स्वतंत्रता की भारतीय शैली

-प्रोफ़ेसर बलराम सिंह

Independence का वास्तविक अर्थ आत्मनिर्भरता है। In का अर्थ है inside अर्थात् आत्मा के स्तर तक पहुँचना और फिर उसी पर निर्भर होना अथवा dependent हो जाना। जब व्यक्ति आत्मश: कार्यरत होता है तो उसका आत्मबल सदैव पुष्टित होता रहता है। उसके लिए सारा जग आत्मीय बन जाता है। वह ‘अयम निज: परोवेति’ की गणना लघुचेतीय समझता है। उसके अंत:करण में चिरक़ालीन उदारता झकोरे लेने लगती है, तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ के सम्मत भाव जागृत हो जाते हैं। यहाँ तक कि उनके यहाँ ‘संताने तनय व तनया’ तक न सीमित रहकर आत्मज और आत्मजा के रूप उत्पन्न होने लगती हैं अर्थात् आत्मबीज ही अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित. व फलित होता है। ‘अहम् ब्रह्म अस्मि’ की अनुभूति सार्थक हो जाती है। ये है independence की वास्तविक महिमा! ये एक दिन में सीमित नहीं हो सकता, ये तो कल्पों का माजरा है जनाब!!

bharat

Independence का दूसरा अर्थ है है स्वाधीनता, अर्थात् अपने को पूरी तरह से पहचान कर उसके आधीन हो जाना अथवा उसी की सत्ता के आधीन कार्यरत हो जाना। अपने को पहचानने का अभिप्राय है अपने धर्म को पहचानना, और उसी आधार पर गुण और कर्म निर्धारित करना। स्वधर्म की पहचान का तात्पर्य है अपनी प्रकृति को गहराई से समझना, बूझना, और परखना। जब व्यक्ति इस स्तर पर पहुँच जाता है तब अपनी प्रकृति को ही आधार बनाकर उसी में श्रद्धा एवं भक्ति से संलग्न होकर कर्म करता है। उसके अतिरिक्त कुछ नहीं करता। श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसका उद्धरण इस प्रकार किया है- ‘स्वधर्मे निधनम श्रेय: परधर्मों भयावह’, अर्थात् अपने धर्म के अनुसार आचरण में सबकुछ मिट जाना भी श्रेयस्कर है। यही नहीं किसी अन्य के धर्म अर्थात् प्रकृति का आचरण भयावह होता है इसलिए स्वाधीनता अत्यंत आवश्यक मानवीय दशा है जो मानव ही नहीं बल्कि पूरी समष्टि के लिए कल्याणकारी है।

Independence का तीसरा अर्थ है स्वतंत्रता अर्थात् अपना ही तंत्र होना चाहिए चाहे वो पारिवारिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, शैक्षिक हो, अथवा राजनीतिक हो। दूसरों की व्यवस्था यद्यपि उनके लिए कितनी भी उच्च एवं सराहनीय क्यों न हो किसी और के लिए तनावपूर्ण, बलाघाती, भयंकर कलह का कारण बन सकती है। अतः किसी भी देश को एक ऐसी व्यवस्था का सृजन करना चाहिए जिसके अंतर्गत हर एक व्यक्ति को सम्पूर्ण मुक्ति रहे कि वह व्यक्तिगत, पारिवारिक, तथा सामाजिक स्तरों पर अपने ही तंत्र के अनुकूल जीवन यापन कर सके। यह व्यवस्था बाह्य रूप से प्रारम्भ में अनेकता के सिद्धांत पर ही आधारित हो सकती है, अर्थात् कोई uniform civil code नहीं, कोई संविधान नहीं, कोई अधिवक्ता या न्यूनतवक़्ता नहीं, कोई AC में विराजित न्यायाधीश नहीं। मात्र धरातलीय प्रबुद्धजनो की आवश्यकता होती है जिनमे आचार विचार से आत्मबोध झलकता हो। वही सर्वभूतानाम की स्वतंत्रता सुनियोजित व  सुनिश्चित कर सकते है इसीलिए भारत ऋषियों का देश रहा है, स्वतंत्रता के लिए। आधुनिक स्वतंत्रता दिवस  को प्रेरणा का आधार मानकर स्वतंत्रता को शाश्वत बनाने के लिए संकल्पित हों, और इसी का पर्व मनायें आज and forever!! शुभम्

– Prof. Bal Ram Singh, School of Indic Studies, Institute of Advanced Sciences, Dartmouth, MA, USA

Advertisements

One thought on “स्वतंत्रता की भारतीय शैली

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s