वैशाखी पर्व पर जलियाँवाला बाग की नृशंसता की शताब्दी (एक पुस्तकीय पुनर्वाचन)

Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal and Dr. Rishiraj Pathak

उत्सव-प्रधान भारत देश में अन्य पर्वों के समान वैशाखी पर्व का भी विशेष महत्त्व है| जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है कि यह पर्व वैशाख मास से सम्बद्ध है| ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जिस मास की पूर्णिमा को विशाखा नक्षत्र पड़े, वह मास वैशाख मास कहलाता है| निम्नलिखित वचन इसके प्रमाण हैं –

’कार्त्तिक्यादिषु संयोगे कृत्तिकापि द्वयं द्वयम्| अन्त्योपान्त्यौ पञ्चमश्च त्रिधा मासत्रयं स्मृतम’||

                                                                                  (सूर्यसिद्धान्त, मानाध्याय, १४. १६)

’यस्मिन्मासे पौर्णमासी…तन्नक्षत्राह्वयो मास: पौर्णमासी तथाह्वया’।

(नारद-संहिता ३.८४)

ध्यान देने योग्य है कि मासों के नाम नक्षत्र तथा चन्द्रमा की युति के आधार पर रखे गये हैं और सूर्य के संक्रमण से मास का काल निर्धारित किया जाता है।

सूर्यस्य राशिगतिर्यत्र परिमीयते स सौर:।

सूर्य जितने समय तक एक राशि में रहता है, उसे सौर मास कहते हैं।

                                                        (कालमाधव, द्वितीय प्रकरण, पृ. ४५)

वर्त्तमान प्रचलन में वैशाखी पर्व १३ अथवा १४ अप्रैल को मनाया जाता है| इसका कारण है कि वैशाखी पर्व सौर मान पर आधारित है| जब भगवान् सूर्य मेष राशि में संक्रमण करते हैं तब मेषसंक्रान्ति होती है| सौर मान के अनुसार तभी नव वर्ष होता है| सौर मान सूर्य के अनुसार निर्धारित होता है| प्रति अंग्रेजी मास की १४ तारीख को सूर्य नयी राशि में प्रवेश करते हैं| इस प्रकार १३ अथवा १४ अप्रैल को सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं|

उल्लेखनीय है कि वैशाख मास को ’माधव’ नाम से भी जाना जाता है। इसका प्रमाण स्वयं यजुर्वेदीय संहिता ग्रन्थ हैं|

’…मधवे त्वा। उपयामगृहीतोSसि। माधवाय उपयामगृहीतोSसि। तपसे त्वा….’।

(कपिष्ठल-कठ-संहिता ३.५, काठक-संहिता ४.७.२९)

’मधुश्च  माधवश्च वासन्तिकावृतू’।

(कपिष्ठल-कठ-संहिता २६.९, काठक-संहिता १७.१०.२५-२८, मैत्रायणी-संहिता २.८.१२, तैत्तिरीय-संहिता ४.४.११, )

’मधवे स्वाहा माधवाय स्वाहा….’।

(वाजसनेयि-संहिता २२.३१, मैत्रायणी-संहिता ३.१२.१३ )

स्कन्दपुराण में ’माधव मास’ को सर्वोत्कृष्ट मास के रूप में वर्णित करते हुए उसका महत्त्व बताया गया है –

“न माधवसमो मासो….”

(स्कन्दपुराण वै. वै. मा. २.१)

माधव मास जैसा कोई अन्य मास नहीं है।

पुराणों में आए सूतजी और नारदजी के संवाद से वैशाख मास के महात्म्य को ज्ञात किया जा सकता है-  विद्या में वेद विद्या, मंत्रों में प्रणव, वृक्षों में कल्पवृक्ष, गायों में कामधेनु, नागों में शेष, पक्षियों में गरुड़, देवों में विष्णु, वर्णों में ब्राह्मण, प्रिय वस्तुओं में प्राण, मित्रों में भार्या, नदियों में गंगा, तेजस्वियों में सूर्य, शस्त्रों में चक्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णव में शिव, रत्नों में कौस्तुभमणि के समान है। भगवान् की भक्ति के लिए यह सबसे उत्तम मास है। इसमें आक, पीपल और वट वृक्षों की पूजा करते हैं। अन्न और जल के दान का विशेष महत्त्व है, प्याऊ आदि लगवाने से व्यक्ति अपने कुल का उद्धार करता है। इस मास में खड़ाऊँ, पंखा, छतरी आदि का दान दिया जाता है। वैशाख मास में केवल स्नान मात्र से मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर बैकुंठ को जाता है।

पंजाब में वैशाखी पर्व की विशेष महत्ता है| इस दिन १६९९ ई. में सिक्खों के दसवें गुरु श्रीगुरु गोविन्द सिंह जी ने खालसा पन्थ की स्थापना की थी| इस दिन पंजाब में तरन-तारन सरोवर में स्नान का विशेष महत्त्व है| ऐसी मान्यता है कि इस पवित्र सरोवर में स्नान करने से कुष्ठ जैसे असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं|

वैशाखी पर्व के इस पुण्यवर्धक अवसर पर अतीत की कुछ दुर्दान्त नृशंस घटनाओं का स्मरण हो जाना भी स्वाभाविक है| परतन्त्र भारत में १९१९ ई. की वैशाखी भारतीय इतिहास में अति अमानवीय घटना के रूप में प्रसिद्ध है| उल्लेखनीय है कि १३ अप्रैल १९१९ ई. को अमृतसर स्थित जलियाँवाला बाग में वैशाखी पर्व के अवसर पर भारतीय जन समूह अंग्रेजों द्वारा प्रवर्तित रोलेट एक्ट के विरोध प्रदर्शन में एकत्रित हो गया| जब यह बात जनरल डायर को ज्ञात हुई तो उसने अचानक वहाँ आकर अपने सैनिकों के साथ मिलकर निरपराध और निःशस्त्र भारतीयों पर गोलियां चलाईं| वहाँ १५ मिनट में १६५० गोलियाँ चलीं| जलियाँवाला बाग में आने और जाने का एक ही दरवाजा था, वहाँ डायर ने तोपें लगवा दीं और हमारे निःशस्त्र भारतीय मृत्यु यज्ञ की आहुति बनते रहे| अनेक लोग अपनी प्राणरक्षा के लिए कुँए में कूद गए| आज इस कुँए को शहीदी कुँए के नाम से जाना जाता है| मृत्यु के इस क्रूर नृत्य के साक्षी श्री ऊधमसिंह जी भगवान् की कृपा से सुरक्षित बच गए| श्री ऊधमसिंह जी ने प्रतिज्ञा की कि मैं निरपराध भारतीयों की हत्या का प्रतिशोध लेने के लिए डायर का वध करूंगा| श्री ऊधमसिंह जी ने अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण करने के लिए बहुत संघर्ष किया| उन्होंने धन प्राप्ति के लिए बढ़ई बनकर लकड़ी का काम किया और भगत सिंह जी से प्रेरित होकर बंदूक खरीदने के लिए विदेश चले गए, किन्तु लाइसेंस न होने के कारण उन्हें पाँच वर्ष की जेल हो गयी| जेल से बाहर आकर उन्होंने पुनः तैयारी की और लन्दन चले गए| वहाँ जाकर उन्होंने एक होटल में काम किया और बंदूक खरीदने के लिए धन जुटाकर बंदूक खरीद ली| श्री ऊधमसिंह जी अपनी वीरता और चतुरता का परिचय देते हुए बन्दूक को एक पुस्तक में गोपनीय ढंग से रखकर किंग्स्टन गए| किंग्स्टन में डायर का सम्मान समारोह चल रहा था, जहाँ श्री ऊधमसिंह जी ने उसके सम्मान समारोह के उपरांत सबके सामने गोलियाँ चलाकर डायर का वध कर दिया और जलियाँवाला बाग हत्याकांड का उल्लेख करते हुए अपनी प्रतिज्ञा की सार्थकता सिद्ध की| बाद में श्री ऊधमसिंह जी को फांसी की सजा हुई और वे सदा के लिए अमर हो गए|

आधुनिक संस्कृत काव्य परम्परा में इसी घटना को आधार बनाकर डा. ऋषिराज पाठक ने श्रीमदूधमसिंहचरितम् नामक ऐतिहासिक खण्डकाव्य की रचना की है, जिसे हिन्दी, अंग्रेजी, और पंजाबी भाषाओं में अनुवाद के साथ जलियाँवाला बाग घटना के शताब्दी वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रकाशित किया जा रहा है| प्रसादगुणोपेत यह काव्य सरल तथा प्रवाहमयी भाषा में लिखा गया है| इस काव्य में जलियाँवाला बाग की वैशाखी की घटना का जीवन्त वर्णन है| अंग्रेजों के रोलेट एक्ट के विरोध में भारतीयों द्वारा विरोधप्रदर्शन, डायर द्वारा नृशंस हत्याएँ, श्रीऊधमसिंह जी की प्रतिज्ञा, उनका संघर्ष और डायर का वध, काव्य में इन सभी घटनाओं का सजीव वर्णन है| इस काव्य की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं-

डायर द्वारा नृशंस हत्याएँ –

यदाङ्ग्लो डायरो दुष्टो विद्रोहं ज्ञातवानिमम्|

तदादिशद् विघाताय निःशस्त्राणां सभामहे||

डायरादेशतस्तत्र सेनया प्रहृतं ततः|

चक्ररूपभुशुण्डीभिरग्निगोलकवृष्टिभिः||

(श्रीमदूधमसिंहचरितम् २०-२१)

And when General Dyer came to know about the protest,

The sadist foreigner ordered for the massacre of the unarmed people.

On Dyer’s order, the army rained ammunition from the machine guns,

On the crowd, hapless and feeble. (20-21)

जब दुष्ट डायर को इस विद्रोह के विषय में ज्ञात हुआ तो उसने सभा उत्सव में निःशस्त्र भारतीयों के विनाश के लिए आदेश दे दिया| तदनन्तर वहाँ डायर के आदेश से चक्र के समान (घूमती हुई) आग की गोलियों की वृष्टि करने वाली बन्दूकों द्वारा सेना ने निरपराध भारतीयों पर प्रहार किया| (२०-२१)

ਪਤਾ ਲੱਗਾ ਅੰਗ੍ਰੇਜ਼ ਡਾਇਰ ਨੂੰ ਇਸ ਵਿਦ੍ਰੋਹ ਦਾ

ਦਿੱਤਾ ਹੁਕਮ ਨਿਹੱਥਿਆਂ ਦੇ ਵਿਨਾਸ਼ ਦਾ

ਉਦੋਂ ਚਲਾਈਆਂ ਗੋਲੀਆਂ

ਡਾਇਰ ਦੀ ਸਰਕਾਰ

ਮਾਰਿਆ ਨਿਹੱਥਿਆਂ ਭਾਰਤੀਆਂ

ਨੂੰ ਸੰਗੀਨਾ ਨਾਲ

ਡਾਢੇ ਕਹਿਰਾਂ ਨਾਲ॥20-21॥

(Punjabi Translation by – Dr. Gurdeep Kaur)

श्रीऊधम सिंह जी की प्रतिज्ञा –

नरसंहारसम्भारं दृष्ट्वा भीष्मप्रतिज्ञया|

ऊधमसिंहवीरोऽसौ संकल्पं कृतवान् दृढम्||

डायरं मारयिष्यामि नूनमेष दृढव्रतः|

एतदेवास्ति लक्ष्यं मे चिन्तयामास तद्गतः||

(श्रीमदूधमसिंहचरितम् २८-२९)

After seeing the massacre,

Udham Singh took a brilliant and firm vow,

“I will kill Dyer“, he swore,

And started contemplating about how to achieve it. (28-29)

उन वीर ऊधमसिंह ने नरसंहार के समूह को देखकर भीष्मप्रतिज्ञा पूर्वक ”मैं डायर का वध करूँगा”, यह मेरा दृढ़ व्रत है और यही मेरा लक्ष्य है, यह दृढ़ संकल्प किया और उसी प्रतिज्ञा के विषय में चिन्तन करना प्रारम्भ कर दिया| (२८-२९)

ਦੇਖ ਇਹ ਨਰਸਿੰਘਾਰ

ਊਧਮ ਸਿੰਘ ਨੂੰ ਆਇਆ ਰੌਹ

“ਮੈਂ ਡਾਇਰ ਨੂੰ ਮਾਰਨਾ,

ਇਹ ਮੇਰਾ ਲਕਸ਼ ਇਹੀ ਮੇਰੀ ਸੌਂਹ”॥

ਰੁੱਝਿਆ ਫਿਰ ਉਹ ਸੋਚਾਂ ਦੇ

ਕਿਵੇਂ ਵਿਉਂਤਣੀ ਹੈ ਸੌਂਹ॥28-29॥

आज हम भारत की गौरव पूर्ण परम्परा में वैशाखी पर्व के उल्लास का विस्तार करते हुए तथा अपने निरपराध भारतीय पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए वीर श्री ऊधमसिंह जी को सादर स्मरण करते हैं| साथ ही हमारा मानना है कि किसी प्रकार के संबंध बनाने के लिए अथवा लोकप्रियता के लिए आज जिस प्रकार सोशल मीडिया का प्रयोग किया जाता है, उसी प्रकार हो सकता है उस दिन वैशाखी पर्व पर एकत्रित हुए लोगो की सामाजिक सभा का राजनीतिकरण करने के लिए इस्तेमाल किया गया हो। अतः सामाजिक और धार्मिक समारोह का इस्तेमाल राजनीति के लिए करना अत्यंत खतरनाक सिद्ध हो सकता है और कलह का कारण बन सकता है।

[Author’s clarification – The person who opened fire in Jallianwala Bagh was Colonel Reginald Edward Harry Dyer who died in 1927 due to cerebral haemorrhage and arteriosclerosis. It was Sir Michael Francis O’ Dyer who was assassinated by Udham Singh in 1940 in London. O’ Dyer happened to be the Lieutenant Governor of Punjab at the time of the Jallianwala Bagh massacre and a supporter of the heinous crime. This tiny nugget of information has been excluded from the poem in order to maintain the tempo and brevity of it. However, it has been mentioned here because it is an important fact of modern day History.]

Dr. Aparna (Dhir) Khandelwal, Assistant Professor, School of Indic Studies, INADS, Dartmouth &

Dr. Rishiraj Pathak, Assistant Professor, Sanskrit, Shyama Prasad Mukherjee College, University of Delhi, Delhi

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3 thoughts on “वैशाखी पर्व पर जलियाँवाला बाग की नृशंसता की शताब्दी (एक पुस्तकीय पुनर्वाचन)

  1. ऋषि राज और अपर्णा के द्वारा प्रस्तुत यह आलेख मुझे अति सुंदर और भाव प्रधान लगा। इससे प्राप्त प्रेरणा अद्भुत है। धन्यवाद और शुभकामनाएं ।शशि तिवारी

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  2. I read the entire article…. it was informative esp that confusion of Gn Dyer!! The importance of the festival and the story behind sh udham singh was an eye opener! Keep up the good work!

    Liked by 1 person

  3. It is a wonderful Article,.Kudos to boh the authors Dr. Aparna and Dr. Rishiraj Pathak for bringing out such an article at the appropriate time i.e. completion of 100 years of the most heinous and inhuman act of massacre of innocent, helpless civilians during Baisakhi Parva. Prima facie it seems a subject matter of two articles. The reference work done and the description of Baisakhi Parva is noteworthy. At the same time remembering the historical event and paying tribute to Jallianwalla martyrs is very touching. Heartiest congratulations to Dr. Rishiraj Pathak for writing the historical epic in Sanskrit.The authors have indicated one very important message that politicizing any religious, cultural or social event ( as is being done presently through Social Media ) can be dangerous. Equally true is another message one gets from the article that any Foreign Rule can be impervious, insensitive and even inhuman to the set of social and cultural values of the local people and therefore they must have their religious, cultural and social freedom which should never be trampled upon by Authoritative Rule. The note given at the end of the article for clarifying the historical facts is appreciated for openness and transparency. It also brings home the truth that Authoritarian Rule can only spread Hatred and not establish Peace.
    Anand Gaikwad.

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