वासन्ती पर्व ’होली’

 – डॉ. शशि तिवारी

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हमारी कृषि-व्यवस्था दो भागों में बँटी है―(1) वैशाखी, (2) कार्तिकी। इसी को क्रमश: वासन्ती और शारदीय फसलें कहते हैं। फाल्गुन पूर्णमासी वासन्ती फसल का आरम्भ है। होली पर्व का एक प्राचीन नाम ’वासन्ती नवसस्येष्ट’ है। यह मूलतया वसन्त ऋतु में नये अनाजों से किये जाने वाले यज्ञ कर्म (इष्टि) का नाम है। हमारी वैदिक परम्परा है कि  नवान्न को सर्वप्रथम अग्निदेव को समर्पित करते हैं, तत्पश्चात् स्वयं भोग करते हैं। वसन्त ऋतु में चना, मटर, अरहर एवं जौ आदि अनेक अन्न पक चुकते हैं। अत: उनको देवों को समर्पित करते हैं। चारों वर्ण परस्पर मिलकर इस विशाल यज्ञ को सम्पन्न करते हैं। आहुति देते हैं और परिक्रमा करतॆ हैं, यह यज्ञ की प्रक्रिया ही है।

संस्कॄत की परिभाषा ’तृणाग्निं भ्रष्टार्धपक्वशमी धान्य: होलक:’ के अनुसार तिनके की अग्नि में भुने हुए अधपके धान्य (फली वाले अन्न) को होलक कहते हैं। होली शब्द होलक से बना है। इसी कारण इस पर्व को ’होली’ या ’होलिकोत्सव’ कहते है। होली नवान्न वर्ष का प्रतीक है। लॊग प्रतिवर्ष सामूहिक रूप से होली जलाते हैं।

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(Source of Image : httpswww.jansatta.comlifestyleholi-2018)

ऋतुओं का सन्धिकाल रोग उत्पन्न करता हैं । होली का समय हेमन्त और बसन्त ऋतु का योग है। रोग-निवारण के लिए यज्ञ उत्तम साधन है। अत: होली जलने का संबन्ध फसलों के साथ-साथ ऋतु-परिवर्तन से भी है।

एक पौराणिक कथा होली जलाने को भगवान् से जोडती है―होलिका हिरण्यकश्यपु नामक राक्षस की बहिन थी। उसे यह वरदान था कि वह आग में नहीं जलेगी। हिरण्यकश्यपु का प्रह्लाद नाम का बालक पुत्र था जो विष्णु की पूजा करता था। पर हिरण्यकश्यपु पुत्र को रोकता था कि “तू विष्णु की  पूजा न कर मेरी पूजा किया कर“। जब वह नहीं माना तो हिरण्यकश्यपु ने होलिका को आदेश दिया कि वह प्रह्लाद को आग में लेकर बैठ जाये। होलिका प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठ गई,  वह जल गई और प्रह्लाद बच गया। तब से प्रह्लाद, होलिका तथा विष्णु की कथा की स्मृति में होली का त्यौहार मनाया जाता है l

होली उत्सव एवं यज्ञ का सांस्कृतिक प्रतीक है। स्वयं को प्रकॄति से जोड़ने का पर्व है।

आप सभी को इस उत्सव की हार्दिक शुभकामनायें।

डॉ. शशि तिवारी,अध्यक्ष, वेव्स -भारत 

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2 thoughts on “वासन्ती पर्व ’होली’

  1. Very good and informative article!

    But I beg to differ from learned author about Vasanta navanna ishti called Agrayaneshti. Yavagrayanam is done when new Barley crop is ready to be harvested. This will happen after Spring equinox. It is on 21 March as per Gregorian calender. This ritual is performed on the Pournima following this equinox. So in present times it is Chaitri pournima. Two thousand years back it was in Vaisakha pournima. And so on.

    Holi is presently in Falguna Purnamasa and at the changeover from Shishira to Vasanta.
    But was it always like that?

    Because of precession this Falguna Purnima is shifting. To be particular, in Vedic times of 5000-6000 BP this was the Uttarayan or Winter Solstice. In Shrouta Sutra period of 5000-4000BP this became the first month of Shishira. In Vedanga Jyotisha period along with Grihya Sutra this Falguna became the second month of Shishira. Now it has fallen in Vasanta First month.

    Soon we will have to revise our understanding of the festival of Seasons and apply a correction to Lunar months. We will have to understand the festival as being important for actual Season or Lunar month.

    Holaka is mentioned by Mimamsa Bhashyakar Shabarswami as Acharaprapta Karma done in only some Janapadas. Other example is Naibuka. Which is not known to me. He decrees there that these Sadachara has to be universal etc.

    I hope our blog users appreciate this highly rational approach to our sacred and mundane. Hindus must understand scriptures and science both. Then only will they be able to make required changes in cultural practices. Let us be leaders in adaptation and not remain static.

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