विज्ञान, कामरेड कन्हैया, एवं वेदांत

 

– प्रोफेसर बलराम सिंह, सदस्य, बोर्ड ऑफ़ डायरेक्टर, वेव्स

BRSडॉ. बलराम सिंह, प्रोफेसर एवं प्रेजिडेंट, इंस्टिट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड साइंसेज, डाटर्मॉउथ, यू एस ए, २५ सालों तक यूनिवर्सिटी ऑफ़ मेसाचुसेट्स, डाटर्मॉउथ, में केमिस्ट्री, बायोलॉजी एवं इंडिक स्टडीज के प्रोफेसर और डायरेक्टर रहे हैं। वे एक दर्जन पुस्तकों, ३०० रेसेरच आर्टिकल्स और करीब ४०० कांफ्रेंस प्रेसेंटेशन्स के लेखक रह चुके हैं।

9 फ़रवरी के जे एन यू के देशद्रोही नारों की घटना के बाद से ही कामरेड कन्हैया कुमार सिंह के बारे में बहुत कुछ सुनता आ रहा हूँ। बड़ी जिज्ञासा थी उनके बारे में जानने की विशेषरूप से जब से पता चला की वह भी मेरी तरह एक ग्रामीण क्षेत्र से है। 39 साल पहले मैंने भी गाँव से आकर जे एन यू में प्रवेश लिया था, यह बात और है कि मैं स्कूल ऑफ़ लाइफ साइंसेज में था और कामरेड कन्हैया कुमार स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज में। संभव है हम दोनों के अनुभव एक जैसे हों।

आखिर में कामरेड कन्हैया को शर्तिया जमानत मिलने के बाद पहली बार सुनने को मिला। मजा आ गया! कई कारण थे उसके। पहला तो कि उसने अपनी सारी बातें हिन्दी, वह भी ग्रामीण लहजे में कही। यह बात मुझे बड़ी भाई और मेरे अपने जे न यू में एडमिशन के इंटरव्यू का दिन याद दिला दिया। मैं स्कूल ऑफ़ लाइफ साइंसेज के 1977 तक के इतिहास में पहला व्यक्ति था जिसने हिन्दी में इंटरव्यू दिया था। दर असल पहले मेरे यह कहने पर कि मैं इंटरव्यू हिन्दी में देना चाहता था, मुझे  इंटरव्यू रूम से बाहर जाकर इन्तजार करने को कहा गया था। फिर काफी देर के बाद बुलाया गया और कहा गया कि अगर सवाल इंग्लिश मे पूछा जाय तो क्या मैं समझकर हिंदी में जबाब दे सकता था। मैंने यह शर्त स्वीकार करके इंटरव्यू दिया और सौभाग्य से मेरा सिर्फ एडमिशन ही नहीं हुआ बल्कि मुझे एडमिशन की लिस्ट में शीर्षस्थान भी प्राप्त हुआ।

rangoli
उन दिनों जे एन यू में हिन्दी बोलने वालों को हेय दृष्टि से देखा जाता था, तो अब कन्हैया को हिन्दी में भाषण देते देख मैं तो गदगद हो गया, वह भी यह देखकर कि ना कि सिर्फ कामरेड टाइप के विद्यार्थी समझ भी रहे थे बल्कि हंसकर तालियाँ बजाकर प्रतिक्रिया भी जाहिर कर रहे थे।

मैं कन्हैया कुमार को कामरेड इसलिए सम्बोधित कर रहा हूँ क्योंकि एक तो मैं एक सेमेस्टर के लिए एस एफ आई का चरनिया सदस्य हो गया था। दूसरे उनके भाषण, खासकर उनकी वैज्ञानिकों से संवाद की रूचि से कामराडरी (सहमारगिता) उत्त्पन्न हुई है।

अभी हाल में ही  (दिसम्बर 27 – 30, 2015) मैंने कुछ देश विदेश के शिक्षक साथियों के साथ ही एक अन्तराष्ट्रीय वेदांत कांग्रेस जे एन यू में संचालित किया था। उसके पहले विंटर सेमेस्टर 2015 में जे एन यू में ही संस्कृत में विज्ञान एवं तकनीकी नामक कोर्स भी पढ़ाया था। वेदांत कांग्रेस में कई सेसन विज्ञान और समाज की समस्याओं पर थे जो की जे एन यू समेत देश विदेश के प्रोफेसरों एवं विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत किये गये थे। उदाहरण के तौर पर ‘Vedantic Framework to Navigate through contention issue in contemporary science’, जिसे कि यूनिवर्सिटी ऑफ मासाचुसेट्स के प्रोफेसर सुकल्यान सेनगुप्ता ने प्रस्तुत किया था। Elizabeth Town College के प्रोफेसर जे फ्री लॉन्ग ने ‘Past life,  Memory, quantum Theory and Vedanta’ पर एक प्लेनरी प्रस्तुति की थी। यही नहीं एक पैनल डिस्कसन कामरेड के विशेष रुचिकर विषय ‘सामाजिक एवं आर्थिक समानता पर वेदांत की भूमिका’ के बारे में भी था, जिसमें डॉ. कौसल पवार, एक प्रतिष्ठित दलित शोधकर्ता, दिल्ली विश्वविद्यालय की अध्यापिका, जो कि जे न यू की एक शोध छात्रा भी रही है, एक एक्सपर्ट के रूप में शामिल हुई थी।

Vedant
कामरेड कन्हैया के भाषण से ऐसा लगा कि उन्हें वैज्ञानिकों से संपर्क एवं संवाद की कड़ी उत्कंठा है, इसलिए मैं अपनी अगली यात्रा के दौरान (मार्च 10 – 25, 2016) चाहूँगा कि हम लोग मिलें और उनके द्वारा चिन्हित शोषित वर्ग, महिलाएं एवं दलितों की समस्याओं पर विमर्श करें। यदि वे चाहें तो मैं जे न यू के वैज्ञानिकों को भी आमंत्रित कर लूँगा जिनमें Professor R. K. Kale (दलित वर्ग) और Professor Pramod Yadav (OBC) को भी शामिल कर लेंगे।

इतने सारे प्रयासों की तत्परता के बावजूद भी मुझे कुछ अनुभाविक शंकाए हैं। उन्हें भी सबके समक्ष रखना आवश्यक समझता हूँ। ज्ञातव्य हो कि 22nd वेदांत कांग्रेस में भाग लेने के लिए स्वामी रामदेव को जे एन यू के Rector की तरफ से निमंत्रण भेजा गया था और उसका तीव्र विरोध जे न यू छात्र संघ की उपाध्यक्ष शेला रसीद ने न कि केवल विश्वविद्यालय प्रशासन से किया था बल्कि वेदांत कांग्रेस के विदेशी प्रायोजकों एवं उनके संस्थानों को भी लिखित रूप में देकर किया था। इसका मुझे साक्षात ज्ञान है क्योकि मैं भी उन विदेशी प्रायोजकों में से एक था। मैंने शेला रसीद के पत्र का 29 दिसम्बर को जबाब देते हुए उन्हें भी विमर्श के लिए आमंत्रित किया था। आज तक उसका उत्तर नहीं आया है।

Ramdev

फिर भी उम्मीद है इस बदले माहौल में, जहाँ कामरेड कन्हैया के भाषण के समय तिरंगा लहराया जा रहा था, देश की बर्बादी के जंग की बात दूर-दूर नजर नहीं आ रही थी, और भारत के टुकड़े करने वाले कामरेडों को अगल बगल भटकने नहीं  दिया गया था चाहे वह माननीय न्यायाधीश के आदेशों के अंतर्गत ही क्यों न किया गया हो, कामरेड कन्हैया अपने ग्रामीण परिवेश वाले इस बड़े भाई बलराम से वार्ता जरूर करेंगे।

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One thought on “विज्ञान, कामरेड कन्हैया, एवं वेदांत

  1. I like your article. I also appreciate that you are willing to talk to Kanhaiya and Shela Rashid on social-political issues which they are raising. I expect the same from the present government. Till now nobody from the government met with these students and try to listen their views. Instead, they are trying to malign the students and institution image. Those who are trying to meet with them they are also termed anti-nationals. As it has been repeatedly said that nobody is supporting anti-national slogans, but the government should catch the real culprits. Now the report came indicating that those slogans raised by outsiders. We should ask the present government is it so difficult to catch those individuals?
    I think he has some valid point, although he is against RSS and BJP because of that he is charged with sedition. In my view, he has a thoughtful mind and serious about his views. I hope Kanhaiya and Shela Rashid accept your invitation and share their views.

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