ई०पू० इत्यादि। इन सभी में सिंधु घाटी सभ्यता सर्वाधिक विकसित थी। भवन निर्माण हेतु वास्तुकला, चित्रित धूसर मृदभाण्ड, रथ, आभूषण बनाने की कला, स्नानागार, कृषि का ज्ञान, अनाजों के संरक्षण की व्यवस्था इत्यादि सिन्धु घाटी सभ्यता की उत्कृष्टता को प्रदर्शित करते हैं। इस प्रकार भारत प्रारम्भ से ही विभिन्न क्षेत्रों में अग्रणी रहा है और वेद, उपनिषद, ब्राह्मण, आरण्यक इत्यादि भारत के स्थानीय लोगों द्वारा ही रचित हैं, ऐसा विचार नवीन शोध उद्भाषित करती है। अतः यह अतिशयोक्ति नहीं कि आने वाले समय में Aryan Invasion Theory के स्थान पर Out of India को स्वीकार किया जाने लगे कि विश्व में ज्ञान का प्रचार भारत से ही हुआ। आर्य और द्रविड़ को प्रजाति के आधार पर विभाजित करना भी अब वर्तमान वैज्ञानिक शोध के अनुसार अमान्य है। कैम्र्बिज विश्वविद्यालय के Estonian Biocentre के निर्देशक  Prof. Kivisild T, तातूर विश्वविद्यालय के शोधछात्र तथा ज्ञानेश्वर चौबे ने अपने अनुसंधान में यह सिद्ध किया कि सारे भारतवासी जीन अर्थात् गुणसूत्रों के आधार पर एक ही पूर्वजों की संताने हैं। आर्य और द्रविड़ का कोई भेद गुणसूत्र के आधार पर नहीं मिलता तथा जो आनुवंशिक गुणसूत्र भारतवासियों में पाए जाते हैं वे डी॰एन॰ए० गुणसूत्र दुनिया के किसी भी अन्य देश में नहीं पाए जाते। इस प्रकार आर्य कोई प्रजाति जो बाहर से भारत आए ऐसा नहीं है वरन इसका अर्थ है कि श्रेष्ठ आचरण करने वाला जिसमें श्वेत, पितरक्त, श्याम, अश्वेत सभी लोग शामिल हैं –

महकुलकुलीनार्यसभ्यसज्जनसाधव: (अमरकोश 7/3)

इस प्रकार भारतीयों में उनकी समृद्ध विरासत एवं ज्ञान परम्परा के प्रति हीन भावना विकसित करने का षड्यन्त्र यूरोपियों द्वारा किया गया, जिसके प्रभाव में तत्कालीन बौद्धिक वर्ग भी आ गया तथा जब उसे इस बात का एहसास हुआ तब तक काफ़ी समय व्यतीत हो चुका था तथा अंग्रेज़ पूर्णतया भारत को सभ्य बनाने के आधार पर यहाँ अपना साम्राज्य स्थापित कर चुके थे। अंग्रेज़ों ने इस कार्य को रणनीतिक रूप से अंजाम दिया। उन्होंने यहाँ की शिक्षा व्यवस्था को परिवर्तित कर यहाँ के ज्ञान परम्परा के प्रति लोगों में हीन भावना को विकसित किया।

इसके प्रमाण मकाले की इस बात में है -“मैं भारत के कोने-कोने में घूमा हूँ तथा मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा दिखाई नहीं दिया जो भिखारी हो, चोर हो। इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी है, इतने ऊँचे चरित्रिक आदर्श और इतने गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता कि हम कभी इस देश को जीत पाएँगे, जब तक कि उसकी रीढ़ की हड्डी नहीं तोड़ देते और वह है इसकी आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक विरासत। इसलिए मैं प्रस्ताव रखता हूँ कि हम इसकी पुरातन शिक्षाव्यवस्था, उसकी संस्कृति को बदल डाले क्यूँकि यदि भारतीय सोचने लगे कि जो भी विदेशी है और अंग्रेज़ी है वह अच्छा है तथा उसकी अपनी चीज़ों से बेहतर है तो वें अपने आत्मगौरव व अपनी संस्कृति को ही भुलाने लगेंगे तथा वे वैसा बन जाएँगे जैसा हम चाहते हैं – एक पूरी तरह से दमित देश”.

मिथ्या विचार स्थापन का प्रभाव

अंग्रेज़ों की इस कूटनीति के फलस्वरूप हमने अपने ज्ञान परम्परादर्शन, अध्यात्म, यौगिक विधियों इत्यादि के प्रति हीनभावना (Inferiority complex) विकसित कर ली तथा यूरोपीय ज्ञान एवं जीवन-पद्धति को अधिक विकसित मानते हुए उसका अंधानुकरण करना प्रारम्भ कर दिया। इस क्रम में यूरोपीय शक्तियों ने भारत में उपलब्ध संस्कृत ग्रंथो का अपनी भाषा में अनुवाद किया तथा महत्वपूर्ण जानकारियो एवं शब्दों को लैटिन से उत्पन्न हुआ स्वीकार किया जाने लगा। भारतीय वनस्पतिशास्त्र, जड़ी बूटियों एवं विभिन्न आयुर्वेदिक पौधों को लैटिन नाम दिया गया तथा इस प्रकार भारतीय वनस्पतिशास्त्र के ज्ञानपरम्परा की चोरी सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने भारत से मसालों के व्यापार के रूप में करना प्रारम्भ किया। मसालों के लिए वे विभिन्न प्रकार के वनस्पतियों एवं पौधों को अपने देश ले जाते, वहाँ पर संस्कृत के अनुवादित ग्रंथो के आधार पर वे उनका प्रसंस्करण कर अपना पेटेंट कराकर सारे यूरोप में अपने नाम से बेचते थे। इसके प्रमाण गोवा में पुर्तगालियों के जाने के पश्चात् वहाँ मिले कुछ अभिलेखों एवं पत्रव्यवहारों के रूप में सुरक्षित हैं। इस रूप में यूरोपियों का प्रमुख उद्देश्य एक योजनाबद्ध तरीक़े से भाषा को लैटिन में परिवर्तित कर एक तो भाषाई उपनिवेशीकरण करना था तो वहीं दूसरी तरफ़ श्रेष्ठ एवं उन्नत विचारों को अपने यहाँ से उत्पन्न प्रदर्शित करना था। इस रूप वे सम्पूर्ण विश्व में अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करना चाहते थे तथा इसको बल प्रदान करने में ईसाई मान्यताओं ने भी काफ़ी सहयोग किया।ईसाई खोज का सिद्धांत यह कहता है कि यदि चर्च के नाम पर किसी का अधिकरण किया जाता है तो वह चर्च की सम्पत्ति मानी जाएगी। इसी क्रम में वे मानते थे कि सम्पूर्ण विश्व असभ्य और बर्बर है तथा इन्हें सभ्य बनाने की ज़िम्मेदारी उन्हीं की है।

इसी प्रकार 1950 के दशक में जिस जैविक खेती को पिछड़ा माना जाता था तथा यूरिया इत्यादि का व्यापक प्रचार किया गया उसे ही अब रिवर्स इजीनियरिंग के नाम पर अच्छा घोषित किया जा रहा है। भारत में कुम्भ जो की प्रत्येक 12 वर्ष पर आता है को एक अवैज्ञानिक मान्यता के रूप में विदेशियों ने अस्वीकार किया, वैज्ञानिक खोजो के पश्चात् यह सिद्ध हो गया कि यह कुम्भ आयोजन बृहस्पति के सूर्य के चक्कर लगाने के आधार पर मनाया जाता है तथा बृहस्पति सूर्य का एक चक्कर 12 वर्ष में पूर्ण करता है। यूरोप में यह माना जाता था कि भारी धातुओं का शरीर में पाया जाना शरीर के लिए नुक़सानदेय है परंतु भारतीय आयुर्वेदशास्त्र इस बात को लेकर स्पष्ट एवं वैज्ञानिक रहा है कि किसी एक ही धातु के आकार में भिन्नता होने पर उनके गुणधर्म बदल जाते हैं। इसी के आधार पर नैनो कणों को आयुर्वेदिक उपचार हेतु प्रयोग में लाया जाता है। इस प्रकार विभिन्न रूपों में नाम परिवर्तित कर भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विचारों की चोरी पाश्चात्य देशों द्वारा की जाती रही है। जॉन कबाँर्ड जिन जो कि ध्यानविज्ञान के संस्थापक माने जाते हैंने विपश्यना को सचेतनता (Mindfullness) के रूप में प्रचारित किया जबकि उन्होंने यह ख़ुद स्वीकार किया कि उन्हें यह ज्ञान सत्य नारायण गोयनका से प्राप्त हुआ जो कि भारतीय थे। इसी प्रकार भारतीय योगनिद्रा को Stanford  के स्टीफ़न लाबर्स ने ल्युसिड ड्रीमिंग के नाम से प्रचारित किया अब स्थिति यह है हम अंग्रेज़ों एवं पश्चिमी लोगों द्वारा दिए हुए नामों से ही अपनी विरासत को जान रहे हैं तथा इसे उन्हीं का मानकर व्यवहार कर रहे है (द्रष्टव्य – Rajiv Malhotra’s Breaking India)।

अतः आवश्यकता है कि हम अपनी संस्कृति, सभ्यता, ज्ञानपरम्परा, व्यवहार इत्यादि के प्रति बाहरी लोगों द्वारा बनाई गयी कृत्रिम हीनभावना का त्याग करें  तथा इसके रहस्यों को समझते हुए आने वाली पीढ़ी को हस्तांतरित करने का प्रयास करें। हमें इन सब के लिए अपनी समृद्ध विरासत एवं ज्ञान विज्ञान की परम्परा को समझकर तथा स्वीकार कर आने वाली पीढ़ी हेतु संरक्षित करने की आवश्यकता है।

Sh. Alok Kumar Dwivedi, Senior Research Fellow, Philosophy, University of Allahabad, Prayagraj

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